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शुक्रवार, 11 मार्च 2011

मजबूरी का नाम मनमोहन .............................................



(boltikalam.blogspot.कॉम)
दिल्ली से ताल्लुक रखने वाले मेरे एक करीबी मित्र देश के मौजूदा हालातो को लेकर खासे चिंतित है.... बीते दिनों फ़ोन पर बतियाते हुए उन्होंने अपने देश में बढ रहे भ्रष्टाचार की पीड़ा को मेरे सामने उजागर किया... उन्होंने इस बात को दोहराया कि आज हमारे देश को भी एक तहरीर चौक की आवश्यकता है...
मौजूदा दौर में बढ़ते भ्रष्टाचार के प्रति मेरे मित्र की पीड़ा को बखूबी समझा जा सकता है... आज हमारे देश के आम जनमानस इसको लेकर खासा व्यथित है... इस पीड़ा का एहसास शायद हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन को भी है ....तभी बीते दिनों अपने आवास पर मनमोहन ने पत्रकार वार्ता बुलाई और भ्रष्टाचार को लेकर हमेशा की तरह अपना दुखड़ा सुनाया......

मनमोहन सिंह ने पत्रकारों से कहा वह गठबंधन धर्म के आगे लाचार है ..... इस दरमियाँ प्रधान मंत्री ने गठबंधन धर्म की तमाम मजबूरियां भी गिना डाली....साथ ही वह यह कहने से नही चुके कि वह इस बार का कार्यकाल भी सफलता पूर्वक पूरा कर लेंगे....... राजनीती संभावनाओ का खेल है ... यहाँ समीकरण बन्ने और बिगड़ने में देरी नही लगती.... ऐसे में पूर्वानुमान लगा पाना मुश्किल है क्या यू पी ऐ २ अपना कार्यकाल सफलता पूर्वक पूरा कर पायेगी....?

यू पी ऐ १ से ज्यादा भ्रष्ट्र यू पी ऐ २ नजर आता है ....एक से बढकर एक मंत्रियो की टोली मनमोहन सिंह की कबिनेट को सुशोभित कर रही है.... यू पी ऐ २ ने तो भ्रष्ट्राचार के कई कीर्तिमानो को ध्वस्त कर दिया है..... पी ऍम की छवि भी इससे ख़राब हो रही है....इसके अलावा सी वी सी पर थोमस की नियुक्ति से लेकर बोफोर्स में "क्वात्रोची " को क्लीन चित देने और महंगाई के डायन बन्ने तक की कहानी यू पीए २ की विफलता को उजागर कर रही है..... आदर्श सोसाइटी से लेकर कोमन वेल्थ , २ जी स्पेक्ट्रुम से लेकर इसरो में एस बैंड आवंटन तक के घोटाले केंद्र की सरकार की सेहत के लिए कतई अच्छे नही है .....

एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है .... फिर भी हमारे देश के मुखिया मनमोहन अपनी लाचारी जताने में लगे हुए है...जबकि इस समय कोशिश इस बात की होनी चाहिए यू पी ऐ को कैसे मौजूदा चुनोती के दौर से बाहर निकाला जाए ....? मनमोहन भले ही अच्छे अर्थशास्त्री हो.....परन्तु वह एक कुशल राजनेता की केटेगरी में तो कतई नही रखे जा सकते ...... मैं तो उन्हें जननेता भी नही मानता .... ना ही वह भीड़ को खींचने वाले नेता है.....१५ वी लोक सभा चुनावो से पहले भाजपा के पी ऍम इन वेटिंग आडवानी ने मनमोहन के बारे में कहा था वह देश के सबसे कमजोर प्रधान मंत्री है.....उस समय कई लोगो ने आडवानी की बात को हलके में लिया था , आज मनमोहन सिंह पर यह बात सोलह आने सच साबित हो रही है ....

मनमोहन सारे फैसले खुद से नही लेते है....सत्ता का केंद्र दस जनपद बना रहता है .... मनमोहन को अगर मैं सोनिया का "यस बॉस" कहू तो गलत कुछ भी नही होगा..... व्यक्तिगत तौर पर भले ही मनमोहन की छवि इमानदार रही है परन्तु दिन पर दिन ख़राब हो रहे हालातो पर प्रधान मंत्री की चुप्पी से जनता में सही सन्देश नही जा पाटा ... "इकोनोमिक्स की तमाम खूबियाँ भले ही मनमोहन सिंह में रही हो पर सरकार चलाने की खूबियाँ तो उनमे कतई नही है.....

कुछ समय पहले उन्होंने अपना मंत्री मंडल विस्तार भी कर डाला.... उम्मीद थी भ्रष्ट नेताओ के पर कतरे जायेंगे.... पर ऐसा कुछ भी नही हुआ.... कई मंत्रियो को भारी भरकम मंत्रालय दे दिए गए ....नयी बोतल में पुराणी शराब दिखाई दी....इस पर सोनिया गाँधी ने भी अपनी कोई प्रतिक्रिया नही दी..... इसी तरह काला धन एक बदा मुद्दा है.... सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद भी हमारे प्रधानमंत्री इसे वापस लाने की दिशा में कोई प्रयास करते दिखाई दे रहे है..... उल्टा नाम सार्वजनिक किये जाने की बात पर " प्रणव बाबू " खासे नाराज हो जाते है.......

यू पी ऐ २ पर इस समय पूरी तरह से दस जनपद का नियंत्रण बना है.... मनमोहन को भले
ही सोनिया का "फ्री हैण्ड" मिला हो पर उन्हें अपने हर फैसले पर सोनिया की सहमती लेनी जरुरी हो जाती है.... दस जनपद में भी सोनिया के सिपैहसलार पूरी व्यवस्था को चला रहे है.... मनमोहन की साफ़ छवि घोटालो से ख़राब हो रही है ... साथ ही कांग्रेस को भी इससे बड़ा नुकसान झेलना पद रहा है...

मनमोहन की साफ़ छवि घोटालो से ख़राब हो रही है.....साथ ही कांग्रेस को भी इससे नुकसान पहुच रहा है.....बेहतर होता अगर हमारे प्रधान मंत्री गठबंधन धर्म पालन के बजाए राजधर्म का पालन बखूबी से करते.... हमारे प्रधानमंत्री को अटल बिहारी की सरकार से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने १९९८ से २००४ तक २४ दलों की गठबंधन सरकार का नेतृत्व कुशलता पूर्वक किया..... बल्कि कभी किसी के दवाब में काम नही किया.....

मुझे याद है एक बार जयललिता ने उस दौर में अटल आडवानी से उस दौर में करूणानिधि सरकार को भंग करने का दवाब डाला था ... परन्तु वाजपेयी जयललिता की मांग के आगे बेबस नही हुए थे .... अटल की सरकार भले ही एक बोट से गिर गयी परन्तु अगले चुनाव में वह भारी सीट लेकर आये .....

यही नही तहलका जैसे प्रकरण के बाद उन्होंने जॉर्ज को कुछ समय रक्षा मंत्री के पद से मुक्त रखा था...परन्तु यहाँ तो मजबूरी का नाम मनमोहन बन गए है... वह न तो बदती कीमतों पर अंकुश ला सकते है और ना ही भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे मंत्रियो से इस्तीफ़ा दिलवा सकते है.... उनके सामने गठबंधन धरम पालन की सबसे बड़ी मजबूरी है .....और मनमोहन की इसी अदा का फायदा ऐ राजा जैसे लोग उठा जाते है.....और मनमोहन धृत राष्ट्र की भांति आँखों में पट्टी बांधे रह जाते है..... ऐसी सूरत में देश का आम आदमी निराश और हताश नही हो तो क्या करे........?
"दुष्यंत " के शब्दों में कहू तो --------------

"कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे है
गाते गाते लोग अब चिल्लाने लगे है
अब तो इस तालाब का पानी बदल दौ
यह कवल के फूल कुम्हलाने लगे है ......"

3 टिप्‍पणियां:

  1. barhiya hai.....lage rahiye - jamana badlega.....likhte rahiye---sitara chamkega----manmohan ko nishane par liya thik hai...lekin wo to bandar hai--madari to---tathakathit india mata soniya gandhi aur rahul gandhi hain....

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  2. jyada kya kahe----ham aapse naraj bhi nhi ho pate hain.....aapne naraj karne ki puri koshish ki....lekin aapke dwara manmohan ki khabar lene ki is lekh ko parhkar mai khush huaa.....aap bhi khush rahen...aur likhte rahe....swagat raha hai---swagat rahega...

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  3. lalit ne bhi vihan me dehradun ki khabaro ko lajwab dhang se prastut kiya hai...use dheron bdhai bol dena.. ...

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