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शुक्रवार, 6 मई 2011

वीभत्स सच देखना हम लोगो ने छोड़ दिया हैं...

ये कौन है? किसी की माँ है, बेटी है, बहन है या फिर किसी का प्यार था. क्या प्यार करने का फल यही होता है?
दरअसल   नए ज़माने
 के  बीमारू प्यार का एक चेहरा यह भी है.
लड़कियां स्वतंत्र हुई हैं, घूम सकती है, अपना पक्ष रख सकती हैं, अपने फैसले खुद ले सकती हैं. लड़ सकती हैं अपने अधिकारों  के लिए, लेकिन इसकी लड़ाई कौन लडेगा ?    कुछ मानसिक बीमार लोगो की इस करतूत से आप आज के सच का दीदार कर सकते हैं. खैर इस फोटो को एक टक देखने की भी हिम्मत आप नहीं कर सकते, और किसी ने ये काम कर डाला. समाज के बीमार मानसिकता की परिचायक यह फोटो क्या कहती है, कुछ कहने की हिम्मत जुटा पाना ही मुश्किल लग रहा है.    लेकिन सच्चाई यही है की वीभत्स सच देखना हमने छोड़ दिया है.
(रांची में घटी यह घटना को कुछ दिन हुए हैं)

1 टिप्पणी:

  1. vivek.... bhia wakai ghatna to vibhtya hai mere bhi rongte khade ho gya hai nahi dekhi jati mujh se is trh ki photo dekhna ke liye sach ka samna kiya hai............... ye bat bilkul aapki thik hai ki ladkiyo ko padne likhne ki puri azadi hai bhartye sawindhan me har kisi ko ghunme firmne ki sawtantrta hai

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