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सोमवार, 12 सितंबर 2011

खबर वर्धा से.......' फिल्म फेस्टिवल के साथ सवाल रोजगार का' !

                                                                                          माफी के साथ अपनी बात को शुरू करूंगा...माफी इसलिए क्योंकि मै भारत की बहुत ही महान संस्था और व्याक्तियों पर टिप्पणी करने जा रहा हूं....दूसरे शब्दों में कहूं तो छोटी मुंह बड़ी बात करने जा रहा हूं......
विगत दिनों ( 6 सितम्बर से 8 सितम्बर ) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया...फिल्म समारोह की शुरूआत मशहुर फिल्म निर्देशक फिरोज अब्बास खान की फिल्म 'गांधी माय फादर' से की गई...और समारोह का समापन जानेमाने फिल्म अभिनेता ओमपुरी...जो हाल ही में रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के मंच से नेताओं के बारे में कुछ अच्छा-बुरा कहकर नेताओं के निशाने पर आ गये थे...उन्हींकी फिल्मों "पतंग" , "माई सन द फाइनेटिक" और "इस्ट इज इस्ट" जैसी फिल्मों को दिखाकर किया गया। देखने में सुनने में यह सब हर किसी को अच्छा लगा...फिल्मों से जुड़ी बारिकियां भी बतायी गईं....सूत्रों के हवाले से बहुत कुछ जानकारी मुझे भी मिली....मुझे मनोरंजन के दृष्टि से यह सब बहुत अच्छा लगा.....खबर देने वाला सूत्र गदगद था...उसके खुशी का ठिकाना नहीं था....कह रहा था कि मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि इतने महान फिल्मकार लोग मेरे सामने हैं....कुछ देर तक तो मेरे बगल में खुद ओमपुरी बैठे थे....तब मैने उससे कहा कि इंज्वॉय करो....जितना देख सकते हो देखो....जितना ध्यान से सुन सकते हो....कुछ सीख सकते हो सीखो....बेस्ट ऑफ लक.....कहने को तो मैने उसके लिए उत्साहजनक बातें कह दीं....लेकिन उसका उत्साह और उसकी खुशी मुझे शंका से भर रही थीं....कारण ये था कि इसी तरह का चकाचौंध और सब्जबाग 2-3 साल पहले मुझे भी दिखाया गया था.....मेरे सामने भी पुण्य प्रसुन वाजपेयी, राहुल देव, रेखा निगम, यशवंत देशमुख जैसे लोग आए थे....काफी कुछ सीखा था मैने इस बात से मैं इनकार नहीं कर रहा हूं....लेकिन कोर्स खत्म होने के बाद कोई काम नहीं आया....जो बड़े-बड़े सपने आंखों के सामने तैरते थे...वे सपने ही रह गये.....कुछ दिन तक तो विश्वास ही नहीं हुआ कि अब हम लोग....सपने दिखाने वाली संस्था के लिए बेगाने हो गये हैं.....किसी ने ये कहा कि मैनें तो पहले ही कह दिया था कि यहां आने का मतलब नौकरी की गारंटी नहीं है....तो कोई जवाब देने के डर से अदृश्य ही हो गया...खैर इन संस्थाओं के पास इतना पैसा होता है....इतने बड़े-बड़े लोगों के नाम जुड़े होते हैं कि ये देश से ही नहीं विदेशों से भी किसी को भी बुला सकते हैं....लेकिन प्लेसमेंट के समय जाने कहां चली जाती है इनकी शक्ति.....इनका पैसा और इनका परिचय....? महात्मा गांधी हिंदी विवि की खासियत है कि यहां कम फिस में उच्च शिक्षा दी जाती है...कुछ प्रोफेशनल कोर्स जो एक सामान्य घर का लड़का पैसे की कमी से नहीं कर सकता...यहां वह सुविधा उपलब्ध है..कम फिस में कर सकता है....वहां एम फिल के छात्र को 3000 रूपया महीना और पीएचडी के छात्र को 5000 रूपया महीने की छात्रवृत्ति हर छात्र को दी जाती है...केन्द्रीय विवि होने के नाते ये सुविधा जो कि विवि दे रहा है...अगर हर जगह मिले तो कहना ही क्या.....जी थोड़ी सी तारीफ के बाद मैं मूल बात पर आ रहा हूं कि अगर कोर्स कम्पलीट हो जाने पर वहां के मीडिया जैसे कोर्सों को करने वाले छात्रों को यदि कहीं किसी समाचार पत्र या न्यूज चैनल में नौकरी मिल जाए तो ही उन छात्रों की पढ़ाई सफल है....सभी को न सही 50 परसेंट को ही मिल जाए तो भी सही....लेकिन मुझे वहां के कुछ पास आउट स्टूंडेट्स से मालूम पड़ा है कि स्थिति इतनी सुखद नहीं है....रोजगार के मामले में यहां भी बहुत कुछ किस्मत और कनेक्शन ( जुगाड़ )पर भी निर्भर करता है......कुल मिलाकर मैं यही कहना चाहता हूं कि महज सुपरस्टार को देखकर कोई खुद को सुपरस्टार न समझ ले....मेहनत करे और संघर्ष के लिए तैयार रहे.....इस फिल्ड में हर किसी को पैसा और नाम नहीं मिलता.....पैसा और नाम तो दीपक चौरसिया....बरखा दत्त...प्रभु चावला जैसे कुछ गिने चुने लोगों को ही नसीब हो रहा है...क्योंकि उन्होंने ऐसे वक्त में शुरूआत की थी जब कोई टक्कर नहीं था...कोई नाम स्थापित नहीं था.....बाकियों की दाल रोटी का जुगाड़ हो जाता है....और वे इसी में खुश रहते हैं......हाँ एक बात और कहूँगा कि ये जो बड़े-बड़े स्टार लोग किसी भी विवि में आते हैं......अगर १-२ स्टुडेंट्स को हर साल ले जाते ...कुछ सिखाते कुछ बनाते तो उनका मेहनत जो कि वे विभिन्न विवि में जाकर करते हैं ....१०० फीसदी सफल हो जाता.....

2 टिप्‍पणियां:

  1. khbar bhai solha ane sahi hai mitr, isme galti un student ki bhi hoti hai.... jo ek dam shikhar bethna chahte hai bhai uchayi prapt karni hai... to mehnat to karni padegi

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  2. ललित ब्रदर.......समझाईश तो अब हमें खुद को देना है....सपने देखने वाले स्टूडेट्स आज भले ही कोई और है.......लेकिन बीते हुए कल में वो सपना हम भी देखा करते थे.......आज तक, एनडीटीवी, आईबीएन7, स्टार न्यूज, सीएनएन आईबीएन, टाईम्स नाऊ जैसे चैनलों में से किसी एक का भी आईडी हममें से किसी के पास भी नहीं है,,,,,,,हम रिपोर्टिंग का प्रैक्टिस किया करते थे.....जाने कब काम आयेगी वो प्रैक्टिस.....हमारे बीच कुछ उम्दा कैमरामैन और विडियो एडिटर भी हुआ करते थे....कहां गये सब लोग....हर कोई समझौते की जिंदगी जी रहा है मित्र.....राष्ट्रीय विवि से निकलकर क्षेत्रीय हो गये हम लोग......अब तुम मेहनत करो....तुम तो अंतरराष्ट्रीय विवि के टच में हो.....राष्ट्रीय लेबल का रूतबा हासिल करो।

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