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मंगलवार, 28 मई 2019

अफीम की खेती, अमन चैन बेमानी

आपने अफीम की खेती की है।अब भला सोचिए कि जो आपने बीज रोपित किए थे। उनमें मौसम के अनुसार आपने पानी दिया धूप दी, छांव दी और सब कुछ दिया। अब आप सोच रहे हैं कि इससे अमन चैन आएगा। यह बेईमानी नहीं तो क्या है। आप जब अफीम की खेती करेंगे, बीज रोपेंगे, पानी देंगे तो इससे जो हवा चलेगी। वह नशीली होगी। लोग जहरीले होंगे। वातावरण दूषित होगा। लोग पगला भी सकते हैं। उन्मादी भी हो सकते हैं। इसके परिणाम सामने आने लगे हैं। आपने क्या सोचा कि इसका असर दूसरों पर होगा। इसका असर हमारे लोगों पर नहीं होगा। इसका असर इतना अध्यापक होगा कि पूरे देश में आग लग जाएगी। अब आप देश में अमन-चैन, तरक्की, विकास कैसे सोच सकते हैं। यह सोचना आपकी भूल होगी। आप देश में तरक्की की बातें करके अपने आप को गुमराह कर सकते हैं या जनता को बेवकूफ बना सकते हैं। आप समझ रहे होंगे कि मैंने क्या किया है। मैंने अपने घर में ही आग लगाने का काम किया है और अब बुझाने के लिए पूरा तंत्र लगा रहे हो। पहले खेती करने से पहले, बीज रोपने से पहले आपने कुछ नहीं सोचा। परिणाम भले ही आम जनमानस को भुगतना पड़े, लेकिन इसका असर आप पर भी होगा। आप कतई न सोचा कि मैं चैन से सो जाऊंगा। इसमें न आप सो पाएंगे, न रह पाएंगे और न ही जी पाएंगे ऐसा मेरा मानना है।

गुरुवार, 15 मार्च 2018

'बेमेल गठबंधन' की जीत, भाजपा की हार- अब आगे ?


आदित्य कुमार मिश्रा -गोरखपुर।
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में सपा-बसपा के अघोषित गठजोड़ ने भारतीय जनता पार्टी को पराजित कर दिया है। इस परिणाम के पीछे सपा-बसपा के गठजोड़, गोरखपुर में योगी की पसंद का प्रत्याशी न उतारा जाना( ब्राम्हण-ठाकुर फैक्टर), योगी और मोदी के काम से जनता की नाराजगी जैसे अलग-अलग विश्लेषण समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों, वेबसाइटों और लोगों की जुबान पर आ रहे हैं।अगर गोरखपुर में योगी की पसंद का प्रत्याशी न उतारे जाने वाले तथ्य को सही माना जाए तो स्पष्ट है कि यह पराजय योगी और उनके नजदीकी समर्थकों के लिए अप्रत्याशित नहीं होगी, भाजपा भी इससे पूरी तरह परेशान नहीं होगी, लेकिन आम जनता और राजनीतिक विश्लेषक जिन्हें अंदरुनी ख़बर न हों उनके लिए यह परिणाम जरुर चौंकाने वाला दिख रहा है। विशेषकर गोरखपुर सीट का परिणाम, जहां से योगी आदित्यनाथ पिछले पांच बार लगातार जीत दर्ज कर चुके थे।

बात सपा-बसपा के 'अघोषित गठबंधन' की- 
यूं तो राजनीति में धर्म-जाति का बोल-बाला पूरे देश में देखने को मिलता है लेकिन यूपी-बिहार की राजनीति में धर्म और जाति सबसे असरदार फैक्टर के रुप में काम करता है। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि गोरखपुर के उपचुनाव में भी जातिवाद ने अहम भूमिका अदा की, जिसकी सूत्रधार रहीं बसपा प्रमुख मायावती। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट न जीत पाने, उ.प्र. विधानसभा चुनावों में महज 19 सीटों तक सीमित रहने और विपरीत परिस्थितियों में राज्यसभा से अपनी खुद की सदस्यता छोड़ने के बाद राजनीतिक रुप से काफी कमजोर स्थिति में दिख रही मायावती ने इस उपचुनाव को अवसर के रुप में लिया। गोरखपुर और फूलपुर दोनों ही सीटों पर अपना प्रत्याशी न खड़ा करके सपा प्रत्याशियों को बसपा का समर्थन दे दिया गया। जिसका परिणाम है कि योगी का अभेद किला 'गोरखपुर' ढह चुका है और प्रवीण निषाद के रुप में गोरखपुर की जनता को एक नया सांसद मिल चुका है और मायावती यूपी की राजनीति के केंद्र में आ गयी हैं। यूं तो राजनीतिक रुप से गोरखपुर हमेशा ही चर्चा में रहता है और योगी एवं उनके समर्थक हर बार लीड लिये रहते हैं लेकिन इस बार राष्ट्रीय राजनीति में गोरखपुर की चर्चा तो है लेकिन बढ़त विरोधियों के पास है। जीत अखिलेश के प्रत्याशियों की हुई है लेकिन जीत के केंद्र में मायावती हैं। भाजपा के खिलाफ गोरखपुर में मिली जीत से सपा, बसपा, कांग्रेस, राजद, वामपंथी दलों समेत एनडीए विरोधी लगभग सभी छोटे-बड़े दलों को संजीवनी मिल गयी है। गौरतलब है कि चुनाव परिणाम सामने आने पर अखिलेश यादव ने बसपा प्रमुख के घर जाकर उनसे मुलाकात की है। इस मुलाकात के दूरगामी परिणाम देखा जाए तो 2019 के आम चुनावों के लिए अखिलेश यादव को कांग्रेस के अलावा गठबंधन के लिए बसपा के रुप में एक मजबूत साथी मिल गया है। भाजपा द्वारा सपा-बसपा के इस गठबंधन को सांप-छूछूंदर का (असंभव) गठबंधन बताया जाता रहा है। लेकिन 14 मार्च 2018 को सपा-बसपा की इस जीत ने असंभव समझे जाने वाले इस गठबंधन की नींव डाल दी है। 2019 में अगर यह गठबंधन इस तरह का कोई भी उलटफेर करने में कामयाबी हासिल करेगा तो 2022 में भी यह प्रयोग जरुर दोहराया जाएगा....और उसके बाद आज का दिन (14 मार्च 18) योगी आदित्यनाथ और उनके समर्थकों के लिए न भूलने वाला दिन और कभी न भूलने वाली पराजय साबित होगा।

मायावती और अखिलेश की मुलाकात के मायने-
पहले मुश्किल समझे जाने वाले लेकिन अब व्यवहारिक दिख रहे सपा-बसपा के इस संभावित गठबंधन की संभावनाओं पर बात करें तो अखिलेश और मायावती को मिलकर तय करना होगा कि 2022 में दोनों में से किसके नेतृत्व में उ.प्र. विधानसभा का चुनाव लड़ा जाएगा। भले ही उपचुनाव में दो सीटें इन्हें मिल गयी हैं लेकिन 2019 में मोदी लहर से पार पाने के लिए इन दोनों में से किसी एक को 2022 की लड़ाई के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी का मोह छोड़ना होगा जो कि दोनों के लिए दुष्कर है। यह भी हो सकता है कि दोनों ही दल मोदी से घबराए अन्य दलों को साथ लेकर अपनी-अपनी सुविधा से उ.प्र. की सीटें आपस में बराबर-बराबर बांटकर चुनाव लड़ें और सरकार बनाने लायक परिणाम आने पर सबसे बड़े दल का नेता सीएम की कुर्सी संभाले। वहीं दूसरा नेता केंद्र की राजनीति करे। इसके लिए कांग्रेस का साथ लेना जरुरी है। कांग्रेस के लिए भी सपा-बसपा का साथ पाना मुहंमांगी मुराद पाने जैसा है। कांग्रेस चाहें जितनी सिकुड़ती चली जा रही हो लेकिन प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी ही सबसे बड़े उम्मीदवार दिखाई देते हैं। राहुल को पीएम बनाने के लिए कांग्रेस को समर्थन देकर माया-अखिलेश दोनों में से कोई एक (जो कि सीएम पद का मोह त्याग सका हो) समर्थन के बदले कांग्रेस से उप-प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या किसी दूसरे बड़े पद की मांग सकता है।

सपा-बसपा गठजोड़ पर क्या करेगी भाजपा-
2014 से छोटे-मोटे पराजयों को छोड़कर ज्यादातर मौकों पर सफल दिख रही मोदी-शाह की जोड़ी सपा-बसपा को इतनी आसानी से उनके ख्वाब पूरा नहीं करने देगी। सपा-बसपा के चाल और इरादे अभी से ज़ाहिर होने लगे हैं लेकिन मोदी-शाह कौन सी चाल चलेंगे इसका अनुमान लगा पाना सपा-बसपा के लिए कठिन है। दूसरी तरफ अगर ये बात सच है कि "गोरखपुर में उपेन्द्र शुक्ल योगी की पसंद नहीं थे, उन्होंने खुद तो शुक्ल के समर्थन में प्रचार किया लेकिन हिन्दू युवा वाहिनी और अन्य असरदार कारक इस उप चुनाव में निष्क्रिय रहे और चुनाव परिणाम योगी की इच्छानुसार आया" तो भाजपा के लिए ये एक और चुनौती है। तमाम चुनावी विश्लेषणों को देखें तो लगता है मानों योगी ये बताना चाहते हैं कि गोरखपुर सीट जो कि पिछले 29 सालों से लगातार मठ के परिधि में थी आगे भी मठ के परिधि (योगी की इच्छा) में ही सुरक्षित है। बाहर का व्यक्ति चाहें वह भाजपा का पुराना से पुराना कार्यकर्ता या पदाधिकारी ही क्यों न हो, वह गोरखपुर संसदीय सीट के लिए जिताऊ नहीं है। एैसी स्थिति में एक तरफ भाजपा नेतृत्व को सपा-बसपा से गठजोड़ से मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ मोदी के उत्तराधिकारी समझे जा रहे योगी से भी पार पाना होगा। 2022 का चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा। गोरखपुर में मोदी-शाह की जोड़ी योगी के सामने झुकने की बजाय यहां चुनाव का मोर्चा खुद हाथ में ले सकती है। 2022 जो कि स्वंय मोदी के कार्यों और वर्चस्व की परीक्षा होगी उसमें मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। मोदी के चेहरे के आगे बड़े से बड़ी बाधा दूर हो सकती है। योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी देते समय उन्होंने हर परिस्थिति का अनुमान लगाया होगा। वर्तमान परिस्थिति के लिए भी उनके पास कोई न कोई चौंकाने वाली चाल जरुर होगी। फिलहाल सपा-बसपा का गठजोड़ विपक्षी एकता में जान फूंक चुका है। विपक्षी दल अगर आपसी स्वार्थ को त्यागकर मोदी का विकल्प तलाशने का प्रयास करेंगे तो मोदी के लिए 2019 का मुकाबला आसान नहीं होने जा रहा है। योगी आदित्यनाथ भी इस बात से वाकिब होंगे कि 2019 का चुनाव अगर हाथ से निकल गया तो 2022 में दुबारा सीएम की कुर्सी हासिल कर पाना उनके लिए भी मुश्किल होगा। अखबारों-चैनलों और न्यूज वेबसाइट्स की माने तो फिलहाल योगी अपनी ताकत दिखा चुके हैं। अब मोदी-शाह की बारी है। इस बार योगी को मोदी-शाह का साथ देना होगा तभी 2022 उनके लिए सुलभ होगा।

सोमवार, 12 मार्च 2018

हैरान करते तुम युवा, विपिन की अनकही कहानी

विपिन सिंह राठौर की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं। पढ़ा-लिखा नौजवान जो कम बात करने का आदि हो कैसे डबल मर्डर कर सकता है। सोच कर स्तभ्ध था। लेकिन एक इच्छा भी जाग रही थी कि वे क्या कारण थे कि इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। मिर्जापुर माधौगढं जालौन। किशन किस्सू 9,10 वर्ष  , 97 हाईस्कूल प्रथम, 99 इंटर, बीएससी, mba लखनऊ, कानपुर सीपीएमटी कॉम्पटीशन डॉक्टरी लक्, ब्रजेन्द्र बड़े भाई, एकलौती लड़की 80 बीघा, पिता प्रधान मुन्ना सिंह , घटना  2009,10, शिमला तक आर्किल मटर बेचना

बुधवार, 4 जनवरी 2017

नोट बन्दी का आईना

5 राज्यों में होने वाले चुनाव मोदी सरकार की नोटबन्दी का आइना होगा। इसमें 16 करोड़ मतदाता लोकतंत्र के पर्व में भाग लेंगे। जो वोट की चोट से नोटबन्दी पर मुहर लगाएंगे। इसलिये ये चुनाव अहम हैं। अब 11 मार्च के दिन का ही इंतजार करना होगा।

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

नीतीश की नीति अब राष्ट्रीय राजनीति

सही समय पर सही मुद्दा उठाना किसी राजनीतिज्ञ के लिए के जरूरी पैमाना है। अगर दोनों में तालमेल नहीं बन पाया तो वही हश्र होता है जो बिहार में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा का हुआ। और तालमेल बैठ गया तो आप चमक जाते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री भी इन दिनों कुछ ऐसा ही तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे हैं।
बिहार में पूर्णशराबंदी के बाद अब पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की 50 फीसदी सीलिंग खत्म कर इसे बढ़ाने के मांग जाहिर करता है कि नीतीश कुमार का जोर अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर है। उन्होंने शनिवार को कहा कि पिछड़ों के लिए आरक्षण के वर्तमान मॉडल में बदलाव की जरूरत है। इसके लिए संविधान में जरूरी संशोधन भी होना चाहिए। आरक्षण के दायरे में दलित मुसलमान व दलित ईसाई के लोग भी शामिल हों। धर्म बदलने से इनलोगों को आरक्षण से वंचित नहीं कर सकते। निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग की
गत सप्ताह नीतीश कुमार की शराबंदी की घोषणा से जिस वर्ग के लोगों को राहत मिली है, उन्हीं लोगों को आरक्षण का यह मूद्दा सबसे ज्यादा आकर्षित करेगा। और यह तथ्य स्वीकार्य है कि सिर्फ बिहार ही नहीं देश में भी ऐसे वर्ग की तादाद सबसे ज्यादा है। नीतीश ने शराबबंदी और आरक्षण, इन दो मुद्दों को हवा दे दी है। इसलिए इनके राजनीतिक निहितार्थ पर भी चर्चा होनी स्वाभाविक है। दोनों ही मुद्दों का राष्ट्रीय महत्व है, जिनके कई राजनीतिक आयाम भी देखे जा सकते हैं। पहला यह कि नीतीश का जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना, जो उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में हर समय दखल देने का मौका देगा।
दूसरा, एक ऐसा मंच तैयार होने की प्रक्रिया को बल मिलना जो मुख्य रूप से पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए अगुवा हो। ठीक वैसा ही मंच जैसा सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव 2015 में चाह रहे थे। मुलायम मंच की अगुवाई का सपना देख रहे थे जो अब फिलहाल दूर की कौड़ी साबित होता दिखाई दे रहा है। खैर, अगर इस मंच के बनने की प्रक्रिया को रूप मिल जाता है तो संभवत: नीतीश कुमार ही इस मंच के सारथी बनें। वैसे मालूम हो कि एक मजबूत तीसरे दल जदयू, झविमो और अजीत सिंह के नेतृत्ववाले राष्ट्रीय लोकदल के विलय की बात चल रही है। अगर नीतीश ऐसे ही सामाजिक मुद्दों को भुनाते रहे तो कुछ और भी छोटे दल शामिल हो सकते हैं या उनसे रिश्ता बनाने में जदयू को सहूलियत हो। देश में भाजपा विरोधी तीसरे मोर्चे की गोलबंदी को इससे बल मिलेगा। नीतीश अगर पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बीच आधार विस्तार में सफल रहे तो ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, हरियाणा आदि प्रदेशों के छोटे दल साथ आ सकते हैं। इससे इन दलों को नीतीश को आगे रखकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी जताने में आसानी होगी। यह याद रखना भी जरूरी है कि नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा की मांग पर सभी पिछड़े राज्यों की तीव्र विकास की आकांक्षा को आवाज देने की कोशिश की थी। अपनी उस भूमिका के लिए उनके तरकश में अब एक और तीर आ गया है।
तीसरा, बिहार बनाम गुजरात मॉडल। नीतीश शराबबंदी का फैसला हो या फिर आरक्षण का मुद्दा दोनों ही गुजरात के मॉडल को चुनौती देता दिखाई दे रहा है या ये कहें कि बराबरी करता हुआ। नीतीश के फैसले और मांग सामाजिक न्याय के साथ विकास के नारे को मजबूत करेगा। पूर्ण शराबबंदी को प्रदेश के गरीबों खासकर महिलाओं का जिस तरह समर्थन मिला है, वह इस बात की पुष्टि करता है। चौथा, और सबसे बड़ा पहलू यह कि राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की छवि सकारात्मक होने के साथ-साथ मजबूत होगी। 1990 के दशक में और पिछली यूपीए सरकार के दौरान क्षेत्रीय दलों को विकास में बाधक बताया जा रहा था। इन्हें जातिवाद, पिछड़ापन, अपराधीकरण जैसी बुराइयों की जड़ बताया जा रहा था। अगर नीतीश का एजेंडा कुछ हद तक भी जमीन पर आ गया तो क्षेत्रीय दलों को विकास विरोधी कहना संभव नहीं होगा। इसके विपरीत अब राष्ट्रीय दलों से सवाल पूछा जा सकेगा कि उनके शासित प्रदेश अंतिम आदमी के बारे में कितने संवेदनशील हैं।

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

उस दिन ऐसा भी हुवा...

मेरी निगाहें दूर बैठे एक जोड़े पर अचानक जा टिकी। वहां पहाड़ों के सर बादलों के ऊपर से झांक रहे थे. दूर तक फैली पहाड़ियों को देखकर वे दोनों कुछ देर शांत रहते फिर अपनी चुप्पी जोरदार हंसी के ठहाकों के साथ तोड़ते। ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा. मैं दोनों को देखना चाह रहा था। अलबत्ता मैं उनके सामने जा खड़ा हुवा। दोनों मुझे देखकर हैरान थे और मैं उन्हें। क्यूंकि वो लड़का मैं ही था और वो लड़की दीपिका (हाँ वही ओम शांति ओम और राम-लीला वाली). मैं खुद को dekh कर हैरान था और दीपिका एक ही जैसे दो लोगों को देखकर। अब उस सीन में किसी एक को तो गायब होना ही था सो गया हो गया. मुलाकात का सिलसिला कुछ आगे बढ़ता तब तक लड़कियों का झुण्ड हाँथ में बैनर पोस्टर लेकर मेरे खिलाफ नारे बजी करने लगा. उनमें से एक लड़की मेरे पास आई. वो लड़की ए.बी.पी. न्यूज़ की एंकर थी. जितना दम था उतनी ताकत से उसने मेरा कान खींचा और उस भीड़ के सामने ले जा पटका। भीड़ में शामिल सभी का चेहरा एक जैसा था. पीछे मुड़कर देखा तो दीपिका नदारद थीं. ख़राब तो लगे गा न यार. फैन तो मैं उस एंकर का भी हूँ.

नारेबाजी के बीच में दिवंगत लेखक कालबुर्गी आ गये। और हम दोनों पर ऐठ गये. बोले खुद को बड़ा पत्रकार समझते हो. क्या मैं आज का गांधी था जो किसी गुमनाम गोडसे ने मुझे मार दिया। माथे पर गोली का निशान दिखाते हुवे बोले- मेरे सवालों का तुम जवाब दो... अचानक से हो रहा शोर शराबा शांत हो गया. अब बस दो ही लोग बचे थे मैं और कालबुर्गी साहब। कुछ कहता कि इससे पहले मुनव्वर राणा जी अपने कुछ साथी साहित्यकरों के साथ वहां आ धमके। कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सोचा भाग लेता हूँ कि इखलाक ने लंगड़ी मार के मुझे गिरा दिया। सुधींद्र कुलकर्णी और वो कश्मीर वाले विधायक मियां … शेख अब्दुल रशीद, बगल में खड़े होकर खीसें निपोर रहे थे. राणा साहब आये और बोले देश में कुछ शक्तियां फांसीवाद को पैदा करने में जुटी हुवी हैं और तुम मीडिया वाले समस्या पर नहीं टी.आर.पी के चक्कर में ही लगे हुवे हैं. फिर सब एक साथ बोलने लगे खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलवाने में गर्व महसूस करते हो लेकिन लोकतंत्र फांसीवाद में तब्दील में हो रहा है तो कुछ नहीं कर रहे हो. बस बहस पर बहस कराये जा रहे हो...


तभी ईश्वर ने मुझ पर कृपा बरसाई। सभी बुद्धजीवियों का घेरा थोड़ी देर के लिए ढीला हुवा और मैं भाग निकला। और जाकर जहाँ रुका वहां परीक्षा चल रही थी. देखा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी देश की वर्तमान स्थिति पर एक निबंध लिख रहे हैं. प्रणब दा ने निबंध पहले लिख लिया इसलिए उनका निबंध देश के नाम सम्बोधन के तौर पर सुनाया गया. कुछ दिन बाद मोदी जी की बारी आई. दोनों की टॉनिक देश को मिलने के बाद मैंने ये उम्मीद की कि अब कुछ दिन तक देश में कुछ नहीं होगा लेकिन तब पंजाब में हाय तौबा मच गयी. अभी एक दिन पहले जाति के नाम पर. देश का पहला व्यक्ति फिर टेंशन में आ गया. कल एकबार फिर उसने देशवासियों को समझाया। जब राष्ट्रपति साहब देश को समझा रहे थे उसी समय हिन्दू समाज के कथित ठेकेदार और सत्ता के लोभी स्वार्थी लोग जम्हाई ले रहे थे. काफी देर तक यह सब चलता रहा तभी एक ४ साल का बच्चा गिलास में पानी लेकर आया और जम्हाई ले रहे उन लोगों पर फेंक दिया। और रौद्र रूप में बोला- अब तो जागो, देश को हिन्दू, मुस्लिम या किसी जाति के लोगों के रहने लायक नहीं बल्कि इंसानों के रहने लायक बनाओ। फिर वह उगते हुवे सूरज की तरफ चल पड़ा... और यह कहता हुवा कहीं ग़ुम हो गया कि देश का ध्यान रखना। हमने इसे आदर्श देश बनाना है...