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सोमवार, 19 दिसंबर 2011

यूपी २०१२ के ताज का हक़दार कौन.... ?



उ. प्र. विधानसभा चुनाव जैसे - जैसे नजदीक आता जा रहा है वैसे - वैसे सभी राजीनीतिक दलों के दिल की धड़कने तेज़ होती दिख रही है हाल ही में स्टार न्यूज़ का नील्सन ओपिनियन पोल बताता है कि इस बार यूपी में बसपा कों भारी सीटों का नुकसान होने वाला है आंकड़े तो चौकाने वाले है ही इसमें कोई गुरेज नहीं है माया सरकार वैसे भी पहले से चर्चा में बनी हुई है आए दिन कोई न कोई उसका राज्यमंत्री लोकायुक्त की जाँच के घेरे में बना रहता है इसमें कोई दोराय नहीं है लेकिन एक बार फिर से मायावती के सबसे करीबी और कैबिनेट में नंबर दो कि हैसियत रखने वाले "नसीमुद्दीन सिद्दीकी" इस समय लोकायुक्त के शिकंजे में है नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर अपने "रिश्तेदारों कों गलत ढंग से ठेके दिलाने और सरकारी ज़मीन कों अवैध तरीके से कब्जाने का आरोप' है लोकायुक्त की जाँच के घेरे में है "राज्य के लघु उद्योग एवं निर्यात प्रोत्साहन मंत्री चन्द्रदेव राम यादव" जिन पर आज़मगढ़ जिले के बम्हौर गाँव के एक सरकारी स्कूल में वेतन लेने की बात कही जा रही है देश में अगर किसी राज्य सरकार के मंत्री लोकायुक्त की जाँच के घेरे में है तो वो है सबसे ज्यादा यूपी सरकार के, मानो ऐसा लगता है कि यह सिलसिला अभी रुकने वाला है नहीं विधानसभा चुनाव नजदीक आते- आते और भी कई मंत्री घोटालो की चपेट में आ सकते है घोटाला करने वाले मंत्रियो की फेहरिस्त ही इतनी लंबी है कि अंदाज़ा लगाना बड़ा ही मुश्किल है आखिर इन सबके मद्देनज़र अब सवाल मायावती की साख का भी है जो चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री है माया वैसे तो हमेशा से अपनी पार्टी के पाक साफ बताने लगी रहती है लेकिन एकदम से मायावती सरकार के ज्यादातर कैबिनेट मंत्रियो का लोकायुक्त की जाँच के घेरे में आना यह दर्शाता है कि कही न कही बसपा से कोई भूल हुई है जिसका खमियाजा अब उसे खुद भुगतना पड़ रहा है स्टार न्यूज़ नील्सन ओपिनियन पोल के ताज़ा आंकड़ो ने पार्टी के भीतर खलबली तो मचा ही दी है जिसके कारण पार्टी के हर मंत्रियो के चेहरे पर चिंता की रेखाये साफ देखी जा सकती है यूपी विधानसभा चुनाव में इस बार विपक्षी समाजवादी पार्टी फिर से बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आ रही है पिछले साल की अपेक्षा सपा 135 (+38 ) सीटों पर काबिज होती दिख रही है पूर्ण बहुमत के बलबूते सरकार चला रही बसपा 120 (-86) सीटों पर ही सिमट सकती है लगता है कही न कही बसपा फेक्टर बिखरता नज़र आ रहा है कहा तो यहाँ तक जाता है कि बसपा का दलित वोट बैंक हमेशा खामोश रहता है लेकिन वह कब पलट जाए कहना मुश्किल है


राजनीति के मैदान पर जन्म लेने वाले राहुल गाँधी और दलितों के घर खाना खाकर उनका ही गुणगान करने वाले, राहुल के साथ दलित फेक्टर पंजे से पंजा मिला सकता है ज़रा याद कीजियेगा 1985 के विधानसभा चुनाव कों जब कांग्रेस ने 425 सीटों में से 269 सीटे जीतकर एक नया इतिहास रचा था तब से लेकर अब तक कांग्रेस यूपी में हासिये पर चल रही है लगता है चुनावी मंदी की मार ने कांग्रेस कों कभी इस राज्य में उभरने ही नहीं दिया कारण जो भी रहा हो, जनता तो सिर्फ बदलाव चाहती है वैसे भी भूमंडलीकरण युग की इस जनता कों बार- बार एक ही व्यक्ति का चेहरे देखना शायद अच्छा नहीं लगता इसीलिए वह बदलाव चाहती है जिसकी भुक्तभोगी खुद कांग्रेस है इसीलिए यूपी के मैदान पर कांग्रेस कों एक नई ज़मीन तलाश करनी पड़ रही है लेकिन यूपी 2012 के चुनाव में कांग्रेस उभार ले सकती है कांग्रेस लगभग 68 (+48 ) सीटों पर काबिज होकर यूपी की राजनीति में खलबली मचा सकती है


राम नाम का जाप करने वाली बीजेपी भले ही बड़े -बड़े दावे करती हो लेकिन वह खुद ही यह तय नहीं कर पा रही है कि यूपी के मुख्यमंत्री पद के लिए किसे प्रमोट करे? बीजेपी की चिंता यही से शुरू होती है कि यूपी का दावेदार किसे बने जाए ? हालाकि इन सबके बीच बीजेपी 65 (+14 ) पर काबिज होकर एक नया खेल, खेल सकती है राजनीति का चिकना घड़ा कहे जाने वाले आरएलडी प्रमुख अजित सिंह या फिर यूँ कहे की घाट-घाट का पानी पीने वाले अजित सिंह न तो कोई लाभ उठाते दिख रहे है और न ही कोई नुकसान इनका तो हिसाब बराबर है पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी मात्र 10 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकते है वैसे भी उनके वोट बैंक का दायर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा है इससे आगे वे कही जा भी नहीं सकते आरएलडी का सपना है कि कब हरित प्रदेश बने और कब आरएलडी का सिक्का चले लेकिन उनके नल से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहर पानी निकलने वाला है नहीं यूपी 2012 का सपना संजोए अजित सिंह ने एक बार फिर से यूपीए के साथ गठबंधन कर लिया है, बताया तो यहाँ तक जा रहा है कि अजित सिंह यूपी की मात्र 50 -60 विधानसभा सीटों पर ही अपने प्रत्याशी उतारने वाले है लेकिन यूपीए के साथ गठबंधन करके एक बार से फिर अजित ने एक ओर नई चल चली है


जिस जाट वोट बैंक के आसरे अजित पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ गिनी चुनी सीटों पर काबिज होते है उन्ही सीटों के सहारे केंद्र और राज्य सरकार में अपनी घुसपैठ बना लेने में माहिर कहे जाते है लेकिन सवाल अब यही से एक और खड़ा होता है कि अजित सिंह आखिर कब तक जाटों पर राजनीति करके उनका बेवकूफ बनाते रहेंगे बागपत जिले की ज़मीन से ताल्लुक रखने वाले अजित सिंह, हर बार इसी जिले की लोकसभा सीट से चुनाव कर आते है बागपत जिले का नाम आज भी खून खराबे और लूट, हत्याओ जैसे मामलों में सबसे ज्यादा चर्चित रहता है मेरठ जिले से अलग जिला बने हुए बागपत जिले कों करीब एक दशक हो चुका है लेकिन इस जिले का सही से विकास नहीं हुआ है अजित सिंह ने अब तक कौनसा ऐसा बड़ा कार्य इस जिले के लिए किया है जिससे यहाँ के युवकों का बोद्धिक स्तर सुधरे, बागपत की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है


इस बार यूपी के महाभारत पर पूरे देश की नज़र बनी हुई है 403 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में चार पार्टिया के बीच चुनावी घमासान होने वाला है देखना यह है कि यूपी के इस कुरुक्षेत्र मैदान पर कौन बाज़ी मरता है ? ताकि यूपी 2012 का ताज उसके सिर पर हो









गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

आम आदमी से दूर होती सरकार......



विदर्भ की रामकली बाई इन दिनों मायूस है.... .....यह रामकली वह है जिसका एक बच्चा अभी एक साल पहले कुपोषण के चलते मर गया..... इस बच्चे की बात करने पर आज भी वह सिहर उठती है.... पिछले कुछ वर्षो में जैसी त्रासदी विदर्भ ने देखी होगी शायद भारत के किसी कोने ने देखी होगी......सरकार आये दिन गरीबो को अनाज के नाम पर कई घोषणा कर रही है लेकिन सच्चाई यह है कि गरीबो की झोपड़ी तक कोई अनाज नहीं पहुच पा रहा है जिसके चलते आज रामकली के बच्चे कुपोषण के चलते मारे जा रहे है......

महंगाई को कम करने के सरकार दावे तो जोर शोर से करती रही है लेकिन सच्चाई यह है कि देश में आम आदमी की थाली दिनों दिन महंगी होती जा रही है.....प्रधानमंत्री जहाँ ऊँची विकास दर और कॉरपोरेट नीतियों का हवाला देते नहीं थकते वही देश के वित्त मंत्री यह कहते है हमारे पास महंगाई रोकने के लिये कोई जादू की छड़ी नहीं है तो इस सरकार का असली चेहरा जनता के सामने बेनकाब हो जाता है......हद तो तब हो जाती है जब रिज़र्व बैंक 13 वी बार अपनी ब्याज दर बढाता है ताकि मार्केट में लिक्विडिटी बनी रहे .

इसके बाद भी आलम ये है महंगाई देश को निगलते जाती है और रामकली जैसे गरीब परिवारों के सामने रोजी रोटी का एक बड़ा संकट पैदा हो जाता है ..... आज यह जानकर हैरत होती है कि हमारे देश में भुखमरी की समस्या लगातार बढती जा रही है ...... यूं ऍन ओ की हालिया रिपोर्ट को अगर आधार बनाये तो कुपोषण ने हमारे देश में सारे रिकार्डो को ध्वस्त कर दिया है.....आपको यह जानकर हैरत होगी कि हर रोज तकरीबन ७००० मौते अकेले कुपोषण से हमारे देश में हो रही है.....सरकार खाद्य सुरक्षा कानून लाने की बात लम्बे समय से कर रही है लेकिन इसको पेश करने की राह भी आसान नहीं है......

मनमोहन और सोनिया की अगुवाई वाली सलाहकार परिषद् में इसे लेकर अलग अलग सुर है..... राजनेताओ को आम आदमी से कुछ लेना देना नही है ... अगर ऐसा होता तो आज हमारे ऊपर कुपोषण का कलंक नहीं लगता..... बढती जनसँख्या ने देश में खाद्य संकट को हमारे सामने बड़ा दिया है.....ऐसा नहीं है देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान उत्पादन नहीं हो रहा ॥ उत्पादन तो हो रहा है लेकिन फसल के रख रखाव के लिये हमारे पास पर्याप्त मात्रा में गोदाम नहीं है ...... इसी के चलते करोडो का अनाज हर साल गोदामों में सड़ता जा रहा है.... अभी इस बार मध्य प्रदेश में चावल का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ .... वहां के मुख्यमंत्री शिवराज परेशान हो गए है .... सी ऍम होने के नाते उन्होंने केंद्र को चिट्टी लिख दी ... उन्होंने कहा मध्य प्रदेश में रख रखाव के लिये पर्याप्त गोदाम नहीं है लिहाजा केंद्र सरकार इस अनाज के रख रखाव की व्यवस्था सुनिश्चित करे लेकिन देखिये केंद्र ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की .....


हमारे देश में केंद्र ओर राज्यों में अलग अलग सरकारे होने के कारन कई बार सही तालमेल नहीं बन सकता .... यही अभी मध्य प्रदेश में देखने को मिला ....कमोवेश यही हालात आज देश के अन्य राज्यों में है ......

यूनेस्को का कहना है भारत की गिनती दुनिया के सबसे कुपोषित देशो में हो रही है....लेकिन इन सबके बाद मनमोहनी इकोनोमिक्स ऊँची विकास दर और "भारत निर्माण " की अगर दुहाई दे तो यह कुछ हास्यास्पद मालूम पड़ता है .......हद तो तब हो जाती है जब इस देश में घोटालो के बाद एक घोटाले होते रहते है और हमारे प्रधानमंत्री अपनी नेकनीयती का सबूत देते नहीं थकते......देश की जनसँख्या तेजी से बढ़ रही है ... हाल ही में हमने १२१ करोड़ के आकडे को छुआ है अगर यही सिलसिला जारी रहा तो यकीन जानिए हम चीन को पीछे छोड़ देंगे... ऐसे में बड़ी आबादी के लिये भोजन जुटाने की एक बड़ी चुनौती हमारे सामने आ सकती है....

पिछले दो दशको में हमारा खाद्यान उत्पादन १.५ फीसदी तक जा गिरा है.... मनमोहन के दौर में हमारे देश में दो भारत बस रहे है... एक तबका ऐसा है जो संपन्न है ...वही एक तबका ऐसा है जो अपनी रोजी रोटी जुटाने के लिये हाड मांस एक कर रहा है.... याद कीजिये १९९० का दौर उस समय हमारा देश आर्थिक सुधारो की दहलीज पर खड़ा था.... नरसिम्हा राव की सरकार उस समय थी...उस दौर में हमारे देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान की खपत ४६८ ग्राम हुआ करती थी...

उदारीकरण के आज २० सालो बाद भी भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान उपलब्धता ४०० ग्राम हो गई है ....यही नहीं आप यह जानकार चौंक जायेंगे १९९० में प्रति व्यक्ति ४२ ग्राम दाल उपलब्ध थी वही २०११ में यह आकडा भी लुढ़क गया और यह २५ ग्राम तक पहुच गया .... यह आंकड़ा औसत है जिसमे मनमोहनी इकोनोमिक्स का संपन्न तबका भी शामिल है साथ ही वह क्लास भी जो रात को दो रोटी भी सही से नहीं खाता होगा... अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट कहती है देश की ७० फीसदी आबादी आज भी २० रूपया प्रति दिन पर गुजर बसर करती है.....ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है इस दौर में कैसे यह गरीब तबका दो समय का भोजन अपने लिये बनाता होगा ? ऊपर से यह सरकार २६ और ३२ की बहस चलाकर गरीबो क मुह पर तमाचा मारने पे तुली रहती है .........

देश में आज थाली दिन प्रति दिन महंगी होती जा रही है.....घरेलू गैस के दामो में भी सरकार अपनी मनमर्जी चलाती रहती है... यही नहीं तेल के दाम भी सरकार आये दिन बढाने का फैसला लेती रहती है जिसकी सबसे ज्यादा मार गरीब परिवारों पर पड़ती है ... इसके चलते लोगो करता जीना दुश्वार होता जा रहा है.....सरकार को तेल कंपनियों का घाटा पूरा करना है ... आम आदमी से कुछ भी लेना देना नहीं है .....


अगर आम आदमी से कुछ लेना देना होता तो उसकी तरफ सरकार ध्यान तो जरुर देती...... शायद तभी आम आदमी का अब यू पी ए २ से मोहभंग होता जा रहा है.....तेल और घरेलू गैस के दामो को बढाने का फैसला सरकार वैश्विक माहौल का हवाला देकर अक्सर लेती रहती है ....


ज्यादा समय नहीं बीता जब मुद्रा स्फीति रिकॉर्ड १२.२५ % पार कर गई जो अब तक की सबसे बड़ी दर है.... ऊपर से रिजर्व बैंक लोन की दर बढाने का फैसला कर मध्यम वर्गीय परिवारों को निराश करते रहता है .......अभी इस वर्ष देश का सकल घरेलू उत्पाद सात फीसदी के आस पास है ....जबकि यही पिछले साल ९ फीसदी के आस पास रहा था... आज आलम यह है कि रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट आते जा रही है... यह संकेत भारतीय आर्थव्यवस्था के डगमग रहने के संकेत के रूप में देखा जा सकता है ... सरकार मंदी की आहट के मुकाबले के लिए ऍफ़ डी आई लाने की हिमायती थी ताकि विदेशी निवेशक यहाँ के बाजार में आकर अपना पैसा लगा सके लेकिन २जी की आंच ने कारपोरेट को सहमा दिया है ....लिहाजा कई परियोजनायो के लिए एनओसी मिलनी मुश्किल हो चली है..........यानी पहली बार वह अर्थव्यवस्था औंधे मुह गिर रही है जिसकी बिसात पर मनमोहन ने उदारीकरण का सपना देखा था ..... ऐसे में कह पाना मुश्किल होगा कि मौजूदा दौर में जब सारे दरवाजे बंद हो चुके है तो रास्ता जायेगा किधर ?


मनमोहन के दौर में समाज में अमीर और गरीबी की जो खाई चौड़ी हुई है उसके पीछे बहुत हद तक हमारी खाद्यान प्रणाली जिम्मेदार है .....जबसे मनमोहन ने देश में उदारीकरण की शुरुवात की तबसे हर सरकार का ध्यान ऊँची विकास दर बरकरार रखने और सेंसेक्स बढाने पर जा टिका है .....आकड़ो की बाजीगरी आज के दौर में कैसे की जाती है ये हर किसी को मालूम है ....


वैसे भी यह बात समझ से परे लगती है आम आदमी करता सेंसेक्स से क्या लेना देना ? बीते २० सालो में एक खास बात यह देखने में आई है सरकार की विकास दर और गरीबी के आकडे दोनों तेजी के साथ बढे है .... सरकारी आंकड़ो में विकास ने "हाईवे " की तरह छलांग लगाई है लेकिन इस रफ़्तार ने कुपोषण , गरीबी, भुखमरी जैसी समस्याओ को बढाया है ....इस दौर में कृषि जैसे सेक्टर की हालत सबसे खस्ता हो गई......

शहरों में चकाचौंध तो तेजी से बढ़ी लेकिन गावो से लोगो का पलायन बदस्तूर जारी रहा .....आज आलम यह है कृषि में हमारी विकास दर दो फीसदी से भी कम है जो हमारे फिसड्डी होने को बखूबी बया कर रही है..... ..... किसानो को सरकार ने इस दौर में पैकेज भी प्रदान किया है .... यही नहीं बैंक भी किसानो की मदद के लिये आगे आये है लेकिन इन सब चीजो के बाद भी किसान परंपरागत खेती को छोड़ने पर आमादा है......साहूकार के दौर में किसानो पर जो कर्ज के कष्ट थे अब वह लोन के बाद भी ज्यादा बढ़ गए है.....

आकडे इस बात की गवाही देने के लिये काफी है किसान आत्महत्या का एक बड़ा कारण कर्ज रहा है... किसान पर कर्ज को चुकाने का बोझ इतना ज्यादा है वह समय से इसे नहीं चुका सकता .... वैसे भी भारत की कृषि को "मानसून का जुआ " कहा जाता है जो "इन्द्र देव " की कृपा पर ज्यादा टिकी हुई है......उस पर तुर्रा यह है हमारे प्रधान मंत्री इसे लाभ का सौदा बनाने के बजाय विदेशी निवेश बढाने पर आमादा है जिसकी वकालत शुरू से मनमोहनी अर्थशास्त्र करता रहा है......ऐसे में अपने किसान की खुशहाली दूर की कौड़ी लगती है ......


अपने घर खुशहाली नहीं रहेगी तो दूसरे से मदद मांगने से क्या फायदा.....? लेकिन मनमोहन अमेरिकी कंपनियों के ज्यादा निकट चले गए है ..... शायद तभी उन्हें अपने देश के पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री के नारे "जय जवान जय किसान " का एहसास इस दौर में नहीं होता......अगर ऐसा होता तो बीते सात सालो में ढाई लाख किसान आत्महत्याए अपने देश में नहीं होती......और ना ही कुपोषण का यूनेस्को का कलंक हमारे माथे पर लगता...................

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

Bellary Mining Scam - Lawmakers become lawbreakers_Network_PKG The politically powerful people have plundered the nation’s wealth. In other words we can easily narrate it as way this country is looted by these politicos all over, make Ghaznavis and Nadir Shahs look like small-time pick-pockets. ETV's special report on “Khablam Karlo or Khablam Bangara, Khablam is iron, Bangara is gold” which turned our lawmakers to into lawbreakers. Not only lawmakers & legislators but the people who meant to implement the law had also allegedly involved in violating the rules seemingly conveying the message that 'All that Glitter is not Gold' . Large number of MLAs or MPs in Karnataka are leading businessmen. The traders have seemingly entered to the portals of legislatures because they know that the policies are made by those who are sitting there. They themselves decided to become the legislators, instead of relying on an intermediary politician. They had a chit fund business. Reddy's came to the limelight during the Lok Sabha elections in 1999. They worked for Sushma Swaraj after she stood as a long-shot candidate in Bellary, against Sonia Gandhi. Though Sushma lost, she remained a patron of the Reddys. And by 2005 they had entered politics. Despite being influenced by Saffron party they developed close terms with the then Andhra Pradesh chief minister YSR. Through this, they found a ready-made uncle in Rajasekhara Reddy and a ready-made mother in Sushma Swaraj. Earlier, during the British there was mining going on in the state but the demand in the international market was very, very poor. Therefore they were practically on the verge of closure. Once they found out that Korea, Japan, China, had the technology of converting the ‘fines’ into higher steel & the countdown to the August 2008 Beijing Olympics gave the steel industry a boom. The Games witnessed the commissioning of huge infrastructure projects led to a hunger for steel in China. Mentionably, the iron ore found in Bellary is one of the finest in the world with an iron (Fe) content of 60-65 per cent, and is known as 64Fe. This ore is exported in its raw form to not only to China but also to countries like Japan, South Korea and Australia. After turning into strong leaders they care very little about law. The more money, power and political prominence they got they felt that they could do anything & everything. TDP chief N Chandrababu Naidu stated that YSR the then Andhra Pradesh CM had saved them for five years. He also revealed son of YSR, Jagan Mohan Reddy's connection with illegal mining. ' N Chandra Babau Naidu, TDP chief [BLOOD_AND_IRON-2] TCR (1:10- 2:00) VTS_01_1 VO4: They started working independently. They started expanding their activities like a mafia. Experts believes that 30 million tonnes of iron ore was looted from state. They would have excavated only as much as they could consume but because of the International market demand was huge, they without following the guidelines of Indian Bureau of Mines, they went on grabbing every possible place, even agricultural land. Indian Bureau of Mines (IBM) for inspected that about 103 mines there, out of these 95 are iron ore mines. In which out of 95 iron ore mines, two are sub-judice.Union Minister for Mines BK Handique has informed that whatever iron ore were exported, 70% are fines and 30% are lumps. 30 % lumps in the country itself out of the 70% fines, exported almost all. These fines, have no use for them. As the country don’t have the right technology & the energy is very costly here in India. Apart from political patronage, Reddy's have also got the support of former chief justice of Karnataka, Justice Dinakaran, who resigned recently,dealt with the number of cases of this mining mafia. He allegedly passed a series of orders in their favor. Justice Dinakaran allowed him to lift more then one lakh ton of iron ore from reserved forest. Senior Advocate Prashant Bhushan sharply reacted over that they have mined the border of Andhra-Karnataka. On paper, the Gali Reddy brothers do not own even a square inch of a mining lease in the state of Karnataka. However, they have promoted Obulapuram Mining Company, which has a mining lease in the neighbouring state of Andhra Pradesh. In Karnataka, the Reddy brothers and their associates have been accused of using strong-arm methods to control mining operations in the name of other lease-holders through illegal sub-leases and third-party ‘raising’ contracts .On the contrary, Janardhan Reddy claiming to be innocent from very beginning and stated that will resign if single evidence found against him. As much as 70 per cent of the total production had no market and then before the Beijing Olympics China went after infrastructure in a big way .The requirement of steel went up, accordingly the requirement of iron ore went up and when this boom came which led such a biggest mining scam. Money is a thing where political differences sink, the parties joined hands. Not only the politicos but the Justice also allegedly indulged in the scam claimed to be the biggest scam of Independent India, in terms of money.

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

जूता-चप्पल और चांटा मारने के इस दौर में.....












माफी के साथ, कह रहा
हूं कि बहुत खुशी होती है जब कोई गलत आदमी इसका शिकार होता है,,,,,,,लेकिन चुंकि यह गांधी का देश है---इसलिए यहां हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है,,,,,,,,,,और किसी भी कीमत पर इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि अगर कोई गलत आदमी इसका शिकार होता है...तो वह और उसके राजनीतिक समर्थक अपने प्रतिद्वन्दियों पर भी उसी अंदाज में हमला कर सकते हैं....कुछ दिन पहले तरह जिस हरविंदर सिंह नाम के एक भाई ने शरद पवार को थप्पड़ मारा था,,,,उसे खुद की राजनीतिक पार्टी खड़ी करनी चाहिए,,,,या फिर अपने विचारों से मेल खाने वाली पार्टी ( अंधे में कानी ही सही ) के साथ मिलकर काम करना चाहिए.....और जिस महंगाई और भ्रस्टाचार से आजिज आकर उसने क्रिकेट में व्यस्त रहने वाले एक केन्द्रीय मंत्री को चांटा मारा था ,,,उस महंगाई और भ्रस्टाचार को उसे ख़त्म करना चाहिए........खैर उसने जो काम किया था...वो उसे भगत सिंह की राह पर चलना समझ रहा होगा...लेकिन आज के युग में भगत सिंह बनना मुश्किल है,,,,आज एक नेता या राजनितिक पार्टी या अधिकारी गलत होता तो भगत सिंह की राह सही मानी जा सकता थी ...लेकिन यहां तो हर शाख पर उल्लू बैठा है....और आज के युग में जब सेना और पुलिस सरकार के हाथ में है वह उसका सही और गलत इस्तेमाल कर सकती है....जैसा कि हम बाबा रामदेव के मामले में दिल्ली के रामलीला मैदान में तमाशा देख चुके हैं,,,,ऐसे में इन उल्लुओं पर अहिंसा का हथियार ही कारगर होगा....वरना हरविंदर सिंह जैसे नासमझ और अतिउत्साही लोगों को नक्सली टाईप का या सस्ती लोकप्रियता के लिए काम करने वाला घोषित कर दिया जायेगा...कुल मिलाकर जूता, चप्पल और चांटा मारने के इस दौर में ख़ुशी की बात ये है कि हमारे पास अन्ना हजारे जैसे मार्गदर्शक मौजूद हैं....अन्ना हजारे २७ दिसम्बर २०१ से फिरसे अनशन पर बैठने वाले हैं......ऐसे में अन्ना जी का साथ हरविंदर जैसे लोगो को जरुर देना चाहिए......यूँ तो देश के ज्यादातर लोग अन्ना जी के साथ हैं और रहेंगे.....क्योंकि अन्ना जी जिस अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं..... उससे पुलिस उनको क्या उनके समर्थकों तक को छूने में हजार बार सोचती है..... रही बात अन्ना हजारे के कांग्रेस के विरोध में ५ राज्यों के प्रचार करने की तो .....वो करें, लेकिन एक बार वो इतना जरुर बताते चलें कि ईमानदार कौन है ...जनता वोट किसको दे....अगर बसपा को--- तो बलात्कारी विधायक किस पार्टी में हैं.....सपा को ---तो अमर सिंह जैसे दलाल कहाँ से पैदा हुए,,,,, बीजेपी को तो ---येदियुरप्पा किसके खेत की मूली है,,,,,लोकदल को तो---अवसरवादी और परिवारवादी कौन है........अन्ना जवाब दें न दें हम उनके साथ हैं........और देश के युवाओं और मीडिया वर्ग से गुजारिश और उम्मीद करते हैं कि वे अन्ना का साथ पहले की रह देंगे..डेल्ही से बाहर वालों रिजर्वेशन करालो ...डेट -२७ दिसम्बर , जगह-फिर वही -- दिल्ली का रामलीला मैदान......