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रविवार, 26 सितंबर 2010

बुढापे ने लाचार किया मांगने को अधिकार....

बुढापे ने लाचार किया मांगने को अधिकार.... (प्रकाशपाण्डये)लोकमतसमाचार(औरंगाबाद महाराष्ट्र)कुछ दिन पहले मैंने इस विषय पर काम किया है सो अपने अनुभव को अपने अंदाज में बयां कर रहा हूं. जरा गौर फरमाइगा..........इस सिलसिले में मैं औरंगाबाद के कई वृद्धा आश्रमों में भी गया था..जिसका निचो‹ड लिख रहा हूं....पूरा संदर्भ शायद सम्भव नहीं हैं. इसके पहले भी अंग्रेजी में एक ऑर्टिकल लिख चुका हूं लेकिन दुख है कि आप दोस्तों संबंधित विषय पर कोई टिका टिप्पणी नहीं करते हैं.. जीवित रहने दो मारों मत...........कैव्स प्रणाम आपकोयहां से प‹ढे..... .................
आंखों की झुरियां, बालों का सफेदपन यह बयां करता है कि जवानी की छटा हुजूर ढल गई है, बु‹ढापे ने दस्तक देना शुरू कर दिया है. खुद को सम्भलों और चलों आराम करों जो बीज तुमने अभी तक लगाया था उसका असल भोग करने का सही वक्त आ गया हैं. तन जाओं दोहन शुरू करों. यह तो पम्परागत हमारा अधिकार कहता है लेकिन जिस बीज को आपने पानी दिया है वह सत प्रतिशत फूला चुका हैं परंतु दुख इस बात की है कि आप ने कुछ ज्यादा ही पानी पीला दिया. यही कारण है कि वह आज आप से अधिक दिमागदार हो चुका है और आपको ही अस्वीकार करना शुरू कर दिया है. आप इस समय लाचार हो गए है, सारी क्षमताएं स्थिर और सिमटने लगी हैं.स्वावलंबी तो आप कतई नहीं रह सकते है. इसका भली भाति एहसास आपको अब तक हो ही गया होगा. खैर ऐसे वक्त में औलाद ही मुंह मो‹ड लिया है तो आप क्या कर सकते है. आपके दिल पर क्या गुजर रही होगी समझ सकते हंै. आपने अपनी हर इच्छाओं की तिलांजलि देकर अपने जिगर के टुक‹डे को उसकी पसंदीदा वस्तुएं समय-दर-समय मुहैया कराया, आज जब आप पर ही संकट के बादल मंडराने लगे है तो बेटे जनाब ने मुंह मो‹डना शुरू कर दिया. वाह खुदा तुने कैसे वक्त में ऐसे बच्चों को जन्म दिया था. सारी मशांए मानों खोखली मात्र रह गई हैं. बेटा जनाब क्या आपके बु‹ढापे का सहारा बनेंगे. लेकिन इस मॉडन दौर के कुछ दिमागदार सपूतों ने खुद को प्रमाणित कर दिया है कि वो औलाद नहीं धरती के अनचाहे अवसाद है जिसे इस धरती पर आने का कोई हक ही नहीं था. खैर आ ही गए है तो विषाद जरूर फैलाएंगे और आप बचकर कहा जाएंगे.जिम्मेदारियों का उन्हें कोई एहसास नहीं होता क्योंकि स्कूल से लेकर कॉलेज जाने तक आपने बच्चा हैं कहकर उसे जिम्मेदारी सौंपी ही नहीं. दायित्व को इन नवाबजादों ने पंचतत्व में विलीन कर दिया हैं. आज सबकुछ खोकर आप लोग स्वयं अपने अधिकार के लिए गि‹डगि‹डा रहे हैं तो क्या होगा. चलिएं दोहरे अर्थों को छो‹डकर साफ-साफ बात करते है. हालही में दिल्ली हाई कोर्ट में ७३ साल के एक बुजुर्ग ने अपने बेटे के खिलाफ अर्जी दाखिल कर अपने प्रोटेक्शन की मांग की. खैर यह पहला मामला नहीं होगा,ऐसे बहुतायत मामले हैं, जिसमें बुजुर्ग कभी प्रोटेक्शन की मांग करता है तो कभी गुजारा-भत्ते की गुहार लगाता हंै. लेकिन धन्यवाद भारतीय संविधान और न्यायालय का जिसने इस पूरे मसले पर ध्यान केद्रित करते हुए औलाद की कानूनी जिम्मेदारी को तय कर, इस संदर्भ विशेष के लिए निर्मित कानून के अंतर्गत नियम कायदों को बनाया. न्यायालय ने बुजुर्गों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए कुछ नियम कायदे बनाए जो उनके बुरे दिनों में संकट मोचन का काम करती हंै.नियम कायदे :औलाद अपने माता पिता को किसी भी रूप से परेशान कर रहा हो, चाहे वो शारीरिक उत्पी‹डन हो या मानसिक ऐसे स्थिति में बुजुर्ग को अपने हक के मद्देनजर स्थानीय थाने में पहुंच अपने बेटे के खिलाफ केस फाइल कर कार्रवाई की मांग कर सकता हंै. भारतीय संविधान में व्यक्ति विशेष की स्वतंत्रता के मद्देनजर कुछ मौलिक अधिकार बनाए गए हैं. अनुच्छेद-२१ के कहता है कि सभी को जीवन जीने की स्वतंत्रता दी गई हैं. किसी कारण वस व्यक्ति को यह लगे कि उसके इस स्वतंत्रता पर कोई किसी प्रकार का बंदिश लगा रहा हैं तो संबंधित स्थानीय पुलिस थाने में पहुंच प्रोटक्शन की मांग कर सकता हैं. अगर ऐसे में पुलिस सहयोग नहीं करती हैं तो बुजुर्ग कोर्ट में मामले को दर्ज करा कर प्रोटक्शन की मांग रख सकता हैं तथा उक्त पुलिस अधिकारी जिसने केस फाइल नहीं किया था के खिलाफ भी मामला दर्ज कर कार्रवाई की मांग कर सकता हैं. इसके अलावा भी बुजुर्ग कानून की सहायता लेकर अपने बच्चों को कानूनी रूप से मजबूर कर गुजारा भत्ता की मांग कर सकता है. संतान नहीं होने की स्थिति में जो भी व्यक्ति उसके जायदाद का वारिस बनता हैं, वह व्यक्ति उनका ख्याल रखेंगा. साथ ही उसके स्वास्थ्य एवं भरण पोषण पर ध्यान देगा. कुछ केस ऐसे भी सामने आते है जिसमें बुजुर्ग प्रॉपर्टी स्वयं के पास अर्जित रखता है और वह इसे विल के जरिए किसी शख्स के नाम कर देता है, तो उस शख्स जिम्मेदारी होती है कि वह उसका देखभाल करें. द मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैंरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट २००७ के तहत ट्रिब्यूनल का गठन किया गया. इस ट्रिब्यूनल में एडीएम लेवल का अधिकारी बैंठता है. सेक्शन-१७ के मुताबिक इस मामले में किसी वकील की आवश्यकता नहीं होती है. इसके अंतर्गत दोनों पक्षों को अपनी बात स्वयं रखनी प‹डती हैं. सेक्शन-५ कहता है कि अगर किसी कारण वस बुजुर्ग कोर्ट आने की अवस्था में नहीं है तो वह इस काम के लिए किसी अन्य को नियुक्त कर सकता है.
‘‘बु‹ढापा वृद्धा बचपन का पूर्ण आगमन हुआ करता है. कहा जाता है कि इस अवस्था में प्रवेश करने बाद व्यक्ति की इच्छाए एक बार फिर से जागृत होती हंै, और उसके बर्ताव में एक नटखटी बच्चे का स्वरुप दिखने लगता हैं. ऐसे में वह सोचता हैं कि कोई उसका ख्याल रखे पालन पोषण करें.ङ्कङ्क प्रेमचंद (बु‹ढी काकी )...............

2 टिप्‍पणियां:

  1. भारत में निरन्‍तर टूट रही परिवार संस्‍था के कारण यह हश्र हुआ है। पूर्व में हमारे बुजुर्ग परिवार संस्‍था के मुखिया थे लेकिन अब स्थितियां बदल गयी हैं। हमने पश्चिम की नकल करके परिवार तो तोड़ डाले लेकिन यह नहीं देखा कि पश्चिम में वृद्धों का पालन सरकार करती हैं। इसलिए या तो समाज को सुदृढ़ करो नहीं तो सरकार इस समस्‍या पर ध्‍यान दे।

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  2. yah sab paschat ka andhanukaran hai mere dost.. aage aage dekho hota hai kya..

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