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शनिवार, 6 नवंबर 2010

              माफ़ कीजियेगा पत्रकार किसीको नही चाहिए...

वर चाहिए---वधु चाहिए  .....डाक्टर चाहिए
                                          इंजीनियर चाहिए
                   प्राइमरी स्कूल का सरकारी मास्टर भी चलेगा
                   सेना का जवान तो दौड़ेगा
                   पुलिस  या  रेलवे में तो क्लर्क क्या चपरासी भी चल सकता है.................................................लेकिन लेडिज एंड जेंटल मैन, माफ़ कीजियेगा पत्रकार किसीको नही चाहिए..........................


 क्यूँ नही चाहिए ......इसका कारण ये है की पत्रकारों की स्थिति अब  वो नही रही जो पहले कभी हुआ करती थी........गली-गली जर्नलिज्म के फैक्ट्री खुलते जा रहे हैं...और मीडिया के लिए सस्ते दर  पे मजदूर आसानी से मिल जा रहे हैं........खैर कुछ लोग जो इत्तेफाक से सेटल हो चुके हैं......वो इंकार कर देंगे.....वो कहेंगा.....म्य्लोर्ड ये सब बकवास है लेकिन आपको यकीं दिलाने के लिए कि मेरी बात सही है ये कहानी काफी है........................................एक समाचार पत्र के सम्पादक महोदय हैं.....उनके दो लड़के हैं....एक है पत्रकार....बोले तो नई दुनिया में रिपोर्टर है....जबकि दूसरा जो कि उनका छोटा बेटा है ......प्राइमरी स्कूल में मास्टर है.....बोले तो उसने बीए के बाद बीएड  किया था......अब सम्पादक जी परेसान हैं कि उनके छोटे बेटे के लिए लड़की वाले आ रहे हैं ...कोई दस लाख तो कोई पन्द्रह लाख देने को तैयार है.....सम्पादक जी बहुत दुखी हैं क्योंकि पहले वो अपने बड़े बेटे कि शादी करना चाह रहे हैं ......उनकी समस्या ये नही है कि बड़े लडके के लिए कोई नही आ रहा है.....बल्कि मुख्य समस्या ये है कि 2 .5  -3  लाख से ज्यादा कोई दे नही रहा है .....जबकि लड़का जागरण मीडिया इंस्टिट्यूट नॉएडा से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट है ..........आगे आप समझ सकते हैं.....कि पत्रकारों को आम लोग इज्जत तो देते हैं....लेकिन समझते हैं कि झोला लेकर घूमेगा......खैर कहानी यहीं ख़त्म करता हू....और ये कहानी बुझदिलों को डरा  सकती है ......हम जैसे लोग तो सोच समझ कर आये हैं....खासकर माखनलाल यूनवर्सिटी के लोग तो बिंदास होकर पत्रकारिता कर रहे हैं....और आगे भी करेंगे........आपको ऐसा लग रहा होगा कि बात को कहाँ से सुरु किया था और कहाँ ख़त्म कर रहा हूँ........लेकिन ..........फिर से ये बताना चाहूँगा कि मेरे परिचय के वो सम्पादक जी गाँव क्षेत्र से बिलोंग करते हैं......और गाँव में इन सरकारी मास्टर आदि को बहुत इज्जत मिलती है.....जबकि .......पत्रकार को जुझारू प्राणी समझा जाता है जो कि वो है.......आगे मै अपनी बात को ख़त्म नही कर पा रहा हू.....सब कुछ के बाद माफ़ कीजियेगा ......मै पत्रकारिता में आकर फिलहाल खुस हू.....उम्मीद है कि आप अगर पत्रकार हैं या पत्रकारिता कि पढाई कर रहे   हैं तो आप भी इस पेशे से हमेशा  खुस रहेंगे............खुदा हाफिज.....

1 टिप्पणी:

  1. अभी थोडा रुक जाइए, लड़के होने का गरूर बस अब समाप्‍त ही होने वाला है। दहेज तो अब लड़के वालों को देना पड़ेगा, लड़कियां तो अब मिल ही नहीं रही हैं। इसलिए पत्रकार बनें या मास्‍टर सभी को दहेज देना पड़ेगा। हा हा हा हा।

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