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बुधवार, 16 नवंबर 2011

खास होकर भी आम हूँ


खास होकर भी आम हूँ
हाँ जो भी हूँ सरेआम हूँ
जिंदगी के छोटे छोटे सपनो को लेकर डुबती उभरती रहती हूँ
फौलाद सा ह्रदय लिए गिरती सवरती रहती हूँ
हर मोड़ पर मुझे लड़ना झगड़ना पड़ता है
हर बार गिरकर संभलना पड़ता है
कभी सागर के पर कभी अपनों के संसार में कहती चलती हूँ
हाँ हूँ मैं एक लड़की  जो सबसे  कहती चलती हूँ .
घर की चार दिवारी से निकल कर
मन में ख्वाबों का आशियाँ ले कर उडती चलती हूँ
हाँ हूँ मैं एक लड़की जो सबसे कहती हूँ
जब जब मेरी चेतना जागी
तो मैं उन लोगों से दूर भागी
जिन्होंने हर बार कराया अहसास
की तुम लड़का होती काश
तो तुम पे कोई न बांध पता अपना मोह पाश
चाहें जो भी हो मुझे इस तिलिस्म को तोडना होगा
मुझे हर उस बंधन को छोड़ना होगा
जो मुझे मेरे होने के अहसास से दूर करता
मुझे मेरे अस्तित्व को समझने परखने से रोकता है.  

1 टिप्पणी:

  1. वो कौन है जिसने तुमसे लड़का होने को कहा...मैं तो इंटर्नशिप के लिए गया था तो मुझसे कहा गया था कि काश तुम लड़की होते तो तुम्हारा कुछ किया जाता....अब बताओ तुम लड़की होकर रो रही हो...और मैं लड़का होकर रो रहा था.....बट डोंट माइंड ...लड़का-लड़की की बातें तो कविता-कहानी लिखने औप फिल्म बनाने के लिए होती हैं...लिखते रहो....मुझे लगता है एक लाइन पकड़ कर चला जाए तो मंजिल मिलेगी...मुझे लगता है कि आगे चलकर तुम महिला आयोग की अध्यक्ष बनोगी...बेस्ट ऑफ लक ..हा हा हा हा

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