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शनिवार, 4 दिसंबर 2010

दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं...

       शकील "जमशेदपुरी"

 अपने वजूद को दर्द से सजाए रखते हैं
 दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं

ये मेरे रात भर रोने की गवाही है
पत्तियों पर शबनम का जो पहरा है
इतनी सी बात कब समझेंगे वो  
जख्म दिल का तेरे प्यार से गहरा है

फिर भी तेरी तस्वीर दिल में समाए रखते हैं
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं

रात भर मैंने जो आसमां की निगहबानी की
                                      चांद और तेरे हुस्न की आजमाइश में
                                      और तुम जो जागती रही रात भर 
                                    खलल पड़ता रहा सितारों की नुमाइश में

अब तेरी तस्वीर को पलकों में छुपाए रखते हैं
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं

हम समझते थे वो समझती है खामोशी की जुबां
अब उनके समझ की इंतेहा हो गई
चुप रहने को बेहतर समझते रहे "शकील"
तेरी यही खामोशी एक दास्तां हो गई

जागते अरमां को अब सुलाए रखते हैं
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं

6 टिप्‍पणियां:

  1. ये मेरे रात भर रोने की गवाही है
    पत्तियों पर शबनम का जो पहरा है
    इतनी सी बात कब समझेंगे वो
    जख्म दिल का तेरे प्यार से गहरा है
    बेहतरीन रचना। हरेक लाईन पहले से बेहतर।

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  2. अमित चंद्रा और परमजीत जी....
    टिप्पणी करके हौसला अफजाई का शुक्रया.

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  3. kavita to acchi aapki dadhi bhi lajwab hai......bhai aapae gujarish hai ki rajnitik pariwarwad ke khilaf bhi likho.......

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  4. Aditya sir. Thanks for your copliment. U asked to write about politics. I will try to do so.

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