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सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

पुरानी दुश्मनी का बदला


उत्तर प्रदेश में पार्टी से नेताओ का निकाले जाने का सिलसिला लगातार बना हुआ है..... आये दिन कोई न कोई नेता बीएसपी पार्टी से निलंबित किया जा रहा है..... कोई हत्या के प्रकरण में शामिल है, तो कोई विवादों कों लेकर अपनी लोकप्रियता बटौर रहा है.... लेकिन इस बार मामला है उ. प्र. के मेरठ से है . जहा बसपा से विधायक हाजी याकूब कुरैशी कों पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, इस विधायक का कसूर इतना है कि उसने घोसीपुर में अस्थाई कमेले की नीव रखने के मौके पर सिखों के ऊपर बेहूदी टिप्पणी की ...... "याकूब ने सिखों की तुलना कमेले में काटने वाली भेसों से की" . इस भाषण से सिख समुदाय में इस समय ज़बरदस्त आक्रोश बना हुआ है ... याकूब इससे पहले भी विवादों के घेरे में कई बार आ चुके है.. चाहे डेनमार्क के कार्टूनिस्ट का सर कलम करने की बात हो, या फिर सिपाही कों थप्पड़ मारने का प्रकरण हो, लेकिन इस बार याकूब के लिए यह टिप्पणी भारी पड़ गई.... इसी के चलते सीएम् मायावती ने हाजी कों पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया ..... यह जानकारी प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसद मोर्य की ओर दी गई, ओर कहा की याकूब पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में अब भाग नहीं लेंगे...

वैसे भी पैसे वालो नेताओ के लिए ये चीजे कोई मायने नहीं रखती, ये चिकनी मिटटी के घड़े की तरह होते है, जब चाहे कही भी फिसल जाते है ........ . पैसे के बल पर किसी भी पार्टी से जाकर जुड़ा जाते है.... लेकिन अब सवाल ये खड़ा होता है की जिस जनता के सहारे ये कुर्सी पर बैठते है... कही न कही जनता कों भी अपने चुने हुए प्रतिनिधि से कुछ न कुछ उम्मीद तो रहती ही है कि ये हमारे क्षेत्रो में अच्छा विकास हो .. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता ... वो इसलिए जिन मुद्दों कों लेकर प्रत्याशी मैदान में उतरते है ..... यह केवल चुनाव तक ही सीमित होते है... जीतने के बाद सब गोल माल हो जाते है ..... इसमें कही न कही हमारे मतदाताओ की भी सबसे बड़ी कमी ये होती है कि उसे वोट डालने से पहले ये देख लेना चाहिए कि प्रत्याशी का कोई अपना व्यक्तित्व है भी की नहीं, क्या ऐसे ही जब मुह उठाये वोट देने चले गए ...... लेकिन हमारा मतदाता जानते हुए भी न जाने क्यों अनजान बन जाता है..... खासकर जिस दिन मतदान होता है........... ओर उसी का खामियाजा फिर पांच साल तक भुगतना पड़ता है .....

कुरैशी कों हाल में मेरठ शहर से दक्षिणी सीट पर प्रत्याशी बनाया था ... याकूब मुस्लिम समुदाय की कसाई बिरादरी से ताल्लुक रखते है, मूलरूप से ये बरादरी भेंसो का व्यापार करती है .. कुरैशी भी भेंसो के मीट के बहुत बड़े व्यापारी है. जिनका मीट देश- विदेशो में सप्लाई होता है... अब आप ही अंदाज़ा लगा सकते है कितना बड़ी हेसियत है इस इन्सान की .....शहर के बीचो - बीच कुरैशी के कई कमेले है जिनको लेकर हमेशा से विवाद होता रहता है... इस कमेले से निकलने वाला गन्दा पानी, बुरी बदबू वातावरण कों तो दूषित करता ही है.. और साथ ही साथ यहा से गुजरने वाले हर इन्सान का निकलना भी मुहाल हो जाता है .... कई बार मेरा भी इसी इलाके से गुजरना हुआ, लेकिन मुझसे भी नहीं रहा गया.. इस कमेले से सटी हुई शास्त्रीनगर कालोनी भी इसकी चपेट में है...स्थानीय लोगो दुवारा की गई शिकायत का असर शासन प्रशासन पर कोई मायने नहीं रखती क्योकि सारा मामला केवल राजनीति तक ही सिमट कर रह जाता है ....मामले की सुलह बीच में ही कर ली जाती है, अब आप ही सोचिए की पैसे ओर राजनितिक पावर के दम पर कैसे हर चीज़ घुटने टेक देती है, तो फिर कहा से आम जनता की समस्या का समाधान हो पायेगा ? बड़ा ही मुश्किल सवाल है जो मेरे जेहन में उठता रहता है, तो क्या ऐसे नेताओ से हम विकास की उम्मीदकर सकते है ?

वर्ष २००४ के लोकसभा चुनाव में मेरठ लोकसभा सीट से कुरैशी समुदाय के शाहिद अख़लाक़ कों बसपा से सांसद बनाया गया. जनता कों इनसे भी बहुत- सी उम्मीदे थी, लेकिन इनकी उम्मीदे भी जनता के लिए नागवार गुजरी, ज़रा याद कीजिए उस दौर कों जब उ० प्र० में वर्ष २००४ लोकसभा चुनाव के बाद नगर निकाय चुनाव हुए थे, उस समय सभी दलों ने अपने - अपने प्रत्याशियों कों चुनाव चिन्ह दिया था, लेकिन बसपा ने ऐसा नहीं किया, उसमें शाहिद अखलाख की पत्नि भी मेयर चुनाव के लिए मैदान में थी, बिना चुनाव चिन्ह के लिए सभी प्रत्याशियों कों काफी मशक्कत करनी पड़ी थी, जिसका फायदा भाजपा कों मिला ओर मेरठ से भाजपा की मेयर मुधू गुर्जर चुन ली गई... बस तब से ही शाहिद ने बसपा से कन्नी कटनी शुरू कर दी थी, ओर अपनी नई पार्टी के साथ सपा में जा शामिल हुए, काफी लम्बे समय से कुरैशी नेता मेरठ की राजनीति में अपनी साख बनाए हुए है, जनसंख्या में मामले में इनकी तादात न के बराबर है, मात्र पैसे के बल पर ये लोग राजनीति में है, न ही ज्यादा शिक्षित है ओर न ही राजनीति के मायने का पता, तो ऐसे नेताओ से क्या उम्मीद की जा सकती है ?

वर्ष २००७ की विधानसभा चुनाव में कभी बसपा के हमदम रहे याकूब ने अपनी एक नई पार्टी यूडीएफ के बदौलत मेरठ शहर से चुनाव लड़ा ओर भारी मतों से जीत भी गए , लेकिन उनके समर्थको ने जीत की ख़ुशी का इज़हार इस तरह से किया कि मानो दिवाली का त्यौहार मनाया जा रहा हो , खुले आम सडको पर हथियार लहराकर असमान में गोलिया दागी जा रही थी, कुछ समय के लिए तो पूरा शहर सहम - सा गया कि ये हो क्या रहा है ? यूडीएफ से विधायक बनने के बाद याकूब बसपा में ही शामिल हो गए , क्योंकि पार्टी पूर्ण बहुमत से जो जीती थी, सोचा था की पार्टी में कुछ तो कद बढेगा लेकिन मायावती ने याकूब कों पार्टी में कोई अहमियत नहीं दी, साल २००२ में जब बसपा की गठबंधन की सरकार बनी थी,तो कुरैशी खरखौदा विधानसभा सीट से जीते ,२००४ में जब बसपा सरकार बीच में ही किन्ही कारणों से गिरा दी गई थी, तो याकूब बसपा के २३ विधायको कों तोड़कर सपा पार्टी में जा शामिल हुए थे, मोटी रकम के बल पर विधायको की खरीद फरोख्त याकूब ने ही की थी, बस तभी से याकूब मायावती की आँखों में खटके हुए थे, आखिर कभी न कभी तो पुरानी दुश्मनी का बदला तो लेना था तो इससे अच्छा मौका ओर हो भी क्या सकता था,

२००४ में जब सपा की सरकार आई, तो हाजी याकूब कों अल्पसंख्यक राज्य मंत्री का भी दर्जा दिया गया, लेकिन उन्हें यह भी पार्टी रास नहीं आई ओर अंत में इससे भी रुखसत कर दिए गए, सवाल अब यह है कि आखिर अब वे किस पार्टी की ओर रुख तय करेंगे ? मामला बड़ा ही दिलचश्प है, याकूब ने अपना राजनीतिक सफ़र, अपने ताऊ कांग्रेसी नेता हकीमुद्दीन से प्रेरित होकर की, जो एक प्रभावशाली नेता होने के नाते शहर से कांग्रेस अध्यक्ष भी थे, तो क्या याकूब फिर से पुराने खेमे में जायेंगे या अपनी नवगठित पार्टी यूडीएफ कों पुनर्जीवित करेंगे? वैसे न्योता मिलने पर याकूब आरएलडी से भी हाथ मिला सकते है, मौका परस्ती लोग अच्छा मौका कभी नहीं गवाते है

अगला याकूब कौन होगा ? इसका डर हर किसी कों सता रहा है, कभी समाजवादी पार्टी के सिपसलाहकार रहे अमित अग्रवाल कों मायावती ने मेरठ केंट से प्रत्याशी घोषित किया था,ओर अंत में उन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, हस्तिनापुएर सीट से विधायक योगेश वर्मा का भी इस बार टिकिट काट दिया, उनकी जगह अब प्रशांत गौतम कों इस बार हस्तिनापुर सीट से नया प्रत्याशी बनाया है, सरधना विधानसभा सीट से चंद्र्बीर सिंह पर भी तलवार लटकती दिख रही है, क्योंकि उनके भाई पर हत्या का आरोप जो लगा है , किठौर विधानसभा सीट से नये प्रत्याशी ओर खरखौदा विधानसभा सीट से विधायक लखीराम नागर पर हालाकि कोई आरोप नहीं है, इसीलिए उनकी जगह अभी सुरक्षित है, सिवालखास के विधायक विनोद हरित कों अभी कही से प्रत्याशी नहीं बनाया है, कुल मिलाकर ये कहा जा सकता की है , कि माया का अगला निशाना कौन होगा ?

1 टिप्पणी:

  1. sahi kah rahe ho dost up me ajeeb sthiti tayaar ho rahi hai. vaise bhee zyaada dimaag kharch karne kee zaroorat nahi hai. kyunki sarkar kisee ke bane janta ko hona nuksaan hee hai.
    baaki achha bura sochna janta ka kaam hai.

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