भारत एक लोकतान्त्रिक देश है .....यहाँ प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार दिए गये हैं....इसी समान अधिकार की वजह से नरेंद्र मोदी ( जो शायद कभी चाय की दुकान चलाते थे )..आज गुजरात में गद्दी सम्भाल रहे हैं...और मायावती जैसी सामान्य शिक्षिका आज यूपी में राजकाज देख रही हैं..... मुझे इस देश की व्यवस्था से कोई शिकायत नहीं है.....क्योंकि इसे कायम रखने या सुधारने की जिम्मेदारी मेरी भी उतनी ही है.....जितनी राहुल गाँधी या मनमोहन सिंह की है.....
लेकिन मुझे दुःख इस बात का है कि जहाँ एक ओर एक आम मजदुर आठ घंटे काम करके सौ रूपया कमाता है और महीने में बमुश्किल तीन हजार में अपने पांच -छः सदस्यों को पाल रहा है ....बच्चों को पढ़ा-लिखा रहा है.....वहीँ दूसरी ओर मायावती ,मुलायम सिंह ,लालू यादव ,जय ललिता और मधु कोड़ा जैसे लोग गद्दी पर बैठते ही अरबों -खरबों के मालिक बन जाते हैं .....इनके खिलाफ सीबीआई की जाँच चलती है .....करोड़ो तो ये लोग कमा चुके हैं और करोड़ो इनके जाँच में खर्च हो जाता है....नतीजा क्या निकलता है......कभी मायावती के सांसदों के वोट के लालच में केंद्र सरकार सीबीआई की पकड़ कमजोर करती है तो कभी मुलायम और लालू के सांसदों के वोट के लालच में....वैसे केंद्र सरकार में भी दूध के धुले लोग बैठे होते तो कुछ उम्मीद भी किया जाता....मगर वहां भी खानदानी लोगों का राज चल रहा है ...जो सिर्फ इसी जुगाड़ में रहते हैं की शासन की लगाम खानदान से बाहर न जाये...भले ही दर्जनों मायावती पैदा हो जाये और अपनी मूर्तियाँ लगवाएं ----भले ही सैकड़ो लालू और कोड़ा हो जाये और चारा और कोयला निगलते जाये... ऐसी बात नहीं है की इन लोगो का इलाज नहीं है......इलाज है मेरे पास है...आपके पास है ....
मगर सवाल ये है कि बिल्ली के गले में घंटा कौन
बाँधेगा .........................................................................................
.ऊपर मैंने जो कुछ भी लिखा है वो सब अपनी एक कविता की भूमिका के लिए लिखा है............कविता कुछ इस तरह से है
अगर मुझे कानून का डर न होता
अगर मुझे कानून का डर न होता
अगर मुझे समाज का डर न होता
अगर मुझे ऊपर वाले का डर न होता
तो मै जाने क्या-क्या कर गया होता
मगर इस कानून से , इस समाज से
और ऊपर वाले से मुझे ही डर क्यों
....................... लगता है
उन्हें डर क्यों नही लगता
जो जुर्म पर जुर्म किये जा रहे हैं
कुर्सी पर बैठकर हमारा खून
................... पीये जा रहे हैं
अरे कोई जरा कह दो उनसे कि समाज
से ,कानून से और ऊपर वाले से डरे
अगर हम भी डरना छोड़ देंगे तो
उन्हें तो दुनिया ही छोड़नी पड़ेगी
..............ईमान से... ................
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010
मीडिया को कोसना बंद करो
जाने माने फ़िल्मकार महेश भट्ट ने मीडिया पर अपनी भड़ास निकलते हुआ दैनिक जागरण के सम्पादकीय में लिखा हैकि मीडिया खबरे देते हुए अपने सीमओं और कर्तब्यो को भूल जाता है। आपको इस बात का बहुत कष्ट है की मीडिया निजी जीवन में घुस रहा है, हमारे बेडरूम तक घुस रहा है , आम आदमी को रिपोर्टर की तरह प्रयोग कर रहा है । खैर गलत कुछ नहीं है ।
पिछले कुछ दिनों से मीडिया के खिलाफ लिखना एक फैसन सा बनता जा रहा है और खास करके इलेक्ट्रोनिक मीडिया के खिलाफ, लेकिन मै यह नहीं समझ पा रहा हूँ की इन लोगो को मीडिया के बेडरूम में घुसने से दिक्कत क्यों है भारत के लोग तो परेशां है की मीडिया उनके बेडरूम में नहीं पहुच रही है । क्योकी उनका बेड रूम ही उनका किचेन है, वही खाना बनाते है वही कपडे रखते है वाहे सोते है कोई बहार सर मिलने आजाये तो वही बैठ कर मिलते भी है और उन्हें दुःख इस बात का है कीखुद गलत काम करना बंद करो मीडिया अपने आप तुम्हारा पीछा छोड़ देगी और बहुत हो चुका अब मीडिया को कोसना बंद करो और बैठ कर आत्ममंथन करोमै चाहता हू मै चाहता हू की मीडिया मेरे पीछे आये पर आती ही नहीं मेरे गाँव का बदलू भी चाह्ता है की मीडिया आये पर आती ही नहीं क्या करे भाई. जरी रहेगा मीडिया हकमारी निजी जिन्दगी में नहीं झाकता है। वो कहते है मीडिया दिखाए की आज हम बिना खाए सो गए है, आज मालिक नाराज थे तो पैसा नहीं मांग सका खाना नहीं बना बच्चे भी भूखे है, पर ऐसा हो नहीं रहा है।
साहब लिखते है की मीडिया को अपना खुद का कोड ऑफ़ सेंसरशिप तीयआर करना चाहिए , लोगो को ऐसी खबरों का वहिष्कार करना चाहिए जो मानवीय सम्बेदानाओ को और भावनाओ को आहात करने वाली होसाहब अपनी फिल्मे बनाते वक्त ऐसा कई नहीं सोचते है । तब तो आप कहते है जो डिमांड है मै उसकी पूर्ती कर रहा हू , आप कहते है की मै फिल्मो पर पैसा लगता हू पैसा कमाने के लिए उस समय इनके जेहन में यह ख्याल नहीं आता की उनके इस कृत्य का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा ।
पिछले दिनों मीडिया ने कुछ गलतिया की लेकिन वो नियोजित नहीं था और उसके बाद लगत आलोचनों का शिकार होकर उसने सुधार भी किया , पर आज परेशानी इण्डिया के लोगो को है उन १० से २० प्रतिशत लोगो को है जो आम जनता पर शाशन कर रहे है इनके चहरे बाहर से जितने साफ दीखते है ये अन्दर उतने ही गंदे है पर ये चाहते है की इनकी गंदगी छुपी रहे और ये आराम से शाशन करते रहे , इनके बेडरूम में गड़बड़ी है इसलिए ये वहा मीडिया का आना नहीं पसंद करते है पर मुझे खुशी है की मीडिया अपना काम कर रही है, गरीबो की गरीबी दिखा नहीं पा रही है काम से काम अमीरों की ऐयाशी तो दिखती है , ये लोग मीडिया को गली देंगे की की यह नहीं दिखाना चाहिए पर खुद नहीं सोचेंगे की यह नहीं करना चाहिए ।
मुझे समाज के इन कथित बुधिजीवियो से यही कहना है की मीडिया पर अंकुश लगाने से पहले खुद पर अंकुश लगाओ , खुद गलत काम करना बंद करो मीडिया अपने आप तुम्हारा पीछा छोड़ देगी और बहुत हो चुका अब मीडिया को कोसना बंद करो और बैठ कर आत्ममंथन करोमै चाहता हू मै चाहता हू की मीडिया मेरे पीछे आये पर आती ही नहीं मेरे गाँव का बदलू भी चाह्ता है की मीडिया आये पर आती ही नहीं क्या करे भाई? जरी रहेगा .............
पिछले कुछ दिनों से मीडिया के खिलाफ लिखना एक फैसन सा बनता जा रहा है और खास करके इलेक्ट्रोनिक मीडिया के खिलाफ, लेकिन मै यह नहीं समझ पा रहा हूँ की इन लोगो को मीडिया के बेडरूम में घुसने से दिक्कत क्यों है भारत के लोग तो परेशां है की मीडिया उनके बेडरूम में नहीं पहुच रही है । क्योकी उनका बेड रूम ही उनका किचेन है, वही खाना बनाते है वही कपडे रखते है वाहे सोते है कोई बहार सर मिलने आजाये तो वही बैठ कर मिलते भी है और उन्हें दुःख इस बात का है कीखुद गलत काम करना बंद करो मीडिया अपने आप तुम्हारा पीछा छोड़ देगी और बहुत हो चुका अब मीडिया को कोसना बंद करो और बैठ कर आत्ममंथन करोमै चाहता हू मै चाहता हू की मीडिया मेरे पीछे आये पर आती ही नहीं मेरे गाँव का बदलू भी चाह्ता है की मीडिया आये पर आती ही नहीं क्या करे भाई. जरी रहेगा मीडिया हकमारी निजी जिन्दगी में नहीं झाकता है। वो कहते है मीडिया दिखाए की आज हम बिना खाए सो गए है, आज मालिक नाराज थे तो पैसा नहीं मांग सका खाना नहीं बना बच्चे भी भूखे है, पर ऐसा हो नहीं रहा है।
साहब लिखते है की मीडिया को अपना खुद का कोड ऑफ़ सेंसरशिप तीयआर करना चाहिए , लोगो को ऐसी खबरों का वहिष्कार करना चाहिए जो मानवीय सम्बेदानाओ को और भावनाओ को आहात करने वाली होसाहब अपनी फिल्मे बनाते वक्त ऐसा कई नहीं सोचते है । तब तो आप कहते है जो डिमांड है मै उसकी पूर्ती कर रहा हू , आप कहते है की मै फिल्मो पर पैसा लगता हू पैसा कमाने के लिए उस समय इनके जेहन में यह ख्याल नहीं आता की उनके इस कृत्य का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा ।
पिछले दिनों मीडिया ने कुछ गलतिया की लेकिन वो नियोजित नहीं था और उसके बाद लगत आलोचनों का शिकार होकर उसने सुधार भी किया , पर आज परेशानी इण्डिया के लोगो को है उन १० से २० प्रतिशत लोगो को है जो आम जनता पर शाशन कर रहे है इनके चहरे बाहर से जितने साफ दीखते है ये अन्दर उतने ही गंदे है पर ये चाहते है की इनकी गंदगी छुपी रहे और ये आराम से शाशन करते रहे , इनके बेडरूम में गड़बड़ी है इसलिए ये वहा मीडिया का आना नहीं पसंद करते है पर मुझे खुशी है की मीडिया अपना काम कर रही है, गरीबो की गरीबी दिखा नहीं पा रही है काम से काम अमीरों की ऐयाशी तो दिखती है , ये लोग मीडिया को गली देंगे की की यह नहीं दिखाना चाहिए पर खुद नहीं सोचेंगे की यह नहीं करना चाहिए ।
मुझे समाज के इन कथित बुधिजीवियो से यही कहना है की मीडिया पर अंकुश लगाने से पहले खुद पर अंकुश लगाओ , खुद गलत काम करना बंद करो मीडिया अपने आप तुम्हारा पीछा छोड़ देगी और बहुत हो चुका अब मीडिया को कोसना बंद करो और बैठ कर आत्ममंथन करोमै चाहता हू मै चाहता हू की मीडिया मेरे पीछे आये पर आती ही नहीं मेरे गाँव का बदलू भी चाह्ता है की मीडिया आये पर आती ही नहीं क्या करे भाई? जरी रहेगा .............
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
ऐतराज किसको हैं ................
खबरों की दुनिया में चल चला चल ही ठहर गया हैं .आप के जो आलाकमान कमीने किस्म के बैठे मिलेगे वो मेरे भाई कुछ नहीं जानते हम उनसे १००% जादा जानते हैं पर उनके पास नौकरी हैं और हम झक मर कर इंटर्न की आड़ में खुद को पिसवाते हैं और मजबूरन ही कहे ये तो शब्दों की महिमा हैं की हमे काम सिखाया जाता हैं ......
............................................................................................पर ये भी तय हैं की जब हम आयेगे तो लात मरकर इन हराम के पिलो को पत्रिकारता से निकल बहार कर देगे ये पत्रिकारता का संक्रमण काल हैं हम तो उस चौथे इस्ताम्भ के लिए जिए और मरेगे जो इसके मूल केंद्र में रखा गया हैं ...........हम आन्दोलन भी करेगी गलत करने वालो को सजाय मौत तो नहीं केवल उसके उनके हाथ और जुबान जरूर कटेगे ............................................
.................................ये वादा हैं पत्रकारिता धर्म से जिसको हमने विश्वविधालय से पाया हैं ...अपना नारा छीनो मरो लोटो ...........
............................................................................................पर ये भी तय हैं की जब हम आयेगे तो लात मरकर इन हराम के पिलो को पत्रिकारता से निकल बहार कर देगे ये पत्रिकारता का संक्रमण काल हैं हम तो उस चौथे इस्ताम्भ के लिए जिए और मरेगे जो इसके मूल केंद्र में रखा गया हैं ...........हम आन्दोलन भी करेगी गलत करने वालो को सजाय मौत तो नहीं केवल उसके उनके हाथ और जुबान जरूर कटेगे ............................................
.................................ये वादा हैं पत्रकारिता धर्म से जिसको हमने विश्वविधालय से पाया हैं ...अपना नारा छीनो मरो लोटो ...........
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
शान से परेशान हूँ
काल के जंजाल सा लगता हैं ये इंटर्नशिप पर क्या कहू सवाल हैं कहा से पाऊ नौकरी .....गम तो इतना हैं की आज छोड़ दू...... ये जाल का जंजाल ....पर हैं अगर कोई सोलुसन बताओ वरना चुप चाप तुम भी भटको खैर हम तो भटक रहे ही हैं .........अगर कोई पूछे क्या हैं नोकरी तेरे पास तनकर उठो कहो,,,,,,, हैं कोई व्यवस्था तेरे पास नहीं तो चल चलता बन ......और सुन अभागो के शूख स्वप्न सचे नही बहुत आच्छे होते हैं ..................कल तो मैं आई बी अंन , आजतक ,का मालिक बन कर दिखाउगा ........चल अभी शांत रह .....कल की खबर में एंकर ने जो तुझे बना दिया ......जीरो से हीरो बनने वक्त ही लगता हैं ....चल आज ये तेरा हैं .....ये कल माकूल मेरा होगा .....
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
हमने राखी टाईप के एंकर को लाईन नहीं मारी, फिर भी...................
आई.बी.एन.में इंटर्न का वो भी एक दिन था। रोज़ की तरह एक बडे़ से हॉल के अन्दर ढेर सारे लोग अपने-अपने कम्प्यूटर पर काम कर रहे थे। हॉल के ही एक कोने में चैनल का स्टूडियो था। वह स्टूडियो क्या था......पूरे चैनल के आकर्षण का केन्द्र था। मै स्टूडियो के करीब आउटपुट विभाग में खड़ा हो गया। राकेश त्रिपाठी पहले से वहां मौजूद थे ,अपने काम में व्यस्त थे। मैने उन्हे अपनी ओर बुलाया और स्टूडियो की ओर देखने का इशारा किया। दरअसल स्टूडियो में एक महिला एंकर एंकरिंग कर रही थी। हम लोग कभी टी.वी. देख रहे थे ,कभी उस एंकर को......। मैने देखा कि एक साहब हम लोगों को घूर रहे थे....मैने त्रिपाठी जी से कहा कि देखिये ...वो हम लोगों को घूर रहा है। मेरा ख्याल है यहां से कट लिया जाए....। लेकिन (कॉन्फिडेंस का दूसरा नाम राकेश) त्रिपाठी जी नहीं समझे....वो बोले इसका कोई मतलब नहीं है । हम लोग एंकरिंग देख रहें हैं.....किसी को क्या प्राब्लम है ।लेकिन तभी वो साहब हमारे पास आ गये.....और बोल उठे...तुम लोग यहां इंटर्न करने आये हो...त्रिपाठी जी गर्व से बोले हां सर । वो साहब अजीब सा चेहरा बनाकर बोले....तुम दोनो दुबारा यहां दिखायी मत देना, जाकर कुछ काम करो...। मैने तुरन्त '' बाएं मुड़ आगे बढ़ '' वाला फन्डा अपनाया और वहां से वैसे ही गायब हुआ जैसे गुरुदेव के रूम से ललित और हर्ष उस समय गायब हुए थे , जब अपने विवेक भाई, फरहान साहब के लिये गुरूदेव के पास पूरी टीम लेकर वकालत करने करने गये थे.....और गुरूदेव ने डांट दिया था। ख़ैर अब हम लोग सुरक्षित इलाके में पहुंच चुके थे......मेरा मतलब स्पोर्ट डेस्क के पास..... जहाँ से आदिमानव टाईप के वो सर हम लोगों को देख नहीं सकते थे....। मैने त्रिपाठी जी से पूछा वो क्यों बकवास कर रहा था......वे बोले -पता नहीं मह.राज उसको क्या दिक्कत है........। मैने कहा --अरे यार उसको लग रहा था कि हम लोग एंकर को लाईन मार रहे हैं.........उस दिन के बाद से मै रोज वहीं जाकर खड़ा होता हूं ...लेकिन अकेला...। अब वो आदिमानव कुछ नहीं बोलता है.... शायद उसे हम दोनो के साथ-साथ खड़ा रहने से प्राब्लम है........और शायद इसी को तो कहते हैं कि डर के आगे जीत है......क्योंकि हमने एंकर को लाईन नहीं मारा था.....तो नहीं मारा था.......... भला एंकर भी कोई लाईन मारने की चीज है...वो भी ''राखी टाईप की एंकर'' लेकिन आदिमानव और महामानव को कौन समझाये .......
रविवार, 4 अप्रैल 2010
रात गयी , मगर बात नहीं गयी ....................
मगर नहीं
आज पूरे हिंदुस्तान में सानिया मिर्ज़ा के शादी का विवाद छाया हुआ है ..... टीवी चैनल भी अमिताभ - कांग्रेस प्रकरण दिखा दिखा कर बोर हो चले थे .... इसी बीच सानिया मिर्ज़ा ने टीवी चैंनलों को बैठे -बिठाये एक मुद्दा खेलनें को दे दिया ....इस खेल की भूमिका पाकिस्तान के क्रिकेटर शोएब मलिक ने सन २००२ में ही लिख दिया था ....... बात कुछ इस तरह से है कि शोएब मलिक और आयशा सिद्दीकी की मुलाकात तब हुई जब शोएब मलिक महज २० वर्ष के थे ...... वह पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के सदस्य थे ....... आयशा सिद्दीकी सेलिब्रिटी शोएब के आकर्षण से बच नहीं पायीं .......और खुद को शोएब के हाथो समर्पित कर दिया .... शोएब नें आयशा के साथ वही किया , जो उनके जैसे ढेरो रईशजादे सेलिब्रिटी करते हैं .... करके चले जाते है........... शोएब जब पाकिस्तान पहुंचे तो आयशा से फोन पर बातें जारी रही .......सुनने में यह आ रहा है कि इन्टरनेट और फ़ोन पर ही शोएब नें आयशा के साथ निकाह कर लिया...... शोएब को क्या मालूम था कि किस्मत उन पर कुछ इस तरह से मेहरबान होगी कि सानिया मिर्ज़ा जैसी मशहूर हस्ती का साथ उन्हें मिलेगा .......लेकिन यही तो कुदरत का करिश्मा है कि किसे कब क्या मिल जाये कोई नहीं जानता ..... वैसे शोएब पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके हैं ...... मतलब प्रसिद्धि में वह सानिया से ज़रा भी कम नहीं है .......... शोएब की आयशा के साथ गुज़रे वो दिन आज उनके लिए मुसीबतों के पहाड़ बन चुके हैं........मतलब शोएब ने जिसे ""रात गयी बात गयी "" समझकर भुला दिया था...... वह उनके गले का फंदा बनता जा रहा है.......लेकिन सानिया मिर्ज़ा जिस बेशर्मी से शोएब के सुर से सुर मिलाकर १५ अप्रैल को शादी का ऐलान कर रहीं हैं ........वह आयशा के साथ ही साथ पूरे हिन्दुतान के मुंह पर तमाचा है ........लेकिन अफ़सोस इस बात का है की हमारे देश का कानून उन्हें ऐसा करने की पूरी इजाजत देता है.........सानिया को कम से कम कानूनन शोएब के वरी हो जाने का तो इन्तेजार करना चाहिए.......अब देखना यह है कि यह मामला कहाँ तक पहुँचता है....... जबकि स्टार न्यूज़ की ख़बरों के मुताबिक शोएब मलिक ने यह बात कबूल कर ली है कि उन्होंने फ़ोन पर निकाह किया है......लेकिन उन्हें गलत फोटो दिखाया गया था.......
अपने विशेष सहयोगी अंकित तिवारी ,गरिमा तिवारी ,रितू. रितेश और अभिनव तिवारी जी. डी.सलवान नई दिल्ली को धन्यवाद देते हुए इस विश्वास के साथ कि पीठ में छुरा घोंपने वाले देश पाकिस्तान के शोएब से सानिया मिर्ज़ा एक न एक दिन ज़रूर धोखा खायेंगी....और ये सानिया का निजी मामला नहीं है मेरे अपने देश का मामला है ...........मै अपनी बात को यहीं समाप्त करता हूँ ........
बुधवार, 31 मार्च 2010
इन्टर्न का तिलिस्म टूट ही गया .............
१५ फरवरी २०१० से मैंने भी आई बी एन सेवेन में इन्टर्न शुरू किया.........मै यहाँ कोई बड़ी आशा लेकर नहीं आया था....क्योंकि मेरे सीनियर रजत सर ने मुझसे कहा था कि किसी छोटे चैनल में इन्टर्न करना ,वहां ज्यादा सिखने को मिलेगा ........लेकिन प्लेसमेंट ऑफिसर साहब की मेहरबानी से आई बी एन सेवेन चला आया.....मुझे यहाँ अच्छा लगा ,यहाँ एक चीज मुझे महसूस हुआ की मुझे यहाँ दुसरे या तीसरे सेमेस्टर में ही आ जाना चाहिए था....जिससे मै न्यूज़ चैनल्स की रिक्वायरमेंट्स को पहले ही समझ पाता .......खैर ,देर आये दुरुस्त आये बोले तो जब जागो तभी सवेरा ........जब वहां पहुंचा तो मेरे साथ तीस लोग इन्टर्न ज्वाइन किये ...सभी को अलग -अलग जगहों पर लगाया गया...मुझे गेस्ट को -आर्डिनेशन में लगा दिया गया , मेरे साथ मेरे दोस्त राकेश त्रिपाठी जी भी थे .....उन्हें आउटपुट में लगाया ..... बेचारे बहुत ही सीधे और शरीफ आदमी -----पहली बार पता चला की माखनलाल में ऐसे व्यक्तित्व भी उपस्थित हैं ...खैर अगले दिन से मुझसे दोपहर १२ बजे से ९ बजे तक रहने को कहा गया ...............एक हफ्ते बाद मुझे में लगा दिया गया है...आउटपुट वाले साहब ९ बजे बुलाने लगे हैं आने लगा हूँ..आना पड़ता है....इधर गेस्ट वाले सर और मैडम अभी तक मुझ पर अधिकार जता रहे हैं ....शाम को ६ बजे से गेस्ट के घर भेज देते है ....................१० बजे रात तक की छुट्टी ....... फिर भी जाता हूँ..पहले ही बता चूका हूँ कि जाना पड़ता है .........वैसे मजा भी आता है नेता -सांसद- विधायक-पत्रकार सबसे मुलाकात हो जाती है ...इधर मेरे साथ अन्शुमान सिंह और आशीष चौरसिया भी आये हैं इंडिया टीवी में ....अन्शुमान का तो दोपहर १२ बजे से मानो दम -बेदम होने लगता है ...............लगते हैं ----- कॉल करने -मिस कॉल करने , मैसेज भेजने.... कहाँ हो..कब आइहो .....मै आ जाता हूँ ,,,सच कहूँ तो मुझे भी मजा आता है ....जितना मजा क्लास छोड़ने में नही आता था उससे ज्यादा मजा यहाँ आता है ........दोनों लोग मिलकर कभी जी न्यूज को कभी- पी न्यूज को ....................गरियाते रहते हैं........बीच -बीच में विवेक - प्रकाश(सी एन ई बी )अभिमन्यु, भाई लोग से मुलाकात होती रहती है...एक शाला एक लड़का से भी रोज मुलाकात हो जाती है.....वो कब खुस हो जाता है कब रोने लगता है पता ही नही चलता ,वो भी अपने आप में एक सनसनी है...........
एक दिन पी सी आर रूम में गये ...मेरे साथ एक लड़का और था.....लड़के ने कुछ पूछ दिया ......मानो उससे कुछ गलती हो गयी --------- एक साहब बौरा गये ,कहने लगे................ कहाँ चले आये ?किस फिल्ड में चले आये ,तुम लड़की होते तो तुम्हारा कुछ होता भी , कुछ किया भी जाता ,तुम हो लौंडा ,तुम्हारा क्या किया जाये , ...........................भाई हम तो सुनकर दंग रह गये, खैर वो भी पक्का मर्द निकला जो सच्चाई थी ,खुलकर कह दिया .......लेकिन भाई (DAR) भय के आगे जीत है ... इंशा अल्ला सीख ही रहा हूँ.........कुल मिलाकर आईबी एन में प्लेसमेंट की सम्भावना बहुत कम है ..........वैसे दुसरे जगह मिलेगी, तीसरे जगह मिलेगी ......बचके कहाँ जाएगी..... मिलेगी-मिलेगी ...क्योंकि हम हैं राही प्यार के फिर लिखेंगे - चलते चलते........ विवेक भाई जय श्री राम
एक दिन पी सी आर रूम में गये ...मेरे साथ एक लड़का और था.....लड़के ने कुछ पूछ दिया ......मानो उससे कुछ गलती हो गयी --------- एक साहब बौरा गये ,कहने लगे................ कहाँ चले आये ?किस फिल्ड में चले आये ,तुम लड़की होते तो तुम्हारा कुछ होता भी , कुछ किया भी जाता ,तुम हो लौंडा ,तुम्हारा क्या किया जाये , ...........................भाई हम तो सुनकर दंग रह गये, खैर वो भी पक्का मर्द निकला जो सच्चाई थी ,खुलकर कह दिया .......लेकिन भाई (DAR) भय के आगे जीत है ... इंशा अल्ला सीख ही रहा हूँ.........कुल मिलाकर आईबी एन में प्लेसमेंट की सम्भावना बहुत कम है ..........वैसे दुसरे जगह मिलेगी, तीसरे जगह मिलेगी ......बचके कहाँ जाएगी..... मिलेगी-मिलेगी ...क्योंकि हम हैं राही प्यार के फिर लिखेंगे - चलते चलते........ विवेक भाई जय श्री राम
विवेक भैया के नाम अंकित क़ि चिट्ठी ....................
मेरा नाम अंकित तिवारी है ....मै क्लास 4थ में एयरफोर्स स्कुल में पढता हूँ.....मुझे गाँव जाना पसंद है....मै अपने पापा मम्मी को बहुत पसंद करता हूँ...मै खरगोश को बहुत पसंद करता हूँ.....मुझे खाने में लोकी पसंद है......मेरा फेवरेट सब्जेक्ट मैथ है ...मेरा सपना बैंक मैनेजर बनना है.......आज के लिए बस इतना ही...............
.......................................................................विवेक भैया को अच्छा लगेगा तो फिर लिखूंगा........
.......................................................................विवेक भैया को अच्छा लगेगा तो फिर लिखूंगा........
सोमवार, 29 मार्च 2010
तमाशा राजनीति का..
हमारे देश के नेता अजीबो गरीब हरकते करते रहते हैं और अपने धूर्तगिरी का परिचय भी समय समय पर देते हैं.. लो एक नया बखेड़ा महाराष्ट्र में फिर से तैयार हो गया है और इस बार कांग्रेस ने अपनी वास्तविक छवि से सबको परिचित कराया है, आखिर कब तक कोई पाखंड का चोला पहनकर बैठ सकता है दरअसल अभिताभ को बांद्रा वरली के एक कार्यक्रम में बतौर अथिति के तौर पर बुलाया गया था लेकिन अतिथि को भगवान का दर्जा देने वाले इस देश में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अभिताभ और अशोक चव्हान को एक मंच पर देखा तो उन्हें यह दृश्य रास नहीं आया और उन्होंने इसका विरोध किया जिसका असर पुण के साहित्य सम्मलेन में देखने को मिला ....अमिताभ अपने पिता हरिवंश की कविता पढ़ते रहे और एक के बाद एक देश की समस्याओं को जो वास्तव में कविता में मौजूद थी के माध्यम से राजनीति और राजनेताओ को पिंच देते रहे ....अब देखिये ये राजनितिक तमाशा कौन सी करवट बदलता हैं ....
रविवार, 28 मार्च 2010
चाहते...
समय के ठहराव पर ही हम क्यों रूक जाते हैं .चाहते तो कुछ हैं पर मजबूरन करना कुछ पड़ता हैं। आखिर क्यों हम आपनी चाहतो को दिन प्रतिदिन मारते जा रहे हैं ,चाहतो को माकूल बनाना हमारे ही बस में हैं ,फिर भी हम असमर्थ क्यों होजाते हैं अब खुलकर सोचिये....
सोमवार, 22 मार्च 2010
योग्यता
अपनी जिन्दगी का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा,
तुमने योग्यता अर्जित करने में लगा दिया,
इस दौरान तुममे कई कुंठाओ ने घर किया ,
जिसे तुम समझ न सके
अब तुन्हारी योग्यता दो पन्नों में फनफनाने लगी,
कुछ और लोग
जो अब तुम्हारे योग्यता के दो पन्नो पर सवाल पूंछेगे
ये सवाल पूछने वाले जिन्दगी के उस पड़ाव पर हैं
जन्हा इन्हें अपनी योग्यता के आधार पर
यह सवाल पूछना है की तुम्हारी योग्यता क्या है ?
प्रश्नों का दौर चलता है
तुम अपनी योग्यता साबित करते जाते हो |
और अंत में एक व्यक्ती तुमसे कहता है
एक अंतिम प्रश्न पूंछू ?
आप पूरे आत्मविश्वास से लबरेज़ हो प्रश्न पूछने की अनुमती दे देते है
वह आपसे पूछता है
तुम्हारी जाति क्या है ?
और फिर भीषण सन्नाटा जो तुम्हारे मन से उपज कर
एक बंद कमरे में फ़ैल जाता है
तुम उस बंद कमरे से बाहर चुपचाप उठ कर चले आते हो
और अंत में आपके मन में एक सवाल खड़ा होता है
जो अंतविहीन बहस की तरह हो जाता है
आखिर योग्य कौन ?
तुमने योग्यता अर्जित करने में लगा दिया,
इस दौरान तुममे कई कुंठाओ ने घर किया ,
जिसे तुम समझ न सके
अब तुन्हारी योग्यता दो पन्नों में फनफनाने लगी,
कुछ और लोग
जो अब तुम्हारे योग्यता के दो पन्नो पर सवाल पूंछेगे
ये सवाल पूछने वाले जिन्दगी के उस पड़ाव पर हैं
जन्हा इन्हें अपनी योग्यता के आधार पर
यह सवाल पूछना है की तुम्हारी योग्यता क्या है ?
प्रश्नों का दौर चलता है
तुम अपनी योग्यता साबित करते जाते हो |
और अंत में एक व्यक्ती तुमसे कहता है
एक अंतिम प्रश्न पूंछू ?
आप पूरे आत्मविश्वास से लबरेज़ हो प्रश्न पूछने की अनुमती दे देते है
वह आपसे पूछता है
तुम्हारी जाति क्या है ?
और फिर भीषण सन्नाटा जो तुम्हारे मन से उपज कर
एक बंद कमरे में फ़ैल जाता है
तुम उस बंद कमरे से बाहर चुपचाप उठ कर चले आते हो
और अंत में आपके मन में एक सवाल खड़ा होता है
जो अंतविहीन बहस की तरह हो जाता है
आखिर योग्य कौन ?
बुधवार, 10 मार्च 2010
बाल ठाकरे और उनका मराठी मानुस
बाल ठाकरे और उनका मराठी मानुस शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे आज जो मराठी मानुस की बात तेजी याद आने लगी है उसका कारण है कि उन्हें लोकसभा और बिधान सभा मै उनका जनाधार कम हो गया है उनको उनकी मराठी जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है तथा उनके भतीजे राज की पार्टी को १३ सीटें प्राप्त हुई इससे बोखलाए बाल ठाकरे ने एवं उद्धव ठाकरे दोनों ने उत्तर भारतीयों को बहार निकलने एवं पाक खिलाडियों का समर्थन करने वाले शाहरुख खान को भी उन्होंने देशद्रोही ही नही कहा वल्कि यहाँ तक कहा कि उन्हें पाक चले जाना चाहिए समझ से परे है कि शाहरुख़ ने यदि देश द्रोह किया है तो २००४ मै जब बाल ठाकरे ने पाक खिलाडी जाबेद मियांदाद को अपने बंगले मतोंश्री मै बुलाकर और सम्मानित करके क्या किया था वह देशद्रोह था या देशप्रेम समझ से परे है हैरानी तो तब होती है जब वे मराठी मानुस को अपने साथ लेने के लिए मुंबई मै छात्रों को पिटवाते है , पेपर देने नहीं देते है साथ ही दंगे करना उनका धर्म है वे भूल जाते है कि उनके पिता केशव सीताराम ठाकरे हिंदी के औसत दर्जे के कवि हुआ करते थे तथा प्रबोधंकर उपनाम से कविताये करते थे फिर हिंदी भाषियों का विरोध कैसा क्या सिर्फ राजनीती के खातिर हम देश को भी बाँटने की बात कब तक करते रहेगे इससे मराठी शिवाजी की आत्मा और देश को एकता , अखंडता मै पिरोने वाले सरदार बल्लभभाई पटेल की आत्मा को आसह्नीय कष्ट हुआ होगा जिस तरह से राज ठाकरे और बाल ठाकरे अपना अपना वोट बैंक बढाने के खातिर राजनीती कर रहे है वह सबसे गन्दी राजनीती का उदहारण है और केंद्र सरकार ने जो किया है उससे तो साफ लगता है की सरकार मुंबई और बिहार मै वोट बैंक के लिए आज तक चुप बैठी देखती रही और जैसे ही मराठी मानुस की बात देश मै तेजी से उठने लगी तो राहुल गाँधी मुंबई का दोरा करते है , जनरल की टिकिट लेते है और सकुशल लौटते है सोनिया जी को यह भी चोचना होगा की बिहार या उत्तर भारतीय लोगों के बेटे भी बिहार जाते है तो उनके साथ ऐसा क्यों होता है जिस तरह से बाल ठाकरे को दबाने के लिए राज को बढावा दिया जा रहा है
रविवार, 7 मार्च 2010
होली खेले रघुवीरा ................
सबसे पहले तो आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाये ............ होली की शुभकामना में देरी के लिए क्षमा चाहता हु.........दरअसल लेट होने का भी एक कारन है ............चुकी में गाँव को रह्नेबाला हु और वहा नेट की व्यबस्था नहीं थी...........इस कारन लेट हो गया खेर जो भी हो..................इस बार होली पर मजा आया और आता भी क्यों नहीं ....अब रंग की जगह गुलाल से जो होली होने लगी है..............वैसे तो मैंने पिछले सैट सालों से होली नहीं खली लेकिन इस बार की होली खेलने का मजा ही कुछ और था...............कारण १० वी क्लास तक साथ रहने बाले सरे दोस्त मेरे साथ थे और जम कर मस्ती की ....दिन भर क्रिकेट खेलें .........अब पता नहीं की सभी दोस्त एक साथ एक ही जगह पर कैसे मिलेंगे ......ये दिन शायद ही भूल पायें ............खेरमें अपनी होली बताने के चक्कर में आप लोगों से पूछना भूल गया की आप की होली कैसी रही..........
शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
प्रभाष जोशी जी होते तो क्या करते ?
१-लाल घेरे में दसवी का छात्र सिरपुरम यादेयाह
२-बांयी तरफ घेरे में कैमरामैन जिसने मौत के मंजर को दृश्य में कैद किया
(ये फोटो छात्र के आत्मदाह के पहले की है आप चाहे तो २१ फरवरी के उस दर्दनाक फोटो को किसी भी समाचारपत्र में देख सकते है | )
विवेक मिश्र
ज़रा रुकिए !
हम आपको दिखाते है की किस तरह
तेलंगाना राज्य को अलग करने के मुद्दे पर एक छात्र ने किया आत्मदाह |
और फिर खेल ,ड्रामा .इंटरटेनमेंट ,कला की सारी विधाए हो जाती हैं शुरू |
और जब खास ऐसी घटना घटी हो,
न्यूज़ रूम में हो या शाम को पेज सेट करने वाले कथित बुद्धिजीवी दिमाग हो , सब जगह एक अजीब सी हलचल शुरू हो जाती है ,
अपने कला के जौहर को दिखाते हुए ये दिखा देते है की ये
मानवता की जलती तस्वीर हो या दम तोड़ते ,छटपटाते हुए दृश्यों का खेल ये उसे बखूबी सजा सकते है , जिसे दर्शक और पाठक देखकर या तो आह! भरते है या और ध्यान से देखने लगते है और कार्यक्रम के बाद मिली टी आर पी और बढ़ी हुई सर्कुलेशन , न्यूज़ रूम और न्यूज़ पेपरों का मकसद पूरा कर देती है जो इनका वास्तविक लक्ष्य हो गया है
21 फरवरी 2010 को सभी प्रिंट मीडिया के फ्रंट पेज पर
उस्मानिया विश्वविद्यालय में स्कूल के छात्र ने खुद को आग लगाई
(जनसत्ता की हेडिंग )
यह हेडिंग जो मैंने ऊपर लिखा है उसी तरह की हेडिंग तमाम समाचार पत्रों में भी थी|
एक अबोध छात्र सिरपुरम यादेयाह ने हैदराबाद में तेलंगाना के समर्थन में खुद को आग लगा लिया और पुलिस खड़ी मुंह ताकती रही मीडिया वालो ने एक हाई स्कूल के एक छात्र को जलते हुए तस्वीरों और दृश्यों में कैद किया जिसको जनसत्ता जैसे समाचार पत्र में एक दर्दनाक फोटो के साथ जगह मिली जिसकी आधारशिला एक ऐसे {पत्रकार प्रभाष जोशी}ने रखी जो आज भी प्रेरणादायक है
सवाल यह है की प्रभाष जोशी जी होते तो क्या करते ?
यह एक इंटरव्यू का अंश जो प्रभाष जी ने मीडिया खबर में दिया था जो शायद यह स्पष्ट कर दे की प्रभाष जोशी जी होते तो क्या करते ?
पत्रकारिता पहले मिशन हुआ करती थी अब प्रोफेशन में बदल रही है इस पर आप क्या कहेंगे ?
प्रभाष जोशी जी -पत्रकारिता प्रोफेशन भी हो जाए तो कोई खराबी नहीं क्योंकि जिस जमाने में पत्रकारिता देश की आजादी के लिए काम करने में लगी थी उस समय चूंकि आजादी एक राष्ट्रीय मिशन था ,इसलिए उसका काम करने वाली पत्रकारिता भी राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक स्वंत्रता प्राप्त करने का मिशन बन गयी
अब उसमे कम से कम राजनैतिक स्वंत्रता प्राप्त कर ली गयी है
कुछ हद तक सामाजिक स्वतंत्रता भी प्राप्त कर ली गई है
लेकिन पूरी सामाजिक और आर्थिक आज़ादी नहीं मिल पायी है ,अब उसके लिए अगर आप ठीक से पूरी व्यवसयिकता के साथ काम करे तो पत्रकारिता का ही काम आप करेंगे ,लेकिन यह हुनर का काम सुचना का होगा ,लोकमत बनाने का होगा ,मनोरंजन का होगा
यदि मनोरंजन का होगा तो आप मीडिया का काम कर रहे है
"प्रोफेशनल जर्नलिजम पर जो सबसे बड़ा आरोप लगता है की इसमें मानवीय तत्वों का अभाव होता है जैसा की पिछले कुछ समय पहले एक नामी चैनल के पत्रकारों ने १५ august की पूर्व संध्या पर एक अदद न्यूज़ की चाह में एक व्यक्ति को न केवल जलकर आत्महत्या करने में सहायता की बल्कि उसे उकसाया भी ,
आदमी को जलाकर उसकी खबर बनाना कभी पत्रकारिता नहीं हो सकती, यह तो स्केंडल है ,यह माफिया का काम है |
ऐसा हो तो आप कुछ भी कर दे जाकर मर्डर कर दे और कहे यह हमने पत्रकारिता के लिए किया है क्योंकि मुझे मर्डर की कहानी लिखनी थी "
यदि एक पत्रकार ने यह न भी किया हो फिर भी किसी जलते हुए आदमी को कोवर कर रहा हो तो उसे क्या करना चाहिए ?
प्रभाष जोशी जी -पहले उस आदमी को बचाना चाहिए
यह तो उसके प्रोफेशन में अवरोध है ?
प्रभाष जोशी जी -नहीं, वह उसको बचाकर ,उसने क्यों मरने की कोशिश की ,इसकी वजह पता लगाकर उसकी खबर मजे में लिख सकता है |
२-बांयी तरफ घेरे में कैमरामैन जिसने मौत के मंजर को दृश्य में कैद किया
(ये फोटो छात्र के आत्मदाह के पहले की है आप चाहे तो २१ फरवरी के उस दर्दनाक फोटो को किसी भी समाचारपत्र में देख सकते है | )
विवेक मिश्र
ज़रा रुकिए !
हम आपको दिखाते है की किस तरह
तेलंगाना राज्य को अलग करने के मुद्दे पर एक छात्र ने किया आत्मदाह |
और फिर खेल ,ड्रामा .इंटरटेनमेंट ,कला की सारी विधाए हो जाती हैं शुरू |
और जब खास ऐसी घटना घटी हो,
न्यूज़ रूम में हो या शाम को पेज सेट करने वाले कथित बुद्धिजीवी दिमाग हो , सब जगह एक अजीब सी हलचल शुरू हो जाती है ,
अपने कला के जौहर को दिखाते हुए ये दिखा देते है की ये
मानवता की जलती तस्वीर हो या दम तोड़ते ,छटपटाते हुए दृश्यों का खेल ये उसे बखूबी सजा सकते है , जिसे दर्शक और पाठक देखकर या तो आह! भरते है या और ध्यान से देखने लगते है और कार्यक्रम के बाद मिली टी आर पी और बढ़ी हुई सर्कुलेशन , न्यूज़ रूम और न्यूज़ पेपरों का मकसद पूरा कर देती है जो इनका वास्तविक लक्ष्य हो गया है
21 फरवरी 2010 को सभी प्रिंट मीडिया के फ्रंट पेज पर
उस्मानिया विश्वविद्यालय में स्कूल के छात्र ने खुद को आग लगाई
(जनसत्ता की हेडिंग )
यह हेडिंग जो मैंने ऊपर लिखा है उसी तरह की हेडिंग तमाम समाचार पत्रों में भी थी|
एक अबोध छात्र सिरपुरम यादेयाह ने हैदराबाद में तेलंगाना के समर्थन में खुद को आग लगा लिया और पुलिस खड़ी मुंह ताकती रही मीडिया वालो ने एक हाई स्कूल के एक छात्र को जलते हुए तस्वीरों और दृश्यों में कैद किया जिसको जनसत्ता जैसे समाचार पत्र में एक दर्दनाक फोटो के साथ जगह मिली जिसकी आधारशिला एक ऐसे {पत्रकार प्रभाष जोशी}ने रखी जो आज भी प्रेरणादायक है
सवाल यह है की प्रभाष जोशी जी होते तो क्या करते ?
यह एक इंटरव्यू का अंश जो प्रभाष जी ने मीडिया खबर में दिया था जो शायद यह स्पष्ट कर दे की प्रभाष जोशी जी होते तो क्या करते ?
पत्रकारिता पहले मिशन हुआ करती थी अब प्रोफेशन में बदल रही है इस पर आप क्या कहेंगे ?
प्रभाष जोशी जी -पत्रकारिता प्रोफेशन भी हो जाए तो कोई खराबी नहीं क्योंकि जिस जमाने में पत्रकारिता देश की आजादी के लिए काम करने में लगी थी उस समय चूंकि आजादी एक राष्ट्रीय मिशन था ,इसलिए उसका काम करने वाली पत्रकारिता भी राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक स्वंत्रता प्राप्त करने का मिशन बन गयी
अब उसमे कम से कम राजनैतिक स्वंत्रता प्राप्त कर ली गयी है
कुछ हद तक सामाजिक स्वतंत्रता भी प्राप्त कर ली गई है
लेकिन पूरी सामाजिक और आर्थिक आज़ादी नहीं मिल पायी है ,अब उसके लिए अगर आप ठीक से पूरी व्यवसयिकता के साथ काम करे तो पत्रकारिता का ही काम आप करेंगे ,लेकिन यह हुनर का काम सुचना का होगा ,लोकमत बनाने का होगा ,मनोरंजन का होगा
यदि मनोरंजन का होगा तो आप मीडिया का काम कर रहे है
"प्रोफेशनल जर्नलिजम पर जो सबसे बड़ा आरोप लगता है की इसमें मानवीय तत्वों का अभाव होता है जैसा की पिछले कुछ समय पहले एक नामी चैनल के पत्रकारों ने १५ august की पूर्व संध्या पर एक अदद न्यूज़ की चाह में एक व्यक्ति को न केवल जलकर आत्महत्या करने में सहायता की बल्कि उसे उकसाया भी ,
आदमी को जलाकर उसकी खबर बनाना कभी पत्रकारिता नहीं हो सकती, यह तो स्केंडल है ,यह माफिया का काम है |
ऐसा हो तो आप कुछ भी कर दे जाकर मर्डर कर दे और कहे यह हमने पत्रकारिता के लिए किया है क्योंकि मुझे मर्डर की कहानी लिखनी थी "
यदि एक पत्रकार ने यह न भी किया हो फिर भी किसी जलते हुए आदमी को कोवर कर रहा हो तो उसे क्या करना चाहिए ?
प्रभाष जोशी जी -पहले उस आदमी को बचाना चाहिए
यह तो उसके प्रोफेशन में अवरोध है ?
प्रभाष जोशी जी -नहीं, वह उसको बचाकर ,उसने क्यों मरने की कोशिश की ,इसकी वजह पता लगाकर उसकी खबर मजे में लिख सकता है |
सर्वेश्वर दयाल, गुलजार, और इब्नबतूता.........
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी कविता मै मोरक्को यात्री इब्नबतूता जो वर्णन किया है उसको कभी भी कवियों ने अपनी रचनाओं मै जगह नही दी थी और जब सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने इसको अपनी कविता मै जगह दी थी इतिहास बताता है की उसने सर्वाधिक देशों की यात्रा की थी उसने एशिया के भारत ,चीन , म्यांमार, नेपाल तथा और भी पडोसी देशों की और उसने अपनी पुस्तक मै वर्णन भी किया है लेकिन सर्वेश्वर जी को पता नहीं था की इब्नबतूता इतना चर्चित हो जायगा लेकिन हमारी बोलीबुड का तो चुराने का इतिहास रहा है और जब गुलजार ने कविता की दो पंक्तिया चुरा ली तो बे कहते है की हमने गुनाह क्या किया है उन्होंने इश्किया फिल्म मै जो गीत दिया है
"इब्नबतूता बगल मै जूता , पहनो तो करता है चुर्र चुर्र ................
उड़ गयी चिड़ियाँ फुर्रजबकि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता थी"
इब्नबतूता पहन कर जूता ,
निकल पड़े तूफ़ान मैथोड़ी हवा नक् मै भर गयी,
थोड़ी भर गयी कान मैकभी नाक को,
कभी कान को ,मलते इब्नबतूताइसी बीच मै निकल गया
उनके पैर का जूता उड़ते-उड़ते उनका जूता
जा पहुंचा जापान मै इब्नबतूता खड़े रह गए
मोची की दुकान मै
हमारे भारत देश मै जो शब्दों एवं कविता को चुराने का इक लम्बा इतिहास रहा है और गुलजार जी इसमे बहुत ही माहिर इंसान है इसलिए उन्होंने कविता की सिर्फ दो लेने ही चुराई है ताकि सर्वेश्वर दयाल को भी कुछ न देना पड़े और कापीराईटी अधिकार से भी बचा जा सके सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का भले ही इतिहास न रहा हो लेकिन इब्नबतूता का एक घुम्मकड़ यात्री के रूप मै इतिहास रहा है तथा हमारे गुलजार जी का भी उनसे बड़ा चुराने का (कविता ,पंक्तिया ,)इतिहास रहा है सो सर्वेश्वर दयाल जी इतिहास मै हर गये है
"इब्नबतूता बगल मै जूता , पहनो तो करता है चुर्र चुर्र ................
उड़ गयी चिड़ियाँ फुर्रजबकि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता थी"
इब्नबतूता पहन कर जूता ,
निकल पड़े तूफ़ान मैथोड़ी हवा नक् मै भर गयी,
थोड़ी भर गयी कान मैकभी नाक को,
कभी कान को ,मलते इब्नबतूताइसी बीच मै निकल गया
उनके पैर का जूता उड़ते-उड़ते उनका जूता
जा पहुंचा जापान मै इब्नबतूता खड़े रह गए
मोची की दुकान मै
हमारे भारत देश मै जो शब्दों एवं कविता को चुराने का इक लम्बा इतिहास रहा है और गुलजार जी इसमे बहुत ही माहिर इंसान है इसलिए उन्होंने कविता की सिर्फ दो लेने ही चुराई है ताकि सर्वेश्वर दयाल को भी कुछ न देना पड़े और कापीराईटी अधिकार से भी बचा जा सके सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का भले ही इतिहास न रहा हो लेकिन इब्नबतूता का एक घुम्मकड़ यात्री के रूप मै इतिहास रहा है तथा हमारे गुलजार जी का भी उनसे बड़ा चुराने का (कविता ,पंक्तिया ,)इतिहास रहा है सो सर्वेश्वर दयाल जी इतिहास मै हर गये है
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
आखिर रेलवे कर्मचारी कब होगे काम के प्रति सजग ..............

तन्मय जैन
आखिर रेल कर्मचारी कब होंगे काम के प्रति सजग............ अभी कुछ दिन पहले ही मेरा मन भोपाल में नहीं लग रहा था.........सोचा था घर को चला जाये तो थोडा मन लग जायेगा ................लेकिन रास्तेमें एक अजब बाकया हुआ ...............उस बाकये में मेरी भी गलत थी लेकिन रेलवे प्रशासन की लापरबाहीभी सामने आई ..................हुआ यु की ट्रेन से सफर करते समय दोपहर में ज्यादा गर्मी लग रही थी सोचा की जेकेट को उतार दिया जाये लेकिन क्या पता था की में जेकेट उतार नहीं रहा बल्कि रेलवे प्रशासन को दान में दे रहा हु .................उतारते बक्त में जेकेट ट्रेन में ही भूल गया ...............और जब तक मुझे दयां आया ट्रेन जा चुकी थी...............मैंने टी टी से कहा की मेरी जेकेट ट्रेन में ही रह गयी है और जहा बह रखी है उसकी लोकेसन ये है ......................तो पहले तो उन्होंने टिकिट की मांग की दिखाने बेपारबह बोले की आपकी जेकेट मिलने के चांस न के बराबर ही है .............या तो अगले स्टेशन पर रेलवे कर्मचारी जाएगे ही नहीं अगर जायेगे भी तो जेकेट को स्वयं ही रख लेंगे ................यह सुनकर मुझे हंसी भी आई और दुःख भी हुआ ....दुःख इस बात का की जब तक हमारे कर्मचारी सुधरेंगे नहीं तब तक हम एक सम्पन्न देश की कल्पना नहीं कर सकते........और हंसी इस बात की की जब बह यह कह रहे थे कि जेकेट मिलना मुश्किल है उनके चेहरे पर मुश्कान थी अब आप इससे ही अंदाजा लगा सकते है कि बह पहले ही समझ चुके थे कि जेकेट मिलना मुश्किल है................ एक और जहा ममता जी रेलवे में बदलाब कि बात करती है .....बही दूसरी और इस तरह कि करामत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब इस तरह का माहोल है तो bakayi me बदलाब हो पायेगा या सिर्फ बदलाब कि बाते ही होती रहेगी.............................
आखिर रेल कर्मचारी कब होंगे काम के प्रति सजग............ अभी कुछ दिन पहले ही मेरा मन भोपाल में नहीं लग रहा था.........सोचा था घर को चला जाये तो थोडा मन लग जायेगा ................लेकिन रास्तेमें एक अजब बाकया हुआ ...............उस बाकये में मेरी भी गलत थी लेकिन रेलवे प्रशासन की लापरबाहीभी सामने आई ..................हुआ यु की ट्रेन से सफर करते समय दोपहर में ज्यादा गर्मी लग रही थी सोचा की जेकेट को उतार दिया जाये लेकिन क्या पता था की में जेकेट उतार नहीं रहा बल्कि रेलवे प्रशासन को दान में दे रहा हु .................उतारते बक्त में जेकेट ट्रेन में ही भूल गया ...............और जब तक मुझे दयां आया ट्रेन जा चुकी थी...............मैंने टी टी से कहा की मेरी जेकेट ट्रेन में ही रह गयी है और जहा बह रखी है उसकी लोकेसन ये है ......................तो पहले तो उन्होंने टिकिट की मांग की दिखाने बेपारबह बोले की आपकी जेकेट मिलने के चांस न के बराबर ही है .............या तो अगले स्टेशन पर रेलवे कर्मचारी जाएगे ही नहीं अगर जायेगे भी तो जेकेट को स्वयं ही रख लेंगे ................यह सुनकर मुझे हंसी भी आई और दुःख भी हुआ ....दुःख इस बात का की जब तक हमारे कर्मचारी सुधरेंगे नहीं तब तक हम एक सम्पन्न देश की कल्पना नहीं कर सकते........और हंसी इस बात की की जब बह यह कह रहे थे कि जेकेट मिलना मुश्किल है उनके चेहरे पर मुश्कान थी अब आप इससे ही अंदाजा लगा सकते है कि बह पहले ही समझ चुके थे कि जेकेट मिलना मुश्किल है................ एक और जहा ममता जी रेलवे में बदलाब कि बात करती है .....बही दूसरी और इस तरह कि करामत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब इस तरह का माहोल है तो bakayi me बदलाब हो पायेगा या सिर्फ बदलाब कि बाते ही होती रहेगी.............................
अहिंसक सत्याग्रहियों पर हमला ...
महादेव विद्रोही महामंत्री सर्व सेवा संघ
भावनगर 20 फरवरी 2010। गुजरात के भावनगर जिले के महुआ तहसील में हरे-भरे उपजाऊ कृषि जमीन पर प्रस्तावित निरमा सिमेंट फैक्टरी के खिलाफ गांधीवादी स्थानीय विधायक कनू भाई कलसारिया के अगुवाई में मौन जुलूस मार्च कर रही जनता पर निरमा कंपनी के दलालों और पुलिस द्वारा कातिलाना हमला किया गया जिसमें वे और उनकी पत्नी दोनों घायल हैं। हमले में सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। और दर्जनों लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। निरमा सिमेंट फैक्टरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन को प्रख्यात गांधीवादी चुन्नी भाई वैद का समर्थन प्राप्त है।
उधर आसाम की राजधानी गुवाहाटी में सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष डॉ. सुगन बरंठ की अध्यक्षता में सम्पन्न राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सर्वसम्मति से गुजरात पुलिस एवं निरमा कंपनी द्वारा किये गये इस जघन्य कृत्य का कड़े शब्दों में विरोध करते हुए इस आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया गया। प्रस्ताव में सभी हमलावरों पर शीघ्रातिशीघ्र कानूनी कार्रवाई करने, सभी गिरफ्तार सत्याग्रहियों को रिहा करने एवं सीमेंट कंपनी को दी गयी मंजूरी को रद्द करने की मांग की गयी है।
ज्ञातव्य है कि भावनगर जिले के महुआ तहसील में गुजरात सरकार निरमा सीमेंट फैक्ट्री के लिए 15 गांवों की करीब 10 हजार एकड़ जमीन अधिग्रहित कर रही है। अधिग्रहण के कारण करीब 40 हजार लोगों की आजीविका छिन जायेगी एवं पर्यावरण पर गंभीर संकट उपस्थित होगा। कुछ ही वर्ष पहले इस क्षेत्र में गुजरात सरकार द्वारा 60 करोड़ रुपये खर्च कर चार छोटे बांध बनाये गये हैं, जिससे वर्षा-जल का संचय होता है और लोगों को पेयजल व कृषि के लिए पानी मिलता है। इस सीमेंट फैक्ट्री के बनने से यह सारा समाप्त हो जायेगा।
सर्व सेवा संघ मानता है कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने एवं अहिंसक विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में किसी के द्वारा भी इसपर किया गया हमला संविधान पर हमला है।
25 फरवरी 2010 को प्रभावित गांवों के ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह लोग साबरमती गांधी आश्रम, अहमदाबाद से गुजरात की राजधानी गांधीनगर तक मार्च करेंगे, जहां वे अपने रक्तों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन गुजरात सरकार को सौंपेंगे। सर्व सेवा संघ इस मार्च में शामिल होकर समर्थन करेगा।
साभार : इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी) Nai Azadi naiazadi@gmail. से इस ब्लॉग पर छापने हेतु भेजा गया
http://hindi.indiawaterportal.org/ पर यह लेख उपलब्ध है |
भावनगर 20 फरवरी 2010। गुजरात के भावनगर जिले के महुआ तहसील में हरे-भरे उपजाऊ कृषि जमीन पर प्रस्तावित निरमा सिमेंट फैक्टरी के खिलाफ गांधीवादी स्थानीय विधायक कनू भाई कलसारिया के अगुवाई में मौन जुलूस मार्च कर रही जनता पर निरमा कंपनी के दलालों और पुलिस द्वारा कातिलाना हमला किया गया जिसमें वे और उनकी पत्नी दोनों घायल हैं। हमले में सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। और दर्जनों लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। निरमा सिमेंट फैक्टरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन को प्रख्यात गांधीवादी चुन्नी भाई वैद का समर्थन प्राप्त है।
उधर आसाम की राजधानी गुवाहाटी में सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष डॉ. सुगन बरंठ की अध्यक्षता में सम्पन्न राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सर्वसम्मति से गुजरात पुलिस एवं निरमा कंपनी द्वारा किये गये इस जघन्य कृत्य का कड़े शब्दों में विरोध करते हुए इस आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया गया। प्रस्ताव में सभी हमलावरों पर शीघ्रातिशीघ्र कानूनी कार्रवाई करने, सभी गिरफ्तार सत्याग्रहियों को रिहा करने एवं सीमेंट कंपनी को दी गयी मंजूरी को रद्द करने की मांग की गयी है।
ज्ञातव्य है कि भावनगर जिले के महुआ तहसील में गुजरात सरकार निरमा सीमेंट फैक्ट्री के लिए 15 गांवों की करीब 10 हजार एकड़ जमीन अधिग्रहित कर रही है। अधिग्रहण के कारण करीब 40 हजार लोगों की आजीविका छिन जायेगी एवं पर्यावरण पर गंभीर संकट उपस्थित होगा। कुछ ही वर्ष पहले इस क्षेत्र में गुजरात सरकार द्वारा 60 करोड़ रुपये खर्च कर चार छोटे बांध बनाये गये हैं, जिससे वर्षा-जल का संचय होता है और लोगों को पेयजल व कृषि के लिए पानी मिलता है। इस सीमेंट फैक्ट्री के बनने से यह सारा समाप्त हो जायेगा।
सर्व सेवा संघ मानता है कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने एवं अहिंसक विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में किसी के द्वारा भी इसपर किया गया हमला संविधान पर हमला है।
25 फरवरी 2010 को प्रभावित गांवों के ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह लोग साबरमती गांधी आश्रम, अहमदाबाद से गुजरात की राजधानी गांधीनगर तक मार्च करेंगे, जहां वे अपने रक्तों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन गुजरात सरकार को सौंपेंगे। सर्व सेवा संघ इस मार्च में शामिल होकर समर्थन करेगा।
साभार : इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी) Nai Azadi naiazadi@gmail. से इस ब्लॉग पर छापने हेतु भेजा गया
http://hindi.indiawaterportal.org/ पर यह लेख उपलब्ध है |
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
सचिन तुस्सी ग्रेट हो.........................
तन्मय जैनक्रिकेट का भगबान ,खुदा अगर हम इन शब्दों से उस चमत्कारिक व्यक्ति को नवाजे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी...........इतना सब कहकर उस व्यक्ति का नाम लेना गुस्ताखी होगी तो नाम न लेना नादानी...............जी हा ,हम बात कर रहे है .....सचिन रमेश तेंन्दुलकर .........................जब इस सख्सने पहली बार १९८९ में खेल के मैदान में कदम रखा तो शायद ही किसी ने सोचा होगा की एक दिन यह सख्स उस मुकाम परपहुचेगा जहा से उसे पूरी दुनिया देखेगी...................लेकिन सचिन ने न सिर्फ कदम दर कदम बढ़ाते हुए क्रिकेट के सर्बोच्चशिखर हो छुआ बल्कि बन्दे क्रिकेट इतिहास की अद्वितीय पारी खेलकर यह जाता दिया की उन्हें क्रिकेट का भगबान क्यों कहा जाता है .............अपनी २०० रन की शानदार पारी ने अफ्रीकियों को नतमस्तक होने को मजबूर कर दिया........अपनी इस पारी में में सचिने ने पच्चीस चुके और तीन छक्केलगाये ... वही १९९७ में बने सईद अनवर के तथा काउवेंट्री के १९४ रनों को ध्वस्त करते हुए एक बार फिर जता दिया की सचिने तुस्सी ग्रेट हो.........
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