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सोमवार, 2 अगस्त 2010

यायावर



आशुतोष शुक्ला के द्वारा ये कविता लिखी गयी है ....
दृश्य श्रव्य अध्यन केंद्र में प्रसारण पत्रकारिता के तृतीय समेस्टर के छात्र हैं .......
मेरे द्वारा लिखी हुई ये कविता किसी साहित्यिक योगदान के लिए हीं है , अपितु केवल एक भावना ैदा करती हैउस व्यक्ति में जो    माम तरह की बुराइयों में फंस कर अपने मूल लक्ष्य से भटक गया हो और एक आवाज़ चाहता होजो उसे नींद से जगा दे ...........

'
ये कविता एक आवाज़ है'.............

यायावर था मै कभी ,

ठहर गया हूँ अभी अभी

जैसे बाँध के सामने रुक जाती है कोई नदी ,

कुछ क्लेश था मन में बचा अभी

क्यों बंध सीमा में गया अभी

सत्यान्वेषण की राह में बाधाएं आती है कितनी

यह ज्ञात हुआ है मुझे अभी

मुझको दिखता है सत्यांश उस बंधन के कोने से कही

मुझमे दृढ़ता मुझमे भुजबल मुझ में नवयौवन का प्रवाह ,

मै भरा हुआ उत्साह से था उस बंधन ने जाना अभी

यह बंधन कुटिल बेड़ियों का लालच की जिसमे गाँठ पड़ी

जब मैंने वहां प्रहार किया बंधन टूटे गांठे जा उडी

फिर चल पड़ा मै उधर

जिसको लक्ष्य बनाया था कभी

तोड़ के साड़ी सीमओं को निकल पड़ा हूँ अभी अभी

यायावर हूँ मै अभी .....................

यायावर हूँ मै अभी ...............................

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut achhi kavita hai....aapne sochne par majbur kar diya hai....lekin aapko btana chahunga ki bandh se hi rok kar nadi ke pani se bijali banti hai....bandh se hi niyantrit karke nadi ko ek nischit disha di jati hai....bandh tut jane par badh aa jata hai....jaise ki is samay pakistan me aaya hai....pichale saal bihar me aaya tha.....ummid karta hu ki aap band ke mahtv ko samjhenge aur jindgi me khud aage badhenge aur any logo ko bhi prerda denge.....

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  2. bahut achhi kavita hai....aapne sochne par majbur kar diya hai....lekin aapko btana chahunga ki bandh se hi rok kar nadi ke pani se bijali banti hai....bandh se hi niyantrit karke nadi ko ek nischit disha di jati hai....bandh tut jane par badh aa jata hai....jaise ki is samay pakistan me aaya hai....pichale saal bihar me aaya tha.....ummid karta hu ki aap band ke mahtv ko samjhenge aur jindgi me khud aage badhenge aur any logo ko bhi prerda denge.....

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