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शनिवार, 26 मई 2012

ऊपर चलेंगें जब तो सारा हिसाब होगा...

क्या शिथिलताओं के दौर में होगा
होगा तभी जब हौसलों से हौसलों का मेल होगा...

पोखरों-तालाबों में वे अपने छितर गए
सौंप दें सागर इन्हें, तो न जाने क्या होगा...

मिट गया वो इतिहास की किताब से
पत्थरों की भांति जो बुत बना बैठा होगा...

बेटियों ने जिन आँखों में बचपन बिताया होगा
जिन हांथों ने उसके तन को कपड़ा पहनाया होगा
धूमिल होती उस बच्ची की इज्जत
वो मजलूम  बाप भला कैसे देख पाया होगा...

इस कलयुग के काल में लूट रहे हैं सब
तू मौन खड़ा हैं यूँ, शायद तुझमें बचा अभी इन्सान होगा...

हर पल की हरकत तम्हारी देख रहा हैं कोई
ऊपर चलेंगें जब तो सारा हिसाब होगा...

रविवार, 13 मई 2012

झूठी कहानी, झूठा फसाना और झूठी दिलशा.........लगता है कलयुग ही है


झूठी कहानी, झूठा फसाना और झूठी दिलशा.........लगता है कलयुग ही है 
क्या अब पूरी तरह से कलयुग आ गया, शायद इस लेख को पड़ने के बाद आप भी कहेगे की हाँ. रोज की तरह हम अपने रूम से ऑफिस के लिए निकले अबसे पहले तो हमारा सामना भीड़- भाड से हुआ. ये तो रोज मर्रा की कहानी थी इसमे नया कुछ नहीं था. रस्ते मै चलते हुए हमारी नजर उस पर पड़ी जिसने मुझे यह सब करने को मजबूर कर दिया. मेरे बगल से एक तिपहिया वाहन गुजरा जिसे आप टेक्सी कह सकते है. उस पर एक नेता को जन्म दिन की बढ़िया सी बधाई दी गयी थी. और बड़े- बड़े अच्छरों मै लिखा था जीवेत शरद: शतम...
यह कोई नया नहीं था इस शब्द से तो हम यदा कदा जूझते रहते है. भला आप ही सोचें क्या आज के समय कोई शरद: शतं अर्थात १०० साल जी सकता है. जब हमारे देश की औसत जीवन ६५-७० हो . ये तो कभी हो ही नहीं सकता है. भला हम जापान या विकसित देशों मैं तो रहते नहीं है, जहाँ एक बार तो सोचा भी जा सकता है. भारत जैसे देश मैं तो कह ही नहीं सकता! .मै १०० साल तक जीने को चुनौती नहीं दे रहा. भला मै कौन हो सकता हूँ . मै उन सज्जन को भी कुछ गलत नहीं मन रहा हूँ जिन्होंने इतने बड़े- बड़े शब्दों में बधाइयाँ दी हों. ये तो सभी लोगों का इक तरीका है, बधाइयाँ देने का. सो सज्जन साब भी कैसे पीछे रह सकते थे. लेकिन सोचो न भैया कोई ७० से ८० जी सकता है. हो सकता है ९० तक पहुच जाये लेकिन मेरे हिसाब से वह १०० नहीं जी सकता. क्योकि भारत देश की जलवायु आज के मानव को वंहा तक नहीं पंहुचा सकती. हाँ वो जमाना या समय चला गया जब लोग १०० या ११० तक आसानी से जी लिया करते थे. अब भारत के खान पान मैं काफी बदलाव आया है. अब बाजार मैं शुद्ध बस्तुएं ढूढें से शायद ही मिल पायें. साथ ही भाग्दोड़ बरी जिन्दी और जीने का तरीका . देर रात  तक सोना और १०-११ बजे तक विस्तर को छोड़ना ये सब भी तो जीवन को प्रभित करते  है. फिर आप ही बताएं की जीवेत शरद: शतम कभी हो सकता है.?

गुरुवार, 10 मई 2012

मखना लाल के कर्मचारियों को मिली चार माह की दिलाशा

मखना लाल के कर्मचारियों को मिली चार माह की दिलाशा 
कई दिनों से आंदोलित मखना लाल चतुर्वेदी वि. में परमानेंट करने को लेकर पहले हड़ताल और बाद में भूख हड़ताल तक आये कर्मचरियों को आखिर में चार माह की दिलाशा दी गयी है. और हड़ताल ख़त्म करा दी गयी  और निर्णय लिया गया की उनके परमानेंट के लिए एक कमिटी बनायीं जाएगी. फिर तय किया जायेगा की परमानेंट किया जाये की नहीं. देखना यह होगा की. कई सालों से कार्यरत कर्मचारियों को उनको लाभ दिया जायेगा की नहीं. 

शनिवार, 3 मार्च 2012

प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार होती तो .....सोचिये ज़रा!

तमाम टीवी चैनलों पर चलने वाले इस विज्ञापन को देने वाले विज्ञापनदाता पार्टी के तारनहारों....पिछले 22 सालों से उत्तर प्रदेश में आपकी सरकार तो आई नहीं....और आपने धर्म के आधार पर आरक्षण की जो राजनिती शुरू की है...उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले 22 साल भी आप यूपी में आने वाले नहीं हो....धर्म-जाति की राजनीति ही तो है जिसने बहन जी को आने का मौका दिया....बहन जी ने सोशल इंजिनियरिंग का नाम देकर दलित-ब्राम्हण-मुस्लिम गठबंधन किया और एक मुश्त वोटों की फसल काट ली....जातिवाद तो यूपी में है ही....धर्म में भी बांट दो....खैर जनसंख्या इतनी है कि आरक्षण घटाकर या बढ़ाकर जाति-धर्म के आधार पर बांटने से भी गरीबी खत्म नहीं होगी...खत्म होगी तो राजनीति में परिवारवाद को खत्म कर गरीबों को राजनीति में हिस्सा देने से....जिससे कि वे गरीबों के हक में कानून बना सकें....बाकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार है....2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला...कॉमनवेल्थ घोटाला...के सिवाय कर क्या रही है सोचिये ज़रा!





शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

माँ के पेट से चक्रव्यू भेदने की कला सीखने वाले भारतीय युवाओं में इतना अँधेरा क्योँ?

खबर भोपाल की है.................
बुधवार को बीएचएमएस थर्ड ईयर की छात्रा ने अपने कमरे में फांसी लगा ली. वजह था प्यार में धोखा. इससे पहले भी मेडिकल की एक छात्र ने ख़ुदकुशी कर ली थी. वहां भी मामला प्रेम प्रसंग का ही था. ऐसी ख़बरें कितनी दुखद होती है. सिर्फ मनचाहा प्यार न मिलने पर जिंदगी को अलविदा कह देना, युवाओं की सोच पर बड़े सवाल खड़े करता है. आखिर युवाओं में इतनी हताशा, इतनी निराशा क्योँ?
कुछ ही दिन पहले की बात है. मेरे कॉलेज में दो दोस्त आपस में झगड़ रहे थे. एक का कहना था कि तुमने बीती रात मेरा फ़ोन सिर्फ इस लिए नहीं उठाया, क्यूंकि तुम उस वक़्त किसी लड़की से बात कर रहे थे. तुम लड़कियों को बिला वजह इतना महत्व देते हो. मैं तो लड़कियों को घुटने पर रखता हूँ. तभी दूसरा दोस्त अपने जूतों कि तरफ इशारा करते हुए बोला- मैं लड़कियों को यहाँ रखता हूँ...............................
यह विचार किसी एक लड़के के व्यतिगत हो सकते हैं, पर इसमें कोई शक नहीं कि लडको कि ऐसी मानसिकता लड़कों के एक बड़े समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं. ज़ाहिर है अगर लड़के लड़कियों के बारे में ऐसी सोच रख सकते हैं, तो उसे मरने के लिए भी छोड़ सकते हैं. मेरा भी व्यकिगत तौर पर भी यही मानना है कि लड़के अच्छे प्यार करने वाले होते हैं, जबकि लड़कियां अच्छी चयन करने वाली होती है. अंग्रेजी में कहा भी जाता है- "Boy is a good lover and girl is a good chooser". बहुत कम ऐसे अवसर आते हैं, जब लडकियां किसी से सच्चा प्यार करती है. पर जब वो सच्चा प्यार करती है, तो पूरे मन से करती है. यहाँ तक कि नर्क तक भी उस लड़के का पीछा करती है. मुझे कहने में कोई झिझक नहीं कि उनके  प्यार की पराकाष्ठा ही उन्हें आत्महत्या पर आमादा कर देती है.
मैं लड़कों को कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहूँगा. पर वे इन बारीकियों को समझें  कि सच्चा प्यार करने वाली लड़कियां किसी भी कीमत पर हार नहीं मानतीं. तब उनके पास दो ही रास्ते होते हैं. या तो आपने प्यार को पाना या फिर खुद को मिटा देना.
लड़कियों को भी यह समझने होगा कि ख़ुदकुशी कोई समाधान नहीं है. मरने के बाद अगर किसी को प्यार का एहसास हो भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है. बेहतर तो यही होगा कि लड़कियां जीते जी अपनी भावनाओं को समझा पायें. वैसे भी समय से पहले और तकदीर से ज्यादा किसी को क्या मिलता है. नियति भी कोई चीज़ होती है......
सदा तो धूप के हाथों में भी परचम नहीं होता
ख़ुशी के घर में भी बोलो क्या कोई गम नहीं होता?
फ़क़त एक आदमी के वास्ते जग छोड़ने वाले
फ़क़त उस आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता


उम्मीद है अब ऐसी ख़बरें हमारे कान के पर्दे से नहीं टकराएंगी.

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

न भूलो तुम...

कहलात बलशाली ना कोई,
भुजबल से...
कहलात ना कोई बुद्धिमान,
छल से...
दर्शन करो नारी का,
ना अश्लीलता से...
गुरुओं... शिक्षा को ना तौलो तुम,
चन्द सिक्कों से...
देश की जीवन रेखा हो तुम युवा,
ना भटको बहकावों से...
भरण-पोषण के लिए, हमारी खुशियों के लिए,
प्राण ले लिए सपनों के,अपने ही हाथ से...
है कद बड़ा कई गुना उन मात-पिता का,
इस सृष्टि के ईश से...
इस सृष्टि के ईश से...

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

उमा में चमत्कार का अक्स देखता भाजपा आलाकमान...............


"जैसे उडी जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवे". कुछ समय पहले भारतीय जनता पार्टी में अपनी वापसी पर साध्वी ने कुछ इन्ही पंक्तियों में अपनी वापसी को मीडिया के खचाखच भरे समारोह में बयां किया.पार्टी के आला नेताओं के तमाम विरोधो के बावजूद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी उमा को पार्टी में लाने में कामयाब हो गए.इस विरोध का असर उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी देखने को मिला जिसमे पार्टी के जेटली, स्वराज, जैसे कई बड़े नेता शामिल तक नही थे .इन सभी की गिनती उमा के धुर विरोधियो के रूप में की जाती थी.पन्ने टटोले तो याद कीजिये उस समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पार्टी के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अध्यक्ष प्रभात झा तक को इसकी भनक तक नही लगी... प्रभात झा का तो यह हाल था कि उमा की पार्टी में वापसी से २ घंटे पहले जब उनसे पार्टी में उमा की वापसी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा इस पर कुछ नही कहना है ॥परन्तु २ घंटे बाद प्रभात झा और मुख्यमंत्री ने इस विषय पर गेंद केन्द्रीय नेताओं के पाले में फेकते हुए कहा जब भी कोई नेता पार्टी में आता है तो उसका स्वागत होता है.उमा का हम स्वागत करते है .ठीक इसी तर्ज पर उमा भारती को टिकट देने की घोषणा जब नितिन गडकरी ने पिछले महीने की तो उन्होंने यू पी चुनाव से ठीक पहले चरखारी से उमा को टिकट देकर भाजपा में खलबली मचा दी. खासतौर से यू पी में खुद को बड़ा नेता मानने वाले कई नेताओ का सिंहासन इस खबर के बाद खतरे में नजर आने लगा. घर वापसी के बाद उमा को लेकर माहौल उत्तर प्रदेश भाजपा में लम्बे समय से बन रहा था लेकिन भाजपा के अन्दर एक तबका ऐसा था जो उमा को टिकट देने का विरोध कर रहा था .दरअसल उमा की वापसी का माहौल जसवंत सिंह की भाजपा में वापसी के बाद बनना शुरू हो गया था.उस समय उमा भारती भैरो सिंह शेखावत के निधन पर जसवंत के साथ राजस्थान गई थी .संघ ने दोनों की साथ वापसी की भूमिका तय कर ली थी लेकिन उमा विरोधी खेमा उनकी वापसी की राह में रोड़े अटकाते रहा .मध्य प्रदेश में तो उमा को सबसे ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ता था.यहाँ उमा विरोधी कई नेता उन्हें टिकट तो क्या पार्टी में दुबारा लेने के हिमायती नहीं दिखाई देते थे .जब उमा भारती पिछले साल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख्यमंत्री के पिता की तेरहवी में आडवानी और राजनाथ सिंह के साथ नजर आई तो फिर उमा की पार्टी में वापसी को बल मिलने लगा .इसके बाद पार्टी में गडकरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनका मोहन भागवत के साथ मुलाकातों का सिलसिला चला ॥



खुद भागवत ने भी पार्टी से बाहर गए नेताओं की वापसी का बयान दिया तो इसके बाद उमा की वापसी को लेकर रस्साकशी शुरू हो गई .लेकिन मध्य प्रदेश के भाजपा नेता खुले तौर पर उनकी वापसी पर सहमति नही देते थे क्युकि उनको मालूम था अगर उमा पार्टी में वापसी आ गई तो वह मध्य प्रदेश सरकार के लिए खतरा बन जाएँगी. कुछ यही बात भाजपा के यू पी में बड़े नेताओ के जेहन में बनी थी .उनकी यू पी में वापसी का सीधा मतलब प्रदेश के भाजपा नेताओ के लिए एक खतरा था .उमा ने राम रोटी के मुद्दे पर भाजपा से किनारा कर लिया था .कौन भूल सकता है जब उन्होंने आज से ६ साल पहले भरे मीडिया के सामने आडवानी जैसे नेताओं को खरी खोटी सुनाई थी और पार्टी को मूल मुद्दों से भटका हुआ बताया था .लेकिन इस दौर में उन्होंने संघ परिवार से किसी भी तरह से दूरी नही बढाई .शायद इसी के चलते संघ लम्बे समय से उनकी पार्टी में वापसी के साथ ही टिकट देने का हिमायती था.यही नहीं यू पी सरीखे बड़े राज्य में अगर पार्टी का आलाकमान उनको वापस लाना चाहता था तो इसका बड़ा कारण उमा का करिश्माई नेतृत्व था... साथ ही वह कल्याण सिंह के बाद भाजपा का सबसे पुराना पिछडो का चेहरा थी . वैसे भी उमा भारती पार्टी में कट्टर हिंदुत्व के चेहरे की रूप में जानी जाती रही है ..कौन भूल सकता है अयोध्या के दौर को जब साध्वी के भाषणों ने पार्टी में नए जोश का संचार किया था .उमा की इसी काबिलियत को देखकर पार्टी हाई कमान ने उनको २००३ में मध्य प्रदेश में उतारा जहाँ उन्होंने दिग्विजय सिंह के १० साल के शासन का खात्मा किया . इसके बाद २००४ में हुबली में तिरंगा लहराने और सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुचाने के कारण उनके खिलाफ वारेंट जारी हुआ और उन्होंने मध्य प्रदेश में सी ऍम पद से इस्तीफ़ा दे दिया. वह भी एक उतार चदाव का दौर रहा जब भरी सभा में भाजपा के नेताओं को कैमरे के सामने खरी खोटी सुनाने के बाद उमा ने मध्य प्रदेश में अपनी अलग भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली.

२००८ के चुनावो में इसने ५ सीटे प्रदेश में जीती . उम्मीद की जा रही थी कि उमा की पार्टी बनने के बाद भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा परन्तु ऐसा नही हुआ .... इसके बाद से उमा के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे ... हर बार उन्होंने मीडिया के सामने भाजपा को खूब खरी खोटी सुनाई परन्तु कभी भी संघ को आड़े हाथो नही लिया....शायद इसी के चलते संघ में उनकी वापसी को लेकर खूब चर्चाये लम्बे समय से होती रही .मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिव राज सिंह चौहान और उमा भारती में शुरू से छत्तीस का आकडा रहा है ......उमा की वापसी का विरोध करने वालो में उनके समर्थको का नाम भी प्रमुखता के साथ लिया जाता रहा है. शिव के समर्थक उनकी वापसी के कतई पक्ष में नही थे इसी के चलते उनकी वापसी बार बार टलती रही... यू पी में वापसी के बाद भी शिवराज अपने बयानों में कहा करते रहे वो मध्य प्रदेश से दूर रहेंगी..... लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व के आगे शिव के समर्थको की इस बार एक नही चली.इसी के चलते पार्टी के आलाकमान के बुलावे पर शिवराज को उमा के साथ चरकारी समेत बुंदेलखंड में चुनावी सभाओ में जाना पड़ा .उमा की यू पी में वापसी के बाद अब सबसे ज्यादा चिंता मध्य प्रदेश में होने लगी है ..... राजनीतिक विश्लेषको का मानना है अगर उमा यू पी चुनावो के बाद मध्य प्रदेश में वापस आ गई तो शिवराज का सिंहासन खतरे में पढ़ जायेगा .....वैसे भी प्रदेश में विधान सभा चुनाव की उलटी गिनतिया शुरू होनी ही है .खुद शिवराज सिंह को बाबूलाल गौर के समय जब सिंहासन सौपा गया था तो उमा ने केन्द्रीय नेताओं के इस फैसले का खुलकर विरोध किया था.......अब उमा की यू पी में वापसी से शिवराज के समर्थको की चिंता अब बढ़ रही है ... उमा के यू पी के अखाड़े में कूदने के बाद बैखोफ होकर शासन चला रहे मुख्यमंत्री शिवराज के लिए आगे की डगर आसान नही दिख रही..... क्युकि प्रदेश में शिव के असंतुष्टो का एक बड़ा खेमा मौजूद है जो किसी भी समय उमा के पाले में जाकर शिवराज सिंह के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है .मध्य प्रदेश में आज भी उमा के समर्थको की कमी नही है .....पार्टी हाई कमान भले ही उनको उत्तर प्रदेश के चुनावो में आगे कर रहा है लेकिन साध्वी अपने को मध्य प्रदेश से कैसे अलग रख पायेगी अब यह बड़ा सवाल बनता जा रहा है . उमा को यू पी में टिकट दिलाने में इस बार नितिन गडकरी और संघ की खासी अहम भूमिका रही है.... पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के मिशन २०१२ की कमान सौपी है

.यहाँ भाजपा का पूरी तरह सफाया हो चुका है...कभी उत्तर प्रदेश की पीठ पर सवार होकर पार्टी ने केंद्र की सत्ता का स्वाद चखा था... आज आलम ये है कि यहाँ पर पार्टी चौथे स्थान पर जा चुकी है ..... १६ वी लोक सभा में दिल्ली के तख़्त पर बैठने के सपने देख रही भाजपा ने उमा को "ट्रम्प कार्ड" के तौर पर इस्तेमाल करने का मन बनाया है ताकि पिछड़ी जातियों के एक बड़े वर्ग को वह अपने पाले में ले सके.खासतौर से मध्य प्रदेश से सटे वह इलाके जो बुंदेलखंड का प्रतिनिधित्व करते है जहाँ पर अभी "बहिन जी" का पलड़ा भारी बताया जा रहा है वहां उमा को स्टार प्रचारक बनाकर भाजपा मायावती के वोट बैंक को साधने का काम कर रही है.प्रदेश में अब उमा भारती राहुल गाँधी को सीधे चुनौती देते नजर आ रही है.अपनी ललकार के दवारा उमा यू पी में मुलायम, माया, राहुल , दिग्गी राजा के सामने हुंकार भर रही है ..... अगर उत्तर प्रदेश के कुछ नेताओं का साथ उमा को मिलता तो वह पार्टी की सीटो में इस बार इजाफा कर सकती है ... लेकिन उत्तर प्रदेश में भी भाजपा गुटबाजी की बीमारी से ग्रसित है.पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही की राह अन्य नेताओं से जुदा है.कलराज मिश्र के हाथ चुनाव समिति की कमान आने को राज्य में पार्टी के कई नेता नही पचा पा रहे है.मुरलीमनोहर जोशी, राजनाथ सिंह जैसे नेता केंद्र की राजनीती में रमे है. योगी आदित्यनाथ , विनय कटियार जैसे नेताओ को पार्टी भाव नहीं दे रही है... ऐसे में उमा को मुश्किलों का सामना करना होगा..... सबको साथ लेकर चलने की एक बड़ी चुनौती उनके सामने है......उत्तर प्रदेश की जंग में उमा के लिए विनय कटियार , वरुण गाँधी और योगी आदित्यनाथ जैसे नेता निर्णायक साबित हो सकते है . आज भी इनका प्रदेश में अच्छा खासा जनाधार है॥ हिंदुत्व के पोस्टर बॉय के रूप में ये चेहरे अपनी छाप छोड़ने में अहम् साबित हो सकते है.लेकिन अब तक इन नेताओ ने अपने को पार्टी के चुनाव प्रचार से दूर कर रखा है.साथ में इस समय भाजपा अध्यक्ष गडकरी लम्बे समय से पार्टी का झंडा उठाये स्वयंसेवकों के बजाय जीतने वाले नए नवेले उम्मीदवारों पर दाव खेलने से नहीं चूक रहे...ऐसे में पार्टी से नाराज चल रहे लोगो का साथ मिलना जब मुश्किल हो चला है तो उमा का करिश्मा क्या चलेगा यह कहना दूर की गोटी है. पार्टी में इस समय सबसे बुरा हाल अगर किसी नेता का है तो वह है वरुण गाँधी .पार्टी ने उनकी पसंद को अनदेखा कर पीलीभीत से लगे कई इलाको में प्रत्याशियों को टिकट बांटे है.ऐसे में उमा कैसे चमत्कार कर पाएंगी यह अपने में पहेली बनता जा रहा है.भले ही प्रेक्षक यह कहे कि भाजपा छोड़कर चले गए नेता जब दुबारा पार्टी में आते है..

चुनाव लड़ते है तो उनकी कोई पूछ परख नही होती ... साथ ही वे जनाधार पर कोई असर नही छोड़ पाते लेकिन उमा के मामले में ऐसा नही है.... वह जमीन से जुडी हुई नेता है. अपने ओजस्वी भाषणों से वह भीड़ खींच सकती है.....कल्याण सिंह के जाने के बाद वह पार्टी में पिछडो के एक बड़े वोट बैंक को अपने साथ साध सकती है.....साथ ही उत्तर प्रदेश में बेजान लग रही भाजपा संजय जोशी और उमा के जरिये अपनी खोयी हुई जमीन बचाने का काम कर सकती है.उमा की वापसी के बाद अब गोविन्दाचार्य की भाजपा में वापसी की संभावनाओ को बल मिलने लगा है. उमा के आने के बाद अब संघ गोविन्दाचार्य को पार्टी में वापस लेने की कोशिशो में लग गया है.... गडकरी कई बार उनकी वापसी को लेकर बयान देते रहे है परन्तु उमा की वापसी न हो पाने के चलते आज तक उनकी भी पार्टी में वापसी नही हो पायी.गोविन्दाचार्य को साथ लेकर पार्टी कई काम साध सकती है ... वह अभी रामदेव के काले धन से जुड़े मसले पर वह केंद्र सरकार से लम्बी लडाई लड़ रहे है.....इस समय केंद्र सरकार के खिलाफ व्यापक असंतोष है . एक के बाद एक घोटालो में केंद्र सरकार घिरती जा रही है. भाजपा आम जनमानस का साथ इस समय लेना चाहती है. इसी के चलते संघ में रामदेव का पीछे से साथ देने को लेकर सहमति बन रही है..साथ ही अन्ना और रामदेव को अब केंद्र सरकार के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ने के लिए आगे लाया जा रहा है जिसमे संघ को गोविन्दाचार्य सहयोग कर रहे है . ऐसे में संघ परिवार अपने पुराने साथियों को पार्टी में वापस लेना चाहता है .उमा की वापसी के बाद अब संघ परिवार गोविन्दाचार्य को अपने साथ लाने की कोशिसो में जुट गया है .गोविन्दाचार्य को भाजपा पार्टी के "थिंक टेंक " की रीड माना जाता है.हरिद्वार के एक महंत की माने तो उमा के यू पी के अखाड़े में आने के बाद अब भाजपा में गोविन्दाचार्य की जल्द वापसी हो सकती है.खुद संघ उमा को इसके लिए मना रहा है . अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा और पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भाजपा के अनुकूल आये तो गोविन्दाचार्य की भी भाजपा में वापसी होगी .उमा को चरखारी से यू पी के अखाड़े में उतारकर भाजपा ने अपने इरादे एक बार फिर जता दिए है . उत्तर प्रदेश पर गडकरी की खास नजरे है .पार्टी हिंदुत्व की सवारी कर पिछड़ी जातियों की पीठ पर सवार होकर यू पी में अपना प्रदर्शन सुधारने की कोशिशो में लगी है.देखना होगा उमा में चमत्कार का अक्स देख रहे भाजपा हाई कमान की उम्मीदों में वह इस बार कितना खरा उतरती है ?

( हर्षवर्धन पान्डे) लेखक युवा पत्रकार है . देश , दुनिया से जुड़े मुददों पर लिखते रहते है.समसामयिक विषयो पर लेखक के विचारो को " www.boltikalam.blogspot.com" ब्लॉग पर भी पढ़ा जा सकता है .

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

आम आदमी से दूर होती सरकार......



विदर्भ की रामकली बाई इन दिनों मायूस है.... .....यह रामकली वह है जिसका एक बच्चा अभी एक साल पहले कुपोषण के चलते मर गया..... इस बच्चे की बात करने पर आज भी वह सिहर उठती है.... पिछले कुछ वर्षो में जैसी त्रासदी विदर्भ ने देखी होगी शायद भारत के किसी कोने ने देखी होगी......सरकार आये दिन गरीबो को अनाज के नाम पर कई घोषणा कर रही है लेकिन सच्चाई यह है कि गरीबो की झोपड़ी तक कोई अनाज नहीं पहुच पा रहा है जिसके चलते आज रामकली के बच्चे कुपोषण के चलते मारे जा रहे है......

महंगाई को कम करने के सरकार दावे तो जोर शोर से करती रही है लेकिन सच्चाई यह है कि देश में आम आदमी की थाली दिनों दिन महंगी होती जा रही है.....प्रधानमंत्री जहाँ ऊँची विकास दर और कॉरपोरेट नीतियों का हवाला देते नहीं थकते वही देश के वित्त मंत्री यह कहते है हमारे पास महंगाई रोकने के लिये कोई जादू की छड़ी नहीं है तो इस सरकार का असली चेहरा जनता के सामने बेनकाब हो जाता है......हद तो तब हो जाती है जब रिज़र्व बैंक 13 वी बार अपनी ब्याज दर बढाता है ताकि मार्केट में लिक्विडिटी बनी रहे .

इसके बाद भी आलम ये है महंगाई देश को निगलते जाती है और रामकली जैसे गरीब परिवारों के सामने रोजी रोटी का एक बड़ा संकट पैदा हो जाता है ..... आज यह जानकर हैरत होती है कि हमारे देश में भुखमरी की समस्या लगातार बढती जा रही है ...... यूं ऍन ओ की हालिया रिपोर्ट को अगर आधार बनाये तो कुपोषण ने हमारे देश में सारे रिकार्डो को ध्वस्त कर दिया है.....आपको यह जानकर हैरत होगी कि हर रोज तकरीबन ७००० मौते अकेले कुपोषण से हमारे देश में हो रही है.....सरकार खाद्य सुरक्षा कानून लाने की बात लम्बे समय से कर रही है लेकिन इसको पेश करने की राह भी आसान नहीं है......

मनमोहन और सोनिया की अगुवाई वाली सलाहकार परिषद् में इसे लेकर अलग अलग सुर है..... राजनेताओ को आम आदमी से कुछ लेना देना नही है ... अगर ऐसा होता तो आज हमारे ऊपर कुपोषण का कलंक नहीं लगता..... बढती जनसँख्या ने देश में खाद्य संकट को हमारे सामने बड़ा दिया है.....ऐसा नहीं है देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान उत्पादन नहीं हो रहा ॥ उत्पादन तो हो रहा है लेकिन फसल के रख रखाव के लिये हमारे पास पर्याप्त मात्रा में गोदाम नहीं है ...... इसी के चलते करोडो का अनाज हर साल गोदामों में सड़ता जा रहा है.... अभी इस बार मध्य प्रदेश में चावल का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ .... वहां के मुख्यमंत्री शिवराज परेशान हो गए है .... सी ऍम होने के नाते उन्होंने केंद्र को चिट्टी लिख दी ... उन्होंने कहा मध्य प्रदेश में रख रखाव के लिये पर्याप्त गोदाम नहीं है लिहाजा केंद्र सरकार इस अनाज के रख रखाव की व्यवस्था सुनिश्चित करे लेकिन देखिये केंद्र ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की .....


हमारे देश में केंद्र ओर राज्यों में अलग अलग सरकारे होने के कारन कई बार सही तालमेल नहीं बन सकता .... यही अभी मध्य प्रदेश में देखने को मिला ....कमोवेश यही हालात आज देश के अन्य राज्यों में है ......

यूनेस्को का कहना है भारत की गिनती दुनिया के सबसे कुपोषित देशो में हो रही है....लेकिन इन सबके बाद मनमोहनी इकोनोमिक्स ऊँची विकास दर और "भारत निर्माण " की अगर दुहाई दे तो यह कुछ हास्यास्पद मालूम पड़ता है .......हद तो तब हो जाती है जब इस देश में घोटालो के बाद एक घोटाले होते रहते है और हमारे प्रधानमंत्री अपनी नेकनीयती का सबूत देते नहीं थकते......देश की जनसँख्या तेजी से बढ़ रही है ... हाल ही में हमने १२१ करोड़ के आकडे को छुआ है अगर यही सिलसिला जारी रहा तो यकीन जानिए हम चीन को पीछे छोड़ देंगे... ऐसे में बड़ी आबादी के लिये भोजन जुटाने की एक बड़ी चुनौती हमारे सामने आ सकती है....

पिछले दो दशको में हमारा खाद्यान उत्पादन १.५ फीसदी तक जा गिरा है.... मनमोहन के दौर में हमारे देश में दो भारत बस रहे है... एक तबका ऐसा है जो संपन्न है ...वही एक तबका ऐसा है जो अपनी रोजी रोटी जुटाने के लिये हाड मांस एक कर रहा है.... याद कीजिये १९९० का दौर उस समय हमारा देश आर्थिक सुधारो की दहलीज पर खड़ा था.... नरसिम्हा राव की सरकार उस समय थी...उस दौर में हमारे देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान की खपत ४६८ ग्राम हुआ करती थी...

उदारीकरण के आज २० सालो बाद भी भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान उपलब्धता ४०० ग्राम हो गई है ....यही नहीं आप यह जानकार चौंक जायेंगे १९९० में प्रति व्यक्ति ४२ ग्राम दाल उपलब्ध थी वही २०११ में यह आकडा भी लुढ़क गया और यह २५ ग्राम तक पहुच गया .... यह आंकड़ा औसत है जिसमे मनमोहनी इकोनोमिक्स का संपन्न तबका भी शामिल है साथ ही वह क्लास भी जो रात को दो रोटी भी सही से नहीं खाता होगा... अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट कहती है देश की ७० फीसदी आबादी आज भी २० रूपया प्रति दिन पर गुजर बसर करती है.....ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है इस दौर में कैसे यह गरीब तबका दो समय का भोजन अपने लिये बनाता होगा ? ऊपर से यह सरकार २६ और ३२ की बहस चलाकर गरीबो क मुह पर तमाचा मारने पे तुली रहती है .........

देश में आज थाली दिन प्रति दिन महंगी होती जा रही है.....घरेलू गैस के दामो में भी सरकार अपनी मनमर्जी चलाती रहती है... यही नहीं तेल के दाम भी सरकार आये दिन बढाने का फैसला लेती रहती है जिसकी सबसे ज्यादा मार गरीब परिवारों पर पड़ती है ... इसके चलते लोगो करता जीना दुश्वार होता जा रहा है.....सरकार को तेल कंपनियों का घाटा पूरा करना है ... आम आदमी से कुछ भी लेना देना नहीं है .....


अगर आम आदमी से कुछ लेना देना होता तो उसकी तरफ सरकार ध्यान तो जरुर देती...... शायद तभी आम आदमी का अब यू पी ए २ से मोहभंग होता जा रहा है.....तेल और घरेलू गैस के दामो को बढाने का फैसला सरकार वैश्विक माहौल का हवाला देकर अक्सर लेती रहती है ....


ज्यादा समय नहीं बीता जब मुद्रा स्फीति रिकॉर्ड १२.२५ % पार कर गई जो अब तक की सबसे बड़ी दर है.... ऊपर से रिजर्व बैंक लोन की दर बढाने का फैसला कर मध्यम वर्गीय परिवारों को निराश करते रहता है .......अभी इस वर्ष देश का सकल घरेलू उत्पाद सात फीसदी के आस पास है ....जबकि यही पिछले साल ९ फीसदी के आस पास रहा था... आज आलम यह है कि रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट आते जा रही है... यह संकेत भारतीय आर्थव्यवस्था के डगमग रहने के संकेत के रूप में देखा जा सकता है ... सरकार मंदी की आहट के मुकाबले के लिए ऍफ़ डी आई लाने की हिमायती थी ताकि विदेशी निवेशक यहाँ के बाजार में आकर अपना पैसा लगा सके लेकिन २जी की आंच ने कारपोरेट को सहमा दिया है ....लिहाजा कई परियोजनायो के लिए एनओसी मिलनी मुश्किल हो चली है..........यानी पहली बार वह अर्थव्यवस्था औंधे मुह गिर रही है जिसकी बिसात पर मनमोहन ने उदारीकरण का सपना देखा था ..... ऐसे में कह पाना मुश्किल होगा कि मौजूदा दौर में जब सारे दरवाजे बंद हो चुके है तो रास्ता जायेगा किधर ?


मनमोहन के दौर में समाज में अमीर और गरीबी की जो खाई चौड़ी हुई है उसके पीछे बहुत हद तक हमारी खाद्यान प्रणाली जिम्मेदार है .....जबसे मनमोहन ने देश में उदारीकरण की शुरुवात की तबसे हर सरकार का ध्यान ऊँची विकास दर बरकरार रखने और सेंसेक्स बढाने पर जा टिका है .....आकड़ो की बाजीगरी आज के दौर में कैसे की जाती है ये हर किसी को मालूम है ....


वैसे भी यह बात समझ से परे लगती है आम आदमी करता सेंसेक्स से क्या लेना देना ? बीते २० सालो में एक खास बात यह देखने में आई है सरकार की विकास दर और गरीबी के आकडे दोनों तेजी के साथ बढे है .... सरकारी आंकड़ो में विकास ने "हाईवे " की तरह छलांग लगाई है लेकिन इस रफ़्तार ने कुपोषण , गरीबी, भुखमरी जैसी समस्याओ को बढाया है ....इस दौर में कृषि जैसे सेक्टर की हालत सबसे खस्ता हो गई......

शहरों में चकाचौंध तो तेजी से बढ़ी लेकिन गावो से लोगो का पलायन बदस्तूर जारी रहा .....आज आलम यह है कृषि में हमारी विकास दर दो फीसदी से भी कम है जो हमारे फिसड्डी होने को बखूबी बया कर रही है..... ..... किसानो को सरकार ने इस दौर में पैकेज भी प्रदान किया है .... यही नहीं बैंक भी किसानो की मदद के लिये आगे आये है लेकिन इन सब चीजो के बाद भी किसान परंपरागत खेती को छोड़ने पर आमादा है......साहूकार के दौर में किसानो पर जो कर्ज के कष्ट थे अब वह लोन के बाद भी ज्यादा बढ़ गए है.....

आकडे इस बात की गवाही देने के लिये काफी है किसान आत्महत्या का एक बड़ा कारण कर्ज रहा है... किसान पर कर्ज को चुकाने का बोझ इतना ज्यादा है वह समय से इसे नहीं चुका सकता .... वैसे भी भारत की कृषि को "मानसून का जुआ " कहा जाता है जो "इन्द्र देव " की कृपा पर ज्यादा टिकी हुई है......उस पर तुर्रा यह है हमारे प्रधान मंत्री इसे लाभ का सौदा बनाने के बजाय विदेशी निवेश बढाने पर आमादा है जिसकी वकालत शुरू से मनमोहनी अर्थशास्त्र करता रहा है......ऐसे में अपने किसान की खुशहाली दूर की कौड़ी लगती है ......


अपने घर खुशहाली नहीं रहेगी तो दूसरे से मदद मांगने से क्या फायदा.....? लेकिन मनमोहन अमेरिकी कंपनियों के ज्यादा निकट चले गए है ..... शायद तभी उन्हें अपने देश के पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री के नारे "जय जवान जय किसान " का एहसास इस दौर में नहीं होता......अगर ऐसा होता तो बीते सात सालो में ढाई लाख किसान आत्महत्याए अपने देश में नहीं होती......और ना ही कुपोषण का यूनेस्को का कलंक हमारे माथे पर लगता...................

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

Bellary Mining Scam - Lawmakers become lawbreakers_Network_PKG The politically powerful people have plundered the nation’s wealth. In other words we can easily narrate it as way this country is looted by these politicos all over, make Ghaznavis and Nadir Shahs look like small-time pick-pockets. ETV's special report on “Khablam Karlo or Khablam Bangara, Khablam is iron, Bangara is gold” which turned our lawmakers to into lawbreakers. Not only lawmakers & legislators but the people who meant to implement the law had also allegedly involved in violating the rules seemingly conveying the message that 'All that Glitter is not Gold' . Large number of MLAs or MPs in Karnataka are leading businessmen. The traders have seemingly entered to the portals of legislatures because they know that the policies are made by those who are sitting there. They themselves decided to become the legislators, instead of relying on an intermediary politician. They had a chit fund business. Reddy's came to the limelight during the Lok Sabha elections in 1999. They worked for Sushma Swaraj after she stood as a long-shot candidate in Bellary, against Sonia Gandhi. Though Sushma lost, she remained a patron of the Reddys. And by 2005 they had entered politics. Despite being influenced by Saffron party they developed close terms with the then Andhra Pradesh chief minister YSR. Through this, they found a ready-made uncle in Rajasekhara Reddy and a ready-made mother in Sushma Swaraj. Earlier, during the British there was mining going on in the state but the demand in the international market was very, very poor. Therefore they were practically on the verge of closure. Once they found out that Korea, Japan, China, had the technology of converting the ‘fines’ into higher steel & the countdown to the August 2008 Beijing Olympics gave the steel industry a boom. The Games witnessed the commissioning of huge infrastructure projects led to a hunger for steel in China. Mentionably, the iron ore found in Bellary is one of the finest in the world with an iron (Fe) content of 60-65 per cent, and is known as 64Fe. This ore is exported in its raw form to not only to China but also to countries like Japan, South Korea and Australia. After turning into strong leaders they care very little about law. The more money, power and political prominence they got they felt that they could do anything & everything. TDP chief N Chandrababu Naidu stated that YSR the then Andhra Pradesh CM had saved them for five years. He also revealed son of YSR, Jagan Mohan Reddy's connection with illegal mining. ' N Chandra Babau Naidu, TDP chief [BLOOD_AND_IRON-2] TCR (1:10- 2:00) VTS_01_1 VO4: They started working independently. They started expanding their activities like a mafia. Experts believes that 30 million tonnes of iron ore was looted from state. They would have excavated only as much as they could consume but because of the International market demand was huge, they without following the guidelines of Indian Bureau of Mines, they went on grabbing every possible place, even agricultural land. Indian Bureau of Mines (IBM) for inspected that about 103 mines there, out of these 95 are iron ore mines. In which out of 95 iron ore mines, two are sub-judice.Union Minister for Mines BK Handique has informed that whatever iron ore were exported, 70% are fines and 30% are lumps. 30 % lumps in the country itself out of the 70% fines, exported almost all. These fines, have no use for them. As the country don’t have the right technology & the energy is very costly here in India. Apart from political patronage, Reddy's have also got the support of former chief justice of Karnataka, Justice Dinakaran, who resigned recently,dealt with the number of cases of this mining mafia. He allegedly passed a series of orders in their favor. Justice Dinakaran allowed him to lift more then one lakh ton of iron ore from reserved forest. Senior Advocate Prashant Bhushan sharply reacted over that they have mined the border of Andhra-Karnataka. On paper, the Gali Reddy brothers do not own even a square inch of a mining lease in the state of Karnataka. However, they have promoted Obulapuram Mining Company, which has a mining lease in the neighbouring state of Andhra Pradesh. In Karnataka, the Reddy brothers and their associates have been accused of using strong-arm methods to control mining operations in the name of other lease-holders through illegal sub-leases and third-party ‘raising’ contracts .On the contrary, Janardhan Reddy claiming to be innocent from very beginning and stated that will resign if single evidence found against him. As much as 70 per cent of the total production had no market and then before the Beijing Olympics China went after infrastructure in a big way .The requirement of steel went up, accordingly the requirement of iron ore went up and when this boom came which led such a biggest mining scam. Money is a thing where political differences sink, the parties joined hands. Not only the politicos but the Justice also allegedly indulged in the scam claimed to be the biggest scam of Independent India, in terms of money.

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

जूता-चप्पल और चांटा मारने के इस दौर में.....












माफी के साथ, कह रहा
हूं कि बहुत खुशी होती है जब कोई गलत आदमी इसका शिकार होता है,,,,,,,लेकिन चुंकि यह गांधी का देश है---इसलिए यहां हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है,,,,,,,,,,और किसी भी कीमत पर इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि अगर कोई गलत आदमी इसका शिकार होता है...तो वह और उसके राजनीतिक समर्थक अपने प्रतिद्वन्दियों पर भी उसी अंदाज में हमला कर सकते हैं....कुछ दिन पहले तरह जिस हरविंदर सिंह नाम के एक भाई ने शरद पवार को थप्पड़ मारा था,,,,उसे खुद की राजनीतिक पार्टी खड़ी करनी चाहिए,,,,या फिर अपने विचारों से मेल खाने वाली पार्टी ( अंधे में कानी ही सही ) के साथ मिलकर काम करना चाहिए.....और जिस महंगाई और भ्रस्टाचार से आजिज आकर उसने क्रिकेट में व्यस्त रहने वाले एक केन्द्रीय मंत्री को चांटा मारा था ,,,उस महंगाई और भ्रस्टाचार को उसे ख़त्म करना चाहिए........खैर उसने जो काम किया था...वो उसे भगत सिंह की राह पर चलना समझ रहा होगा...लेकिन आज के युग में भगत सिंह बनना मुश्किल है,,,,आज एक नेता या राजनितिक पार्टी या अधिकारी गलत होता तो भगत सिंह की राह सही मानी जा सकता थी ...लेकिन यहां तो हर शाख पर उल्लू बैठा है....और आज के युग में जब सेना और पुलिस सरकार के हाथ में है वह उसका सही और गलत इस्तेमाल कर सकती है....जैसा कि हम बाबा रामदेव के मामले में दिल्ली के रामलीला मैदान में तमाशा देख चुके हैं,,,,ऐसे में इन उल्लुओं पर अहिंसा का हथियार ही कारगर होगा....वरना हरविंदर सिंह जैसे नासमझ और अतिउत्साही लोगों को नक्सली टाईप का या सस्ती लोकप्रियता के लिए काम करने वाला घोषित कर दिया जायेगा...कुल मिलाकर जूता, चप्पल और चांटा मारने के इस दौर में ख़ुशी की बात ये है कि हमारे पास अन्ना हजारे जैसे मार्गदर्शक मौजूद हैं....अन्ना हजारे २७ दिसम्बर २०१ से फिरसे अनशन पर बैठने वाले हैं......ऐसे में अन्ना जी का साथ हरविंदर जैसे लोगो को जरुर देना चाहिए......यूँ तो देश के ज्यादातर लोग अन्ना जी के साथ हैं और रहेंगे.....क्योंकि अन्ना जी जिस अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं..... उससे पुलिस उनको क्या उनके समर्थकों तक को छूने में हजार बार सोचती है..... रही बात अन्ना हजारे के कांग्रेस के विरोध में ५ राज्यों के प्रचार करने की तो .....वो करें, लेकिन एक बार वो इतना जरुर बताते चलें कि ईमानदार कौन है ...जनता वोट किसको दे....अगर बसपा को--- तो बलात्कारी विधायक किस पार्टी में हैं.....सपा को ---तो अमर सिंह जैसे दलाल कहाँ से पैदा हुए,,,,, बीजेपी को तो ---येदियुरप्पा किसके खेत की मूली है,,,,,लोकदल को तो---अवसरवादी और परिवारवादी कौन है........अन्ना जवाब दें न दें हम उनके साथ हैं........और देश के युवाओं और मीडिया वर्ग से गुजारिश और उम्मीद करते हैं कि वे अन्ना का साथ पहले की रह देंगे..डेल्ही से बाहर वालों रिजर्वेशन करालो ...डेट -२७ दिसम्बर , जगह-फिर वही -- दिल्ली का रामलीला मैदान......

सोमवार, 28 नवंबर 2011

हम माटी के मानुष मरते रहे...



दौरे दौर बदलते रहे हम माटी के मानुष मरते रहे...


जागीरों से, जमीनों से


कभी सूद पर सेठों की चोरी से


हम माटी के मानुष मरते रहे...


दौरे दौर बदलते रहे


हम माटी के मानुष मरते रहे...


देख हरियाली इन खेतों की


ना नदियों के, ना तालाबों के


ना बादलों के नीर से


पली है, बढ़ी है


ना कोठियों में रहने वाले


मालिकों के खून से


ये हरियाली छाई है


सदियों इन जंगलों को,


खेतों की इन स्यालों को


खून पसीना सिर्फ हम अपने


देते रहे हैं


देते रहे हैं


दौरे दौर बदलते रहे


हम माटी के मानुष मरते रहे...

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

भ्रसटाचार ही लोकतंत्र की सही प्रथा ......


देश जब से आजाद हुआ है तब से देश में बहस छिड़ी हुई है की आखिर लोकतंत्र की प्रथा क्या है और आज तक यह साबित नहीं हो पाया की आखिर सही प्रथा है क्या समय समय पर हर राजनेतिक दल ने या किसी संगठन ने अपने तरीके से लोकतंत्र को परिभाषित किया पिछले कई दिनों में कई उद्धरण सामने आये है जिससे यह समझने में आसानी हो की लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलने के लिए क्या किया जाए तो अन्ना ने शांति प्रद तरीके से आन्दोलन किया इस आन्दोलन को अपार जन समर्थन मिला तो कुछ राजनेतिक पार्टियों ने इसे ब्लेक्मेलिग़ कहा यह कहा की ये देश में गलत प्रथा चालू हो रही है उसके बाद नंबर आता है जूता फेक का जिसमे लोगो ने आपना बिरोध नेताओ पर जूता फेक कर किया फिर जिस पार्टी के नेता पर जूता फेका उस पार्टी का कहना था की यह देश में गलत प्रथा चालू होर ही है अब कल एक आदमी ने शरद पवार को तमाचा मार दिया तो शरद बाबु की पार्टी के लोगो ने इसका बिरोध किया बिरोध सही भी था पर फिर भी बहस की यह लोकतंत्र के लिए गलत प्रथा है लेकिन पिछले ६५ सालो से भ्रसटाचार हो रहा है और इस प्रथा के बारे में किसी राजनेतिक पार्टी या नेता ने यह नहीं कहा की यह गलत प्रथा देश में चल रही अब जब हम देश की संसद पर बिसबास करे और इन नेताओ के हिसाब लोकतंत्र की सही प्रथा की बात करे तो एक ही प्रथा बचती हे बो है भ्रसटाचार
क्या यह प्रथा सही है इस पर अपने सुझाब जरुर दे

बुधवार, 16 नवंबर 2011

खास होकर भी आम हूँ


खास होकर भी आम हूँ
हाँ जो भी हूँ सरेआम हूँ
जिंदगी के छोटे छोटे सपनो को लेकर डुबती उभरती रहती हूँ
फौलाद सा ह्रदय लिए गिरती सवरती रहती हूँ
हर मोड़ पर मुझे लड़ना झगड़ना पड़ता है
हर बार गिरकर संभलना पड़ता है
कभी सागर के पर कभी अपनों के संसार में कहती चलती हूँ
हाँ हूँ मैं एक लड़की  जो सबसे  कहती चलती हूँ .
घर की चार दिवारी से निकल कर
मन में ख्वाबों का आशियाँ ले कर उडती चलती हूँ
हाँ हूँ मैं एक लड़की जो सबसे कहती हूँ
जब जब मेरी चेतना जागी
तो मैं उन लोगों से दूर भागी
जिन्होंने हर बार कराया अहसास
की तुम लड़का होती काश
तो तुम पे कोई न बांध पता अपना मोह पाश
चाहें जो भी हो मुझे इस तिलिस्म को तोडना होगा
मुझे हर उस बंधन को छोड़ना होगा
जो मुझे मेरे होने के अहसास से दूर करता
मुझे मेरे अस्तित्व को समझने परखने से रोकता है.  

गुरुवार, 10 नवंबर 2011




Resuming the way of success with maintaining your dignity, and do not depend upon the destiny because it always pull out your feet from that ways where to become get something by hope, although it not come everyday like as such situation but when it come, eye can never stop.....

बुधवार, 9 नवंबर 2011

खबर नई दिल्ली से.....अमर सिंह ने जिंदगी में पहली बार कोई सत्य बात कही !


बसपा के विधायकों को तोड़कर सपा में शामिल करवाने का दावा करने वाले, बिपासा बसु के साथ फोन टेपिंग मामले में चर्चा में आने वाले और 22 जुलाई 2008 को लोकसभा में विश्वास मत के लिए सांसदों को खरीदने के तथाकथित सुत्रधार कोई और नहीं माननीय अमर सिंह साहब ही हैं। कैश फॉर वोट मामले में जेल से बाहर निकलने के बाद अमर सिंह ने मंगलवार यानि की 8 नवम्बर 2011 को नई दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेस आयोजित किया। यूं तो इस प्रेस कांफ्रेस में अमर सिंह ने पत्रकारों के तमाम सवालों का जवाब दिया, लेकिन टीम अन्ना के बारे में अमर सिंह ने जो बात कही... शायद उनके मुंह से अब तक निकला वह पहला और एक मात्र सत्य है और जो देश हित में भी है। दरअसल टीम अन्ना के बारे में अमर सिंह ने कहा कि- जब टीम अन्ना ने भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस सभी को भ्रष्ट कह दिया है यानि कि टीम अन्ना इन सबसे त्रस्त है। ऐसे में टीम अन्ना को चाहिए कि वह राजनिती का एक विकल्प देश को दे। अमर सिंह ने आगे कहा कि जय प्रकाश नारायण ने जब सबको भ्रष्ट कहा था तो उन्होंने एक विकल्प बना दिया था, वह विकल्प था 'जनता पार्टी' के रूप में। जयप्रकाश जी ने सारी बिखरी ताकतों को, विपक्ष में बिखरी ताकतों को एक किया था। सारी बिखरी ताकतों का समन्वय करके उन्होंने जो विकल्प दिया था वह इतना मजबूत था कि जार्ज फर्नाडीस, मधु लिम्हे और चन्द्रशेषर जैसे नेताओं के जेल में बंद होने के बावजूद जनता ने उनके नाम पर चुनाव लड़कर, नेताओं ने नहीं बल्कि जनता ने चुनाव लड़कर इंदिरा गांधी जैसी मजबूत नेता को अपदस्थ कर दिया था। अब अन्ना हजारे बताएं कि क्या वह देश के प्रधानमंत्री बनेंगे, किरण वेदी रक्षा मंत्री- गृह मंत्री बनेंगी, अरविंद केजरीवाल सूचना मंत्री बनेंगे, देश के सामने विकल्प क्या है, बिना विकल्प बताए ये कह देना कि सब चोर हैं, सब भ्रष्ट है ये आरोप लगा देना ठीक नहीं है। अमर सिंह अब चाहें जितनी बड़ी-बड़ी बात करलें लेकिन ये बात 100 प्रतिशत सच है कि आज अमर सिंह को लोग समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता होने के कारण ही पहचानते हैं। अमर सिंह जब समाजवादी पार्टी में थे तो उन्होंने बसपा के विधायकों को तोड़कर सपा में शामिल करवाया था और ये बात शायद उन्होंने खुद स्वीकार किया था...ऐसे में भारतीय लोकतंत्र के हित में उनकी उपयोगिता क्या रही है ये बताने की आवश्यकता नहीं है। किसी जमाने में अमिताभ बच्चन, सुब्रतो रॉय और मुलायम सिंह को दाएं-बाएं लेकर चलने वाले अमर सिंह की विश्वसनीयता न कभी रही है न कभी रहेगी। मुलायम सिंह के जातिवादी राजनिती को पैसे के जरिये बढ़ाने मे मदद करने के सिवाय उनका कोई योगदान नहीं रहा है। पैसा ही अमर सिंह की ताकत रही है। जाति से ठाकुर होने के नाते दिग्विजय सिंह भी न जाने कब से अमर सिंह का साथ देते आये हैं और न जाने कब तक साथ देते रहेगे। कुल मिलाकर कैश फॉर वोट कांड में फंसे अमर सिंह का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा है। आज वह राज्यसभा के सांसद हैं तो सपा के कोटे से है। आगामी यूपी के विधानसभा चुनाव के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि अमर सिंह कितने जमीनी नेता हैं...लोक मंच को कितनी सीटें दिला पाएंगे...भोजपुरी संगीत के बड़े सेवक और गोरखपुर के लोकसभा सीट से योगी आदित्यनाथ से पराजित छुटभैया नेता मनोज तिवारी और बेचारी जया प्रदा के सिवाय कोई जाना पहचाना चेहरा उनके साथ नहीं है। कुल मिलाकर मंगलवार को जो बात उन्होंने दिल्ली प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कही, अन्ना हजारे और उनकी टीम को उस पर जरूर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि अन्ना जिनपर देश की ज्यादातर जनता विश्वास करती है उन्होंने मौनव्रत तोड़ने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं है, एक पार्टी ग्रेजुएट है तो दुसरी पार्टी ने भ्रष्टाचार में पीएचडी किया है। टीम अन्ना के सदस्य मनीष सिसौदिया भी सपा-बसपा को चोर कह चुके हैं । ऐसे में अन्ना हजारे देश को असहाय नहीं छोड़ सकते हैं। अन्ना को अमर सिंह द्वारा कहे गये जिंदगी की एक मात्र सत्य बात पर गौर करना ही चाहिए क्योंकि लेदेकर भाजपा या कांग्रेस में से ही कोई एक पार्टी केन्द्र में सरकार बनाएगी । भारत के अधिकाश राज्यों में या तो भाजपा या कांग्रेस और उसके सहयोगी दल की सरकार है। और टीम अन्ना ने जनता का इन पार्टीयों से मोह भंग करने का कार्य किया है। फिर जनता किसको वोट दे टीम अन्ना को यह बताना ही चाहिए।


New term of betray with sever ties to congress

Mamata is not averse of congress, she is showing only sever that she may be sever ties if government would not accept her demand of falling price of kerosene, diesel,petrol and cooking gas, which hiked a few days ago,trinamul has made it clear before the government that they do not betray the people's therefore,T.MC. has been calling out against the hiked price, but after all a scene creating here as like as Hypocrite day to day in bangala soil, only we are waiting to watch that condition when DIDI really sever ties with centre,but hereafter what have to do so ? now idea.....

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

क्यों न " महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना " का नाम बदलकर " गंगू तेली रोजगार गारंटी योजना " कर दिया जाए...















केन्द्र की यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का नाम कुछ वर्ष पहले ही बदलकर महात्मा गाँधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कर दिया गया। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन की दिशा में किया गया महत्वपुर्ण कार्य है। इसका श्रेय कांग्रेसनीत यूपीए सरकार को जाता है। लेकिन जब हम देखते हैं कि इस योजना के अंतर्गत काम करने वाले मजदूरों के एक दिन की मजदूरी लगभग 120 रूपया मात्र है तो हमें इस योजना की सच्चाई का पता चल जाता है। और यह बात भी आसानी से समझा जा सकता है कि सरकार की नजर में गांव के मजदूरों की क्या कद्र है। जहां एक ओर सांसदों का वेतन 16 हजार से बढ़ाकर एक ही झटके में 80 हजार कर दिया गया...वहीं मजदूरों को १२० रुपया एक दिन की मजदूरी दी जा रही है... महंगाई के इस युग में कोई भी आदमी अपने परिवार को महज १२० रुपया में क्या खिलायेगा....और शिक्षा...स्वास्थ्य का क्या प्रबंध करेगा...कुल मिलाकर अगर १२० रुपया प्रतिदिन ही देना था... तो महात्मा गाँधी का नाम इस योजना के साथ क्यों जोड़ा गया....या तो केंद्र सरकार गाँव के मजदूरों के एक दिन की मजदूरी १२० से बढ़ाकर कम से कम ३०० रुपया कर दे......नहीं तो इस योजना का नाम '' गंगू तेली रोजगार गारंटी योजना '' कर दे....मात्र १२० रुपया प्रतिदिन मजदूरी देने वाले इस योजना में महात्मा गांधी का नाम जोड़कर न सिर्फ मजदूरों का अपितु गांधी जी का भी अपमान किया जा रहा है।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

" BENGAL SWEET ATTRACT THE VISITOR WHO COME KOLKATA TO SEE BANGALA SOIL BEAUTY "

Every time busy kolkata avenue, has something that's attract those who come here first to spent their holiday with his pal, as a out of dweller ,because the culture of city is very lovingly along with here two variation make people for thinks on a lot. one is beauties of meyer chok " eye of bangala girl" and another is sweet of the city which found every corner of the street, that's why kolkata called sweetest city of city pent. so without more narration by word, i want to see you some kolkata misitee " sweet"...... I was ate,those sweet before joining media profession because ever since i did not get time to stay a long and where i am right now there do not get as like as kolkata quality, so i miss too my city sweet everyday.....