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बुधवार, 27 नवंबर 2019

परिनिर्वाण दिवस पर महात्मा फुले को नमन

परिनिर्वाण दिवस पर महात्मा फुले को नमन
एक भारतीय समाज सुधारक, चिंतक, लेखक, दार्शनिक, महिलाओं और दलितों के उद्धारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले के परिनिर्वाण दिवस पर उनके कार्यों को नमन, वंदन।
वे 'महात्मा फुले' एवं 'ज्‍योतिबा फुले' के नाम से भी मशहूर हैं। उन्होंने महाराष्ट्र में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। महिलाओं की दशा सुधारने के लिये 1848 में एक महिला स्कूल खोला। यह देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने स्वयं व अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले को इस कार्य मे लगाया।
जन्म- 11 अप्रैल 1827
परिनिर्वाण-28 नवंबर 1890 पुणे महाराष्ट्र
*जिस समय महात्मा फुले शिक्षा की ज्योति जला रहे थे। उस समय स्कूल के लिये जाते इस परिवार पर जातिवादी लोग, संगठन कीचड़/गोबर फेंक रहे थे।
ऐसे महात्मा को मेरा नमन।

बुधवार, 30 अक्टूबर 2019

अखण्ड भारत के निर्माता को नमन

अखण्ड भारत के निर्माता को नमन
आज भारत देश जिस नींव पर खड़ा है और अखंड रूप में विश्व में अपनी पताका फहरा रहा है। उसका अधिकांश श्रेय एक किसान के बेटे को जाता है। वे भारतीय गणराज्य के संस्थापक पिता थे। ऐसे महापुरुष, दूरदर्शी, अधिवक्ता, राजनीतिज्ञ, भारत रत्न, लौहपुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल की 144 वीं जयंती है। हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी में उनको सरदार अर्थात प्रमुख कहा जाता है। 
गरीब किसान झवेरभाई पटेल के परिवार में जन्मे सरदार बल्लभ भाई पटेल का जीवन संघर्षों से भरा रहा। वह अपनी पढ़ाई के साथ खेतों में पिता का साथ देते थे। यही कारण था कि वे 22 साल में हाईस्कूल की पढ़ाई कर पाये। बाद में कानून की पढ़ाई के लिए वे इंग्लैंड चले गये। 
खेड़ा और बारदोली किसान सत्यागृह से वे जुड़े और अंग्रेज सरकार को कर घटाने पर मजबूर कर दिया। 
562 छोटी-बड़ी देशी रियासतों को मिलाकर एक अखण्ड भारत देश का निर्माण किया। हालाँकि हैदराबाद, जूनागढ़, त्रावणकोर, जम्मू कश्मीर की रियासतों ने थोड़ी परेशानी खड़ी की, लेकिन उनकी सैनिक कार्यवाही और कूटनीति के चलते उनको भी मिला लिया गया।
1930 में जब गुजरात में प्लेग फैला तो एक दोस्त को बचाने और सेवा करने खुद पहुंच गये। उनको भी बीमारी लग गयी। महीनों बाद ठीक हुई।
राष्ट्रहित में उन्होंने आरएसएस पर 1948 में प्रतिबंध लगा दिया। क्योंकि उनको पता चला कि गांधी की मौत के बाद आरएसएस के लोगों ने जश्न मनाया था।
उनका दिल नरम था तो कठोर भी। कहते हैं कि 1909 में जब वे वकालत कर रहे थे तो पत्नी के निधन की चिट्ठी मिली। फिर भी वे विचलित नहीं हुये। वकालत पूरी करने के बाद ही उन्होंने जानकारी दी और चले गये।
राष्ट्रीय एकता दिवस की आप सबको बधाईयां। 
जन्म 31 अक्टूबर 1875 नडियाद गुजरात
अवसान-15 दिसंबर 1950 मुंबई।
ऐसे महान सपूत को ये देश नमन करता रहेगा।

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

अशफ़ाक़ उल्ला खां को नमन, वंदन।

"जाऊँगा खाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जायेगा;जाने किस दिन हिन्दोस्तान, आजाद वतन कहलायेगा"।
अशफ़ाक़ उल्ला खां को नमन, वंदन।
स्वतन्त्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी, जिन्होंने काकोरी कांड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रामप्रसाद बिस्मिल के साथ अशफ़ाक़ उर्दू के बेहतरीन शायर थे। दोनों की दोस्ती मज़हब से ऊपर थी। दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे। पीठ पीछे भी कोई बुराई वे सुन नहीं सकते थे। उनमें देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी। वे हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। ब्रितानी हुक़ूमत ने 19 दिसम्बर 1927 को फैजाबाद जेल में फाँसी पर लटका दिया।
जन्म 22 अक्टूबर 1900 शाहजहांपुर
देश के सपूत को जन्मदिन पर उनको नमन, वंदन।
उनकी शायरी-
"जाऊँगा खाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जायेगा;जाने किस दिन हिन्दोस्तान, आजाद वतन कहलायेगा।
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं, फिर आऊँगा-फिर आऊँगा; ले नया जन्म ऐ भारत माँ! तुझको आजाद कराऊँगा।।
जी करता है मैं भी कह दूँ, पर मजहब से बँध जाता हूँ; मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूँ।
हाँ, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूँगा; औ' जन्नत के बदले उससे, यक नया जन्म ही माँगूँगा।।"

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

डॉ सोनेलाल पटेल को परिनिर्वाण दिवस पर नमन,वंदन

बोधिसत्व डॉ. सोनेलाल पटेल के महापरिनिर्वाण दिवस पर उनके कार्यों को नमन, वंदन
किसानों, कमरों के सामाजिक नेता जिन्होंने आजीवन संघर्ष किया। वो अंधविश्वास के विरोधी और सामाजिक न्याय के पक्षधर थे। उन्होंने कर्म को प्रधानता देने वाली जाति कुर्मियों में राजनैतिक चेतना पैदा की। 1994 में बेगम हजरत महल पार्क लखनऊ में हुई उनकी रैली को बीबीसी लन्दन ने सबसे बड़ी जातीय रैली बताया था। 4 नवम्बर 1995 को उन्होंने अपना दल बनाने की घोषणा की। 15 फरबरी 1999 को लाखों समर्थकों के साथ उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर भंते प्रज्ञानन्द से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और बोधिसत्व कहलाये।
उनकी बढ़ती ताकत को देखते हुये विरोधी घबरा गये। किसी कीमत पर उनकी बढ़ती लोकप्रियता को रोकना चाहते थे। 1999 में जब वे इलाहाबाद में रैली कर रहे थे तो साजिश के तहत मारने के इरादे से लाठीचार्ज करवाया गया। इस घटना को एक फ़ोटो पत्रकार ने कैमरे में कैद कर लिया और भाग गया। लिहाज़ा उनको जिंदा छोड़ दिया गया। हालांकि वे बच जरूर गये, लेकिन उनकी तबियत अक्सर खराब रहने लगी। 17 अक्टूबर 2009 में कानपुर में कार दुर्घटना में निर्वाण की प्राप्ति हुई। उनकी मौत की सीबीआई जांच की मांग की गयी, लेमिन ऐसा नहीं हो पाया।
ऐसी महान आत्मा को मेरा नमन, वंदन। 

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

रावण कौन है?

रावण कौन है?
रावण को न पहचानते हो, न जानते हो
और न ही पहचानना चाहते हो।
तुम मारोगे कैसे?
तुम जाति, धर्म, सम्प्रदाय में बंटे लोग हो।
तुम संघटन, पार्टी, जमात में बंटे लोग हो।
तुम मारोगे कैसे?
वह कतिथ प्रकांड विद्वान था, बिना इजाजत
स्त्री को छूना पसन्द नहीं करता था।
अब भय, ताकत, रुतबा, पहुंच दिखाकर नोंच
रहे बालिकाओं के जिस्म को,तुमने पहचाना?
बेटी, बेटियों में फर्क करने वालो,बांटने वालो,
तुम मारोगे कैसे?
रेपिस्टों, अत्याचारियों, लिंचिंग के आरोपियों
का महिमा मंडन किसने किया और क्यों?
अनाचारियों को बचाने तिरंगा रैली और जयकारे
किसने लगाये और क्यों? तुम पहचानते ही नहीं,
तुम मारोगे कैसे?
रावण अजर, अमर है। मूर्खों की जमात और
व्यवस्था, अव्यवस्था के बीच।
बुराई, अत्याचार, अनाचार, रेपिस्टों के बीच आज
उसने फिर होने का पुख्ता सबूत दिया।

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

ऋषभ व उनकी टीम को पुनः बधाईयां

लॉ स्टूडेंट ऋषभ रंजन उनके सभी साथी जिन्होंने आरे के पेड़ों को बचाने के लिये sc में जनहित याचिका दाखिल की और सफलता मिली। जंगल को बचाने के लिये आगे आने वाले, संघर्ष करने वाले हर शख्स को बधाईयां। सासों लिये यह बहुत ही जरूरी था।
पेड़ कटना नहीं, नये पौधे रोपे जाने चाहिए। ताकि जीवन के लिये साफ वायु मिल सके। 
देश को उन्मादी युवाओं की जरूरत नहीं। ऐसे ही युवा की जरूरत है।
ऋषभ व उनकी टीम को पुनः बधाईयां। 

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

,,,मेरी एक दिन की कहानी नहीं है साहेब

मेरी एक दिन की कहानी नहीं है साहेब
सालों, साल का स्वयं साक्षात इतिहास हूँ मैं
बारिश, पतझड़, शीत जाने कितने मौषम आये
झुके, हिले, लहलहाये और सदा यूं ही मुस्कुराये
चिड़ियों का चहचहाना, फड़फड़ाना और उड़ना।
छांव में बैठे मूक जानवर, सब बखूबी याद है हमें
क्या लेता हूँ आपसे? कभी सोचा तो होगा आपने
बस खड़ा हूँ जड़ों को समेटे हुये कुछ गज जमीं पर
फूल, फल और इमारती लकड़ी देता हूँ मैं आपको
सांसों के लिये साफ, ताजी वायु देता हूँ मैं आपको
अपने को मिटा सब कुछ न्यौछावर करता हूँ आपको
मैं विशालकाय पेड़ हूँ, मैं विशालकाय पेड़ हूँ,
,,,मेरी एक दिन की कहानी नहीं है साहेब
#SaveAarey
#saveForest
#Savebreath
#Savelives

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

,,,शास्त्री जी ने रखी देश की नींव

,,,शास्त्री जी ने रखी देश की नींव
गांधी भले ही विश्व भर में प्रसिद्ध हों, लेकिन देश के गृहमंत्री और दूसरे प्रधानमंत्री मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को देश कभी नहीं भुला पायेगा। उनका जीवन कठिन संघर्षों से भरा रहा। डेढ़ वर्ष में पिता का साया उठ गया। वो स्कूली दिनों में गर्म दोपहरी में भी नंगे पैर ही स्कूल जाया करते थे।
11 जनवरी 1966 को तास्कन्द रूस में सदमे से उनकी मौत हो गयी। उनके पास कर्ज से खरीदी फ़िएट कार, जिसका कर्ज वो pm बनने के बाद भी नहीं चुका पाये। बाद में उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने चुकाया। कुछ किताबें, एक लालटेन, एक बिछाने की चटाई, बैंक में मात्र 7,000 रुपये और नेहरू का दिया हुआ एक कोट ही था।
सादगी के प्रतीक रहे छोटे कद के महान व्यक्तित्व ने जय जवान, जय किसान का नारा देकर देश की नींव रखी। जिस पर ये देश खड़ा है।
वो आजीवन गरीबी में जिये और गरीबी में ही उनका अवसान हो गया।
जन्म 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय
शास्त्री जयंती की आप सबको बधाईयां। 

,,,"गांधी अब तक मरे क्यों नहीं"

,,,"गांधी अब तक मरे क्यों नहीं"
बात 1942 की है जब गांधी आजादी के लिये अनशन शुरू कर दिये। देश मे भारत छोड़ो आंदोलन जोर पकड़ चुका था। बिरतानी हुक़ूमत इससे घबराई हुई थी। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल गांधी से बहुत नाराज थे। वह तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लीनलिथगो से गांधी के अनशन पर नजर बनाये हुये थे। उनको गांधी द्वारा पानी के साथ ग्लूकोज लेने का पता चला तो उनकी जांच करवायी गयी। हालाँकि झूठ निकला। वह कहते थे ये अर्धनग्न फ़कीर मरता है तो मरने दो। एक बार तो वायसराय से पूछा कि "गांधी अब तक मरे क्यों नहीं"।
बाद में 1944 में गांधी भी चर्चिल को पत्र लिखते हैं जिसमें कहते हैं कि "मैंने सुना कि आप एक साधारण ‘नंगे फ़कीर’ को कुचल देना चाहते हो. मैं बहुत लंबे समय से फ़क़ीर होने की कोशिश कर रहा हूँ"। हालांकि चर्चिल तक यह पत्र नहीं पहुंचा।
वह दक्षिण अफ्रीका से लेकर विश्व भर में प्रसिद्ध हो चुके थे। वो अमेरिका कभी नहीं गये, लेकिन बता दूं कि दो दर्जन से अधिक स्थानों पर लगी मूर्तियां उनके कद को दिखा रही हैं। पाकिस्तान, चीन सहित 84 देशों में प्रतिमाएं स्थापित हैं। उनको मारने की 5 बार कोशिश हुई और छठवीं बार गोडसे ने गोली मार दी।
गांधी हमारी आत्मा में बसे हैं। उनको मारा नहीं जा सकता। जब-जब उनको पढ़ा जायेगा तो गोडसे और उसकी विचारधारा पर थूका जाता रहेगा।
गांधी में कुछ कमियां भी थी। सबसे बड़ी कमी थी कि वो वर्णाश्रम व्यवस्था के पक्षधर थे। मनु की इस जातिवादी व्यवस्था जिसने देश का सर्वनाश किया हो, उसका गांधी सर्मथन करते थे। वह शूद्रों को अधिकार देना ही नहीं चाहते थे। भगतसिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों को बचाने का ठोस प्रयास नहीं किया। पट्टाभिसीतारमैया की हार पर वे अपनी हार बता देते।
 कमियां के बाद भी ,,,गांधी होना आसान नहीं है।
उनके अच्छे कार्यों को नमन।
गाँधी जयंती की बधाईयां। 

रविवार, 29 सितंबर 2019

भगत सिंह को क्यों पढ़ा जाना चाहिए?

भगत सिंह को क्यों पढ़ा जाना चाहिए?
इस सवाल से पहले हम बात करते हैं कि 23 वर्षीय इस युवा एवं उनके साथी राजगुरु, सुखदेव को बचाने के लिए किसने, कितनी कोशिश की। अभिलेखागार एवं संसाधन केंद्र दिल्ली के मानद सलाहकार व भगत सिंह के दस्तावेजों के संपादक प्रोफेसर चमनलाल के अनुसार धार्मिक संगठनों, धार्मिक संगठनों से खड़े हुए राजनीतिक संगठनों ने भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने की कोई कोशिश नहीं की।
कोशिश करने वालों में मोतीलाल नेहरु जो प्रसिद्ध वकील थे गम्भीर बीमार होने के बाद भी 31 जनवरी 1931 को लाहौर जेल में क्रांतिकारियों से मिलने गए। कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। हालांकि भगतसिंह ने विरोध किया। फिर भी मोतीलाल नेहरू ने फांसी की सजा के खिलाफ अपील करने की तैयारी की। कागजात मंगाकर अध्ययन भी किया। 8 अगस्त 1929 को जवाहरलाल नेहरु ने भी क्रांतिकारियों से मुलाकात की थी। कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ सुभाष चंद्र बोस, वाम दलों के नेताओं ने भी बहुत प्रयास किये, लेकिन सफल नहीं हुये। भगतसिंह की लोकप्रियता से दक्षिण भारत भी अछूता नहीं था। एशिया के पैगम्बर माने जाने वाले ईवी रामास्वामी पेरियार ने भी भगत सिंह व साथियों को बचाने के लिए तमिल जनरल "कुदई अरासु" में संपादकीय लिखा। साथ ही भगत सिंह की पुस्तक "मैं नास्तिक क्यों हूं" का तमिल में अनुवाद करवाया। महात्मा गांधी ने भी 31 जनवरी 1931 को इलाहाबाद में अपने संबोधन में कहा कि मत्यु दंड वाले व्यक्ति को फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए। फांसी रोकने के लिये एक बार वायसराय से बन्द कमरे में मुलाकात भी की। बतौर प्रोफ़ेसर "गांधी की छवि और कद उस समय बहुत बड़ा था। अंग्रेज भी उनकी ताकत को भलीभाँति समझते थे। गांधी ने जितने प्रयास होना चाहिए थे, उतने नहीं किये"।
अब हम भगत सिंह को क्यों पढ़ा जाना चाहिए। इस पर बात करते हैं। "भगत सिंह के संपूर्ण लेख" पुस्तक, जिसको प्रोफेसर चमनलाल ने लिखा है। जो उनके पत्रों पर आधारित है।
इसके पृष्ठ नंबर 167 की बात करना चाहता हूं। जिसमें भगत सिंह सुभाष चंद्र बोस और नेहरू में से नेहरू को चुनने की बात करते हैं। साथ ही क्यों चुनना चाहिए, इस पर भी वे विस्तार से लिखते भी हैं और समझाते भी हैं। साथ ही पंजाब सहित अन्य युवाओं को चेताते हैं कि नेहरू के भी अंधे पैरोकार नहीं बने। जो सही लगे उसका समर्थन करें।
इसके अगले पृष्ठ पर वह धर्म पर भी जबरदस्त कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि यह बात फलां वेद, पुराण या कुरान में लिखी गई है या उसमें अच्छा बताया गया है। इस बात पर नहीं मानी जानी चाहिए। बल्कि समझदारी की परख पर साबित न हो तब तक नहीं मानी जानी चाहिए। उनके विचार आधुनिकतावादी थे। उन्होंने वर्तमान और भविष्य के भारत, राजनीति सहित कई मुद्दों पर खुलकर लिखा।
मेरे विचार:-भरत सिंह का कद उस समय गांधी से थोड़ा ही कम था। वैसे तो सम्पूर्ण देश मे वे लोकप्रिय थे, लेकिन पंजाब, हरियाणा और उससे सटे इलाकों में वे ज्यादा प्रसिद्ध थे। युवाओं के वह आइकॉन थे। शायद गांधी को इसी बात का डर रहा होगा। हालांकि भगतसिंह ने न तो अपने स्तर पर गिरफ्तारी से बचने का प्रयास किया और न ही फांसी से बचने का। वो 23 साल की उम्र में ही अपने साथी राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी पर झूल गये।
यह भी सच है कि देश आज भी उनकी उम्मीदों तक नहीं पहुंचा है जो उन्होंने सोचा था।
हालांकि देशवासियों के दिलों में वे हमेशा जीवित रहेंगे।
112 वीं जयंती पर उनको नमन। 

सोमवार, 16 सितंबर 2019

भला नाना और नानी का भी...कोई नाम होता है? वह खुद ही अपने आप में नाम और पहचान होते हैं।

भला नाना और नानी का भी...कोई नाम होता है?
वह खुद ही अपने आप में नाम और पहचान होते हैं।
खुशियों का खजाना और हर तमन्ना साकार करना उन्हें आता है।
...भला नाना का भी कोई नाम होता है। 
...भला नानी का भी कोई नाम होता है।
अधिकांश लोग और मैं भी आज तक अपने नाना, नानी का नाम नहीं जान पाया और जरूरत भी नहीं पड़ी।
...क्योंकि नाना और नानी का नाम ही काफी था। 
उनका लाड़, प्यार, उनका हम सब पर सब कुछ लुटा देना।
....यही काफी था हमारे लिये।
बाजार जाने पर उनका घर आना मतलब साफ था। 
...कि बहुत कुछ आने वाला है, बहुत कुछ मिलने वाला है। 
घर आते ही हम सबकी नजरें झोले पर होती थीं।
...कि अब सिम सिम दरवाजा खुलने वाला है, बहुत कुछ मिलने वाला है। 
वह भी थोड़ा तड़फ़ाते थे और कहते थे सोचो क्या लाया हूं,  तुम्हारे लिये।,,,,,,,कोई बता सकता है।
हमारा अनुमान फल-फ्रूट, मिठाई तक ही सीमित रहता था।
,,,लेकिन वह तो खजाना थे। 
पैसे भले ही उनकी जेब में कम हों, लेकिन दिल बहुत बड़ा था। उधारी ही सही हमारी तमन्ना कभी मर नहीं पाती थी।
,,,क्योंकि नाना और नानी का भी कोई नाम होता है।
उनका नाम ही काफी होता है। 
उनके कच्चे मकान और थोड़ी गरीबी भले ही हो, लेकिन उनका घर हमारे सपनों का संसार रहता है।
हम सबके जीवन में नाना और नानी का बड़ा प्यार रहता है। 
बड़ा लाड़ रहता है। बड़ा दुलार रहता है। 
हर पल वह हमारी फ़िक्र करते थे।
कहीं ऊंचाई पर चढ़ गए या कहीं पेड़ पर चढ़ गए या कहीं खतरनाक जगह पहुंच गए तो उनकी जान निकल जाती थी।  तुरंत चिल्ला पड़ते थे। 
,,,,,,अरे वहां कैसे पहुंच गए। (तेज आवाज में)।
,,,तुरंत पीछे आओ, तुरंत वापस आओ, गिर जाओगे, 
लग जाएगी,,,चलो वापस आओ। 
तुरन्त आओ, तुम्हें कुछ दिलाता हूं।
कितनी फिक्र और कितनी चिंता रहती थी उनको।
सामने थोड़ा न दिखूं तो तुरंत पूछते थे नाम लेकर 
,,,,,फलां नहीं दिख रहा है। कहां गया है? 
कहाँ गायब है?,,,सो गया क्या?
जब तक जवाब नहीं मिल जाता। 
वह पूछते ही रहते थे।
कहीं बुखार आ गया तो नीम-हकीम, टोना-टोटका से,,,
लेकर अस्पताल तक भागते थे।
जब तक सही नहीं हुआ, तब तक चैन की सांस नहीं लेते थे।
अंगुली पकड़कर हर जगह ले जाना और जानकारी देना।
लोगों के पूछने पर बताना,कि यह फलां बेटी का फलां बेटा है।
कहानी सुनाना और फिर जोर से गुदगुदाना।
जी भर हंसाना और मिलकर खिलखिलाना।
रूठने पर हर जानवर की आवाज निकालना।
यहां तक कि जानवर बनकर भी दिखाना।
और जब तक हंस न जाएं,,,हर करतब दिखाना।
हमें सब याद है,,, नाना और नानी जी। 
,,,अब न नाना हैं और न नानी हैं,,,लेकिन जब भी
वो चेहरे याद आते हैं तो आंखों में आँसू आ जाते हैं।
उनका चेहरा झूलने लगता है। 
हम यादों के उसी पल में चले जाते हैं।
हमारे जीवन में नाना-नानी का ये रिश्ता कितना अनमोल होता है।
,,,,क्योंकि नाना और नानी का भी कोई नाम होता है क्या?।
(फ़ोटो में नाना नानी,,,ग्राम बरोदिया बीना म.प्र.)
उनके चरणों की धूल को नमन, वंदन।,,,,फूलशंकर।

मंगलवार, 28 मई 2019

अफीम की खेती, अमन चैन बेमानी

आपने अफीम की खेती की है।अब भला सोचिए कि जो आपने बीज रोपित किए थे। उनमें मौसम के अनुसार आपने पानी दिया धूप दी, छांव दी और सब कुछ दिया। अब आप सोच रहे हैं कि इससे अमन चैन आएगा। यह बेईमानी नहीं तो क्या है। आप जब अफीम की खेती करेंगे, बीज रोपेंगे, पानी देंगे तो इससे जो हवा चलेगी। वह नशीली होगी। लोग जहरीले होंगे। वातावरण दूषित होगा। लोग पगला भी सकते हैं। उन्मादी भी हो सकते हैं। इसके परिणाम सामने आने लगे हैं। आपने क्या सोचा कि इसका असर दूसरों पर होगा। इसका असर हमारे लोगों पर नहीं होगा। इसका असर इतना अध्यापक होगा कि पूरे देश में आग लग जाएगी। अब आप देश में अमन-चैन, तरक्की, विकास कैसे सोच सकते हैं। यह सोचना आपकी भूल होगी। आप देश में तरक्की की बातें करके अपने आप को गुमराह कर सकते हैं या जनता को बेवकूफ बना सकते हैं। आप समझ रहे होंगे कि मैंने क्या किया है। मैंने अपने घर में ही आग लगाने का काम किया है और अब बुझाने के लिए पूरा तंत्र लगा रहे हो। पहले खेती करने से पहले, बीज रोपने से पहले आपने कुछ नहीं सोचा। परिणाम भले ही आम जनमानस को भुगतना पड़े, लेकिन इसका असर आप पर भी होगा। आप कतई न सोचा कि मैं चैन से सो जाऊंगा। इसमें न आप सो पाएंगे, न रह पाएंगे और न ही जी पाएंगे ऐसा मेरा मानना है।

गुरुवार, 15 मार्च 2018

'बेमेल गठबंधन' की जीत, भाजपा की हार- अब आगे ?


आदित्य कुमार मिश्रा -गोरखपुर।
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में सपा-बसपा के अघोषित गठजोड़ ने भारतीय जनता पार्टी को पराजित कर दिया है। इस परिणाम के पीछे सपा-बसपा के गठजोड़, गोरखपुर में योगी की पसंद का प्रत्याशी न उतारा जाना( ब्राम्हण-ठाकुर फैक्टर), योगी और मोदी के काम से जनता की नाराजगी जैसे अलग-अलग विश्लेषण समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों, वेबसाइटों और लोगों की जुबान पर आ रहे हैं।अगर गोरखपुर में योगी की पसंद का प्रत्याशी न उतारे जाने वाले तथ्य को सही माना जाए तो स्पष्ट है कि यह पराजय योगी और उनके नजदीकी समर्थकों के लिए अप्रत्याशित नहीं होगी, भाजपा भी इससे पूरी तरह परेशान नहीं होगी, लेकिन आम जनता और राजनीतिक विश्लेषक जिन्हें अंदरुनी ख़बर न हों उनके लिए यह परिणाम जरुर चौंकाने वाला दिख रहा है। विशेषकर गोरखपुर सीट का परिणाम, जहां से योगी आदित्यनाथ पिछले पांच बार लगातार जीत दर्ज कर चुके थे।

बात सपा-बसपा के 'अघोषित गठबंधन' की- 
यूं तो राजनीति में धर्म-जाति का बोल-बाला पूरे देश में देखने को मिलता है लेकिन यूपी-बिहार की राजनीति में धर्म और जाति सबसे असरदार फैक्टर के रुप में काम करता है। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि गोरखपुर के उपचुनाव में भी जातिवाद ने अहम भूमिका अदा की, जिसकी सूत्रधार रहीं बसपा प्रमुख मायावती। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट न जीत पाने, उ.प्र. विधानसभा चुनावों में महज 19 सीटों तक सीमित रहने और विपरीत परिस्थितियों में राज्यसभा से अपनी खुद की सदस्यता छोड़ने के बाद राजनीतिक रुप से काफी कमजोर स्थिति में दिख रही मायावती ने इस उपचुनाव को अवसर के रुप में लिया। गोरखपुर और फूलपुर दोनों ही सीटों पर अपना प्रत्याशी न खड़ा करके सपा प्रत्याशियों को बसपा का समर्थन दे दिया गया। जिसका परिणाम है कि योगी का अभेद किला 'गोरखपुर' ढह चुका है और प्रवीण निषाद के रुप में गोरखपुर की जनता को एक नया सांसद मिल चुका है और मायावती यूपी की राजनीति के केंद्र में आ गयी हैं। यूं तो राजनीतिक रुप से गोरखपुर हमेशा ही चर्चा में रहता है और योगी एवं उनके समर्थक हर बार लीड लिये रहते हैं लेकिन इस बार राष्ट्रीय राजनीति में गोरखपुर की चर्चा तो है लेकिन बढ़त विरोधियों के पास है। जीत अखिलेश के प्रत्याशियों की हुई है लेकिन जीत के केंद्र में मायावती हैं। भाजपा के खिलाफ गोरखपुर में मिली जीत से सपा, बसपा, कांग्रेस, राजद, वामपंथी दलों समेत एनडीए विरोधी लगभग सभी छोटे-बड़े दलों को संजीवनी मिल गयी है। गौरतलब है कि चुनाव परिणाम सामने आने पर अखिलेश यादव ने बसपा प्रमुख के घर जाकर उनसे मुलाकात की है। इस मुलाकात के दूरगामी परिणाम देखा जाए तो 2019 के आम चुनावों के लिए अखिलेश यादव को कांग्रेस के अलावा गठबंधन के लिए बसपा के रुप में एक मजबूत साथी मिल गया है। भाजपा द्वारा सपा-बसपा के इस गठबंधन को सांप-छूछूंदर का (असंभव) गठबंधन बताया जाता रहा है। लेकिन 14 मार्च 2018 को सपा-बसपा की इस जीत ने असंभव समझे जाने वाले इस गठबंधन की नींव डाल दी है। 2019 में अगर यह गठबंधन इस तरह का कोई भी उलटफेर करने में कामयाबी हासिल करेगा तो 2022 में भी यह प्रयोग जरुर दोहराया जाएगा....और उसके बाद आज का दिन (14 मार्च 18) योगी आदित्यनाथ और उनके समर्थकों के लिए न भूलने वाला दिन और कभी न भूलने वाली पराजय साबित होगा।

मायावती और अखिलेश की मुलाकात के मायने-
पहले मुश्किल समझे जाने वाले लेकिन अब व्यवहारिक दिख रहे सपा-बसपा के इस संभावित गठबंधन की संभावनाओं पर बात करें तो अखिलेश और मायावती को मिलकर तय करना होगा कि 2022 में दोनों में से किसके नेतृत्व में उ.प्र. विधानसभा का चुनाव लड़ा जाएगा। भले ही उपचुनाव में दो सीटें इन्हें मिल गयी हैं लेकिन 2019 में मोदी लहर से पार पाने के लिए इन दोनों में से किसी एक को 2022 की लड़ाई के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी का मोह छोड़ना होगा जो कि दोनों के लिए दुष्कर है। यह भी हो सकता है कि दोनों ही दल मोदी से घबराए अन्य दलों को साथ लेकर अपनी-अपनी सुविधा से उ.प्र. की सीटें आपस में बराबर-बराबर बांटकर चुनाव लड़ें और सरकार बनाने लायक परिणाम आने पर सबसे बड़े दल का नेता सीएम की कुर्सी संभाले। वहीं दूसरा नेता केंद्र की राजनीति करे। इसके लिए कांग्रेस का साथ लेना जरुरी है। कांग्रेस के लिए भी सपा-बसपा का साथ पाना मुहंमांगी मुराद पाने जैसा है। कांग्रेस चाहें जितनी सिकुड़ती चली जा रही हो लेकिन प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी ही सबसे बड़े उम्मीदवार दिखाई देते हैं। राहुल को पीएम बनाने के लिए कांग्रेस को समर्थन देकर माया-अखिलेश दोनों में से कोई एक (जो कि सीएम पद का मोह त्याग सका हो) समर्थन के बदले कांग्रेस से उप-प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या किसी दूसरे बड़े पद की मांग सकता है।

सपा-बसपा गठजोड़ पर क्या करेगी भाजपा-
2014 से छोटे-मोटे पराजयों को छोड़कर ज्यादातर मौकों पर सफल दिख रही मोदी-शाह की जोड़ी सपा-बसपा को इतनी आसानी से उनके ख्वाब पूरा नहीं करने देगी। सपा-बसपा के चाल और इरादे अभी से ज़ाहिर होने लगे हैं लेकिन मोदी-शाह कौन सी चाल चलेंगे इसका अनुमान लगा पाना सपा-बसपा के लिए कठिन है। दूसरी तरफ अगर ये बात सच है कि "गोरखपुर में उपेन्द्र शुक्ल योगी की पसंद नहीं थे, उन्होंने खुद तो शुक्ल के समर्थन में प्रचार किया लेकिन हिन्दू युवा वाहिनी और अन्य असरदार कारक इस उप चुनाव में निष्क्रिय रहे और चुनाव परिणाम योगी की इच्छानुसार आया" तो भाजपा के लिए ये एक और चुनौती है। तमाम चुनावी विश्लेषणों को देखें तो लगता है मानों योगी ये बताना चाहते हैं कि गोरखपुर सीट जो कि पिछले 29 सालों से लगातार मठ के परिधि में थी आगे भी मठ के परिधि (योगी की इच्छा) में ही सुरक्षित है। बाहर का व्यक्ति चाहें वह भाजपा का पुराना से पुराना कार्यकर्ता या पदाधिकारी ही क्यों न हो, वह गोरखपुर संसदीय सीट के लिए जिताऊ नहीं है। एैसी स्थिति में एक तरफ भाजपा नेतृत्व को सपा-बसपा से गठजोड़ से मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ मोदी के उत्तराधिकारी समझे जा रहे योगी से भी पार पाना होगा। 2022 का चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा। गोरखपुर में मोदी-शाह की जोड़ी योगी के सामने झुकने की बजाय यहां चुनाव का मोर्चा खुद हाथ में ले सकती है। 2022 जो कि स्वंय मोदी के कार्यों और वर्चस्व की परीक्षा होगी उसमें मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। मोदी के चेहरे के आगे बड़े से बड़ी बाधा दूर हो सकती है। योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी देते समय उन्होंने हर परिस्थिति का अनुमान लगाया होगा। वर्तमान परिस्थिति के लिए भी उनके पास कोई न कोई चौंकाने वाली चाल जरुर होगी। फिलहाल सपा-बसपा का गठजोड़ विपक्षी एकता में जान फूंक चुका है। विपक्षी दल अगर आपसी स्वार्थ को त्यागकर मोदी का विकल्प तलाशने का प्रयास करेंगे तो मोदी के लिए 2019 का मुकाबला आसान नहीं होने जा रहा है। योगी आदित्यनाथ भी इस बात से वाकिब होंगे कि 2019 का चुनाव अगर हाथ से निकल गया तो 2022 में दुबारा सीएम की कुर्सी हासिल कर पाना उनके लिए भी मुश्किल होगा। अखबारों-चैनलों और न्यूज वेबसाइट्स की माने तो फिलहाल योगी अपनी ताकत दिखा चुके हैं। अब मोदी-शाह की बारी है। इस बार योगी को मोदी-शाह का साथ देना होगा तभी 2022 उनके लिए सुलभ होगा।

सोमवार, 12 मार्च 2018

हैरान करते तुम युवा, विपिन की अनकही कहानी

विपिन सिंह राठौर की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं। पढ़ा-लिखा नौजवान जो कम बात करने का आदि हो कैसे डबल मर्डर कर सकता है। सोच कर स्तभ्ध था। लेकिन एक इच्छा भी जाग रही थी कि वे क्या कारण थे कि इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। मिर्जापुर माधौगढं जालौन। किशन किस्सू 9,10 वर्ष  , 97 हाईस्कूल प्रथम, 99 इंटर, बीएससी, mba लखनऊ, कानपुर सीपीएमटी कॉम्पटीशन डॉक्टरी लक्, ब्रजेन्द्र बड़े भाई, एकलौती लड़की 80 बीघा, पिता प्रधान मुन्ना सिंह , घटना  2009,10, शिमला तक आर्किल मटर बेचना

बुधवार, 4 जनवरी 2017

नोट बन्दी का आईना

5 राज्यों में होने वाले चुनाव मोदी सरकार की नोटबन्दी का आइना होगा। इसमें 16 करोड़ मतदाता लोकतंत्र के पर्व में भाग लेंगे। जो वोट की चोट से नोटबन्दी पर मुहर लगाएंगे। इसलिये ये चुनाव अहम हैं। अब 11 मार्च के दिन का ही इंतजार करना होगा।

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

नीतीश की नीति अब राष्ट्रीय राजनीति

सही समय पर सही मुद्दा उठाना किसी राजनीतिज्ञ के लिए के जरूरी पैमाना है। अगर दोनों में तालमेल नहीं बन पाया तो वही हश्र होता है जो बिहार में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा का हुआ। और तालमेल बैठ गया तो आप चमक जाते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री भी इन दिनों कुछ ऐसा ही तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे हैं।
बिहार में पूर्णशराबंदी के बाद अब पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की 50 फीसदी सीलिंग खत्म कर इसे बढ़ाने के मांग जाहिर करता है कि नीतीश कुमार का जोर अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर है। उन्होंने शनिवार को कहा कि पिछड़ों के लिए आरक्षण के वर्तमान मॉडल में बदलाव की जरूरत है। इसके लिए संविधान में जरूरी संशोधन भी होना चाहिए। आरक्षण के दायरे में दलित मुसलमान व दलित ईसाई के लोग भी शामिल हों। धर्म बदलने से इनलोगों को आरक्षण से वंचित नहीं कर सकते। निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग की
गत सप्ताह नीतीश कुमार की शराबंदी की घोषणा से जिस वर्ग के लोगों को राहत मिली है, उन्हीं लोगों को आरक्षण का यह मूद्दा सबसे ज्यादा आकर्षित करेगा। और यह तथ्य स्वीकार्य है कि सिर्फ बिहार ही नहीं देश में भी ऐसे वर्ग की तादाद सबसे ज्यादा है। नीतीश ने शराबबंदी और आरक्षण, इन दो मुद्दों को हवा दे दी है। इसलिए इनके राजनीतिक निहितार्थ पर भी चर्चा होनी स्वाभाविक है। दोनों ही मुद्दों का राष्ट्रीय महत्व है, जिनके कई राजनीतिक आयाम भी देखे जा सकते हैं। पहला यह कि नीतीश का जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना, जो उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में हर समय दखल देने का मौका देगा।
दूसरा, एक ऐसा मंच तैयार होने की प्रक्रिया को बल मिलना जो मुख्य रूप से पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए अगुवा हो। ठीक वैसा ही मंच जैसा सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव 2015 में चाह रहे थे। मुलायम मंच की अगुवाई का सपना देख रहे थे जो अब फिलहाल दूर की कौड़ी साबित होता दिखाई दे रहा है। खैर, अगर इस मंच के बनने की प्रक्रिया को रूप मिल जाता है तो संभवत: नीतीश कुमार ही इस मंच के सारथी बनें। वैसे मालूम हो कि एक मजबूत तीसरे दल जदयू, झविमो और अजीत सिंह के नेतृत्ववाले राष्ट्रीय लोकदल के विलय की बात चल रही है। अगर नीतीश ऐसे ही सामाजिक मुद्दों को भुनाते रहे तो कुछ और भी छोटे दल शामिल हो सकते हैं या उनसे रिश्ता बनाने में जदयू को सहूलियत हो। देश में भाजपा विरोधी तीसरे मोर्चे की गोलबंदी को इससे बल मिलेगा। नीतीश अगर पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बीच आधार विस्तार में सफल रहे तो ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, हरियाणा आदि प्रदेशों के छोटे दल साथ आ सकते हैं। इससे इन दलों को नीतीश को आगे रखकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी जताने में आसानी होगी। यह याद रखना भी जरूरी है कि नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा की मांग पर सभी पिछड़े राज्यों की तीव्र विकास की आकांक्षा को आवाज देने की कोशिश की थी। अपनी उस भूमिका के लिए उनके तरकश में अब एक और तीर आ गया है।
तीसरा, बिहार बनाम गुजरात मॉडल। नीतीश शराबबंदी का फैसला हो या फिर आरक्षण का मुद्दा दोनों ही गुजरात के मॉडल को चुनौती देता दिखाई दे रहा है या ये कहें कि बराबरी करता हुआ। नीतीश के फैसले और मांग सामाजिक न्याय के साथ विकास के नारे को मजबूत करेगा। पूर्ण शराबबंदी को प्रदेश के गरीबों खासकर महिलाओं का जिस तरह समर्थन मिला है, वह इस बात की पुष्टि करता है। चौथा, और सबसे बड़ा पहलू यह कि राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की छवि सकारात्मक होने के साथ-साथ मजबूत होगी। 1990 के दशक में और पिछली यूपीए सरकार के दौरान क्षेत्रीय दलों को विकास में बाधक बताया जा रहा था। इन्हें जातिवाद, पिछड़ापन, अपराधीकरण जैसी बुराइयों की जड़ बताया जा रहा था। अगर नीतीश का एजेंडा कुछ हद तक भी जमीन पर आ गया तो क्षेत्रीय दलों को विकास विरोधी कहना संभव नहीं होगा। इसके विपरीत अब राष्ट्रीय दलों से सवाल पूछा जा सकेगा कि उनके शासित प्रदेश अंतिम आदमी के बारे में कितने संवेदनशील हैं।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

उस दिन ऐसा भी हुवा...

मेरी निगाहें दूर बैठे एक जोड़े पर अचानक जा टिकी। वहां पहाड़ों के सर बादलों के ऊपर से झांक रहे थे. दूर तक फैली पहाड़ियों को देखकर वे दोनों कुछ देर शांत रहते फिर अपनी चुप्पी जोरदार हंसी के ठहाकों के साथ तोड़ते। ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा. मैं दोनों को देखना चाह रहा था। अलबत्ता मैं उनके सामने जा खड़ा हुवा। दोनों मुझे देखकर हैरान थे और मैं उन्हें। क्यूंकि वो लड़का मैं ही था और वो लड़की दीपिका (हाँ वही ओम शांति ओम और राम-लीला वाली). मैं खुद को dekh कर हैरान था और दीपिका एक ही जैसे दो लोगों को देखकर। अब उस सीन में किसी एक को तो गायब होना ही था सो गया हो गया. मुलाकात का सिलसिला कुछ आगे बढ़ता तब तक लड़कियों का झुण्ड हाँथ में बैनर पोस्टर लेकर मेरे खिलाफ नारे बजी करने लगा. उनमें से एक लड़की मेरे पास आई. वो लड़की ए.बी.पी. न्यूज़ की एंकर थी. जितना दम था उतनी ताकत से उसने मेरा कान खींचा और उस भीड़ के सामने ले जा पटका। भीड़ में शामिल सभी का चेहरा एक जैसा था. पीछे मुड़कर देखा तो दीपिका नदारद थीं. ख़राब तो लगे गा न यार. फैन तो मैं उस एंकर का भी हूँ.

नारेबाजी के बीच में दिवंगत लेखक कालबुर्गी आ गये। और हम दोनों पर ऐठ गये. बोले खुद को बड़ा पत्रकार समझते हो. क्या मैं आज का गांधी था जो किसी गुमनाम गोडसे ने मुझे मार दिया। माथे पर गोली का निशान दिखाते हुवे बोले- मेरे सवालों का तुम जवाब दो... अचानक से हो रहा शोर शराबा शांत हो गया. अब बस दो ही लोग बचे थे मैं और कालबुर्गी साहब। कुछ कहता कि इससे पहले मुनव्वर राणा जी अपने कुछ साथी साहित्यकरों के साथ वहां आ धमके। कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सोचा भाग लेता हूँ कि इखलाक ने लंगड़ी मार के मुझे गिरा दिया। सुधींद्र कुलकर्णी और वो कश्मीर वाले विधायक मियां … शेख अब्दुल रशीद, बगल में खड़े होकर खीसें निपोर रहे थे. राणा साहब आये और बोले देश में कुछ शक्तियां फांसीवाद को पैदा करने में जुटी हुवी हैं और तुम मीडिया वाले समस्या पर नहीं टी.आर.पी के चक्कर में ही लगे हुवे हैं. फिर सब एक साथ बोलने लगे खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलवाने में गर्व महसूस करते हो लेकिन लोकतंत्र फांसीवाद में तब्दील में हो रहा है तो कुछ नहीं कर रहे हो. बस बहस पर बहस कराये जा रहे हो...


तभी ईश्वर ने मुझ पर कृपा बरसाई। सभी बुद्धजीवियों का घेरा थोड़ी देर के लिए ढीला हुवा और मैं भाग निकला। और जाकर जहाँ रुका वहां परीक्षा चल रही थी. देखा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी देश की वर्तमान स्थिति पर एक निबंध लिख रहे हैं. प्रणब दा ने निबंध पहले लिख लिया इसलिए उनका निबंध देश के नाम सम्बोधन के तौर पर सुनाया गया. कुछ दिन बाद मोदी जी की बारी आई. दोनों की टॉनिक देश को मिलने के बाद मैंने ये उम्मीद की कि अब कुछ दिन तक देश में कुछ नहीं होगा लेकिन तब पंजाब में हाय तौबा मच गयी. अभी एक दिन पहले जाति के नाम पर. देश का पहला व्यक्ति फिर टेंशन में आ गया. कल एकबार फिर उसने देशवासियों को समझाया। जब राष्ट्रपति साहब देश को समझा रहे थे उसी समय हिन्दू समाज के कथित ठेकेदार और सत्ता के लोभी स्वार्थी लोग जम्हाई ले रहे थे. काफी देर तक यह सब चलता रहा तभी एक ४ साल का बच्चा गिलास में पानी लेकर आया और जम्हाई ले रहे उन लोगों पर फेंक दिया। और रौद्र रूप में बोला- अब तो जागो, देश को हिन्दू, मुस्लिम या किसी जाति के लोगों के रहने लायक नहीं बल्कि इंसानों के रहने लायक बनाओ। फिर वह उगते हुवे सूरज की तरफ चल पड़ा... और यह कहता हुवा कहीं ग़ुम हो गया कि देश का ध्यान रखना। हमने इसे आदर्श देश बनाना है...

बुधवार, 27 मई 2015

बेपर्दा होते ही हैवानों से बच निकली वो लड़की

आज के दिन मैं पैदा हुई थी। शादी के लायक तो उम्र हो चुकी है लेकिन ऐसा लग रहा है मैंने फिर से जन्म लिया है। पिछले तीन सालों में आज मेरे साथ ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस मैट्रो में एक भी शख्स ऐसा नहीं दिखा जिसकी आंखों में मुझे देखते समय हवस हो। मैं हैरान थी। ऐसी नहीं कि कोई देख नहीं रहा था। देख रहे थे। लेकिन चोरी से। मैंने कई बार उनकी नजरों में झांकने कोशिश की। हर बार सभी की नजर में मुझे सिर्फ शर्म ही नजर आई। मुझे एक बार देखने के बाद दोबारा देखने की हिम्मत किसी में नहीं दिख रही थी। मैं खुश थी कि अब मुझे मैट्रो में, राह चलते, कोई छेड़ेगा नहीं। किसी की जुबान और न निगाहें ही हर दिन मेरे शरीर को अब तार-तार नहीं करेंगीं।
मर्दों में ऐसा बदलाव महज एक दिन के भीतर ही था। कल ही की तो बात है। मैं मैट्रो से उतर कर अपने किराए के मकान में जा रही थी। ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए पैदल ही चल दी। या ये कहिए कि महीने का बजट देखकर चलना पड़ता था इसलिए... खैर... सुर्ख चमकता नीला आसमान देखते ही देखते काले बादलों से घिर गया। मैट्रो से उतरते वक्त शायद  शाम के 7:30 ही बज रहे होंगे। लेकिन ऐसा लग रहा था रात के 11 बज गए हों। गुप्प अंधेरा। उम्मीद थी बारिश होगी। चंद कदम चले ही थे कि बारिश शुरू हो गई। राह पर खड़े रिक्षों ने भी फिलहाल बारिश  की वजह से चलने से मना कर दिया था। मैं आगे बढ़ गई बारिश ने पूरी तरह भिगो दिया था। हवा थोड़ी तेजी थी। ठंड से मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ लगा रही थी।
तभी पीछे से आवाज आई। कहां जा रही हो। ये मौसम तो मजे करने का है। कुछ पल के लिए सब शांत हो गया। और चंद सेंकेंड बाद फिर आवाजा आई- आइए आपको छोड़ देते हैं। मेरी धड़कनें तेज हो गईं। डर से ठंड और तेज लग रही थी। मेरी धड़कनों के साथ-साथ मेरे कदम भी तेजी से बढ़ने लगे। मैं समझो दौड़ लगा रही थी। तभी अचानक बाइक पर सवार दो लड़कों ने मेरे रास्ता रोक लिया। हाथी जैसा शरीर और भद्दी शक्ल वाले उन लड़कों ने अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा आओ आज तुम्हें हिरोइन बना दूं। सी ग्रेड फिल्मों की। मेरे पैरों से जमीन खिसकी गई। उनकी बेहुदी बातें मुझे छलनी कर रहे थे। मैंने खुद के बचाव के लिए इधर-उधर नजर दौड़ाई। रास्ता सुनसान हो चुका था। आसपास पेड़ के नीचे खड़ी कुछ गायों और कुत्तों के और कोई नहीं दिखाई दे रहा था। बारिश में भीगा मेरा बदन उन्हें किसी तले हुए मांस से कम नहीं लग रहा था, जिसे खाकर वे अपनी भूख मिटाना चाहते थे। मैंने भागने की कोशिश की तभी पीछे बैठे भेडि़ये ने मेरा हाथ झटककर कहा- होशियारी करोगी तो एक और निर्भया बना दूंगा। उसकी धमकी से मानो मेरा शरीर जम सा गया। हलक सूख गया था। और जिस्म से बारिश की बूंदें के साथ पसीना भी टपक रहा था। फिर भी मैं अपनी पूरी ताकत से पीछे की तरफ भागी। और जोर-जोर से चिल्लाने लगी। पीड़ों की नीचे बैठे कुत्ते भी शोर मचाने लगे। भागते हुए मैंने अपना रास्ता बदला। हालांकि पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत मैं हो चुकी थी। लेकिन वो भेडि़ए पीछे हैं या नहीं, जानने के लिए मैंने दौड़ते दौड़ते ही पीछे देखना चाहा। और तभी एक गाड़ी से जा टकराई। देखा तो नीली-लाल बत्ती वाली वैन में बैठे कुछ पुलिसवाले मुझे भौचक होकर देख रहे थे। उन्होंने सवाल पूछा  लेकिन मैं उनको जवाब नहीं दे पाई। मेरे फेफड़े मुह को आ गए थे। मेरे मुंह से शब्द फूटने के बजाए मैं जोर-जोर से आवाज करते सांस ले रही थी। उनके वहां न पहुंचने पर अपने होने वाले हश्र को याद करके मैं उन्हें देखकर फफक पड़ी।
इस घटना ने मुझे तोड़कर रख दिया। वैसे लड़कों की घिनौनी और शर्मशार करनेवाली देने वाली हरकतों से मैं... मैं क्या, शहर की हर लड़की हर रोज सामना करती है। हर उम्र का मर्द अपने-अपने तरीके लड़कियों से अश्लीलता करने की कोशिश करता है। कई बार सोचती थी कि भगवान ने ऐसा जिस्म ही क्यों दिया जो हर समय जिल्लत और डर में ही जीने को मजबूर करता है। मैं दुआ मांगती थी कि मेरी हड्डियों से ये मांस गलकर निकल जाए। तब शायद ये लोग मुझे हैवानियत से देखना बंद कर दें। टीवी पर चर्चाओं में अकसर लोग लड़कियों के कपड़ों की खिलाफत करते दिखते हैं। कई मर्तबा मैंने अपने लिबास को भी बदलकर देखा। हिंदू होने के बाद भी बुर्का तक पहना। लेकिन उससे झलकते हुए बदन पर भी लोगों की बातें खतम नहीं होती थीं। लेकिन इन तीन सालों में किसी एक भी सोच मुझे बदली नहीं दिखी।
पुलिसवालों ने मुझे घर छोड़ा। उस रात मुझे नींद ही नहीं आई। मैं सोचती ही रही। लड़कियों के हंसने, बोलने, चलने यहां तक कि बैठने के तरीके को ये लोग हमेशा अलग नजर से ही क्यों देखते हैं। सोचती रही ऐसा क्या करूं कि जिससे मुझे लोग दरिंदगी से देखना बंद करें। और यही सोचते-सोचते मैं सो गई।
सुबह अपने ही टाइम पर उठी। चुंकि आज मेरा बर्थ डे है। मुझे दोस्तों के साथ पार्टी करनी थी। झट से मैंने अल्मारी से अपने नए कपड़े निकाले। बिस्तर पर रखा। और फिर नहाने चली गई। पानी की तेज धार मुझे ठंडक पहुंचा रही थी। आंख बंद करने पर कल की घटना मुझे डरा रही थी। घर से बाहर निकलने के लिए। मैं फिर सोच में पड़ गई। तभी जोर से घंटी बनजे की आवाज आई। मैं वापस होश में आई। पानी करीब एक 45 मिनट से मुझे भिको रहा था। घंटी दोबारा बजी। मैं बाथरूम से बाहर निकली। दरवाजा खोला तो कोई नहीं था। दरवाजे पर टिफिन रखा हुआ था। मैंने टिफिन को पास वाली टेबल पर रखा। अपना पर्स उठाया और दोस्तों से मिलने चल दी। मैट्रो तक पहुंचते-पहुंचते न जाने कितने लोगों ने मुझे घूर-घूर कर देखा। लेकिन किसी की नजरों में हैवानियत नहीं थी। मैट्रो में भी यही दिखा। मैं खुश थी। मैं अब आजाद हूं। मेरा जिस्म अब मेरे लिए नासूर नहीं रह गया था। मुझे अब अपने शरीर के लिए ईश्वर से बद्दुआ नहीं मांगनी पड़ेगी। लोगों से खुद को बचाने के लिए मैंने आज भी कुछ नया ही किया था इसलिए शायद लोगों में इतना बदलाव दिख रहा था। मैं मेरे नए कपड़े वैसे ही बिस्तर पर छोड़कर आ गई। आज मैं बेपर्दा हो कर सफर कर रही थी। मैं वैसा बनकर आई थी जैसे ये इंसान मुझे देखना चाहते थे। मैं मौन थी लेकिन चीख-चीखकर बता रही थी देखो इस मांस के लोथड़े में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसकी वहज से हर दिन कोई न कोई लड़की दुराचार की शिकार होती है। ...समाज को समझना होना कि बदलाव की सबसे ज्यादा जरूरत किसे है। क्योंकि पुरुषप्रधान समाज की अवधारणा को खत्म करते हुए महिलाएं खुद को बदल रही हैं। हर क्षेत्र में पुरुषों को चुनौती दे रही हैं। वे तकरीबन आजाद हो चुकी हैं पुरानी दकियानूसी परम्पराओं से। बदलाव तो उनके जीवन का एक हिस्सा बन गया है। इसलिए शायद बदलना उन्हें नहीं किसी और को होगा।

मंगलवार, 19 मई 2015

अभी नहीं मिली है मुझे सुकून की नींद: अरुणा

समाज में मुझे इसकी इजाजत नहीं देता लेकिन ये जिंदगी मेरी है। और मेरे साथ जो कुछ भी हुआ, उसे इस समाज को बताने का मुझे पूरा हक है। कम से कम उस समय जब मैं मर रही हूं... हार रही हूं। मैं शिकायत करना चाहती हूं और गुजारिष भी। मैं अरुणा शानबाग।

मैं 24 साल की ही तो थी जब एक जानवर ने मेरे साथ वो सब कुछ किया, जिसे बर्दाश्त
 करने के लिए असीम ताकत चाहिए थी। वह जानवरे ही था। अगर इंसान होता ऐसा कुछ करने की सोचते भी ना और मर्द पुरुष होता तो इस हद तक ना गिर जाता। जिस उम्र में मैं जमीन पर बदहवास पड़ी आत्मा को चूरचूर कर देने वाला दर्द हो झेल रही थी। अमूनन उस उम्र में कोई लड़की अपने पंख फैलाए दूर आसमान तक उड़ान भरने के सपने देखती है। खुद के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए, देश के लिए कुछ कर गुजरने की कोशिश करती है। मेरे मन में भी ख्वाइष थी। लोगों की सेवा करने की। मैं कर्नाटक से मुंबई आई थी। मुझे सुकून मिलता था-मरीजों की सेवा करके, उनकी तकलीफ को दूर करने के लिए लड़ते रहने में। पर...
वो हादसा 42 साल पहले 27 नवंबर 1973 को मंगलवार के दिन हुआ। भले ही उस वक्त वार्ड ब्वाॅय सोहनलाल वाल्मीकि ने मुझे जो दर्द दिया था उसकी पीड़ा कुछ महीने बाद खत्म हो गई लेकिन जो दर्द मुझे इस समाज में दिया वो आज भी मुझे तकलीफ देता है। मुझे जानवर समझा गया। मुझे तकलीफ नहीं हुई। मुझे कुत्ते की जंजीर से जकड़कर दर्द दिया गया। मुझे तकलीफ नहीं हुई। मुझे कोमा में पहुंचा दिया गया। मुझे तकलीफ नहीं हुई। मुंबई के अस्पताल किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल के वार्ड नंबर में चार में मैं चार दशक तक मन से निकालने के देने वाले अरमानों को मन में ही घूंट लिया। मुझे तकलीफ नहीं हुई। मेरे गूंगेपन के कारण मेरा अपराधी जिसे कानूनी तौर पर कोर्ट से आजाद कर दिया। बावजूद इसके मुझे तकलीफ नहीं हुई। मुझे तकलीफ उस वक्त हुई जब मैं अपने लिए इच्छा से मौत चाहती थी लेकिन 8 मार्च 2011 को अपने फरमान में मुझे कोर्ट ने मौत नहीं देने का फैसला किया। मुझे उस समय तकलीफ हुई जब अंतिम सांस तक उस हादसे को याद करते रहने के लिए मुझे जिंदा रहने का फैसला सुनाया। मुझे तब तकलीफ होती जब मेरी कहानी जानने के बाद भी इस आए दिन हर एक अरुणा शानबाग मरती है। मुझे तब तकलीफ होती है जब लोगों के सामने, इस समाज के सामने सब कुछ हो रहा होता है लेकिन सब के सब मुर्दा बने रहते हैं। गाहे बगाहे कुछ लोग किसी चैक चैराहे पर मेरे जैसी कईयों के नाम व तस्वीर की तख्ती लेकर हल्लाबोल करते हैं और फिर शांत हो जाते हैं। ऐसे तो न सोच बदलेगी और न समाज। 
कुछ लोग कहते हैं पुलिस अपना काम नहीं कर रही है। इसलिए ऐसे अपराध पनप रहे हैं। कुछ कहते हैं हमारा कानून ही कमजोर है। कुछ कहते हैं लोगों को बदलना होगा। नजरिया और सोच, बदलनी होगी। घर से बदलाव की शुरुआत करनी होगी। लोगों को सब कुछ पता है कि ऐसे अपराधों को कैसे खत्म करना है लेकिन बदलने की शुरुआत करने की जगह लोग बस कह ही रहे हैं।
लोगों को लगा मैं कोमा में हूं। इसलिए मौन हूं। उन्हें यह भी लगता था कि मुझे अब कोई दर्द नहीं, कोई तकलीफ नहीं होती। लेकिन मैं तो कभी चुप नहीं थी। हर दिन मैं चीख चीखकर अपने लिए इंसाफ मांगती थी। ऐसा इंसाफ जो दूसरों के लिए मिसाल बने। ऐसी सजा जिसे देखने वाला हर कोई शख्स भविष्य में कभी ऐसी हरकत ना करने की सोचे जैसे मेरे साथ हुई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तीन साल सात महीने बाद ही सही लेकिन ईष्वर ने मेरी मुराद पूरी कर दी। वो मुझे मृत्यु दे रहा है। मेरे जन्म के 13 दिन पहले ही मैं इस दुनिया से जा रही हूं। हो सकता है कि आप लोगों को लग रहा हो कि मैं दूसरी दुनिया में सुकून से रहूंगीं लेकिन हर बार जब देखूंगी कि मेरी ही जैसी कोई अरुणा फिर किसी जानवर के नीचे पिस रही है, मैं तड़पूंगी और तब तक तड़पती रहूंगी। जब तक चर्चाएं खत्म न हो जाएं और जब तक बदलाव की बयार न बहने लगे। कोई एक बदल जाएगा और दूसरे को बदलने के लिए कोशिश करता रहेगा। फिर देखना एक दिन मेरी ही जैसी एक अरुणा शानबाग अपना काम खत्म करके बेसमेंट में अपने कपड़े बदलेगी। न उसे कोई बिना कपड़े देखने के लिए कहीं छुपा होगा। न उसके साथ कोई दुराचार करने की ताक में होगा। वो शाम को सही सलामत अपने घर पहुंचेगी।