1930 एक ऐसा दौर जब भारत गुलामी जन्जीरों को तोड़ने के लिए अपने बाजू मजबूत कर रहा था। भारत की हर गली आन्दोलकारियों की आवाज से गूंज रही थी। वहीं कैनेडा के एक शहर में राष्ट्रमण्डल खेलों की शुरूआत हुई थी। चौदह देशों के करीब 400 खिलाड़ियों ने छः खेलों में प्रतिभाग किया था। उस समय भारत ऐसे दौर से गुजर रहा था कि उसने ये सोचा भी नहीं होगा कि वह कभी राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी भी करेगा। लेकिन मात्र 21 साल के अन्दर भारत को ये मौका मिला उसके बाद १९८२ में। क्यों? शायद इसलिए कि भारत ने विश्व पर बहुत जल्दी अपनी एक अलग और प्रभावशाली छाप डाली है। इस वर्ष राष्ट्रमण्डल खेलों की शुरूआत भारत की राजधानी और दिल वालों के शहर दिल्ली में 3 अक्टूबर को हुई जो कि 13 अक्टूबर तक चले, जिसमें 71 राष्ट्र के 6700 प्रतिभागियों ने 17 खेलों के लिए भाग लिया। भारतियों में उस समय खुशी की लहर दौड़ गयी जब 2003 में भारत को वर्ष 2010 में राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी के लिए चुना गया। कहते हैं न कि हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और होते हैं असल में भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष समेत अन्य सदस्यों के चहरे पर जो खुशी झलक रही थी उसका मुख्य कारण मेजबानी हासिल करने के पीछे छिपी शकुनी चाल का पहला चरण पार करने की थी। मतलब सभी अपने धन को कुबेर धन में तब्दील करने के सपने को साकार होता देख, खुश हो रहे थे। इन खेलों के बजट की गिनती बढ़ते-बढ़ते करीब 70000 करोड़ रूपये जा पहुंची है। कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर इस आंकड़े के आकार को समझाने के लिए इसकी तुलना देश भर के किसानों की कर्ज माफी पर खर्च करीब 65 हजार करोड़ रूपये से करते हैं तो कई लोग इसे केन्द्र सरकार के सालाना शिक्षा बजट से बड़ी राशि बताते हैं। एक बात यह भी सुनने में आती है कि खेलों के बदले जनता का पैसा लुटाने का सिलसिला भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष और राष्ट्रमण्डल खेल आयोजन समिति के महासचिव सुरेश कलमाडी ने वर्ष 2003 में जमैका में लगी बोली से शुरू कर दिया था। भारत की दावेदारी को मजबूत करने के लिए कलमाडी ने अपनी मर्जी से हरेक प्रतिभागी देश को एक-एक लाख डॉलर देने की पेशकश करी थी। भारत को वर्ष 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी मिलने में इस पेशकश ने अहम भूमिका निभाई। उस समय खेल मंत्री रहे भाजपा के विक्रम वर्मा कहते हैं ‘‘राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों को करीब 50-50 लाख रूपये देने की पेशकश कलमाडी का व्यक्तिगत निर्णय था। दरअसल यह मेजबानी हासिल करने के लिए दी जाने वाली रिश्वत थी।’’मेजबानी तो मिल गयी लेकिन वर्ष 2003 में मेजबानी मिलने के बाद वर्ष 2005 तक न तो भारतीय ओलंपिक संघ और न ही खेल मंत्रालय ने आयोजन को लेकर किसी भी तरह की तैयारी को आगे बढ़ाया। आयोजन के दावों और वादों के बीच चार साल निकल गये। आयोजन समिति का सचिवालय भी वर्ष 2007 में सुचारू हुआ। इसके बाद शुरू हुआ तैयारियों के बजाए खेलों के नाम पर ज्यादा से ज्यादा खर्च और कमाई से नए-नए तरीके निकालने का खेल। आयोजन का मास्टर प्लान तो वर्ष 2008 के आखिर में तैयार हुआ। इस देरी ने अटके कामों को पूरा करने का खर्च और धांधली की गुंजाइश दोनों को बढ़ा दिया। पिछले साल तक भी जमीनी तैयारियों पटरी पर नहीं दिखीं तो राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फेनेल ने इस सम्बन्धन प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और अपनी चिंता जतायी। इसी बीच मीडिया ने राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार की कलाई खोलनी शुरू कर दी उदाहरण के तौर पर- पूर्व केन्द्रीय मन्त्री मणिशंकर अय्यर ने मीडिया में इस मुद्दे के उछलने के बाद खूलासा किया कि सुरेश कलमाडी ने 2003 में इन खेलों पर सिर्फ 150 करोड़ रूपये का खर्च आने की बात कही थी लेकिन अब उद् घाटन और समापन समारोह पर ही 300 करोड़ रूपये खर्च होने की बात कही गयी है।गलती तो धनलोलुप नेताओं और उनके चेलाओं ने तो जरूर की और मीडिया द्वारा, इस घोटाले का खुलासा भी होना अति आवश्यक था लेकिन ऐसे समय पर जब खेल शुरू होने में बस कुछ सप्ताह ही बाकी हों, मीडिया द्वारा इस मामले को तूल देना क्या सही था? क्योंकि मीडिया में इस मामले के उछलने के बाद विदेशों में ओलंपिक संघ के अध्यक्ष समेत भारत व भारतीय सरकार की थू-थू हुई। अब शायद ही भारत को राष्ट्रमण्डल खेल या अन्य अन्तर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं की मेजबानी के लिए अवसर मिले। वैसे ये कहा जा सकता है कि मीडिया ने नेताओं ने को नहीं छोड़ा और नेताओं ने देश को, लेकिन ऐसी स्थिति में सिर्फ एक वर्ग ही ऐसा था जिसने बिना किसी स्वार्थ, लालच के देश की शान को बरकरार रखा, देश के खिलाड़ी। खिलाड़ियों ने राष्ट्रमण्डल खेलों में कुल 101 पदक भारत के लिए प्राप्त किये। जिसमें 38 स्वर्ण, 27 रजत व 36 कांस्य हैं। बहरहाल काफी अव्यवस्थाओं के रहते हुए भी खेल सकुशल निपट गये और किसी भी घटना ने दस्तक भी नहीं दी। नहीं तो इसके पहले कई जगह निर्माण कार्य चल रहा था तो कहीं कार्य पूरा होने के बाद ढ़ांचा गिर रहा था।जो भी हो, अन्तिम समय में सरकार ने जब एक बार दम भरा तो काम पूरा करने के बाद ही सांस ली। ये बात अलग है कि एक आध छुट-पुट काम तब भी करने को बाकी रह गये थे। खिलाड़ियों की सुविधा के लिए एयरपोर्ट से ही एक अलग राजमार्ग बनवाया गया था जो खिलाड़ियों को सीधे स्टेडियम पर उतारने के लिए था। रोड के दोनों ओर बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगवायी गयीं थी जिसमें तमाम प्रसिद्ध खिलाड़ियों की खेलते हुए तस्वीर थी, प्रसिद्ध इमारतों की तस्वीर आदि थी। उस समय तो दिल्ली मानों किसी अतिविकसित देश की भांति लग रही थी जहां न तो कहीं कूड़ा था और न ही कोई बिखारी। हां...... बिखारी! उन दिनों एक भी बिखारी दिल्ली की सड़कों पर नहीं था। ये भी सच है कि भारत में दिल्ली भी एक ऐसी जगह के तौर पर देखी जाती है जहां बिखारी बहुतायत में हैं। तो फिर ये बिखारी गये कहां? शहर से बाहर। अपनी झूठी शान बनाने के चक्कर में किसी भी बिखारी, रिक्शेवाले, ठेलेवालों को शहर में नहीं रूकने दिया गया। न ही शहर के बाहर उनके रहने खाने का कोई इन्तजाम किया गया। ऐसे में भीड़ भाड़ का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि पूरा दिल्ली 10 दिन के लिए बंद करा दिया गया था।लेकिन सरकार के ये तमाम ढ़कोसले धरे के धरे रह गये। क्योंकि इस बार मीडिया ने इनकी करतूतों पर पानी फेर दिया। खेल खत्म होते ही अगले दिन भारत सरकार ने पूर्व महालेखा परीक्षक आयुक्त वी.के. शुंगलू समिति, खेलों में हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिए गठित कर दी। इधर कई प्रकरणों के चलते विवादों में घिरी केन्द्र सरकार ने येन केन प्रकारेण सुरेश कलमाड़ी को उनके पद से मुक्त कर दिया। लेकिन प्रश्न ये उठा है कि इस तरह भारत की अस्मिता के साथ खेलने वाले व्यक्तियों की सजा सिर्फ पद से मुक्तिभर कर देना ही रह जाएगी या ऐसे आरोपियों पर कार्रवाई का ये पहला कदम माना जाए?
रविवार, 12 दिसंबर 2010
शनिवार, 11 दिसंबर 2010
दिमागी लंगडा राजा और लोकतंत्र
चुनाव आते ही सभी लोग अलग अलग दलों में अपना ठिकाना खोजने में लग जाते हैं !चेहरे वही पुराने बस पार्टी बदल जाती है,सिद्धांत बदल जाते हैं,बदल जाता है नजरिया ,कल तक जो अपने थे वही बेगाने हो जाते हैं!खैर छोडिये राजनीती है सब जायज है,
गठबंधन करके दल अपनी सरकार तो बना लेते हैं...लेकिन इस गठबंधन के बदले छोटे दलों के आगे सरकार नाक रगड़ती नजर आती है...वर्तमान सन्दर्भ में भी यही बात सच होती दिखाई दे रही है....प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सब कुछ देखते हुए भी अनजान बने रहे और अभी भी हालत में उनकी सुधार नहीं है...मतलब ए.राजा के मामले में वे चुप्पी साधे हुए है...शायद कारण यही है कि ए.राजा की पार्टी उनकी सरकार को साधे है.
वर्तमान में लोकतंत्र की दशा को व्यक्त करती एक कहानी याद आ गई सो उसे आप लोगों के सामने परोस रहा हूँ.
एक हंस-हंसिनी का बड़ा सुंदर जोड़ा था,दोनों में बड़ा प्रेम था!मजे से दिन कट रहे थे !एक दिन दोनों ने नीलगगन में सैर करने की सोची,दोनों सैर करते करते काफी दूर निकल गए!रात हो गई थी सोचा रात यही गुजार कर सुबह चलते है!एक बरगद का पेड़ दिखाई दिया,दोनों वहां पहुचे!उस बरगद के पेड़ पर एक उल्लू रहता था !हंस ने उल्लू से रात गुजारने की बात कही,उल्लू ने अनुमति दे दी!कहा कोई बात नही!सुबह जब हंस-हंसिनी उठ कर जाने लगे तब उल्लू ने हंसिनी को पकड़ लिया, कहा अब हंसीं मेरी है!हंस ने बड़ी विनती की लेकिन उल्लू नही माना,अब हंस ने राजा के दरबार में गुहार लगायी!राजा ने उल्लू को बुलाया,कहा उल्लू,हंसिनी हमेशा हंस की होती है,उल्लू की कभी नही हो सकती !ये जोड़ा बेमेल है!उल्लू ने कहा -हंसिनी मेरी है,यदि आपने ऐसा निर्णय नही दिया तो मै किले की प्राचीर पर बैठ कर आपके काले कारनामों का चिटठा खोल दूंगा !अब राजा डर गया!उसका निर्णय बदल गया,उसने कहा-हंस,अब हंसिनी उल्लू की है!तुम घर जाओ!हंस रोते हुए उदास मन से जाने लगा !अब उल्लू भी रो रहा था!हंस ने पूंछा-तुम क्यों रो रहे हो?मेरी हंसिनी मुझसे छीन गई है,मेरे रोने का कारण तो समझ में आता है,लेकिन तुम क्यों रो रहे हो?उल्लू बोला- में लोक तंत्र की दशा पर रो रहा हूँ,एक सिरफिरे के कारण राजा ने अपना निर्णय बदल दिया!एक धमकी से राजा ने अन्याय को जीता दिया!भ्रष्टाचार को बढ़ावा इन धमकियों के कारण ही शायद मिल रहा है...क्या होगा इस देश का?इसलिए मै रो रहा हूँ!यही हाल है पूरे देश में,अब जनता को सोचना है अगली सरकार उन्हें कैसी बनानी है!
..........................जवाबों की आस में
कृष्ण कुमार द्विवेदी
गठबंधन करके दल अपनी सरकार तो बना लेते हैं...लेकिन इस गठबंधन के बदले छोटे दलों के आगे सरकार नाक रगड़ती नजर आती है...वर्तमान सन्दर्भ में भी यही बात सच होती दिखाई दे रही है....प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सब कुछ देखते हुए भी अनजान बने रहे और अभी भी हालत में उनकी सुधार नहीं है...मतलब ए.राजा के मामले में वे चुप्पी साधे हुए है...शायद कारण यही है कि ए.राजा की पार्टी उनकी सरकार को साधे है.
वर्तमान में लोकतंत्र की दशा को व्यक्त करती एक कहानी याद आ गई सो उसे आप लोगों के सामने परोस रहा हूँ.
एक हंस-हंसिनी का बड़ा सुंदर जोड़ा था,दोनों में बड़ा प्रेम था!मजे से दिन कट रहे थे !एक दिन दोनों ने नीलगगन में सैर करने की सोची,दोनों सैर करते करते काफी दूर निकल गए!रात हो गई थी सोचा रात यही गुजार कर सुबह चलते है!एक बरगद का पेड़ दिखाई दिया,दोनों वहां पहुचे!उस बरगद के पेड़ पर एक उल्लू रहता था !हंस ने उल्लू से रात गुजारने की बात कही,उल्लू ने अनुमति दे दी!कहा कोई बात नही!सुबह जब हंस-हंसिनी उठ कर जाने लगे तब उल्लू ने हंसिनी को पकड़ लिया, कहा अब हंसीं मेरी है!हंस ने बड़ी विनती की लेकिन उल्लू नही माना,अब हंस ने राजा के दरबार में गुहार लगायी!राजा ने उल्लू को बुलाया,कहा उल्लू,हंसिनी हमेशा हंस की होती है,उल्लू की कभी नही हो सकती !ये जोड़ा बेमेल है!उल्लू ने कहा -हंसिनी मेरी है,यदि आपने ऐसा निर्णय नही दिया तो मै किले की प्राचीर पर बैठ कर आपके काले कारनामों का चिटठा खोल दूंगा !अब राजा डर गया!उसका निर्णय बदल गया,उसने कहा-हंस,अब हंसिनी उल्लू की है!तुम घर जाओ!हंस रोते हुए उदास मन से जाने लगा !अब उल्लू भी रो रहा था!हंस ने पूंछा-तुम क्यों रो रहे हो?मेरी हंसिनी मुझसे छीन गई है,मेरे रोने का कारण तो समझ में आता है,लेकिन तुम क्यों रो रहे हो?उल्लू बोला- में लोक तंत्र की दशा पर रो रहा हूँ,एक सिरफिरे के कारण राजा ने अपना निर्णय बदल दिया!एक धमकी से राजा ने अन्याय को जीता दिया!भ्रष्टाचार को बढ़ावा इन धमकियों के कारण ही शायद मिल रहा है...क्या होगा इस देश का?इसलिए मै रो रहा हूँ!यही हाल है पूरे देश में,अब जनता को सोचना है अगली सरकार उन्हें कैसी बनानी है!
..........................जवाबों की आस में
कृष्ण कुमार द्विवेदी
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
क्या हिन्दू किसी दुसरे धर्म का पक्षधर नहीं हो सकता....?
मैं हिन्दू हूँ. मेरा नाम यादव है....... मनीष यादव। मेरी भगवान में आस्था भी है और मंत्र दीक्षा भी ले राखी है. मतलब मैं मांसाहार भी नहीं करता यहाँ तक कच्चा लहसुन और प्याज भी नहीं खता. बावजूद इसके मेरे मित्र दिनभर की हर भेंट में मुझे यही कहते हैं कि आसलम वालेय कूम, और पाकिस्तानी कैसे हो, मुसलमान कब बन रहे हो. एक ख़ास बात तो बताना ही भूल गया ६ दिसम्बर को उनहोंने मुझे मेरा एक और नया नाम दिया "मोनीश खान". इसका कारण मैं जरूर बताऊंगा लेकिन इससे पहले मैं अपने दोस्तों का परिचय दे दूँ.
एक उत्तराखंड से है जिसने अपना स्नातक फिजिकल एजुकेशन से किया है। शायद बंगलुरु से। दूसरा मध्य प्रदेश से है। फोरेंसिक साइंस का छात्र रह चुका है। बाकी चार उत्तर प्रदेश से हैं। दोनों ने फैजाबाद यूनिवर्सिटी से अपना स्नातक कॉमर्स से किया है और बाकी दो ने पत्रकारिता से स्नातक पूर्ण किया है और वर्तमान में सभी मेरे साथ माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल से स्नाकोतर की पढाई कर रहे हैं।
अपनी बात को काटकर अचानक अपने मित्रों के बारे में बताने का मेरा मकसद सिर्फ इतना था कि ये सभी एक अच्छे पाठ्यक्रम से पढ़े हुए हैं और स्नातकोतर के छात्र होने के नाते इतनी तो उम्मीद की जा सकती है कि जो भविष्य में देश के चौथे स्तम्भ के रूप में जाने जायेंगे उनकी सोच कम से कम आम जनमानस की सोच से थोड़ी से तो अलग होनी ही चाहिय।
ख़ैर मेरी इन बातों का अर्थ आप बाद में समझ ही जायेंगे। बात थी कि कारण क्या था....... मेरे दोस्त द्वारा मुझसे इस तरह का व्यवहार करने का कारण सिर्फ इतना था कि मैं पिछले कुछ महीनो से ऐसी पुस्तकें पढ़ रहा हूँ जो या तो भारत-पकिस्तान पर आधारित हैं या वो पुस्तकें जो हिन्दू-मुसलमान वर्ग से जुड़ीं हैं।
मेरा जन्म स्थान लखनऊ है। बचपन से बाबरी मस्जिद विध्वंश और गोध्रार कांड का उल्लेख खूब सुनता आ रहा हूँ। जब से थोडा परिपक्व हुआ तो इन विषयों को जानने कि ललक हुई। शायद इसलिए मैं इस तरह की पुस्तकों को आज कल ज्यादा पढ़ रहा हूँ।
वैसे भारत में मुसलमानों के साथ हुए अन्याय और अत्याचार का मैं पक्षधर हूँ। मैं यह जानता हूँ कि गाँधी जी द्वारा नोवाखली और रामानुजम में एक सभा को संबोधित करने के बाद मुसलमानों के साथ जो हुआ वो गलत था, बाबरी मस्जिद विध्वंश कर जिस तरह से मानवमूल्यों का गला घोंटा गया ये सरासर गलत था, बाबरी मस्जिद विध्वंश मेंबाद मुंबई में मुसलमानों द्वारा निकाली गयी शांति रैली पर गोलियां बरसाना वो गलत था, गोधरा कांड- हिन्दुओंद्वारा मुसलमानों का दमन, एक विस्मार्नीय घटना, मुसलमानों के साथ जो भी हुआ, वो गलत था। और भी बहुतसी घटनाएँ जो इतिहास के पन्नों में आज भी दर्ज हैं मुसलमानों पर हुए अत्याचारों कि गाथा गातें है।
हर बार हिन्दू कोई न कोई नया कारण ढूढ़ कर मुसलमान वर्ग पर उंगलियाँ उठाने की किशिश करता रहा है। मैं हिन्दू हूँ इसलिए ये मेरा हक है कि अगर हिन्दू कोई ऐसा कार्य कर रहा है जिससे अपने धर्म का पतन होता है, मैंरोक-टोक सकता हूँ। लेकिन किसी अन्य धर्म को रोकने-टोकने का अधिकार मुझे क्या किसी भी व्यक्ति को नहींप्राप्त है। चंद संगठनो का भड़काऊ भाषणों से प्रभावित होकर अगर हम उन बातों के पीछे लादेन तो इस क्यासमझा जायेगा? मुर्खता या कुछ और ....? वैसे जहाँ तक मुझे पता है कि हिन्दू धर्म ऐसा कहीं नहीं लिखा है किगलती करने वाले को क्षमा नहीं नहीं किया जायेगा।
दौर बदल गया, कई पीढियां गुजर गयीं लेकिन आज भी हिन्दू-मुसलमानों के बीच बना भेदभाव वैसे ही बरकरारहै। सुनने में आता है कि शिक्षा के आने व विकास होने से लोगों कि मानसिकता में परिवर्तन आ रहा है। ऐसा मुझेनहीं लगता क्योंकि इस बात का साक्ष्य उदाहरण मैं अपने दोस्तों का दे चुका हूँ। मुझे नहीं समझ में आता कि क्योंलोग आज भी इस तरह कि मलिन सोच को ज़िंदा रखे हुएं हैं। लोगों को अपने धर्म में आस्था रखनी चाहिए लेकिनदुसरे के धर्म को बुरा कहना ये कहाँ तक उचित है? और ऐसा तो अपने धर्म में कहीं भी नहीं लिखा है कि किसी दूसराधर्म की निंदा करो, हाँ ये जरूर सुना है कि अपना धर्म दुसरे धर्म का सम्मान करने का सन्देश हमें देता है।
ये सच है कि भारत में मुसलमान शासकों के आने से बाद सबसे ज्यादा मंदिर तोड़े गए। लेकिन क्या ये जरूरी हैकि जिन घटनाओं को बीते कई शताब्दियाँ बीत गयी हों उन्हें पुनर्जीवित कर उनके पीच आज मुस्लिम वर्ग केलोगों का खून बहाया जाए या उनसे उन मान्यताओं का हिसाब-किताब अब लिया जाए जिसको उस समयमुस्लिम शासकों को ने नष्ट कर दी थी। और वैसे भी आज हम धर्म-मान्यताओं के नाम परलड़ भी रहे है तो उनलोगों से जिन्होंने कभी ये किया भी नहीं अपितु उन्हें ये भी नहीं पता होगा कि वे किस मुग़ल शासक के घराने से हैं।
मुगलों का दौर जब अपने पतन पर था तो उस समय या तो अधिकतर मुग़ल शासक वापस अपने वतन लौट गए थेऔर जो बचे रह गए थे उन्हें युद्धों में मौत नसीब हुई थी। तो इस लिहाज से आज भी देश में कितने मुग़ल परिवारबचे रह गए होंगे इसका अनुमान लगाना हम आप आसानी से लगा सकते है।
इतिहास को उठाया जाए तो साफ़ पता चलता है कि भारत में मंदिरों को नस्ष्टकर तहखानो में रखे खजानों कोलुटने के साथ-साथ मुगलों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए युद्धों में परास्त राजाओं का धर्म परिवर्तन करवाया और जिन्होंने मुस्लिम धर्म नहीं अपनाया उन्हें जमादार का काम दिया गया। यही कार मुग़ल शासकों ने पूरे देश मेंकिया। मतलब साफ़ है कि मुगलों के दमन के बाद देश में तो मुसलमान देश में रह गए थे उनमें से तो अधिकतरपहले से ही हिन्दू थे और जो जमादार बनाये गए थे वो भी हिन्दू थे। और ये सभी राजपूत या क्षत्रिय थे अर्थात सभीऊँची जात के थे क्यों कि उस समय मुगलों से अधिकतर युद्ध राजपूतों से हुए थे वैसे भी हमारे हिन्दू धर्म में समाजको चार वर्ग में बांटा गया था जिसमें युद्ध का काम क्षत्रियों के था।
गाजियाबाद के दोहरे गाँव के लोग जो मुसलमान हैं लेकिन स्वयं को मुस्लिम राजपूत कहते हैं। ये वहीँ लोग हैंजिनका धर्मपरिवर्तन कर उन्हें मुगलों ने मुसलमान बनाया गया था। एक और उदाहरण है जो हन्दू तो नहीं लेकिनउन्हें इस्लाम अपनाने के विवश किया गया था-सिन्धी व पंजाबी। ये लोग भी स्वयं को क्रमशा:सिन्धी मुसलमानव पंजाबी मुसलमान कहते हैं। ये लोग पंजाब भारत-पकिस्तान सीमा पर रहते हैं। इसलिए कहीं ना कहीं भारत मेंरहने वाले मुसलमान अपने भाई ही हैं।
लेकिन अपने स्वार्थ के लिए कुछ राजनीतिज्ञ हिन्दुव के पतन का रोना रोकर ना समझ और भावुक जनता कोधरम के नाम पर अपने भाषणों के जरिये पहले तो भड्कतें हैं फिर उन्हें ही राजनीति में अपनी स्थिति को महबूतकरने के लिए दुसरे धर्म के लोगों का गला काटने के लिए भेज देते हैं।
मैं पुनः एक बात विस्मरण करना चाहता हूँ कि भारत में सिर्फ मुसलमान ने ही अत्याचार नहीं सहा है और भीमजहब के लोगों ने भी वही सब झेला है लेकिन आज सिर्फ दो धर्म मुख्य हैं जो देश में परस्पर एक दूसरा के विरोधीमाने जाते हैं,हिन्दू-मुस्लिम। और ये विरोधी भावनाएं कड़ी करने में अपने कूटनीतिक राजनीतिज्ञों का सराहनीययोगदान है। आज भी, जबकि परिस्थतियाँ पूरी तरह से बदल चुकी हैं और सब कुछ संतुलित है, अगर हम गड़े मुर्देउखाड़कर लड़ते रहे तो ना हम और ना ही हमारी पीढियां कभी शांति और अमन का चेहरा देख पाएंगी सिवाएनफरत और प्रतिशोध का चेहरा देखना के।
"हम हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई से पहले एक इंसान हैं....."
मुझे पाठकों से आशा है कि कम से कम वे इस तरह कि भावनाओं को दबाने या मूल से नष्ट करने का जेम्माउठाएंगे जो हन्दू-मुस्लिम विरोधी भावनाओं को उजागर या प्रसार करने के लियेया हों......
अपनी बात को काटकर अचानक अपने मित्रों के बारे में बताने का मेरा मकसद सिर्फ इतना था कि ये सभी एक अच्छे पाठ्यक्रम से पढ़े हुए हैं और स्नातकोतर के छात्र होने के नाते इतनी तो उम्मीद की जा सकती है कि जो भविष्य में देश के चौथे स्तम्भ के रूप में जाने जायेंगे उनकी सोच कम से कम आम जनमानस की सोच से थोड़ी से तो अलग होनी ही चाहिय।
ख़ैर मेरी इन बातों का अर्थ आप बाद में समझ ही जायेंगे। बात थी कि कारण क्या था....... मेरे दोस्त द्वारा मुझसे इस तरह का व्यवहार करने का कारण सिर्फ इतना था कि मैं पिछले कुछ महीनो से ऐसी पुस्तकें पढ़ रहा हूँ जो या तो भारत-पकिस्तान पर आधारित हैं या वो पुस्तकें जो हिन्दू-मुसलमान वर्ग से जुड़ीं हैं।
मेरा जन्म स्थान लखनऊ है। बचपन से बाबरी मस्जिद विध्वंश और गोध्रार कांड का उल्लेख खूब सुनता आ रहा हूँ। जब से थोडा परिपक्व हुआ तो इन विषयों को जानने कि ललक हुई। शायद इसलिए मैं इस तरह की पुस्तकों को आज कल ज्यादा पढ़ रहा हूँ।
वैसे भारत में मुसलमानों के साथ हुए अन्याय और अत्याचार का मैं पक्षधर हूँ। मैं यह जानता हूँ कि गाँधी जी द्वारा नोवाखली और रामानुजम में एक सभा को संबोधित करने के बाद मुसलमानों के साथ जो हुआ वो गलत था, बाबरी मस्जिद विध्वंश कर जिस तरह से मानवमूल्यों का गला घोंटा गया ये सरासर गलत था, बाबरी मस्जिद विध्वंश मेंबाद मुंबई में मुसलमानों द्वारा निकाली गयी शांति रैली पर गोलियां बरसाना वो गलत था, गोधरा कांड- हिन्दुओंद्वारा मुसलमानों का दमन, एक विस्मार्नीय घटना, मुसलमानों के साथ जो भी हुआ, वो गलत था। और भी बहुतसी घटनाएँ जो इतिहास के पन्नों में आज भी दर्ज हैं मुसलमानों पर हुए अत्याचारों कि गाथा गातें है।
हर बार हिन्दू कोई न कोई नया कारण ढूढ़ कर मुसलमान वर्ग पर उंगलियाँ उठाने की किशिश करता रहा है। मैं हिन्दू हूँ इसलिए ये मेरा हक है कि अगर हिन्दू कोई ऐसा कार्य कर रहा है जिससे अपने धर्म का पतन होता है, मैंरोक-टोक सकता हूँ। लेकिन किसी अन्य धर्म को रोकने-टोकने का अधिकार मुझे क्या किसी भी व्यक्ति को नहींप्राप्त है। चंद संगठनो का भड़काऊ भाषणों से प्रभावित होकर अगर हम उन बातों के पीछे लादेन तो इस क्यासमझा जायेगा? मुर्खता या कुछ और ....? वैसे जहाँ तक मुझे पता है कि हिन्दू धर्म ऐसा कहीं नहीं लिखा है किगलती करने वाले को क्षमा नहीं नहीं किया जायेगा।
दौर बदल गया, कई पीढियां गुजर गयीं लेकिन आज भी हिन्दू-मुसलमानों के बीच बना भेदभाव वैसे ही बरकरारहै। सुनने में आता है कि शिक्षा के आने व विकास होने से लोगों कि मानसिकता में परिवर्तन आ रहा है। ऐसा मुझेनहीं लगता क्योंकि इस बात का साक्ष्य उदाहरण मैं अपने दोस्तों का दे चुका हूँ। मुझे नहीं समझ में आता कि क्योंलोग आज भी इस तरह कि मलिन सोच को ज़िंदा रखे हुएं हैं। लोगों को अपने धर्म में आस्था रखनी चाहिए लेकिनदुसरे के धर्म को बुरा कहना ये कहाँ तक उचित है? और ऐसा तो अपने धर्म में कहीं भी नहीं लिखा है कि किसी दूसराधर्म की निंदा करो, हाँ ये जरूर सुना है कि अपना धर्म दुसरे धर्म का सम्मान करने का सन्देश हमें देता है।
ये सच है कि भारत में मुसलमान शासकों के आने से बाद सबसे ज्यादा मंदिर तोड़े गए। लेकिन क्या ये जरूरी हैकि जिन घटनाओं को बीते कई शताब्दियाँ बीत गयी हों उन्हें पुनर्जीवित कर उनके पीच आज मुस्लिम वर्ग केलोगों का खून बहाया जाए या उनसे उन मान्यताओं का हिसाब-किताब अब लिया जाए जिसको उस समयमुस्लिम शासकों को ने नष्ट कर दी थी। और वैसे भी आज हम धर्म-मान्यताओं के नाम परलड़ भी रहे है तो उनलोगों से जिन्होंने कभी ये किया भी नहीं अपितु उन्हें ये भी नहीं पता होगा कि वे किस मुग़ल शासक के घराने से हैं।
मुगलों का दौर जब अपने पतन पर था तो उस समय या तो अधिकतर मुग़ल शासक वापस अपने वतन लौट गए थेऔर जो बचे रह गए थे उन्हें युद्धों में मौत नसीब हुई थी। तो इस लिहाज से आज भी देश में कितने मुग़ल परिवारबचे रह गए होंगे इसका अनुमान लगाना हम आप आसानी से लगा सकते है।
इतिहास को उठाया जाए तो साफ़ पता चलता है कि भारत में मंदिरों को नस्ष्टकर तहखानो में रखे खजानों कोलुटने के साथ-साथ मुगलों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए युद्धों में परास्त राजाओं का धर्म परिवर्तन करवाया और जिन्होंने मुस्लिम धर्म नहीं अपनाया उन्हें जमादार का काम दिया गया। यही कार मुग़ल शासकों ने पूरे देश मेंकिया। मतलब साफ़ है कि मुगलों के दमन के बाद देश में तो मुसलमान देश में रह गए थे उनमें से तो अधिकतरपहले से ही हिन्दू थे और जो जमादार बनाये गए थे वो भी हिन्दू थे। और ये सभी राजपूत या क्षत्रिय थे अर्थात सभीऊँची जात के थे क्यों कि उस समय मुगलों से अधिकतर युद्ध राजपूतों से हुए थे वैसे भी हमारे हिन्दू धर्म में समाजको चार वर्ग में बांटा गया था जिसमें युद्ध का काम क्षत्रियों के था।
गाजियाबाद के दोहरे गाँव के लोग जो मुसलमान हैं लेकिन स्वयं को मुस्लिम राजपूत कहते हैं। ये वहीँ लोग हैंजिनका धर्मपरिवर्तन कर उन्हें मुगलों ने मुसलमान बनाया गया था। एक और उदाहरण है जो हन्दू तो नहीं लेकिनउन्हें इस्लाम अपनाने के विवश किया गया था-सिन्धी व पंजाबी। ये लोग भी स्वयं को क्रमशा:सिन्धी मुसलमानव पंजाबी मुसलमान कहते हैं। ये लोग पंजाब भारत-पकिस्तान सीमा पर रहते हैं। इसलिए कहीं ना कहीं भारत मेंरहने वाले मुसलमान अपने भाई ही हैं।
लेकिन अपने स्वार्थ के लिए कुछ राजनीतिज्ञ हिन्दुव के पतन का रोना रोकर ना समझ और भावुक जनता कोधरम के नाम पर अपने भाषणों के जरिये पहले तो भड्कतें हैं फिर उन्हें ही राजनीति में अपनी स्थिति को महबूतकरने के लिए दुसरे धर्म के लोगों का गला काटने के लिए भेज देते हैं।
मैं पुनः एक बात विस्मरण करना चाहता हूँ कि भारत में सिर्फ मुसलमान ने ही अत्याचार नहीं सहा है और भीमजहब के लोगों ने भी वही सब झेला है लेकिन आज सिर्फ दो धर्म मुख्य हैं जो देश में परस्पर एक दूसरा के विरोधीमाने जाते हैं,हिन्दू-मुस्लिम। और ये विरोधी भावनाएं कड़ी करने में अपने कूटनीतिक राजनीतिज्ञों का सराहनीययोगदान है। आज भी, जबकि परिस्थतियाँ पूरी तरह से बदल चुकी हैं और सब कुछ संतुलित है, अगर हम गड़े मुर्देउखाड़कर लड़ते रहे तो ना हम और ना ही हमारी पीढियां कभी शांति और अमन का चेहरा देख पाएंगी सिवाएनफरत और प्रतिशोध का चेहरा देखना के।
"हम हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई से पहले एक इंसान हैं....."
मुझे पाठकों से आशा है कि कम से कम वे इस तरह कि भावनाओं को दबाने या मूल से नष्ट करने का जेम्माउठाएंगे जो हन्दू-मुस्लिम विरोधी भावनाओं को उजागर या प्रसार करने के लियेया हों......
मंगलवार, 7 दिसंबर 2010
आप बीती......मेरी ही नही आपकी भी.....
देखें भी तो क्या देखे .........
रोजगार समाचार के सिवा.......
मांगे भी तो क्या मांगे........
नौकरी के सिवा..........
कि हमने डिग्री ले लिया.....
हाँ हमने डिग्री ले लिया.....
प्लेसमेंट से पहले एक मेल आता है.....
आ जाओ बेटा रोजगार मेला लगा है.....
मेले में पहुंचते है तो....
दुकानदार कहता है......
क्या कहता है ये नही बताऊंगा....
हाँ बार-बार ये गीत गाऊंगा.......
देखें भी तो क्या देखे .........
रोजगार समाचार के सिवा.......
मांगे भी तो क्या मांगे........
नौकरी के सिवा..........its a fun, dont take it sirious........but if u r agree with these lines then do hard work and get success...
रोजगार समाचार के सिवा.......
मांगे भी तो क्या मांगे........
नौकरी के सिवा..........
कि हमने डिग्री ले लिया.....
हाँ हमने डिग्री ले लिया.....
प्लेसमेंट से पहले एक मेल आता है.....
आ जाओ बेटा रोजगार मेला लगा है.....
मेले में पहुंचते है तो....
दुकानदार कहता है......
क्या कहता है ये नही बताऊंगा....
हाँ बार-बार ये गीत गाऊंगा.......
देखें भी तो क्या देखे .........
रोजगार समाचार के सिवा.......
मांगे भी तो क्या मांगे........
नौकरी के सिवा..........its a fun, dont take it sirious........but if u r agree with these lines then do hard work and get success...
याद तेरी बेसबब नहीं आती.........
शकील "जमशेद्पुरी"
www.gunjj.blogspot.com
मैं खुद ही मुलाक़ात को चल देता हूँ
मायूसी जब चलके दो कदम नहीं आती
तेरी हर अदा मेरी एहसास में बसी है
याद तेरी बेसबब नहीं आती.........
समंदर आज फिर से खौफज़दा है
चेतावनी दी है किसी ने सुनामी की
वही होगा जो पहले हो चुका है
अंजाम जैसे तेरी-मेरी कहानी की
बहुत करीब थे अपनी मंजिल के हम
ज़रा सा आगे बढ़ कर हाथ बढ़ाना था
में तेरा हूँ, सिर्फ तेरा हूँ
ये बात तुम्हें ज़माने को बताना था
काश के तुझमें कोई झिझक नहीं आती
याद तेरी बेसबब नहीं आती.......
शहर से दूर पहाड़ों के दामन में
मोहब्बत का अपना भी एक घर था
हर एक कोणा, दरो-दीवार और फिजा
सब तेरी खुशबू से तर था.
बड़ी दिनों से तेरी महक नहीं आती
याद तेरी बेसबब नहीं आती.....
कभी जो तू निकल आती थी सावन में
घटा तुझको देख कर बरसती थी.
गुज़र होता जो तेरा बाग़ से तो
तुझे छूने को हरेक डाली लचकती थी.
इन डालियों में अब वो लचक नहीं आती.
तेरी याद बेसबब नहीं आती.....
www.gunjj.blogspot.com
मैं खुद ही मुलाक़ात को चल देता हूँ
मायूसी जब चलके दो कदम नहीं आती
तेरी हर अदा मेरी एहसास में बसी है
याद तेरी बेसबब नहीं आती.........
समंदर आज फिर से खौफज़दा है
चेतावनी दी है किसी ने सुनामी की
वही होगा जो पहले हो चुका है
अंजाम जैसे तेरी-मेरी कहानी की
इन बातों से कोई दहशत नहीं आती
याद तेरी बेसबब नहीं आती.......
बहुत करीब थे अपनी मंजिल के हम
ज़रा सा आगे बढ़ कर हाथ बढ़ाना था
में तेरा हूँ, सिर्फ तेरा हूँ
ये बात तुम्हें ज़माने को बताना था
काश के तुझमें कोई झिझक नहीं आती
याद तेरी बेसबब नहीं आती.......
शहर से दूर पहाड़ों के दामन में
मोहब्बत का अपना भी एक घर था
हर एक कोणा, दरो-दीवार और फिजा
सब तेरी खुशबू से तर था.
बड़ी दिनों से तेरी महक नहीं आती
याद तेरी बेसबब नहीं आती.....
कभी जो तू निकल आती थी सावन में
घटा तुझको देख कर बरसती थी.
गुज़र होता जो तेरा बाग़ से तो
तुझे छूने को हरेक डाली लचकती थी.
इन डालियों में अब वो लचक नहीं आती.
तेरी याद बेसबब नहीं आती.....
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
धरती पर क्या-क्या मंजर फैला है....
धरती पर क्या क्या मंजर फैला है
आज लगा यहाँ लाशों का मेला है
ऐसे तो जनाजे को लेकर इंसान आता है
पर
मुर्दे को आग देने आज मुर्दा आया है
जिन्दा थे तो सब कहते थे तू मेरा है
लेकिन
इस शमशान में आज शिर्फ़ मुर्दों का डेरा है
कल
दूसरों के तमाशे में हम तमाशबीन बने
उसी दहशत के निशाने पर आज घर मेरा है.....
आज लगा यहाँ लाशों का मेला है
ऐसे तो जनाजे को लेकर इंसान आता है
पर
मुर्दे को आग देने आज मुर्दा आया है
जिन्दा थे तो सब कहते थे तू मेरा है
लेकिन
इस शमशान में आज शिर्फ़ मुर्दों का डेरा है
कल
दूसरों के तमाशे में हम तमाशबीन बने
उसी दहशत के निशाने पर आज घर मेरा है.....
रविवार, 5 दिसंबर 2010
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कुछ तस्वीरे आपके लिए लेकर आया हूँ... लम्बे समय से आपसे दूर था... दिवाली की छुट्टी मनाकर अभी लौटा हूँ.... बहुत व्यस्त हो गई है लाइफ .... केव्स टुडे में लिख भी नही पा रहा हूँ इन दिनों..... आदित्य अपनी पत्रिका के बारे में लिख चुके है...ख़ुशी इस बात की है कि" विहान " पत्रिका का प्रवेशांक निकल चूका है ... अब दिसंबर की अंक की तैयारी चल रही है... बाजारवाद की कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच पत्रिका लगातार निकालते रहना एक बड़ी चुनोती है ... लेकिन हमारे साथ टीम अच्छी है ...... उम्मीद है पत्रिका प्रगति करेगी......
।
साथियो , इन दिनों लिखने का समय नही मिल पा रहा है .... विहान को लेकर भागादौड़ी कर रहा हूँ ..... अगर लेखन करूँगा तो पत्रिका के लिए समय नही निकल पाउँगा..... वैसे हमारे {सी ऍम डी साहब }"परमार " जी के सख्त निर्देश है कि इन दिनों ब्लॉग पर लिखना और नेट पर बैठना कम ही करे तो ठीक रहेगा क्युकि यही समय है जब पत्रिका को एस्टेब्लिश करना है... इसी के चलते लिखना कम कर दिया है .... परमार जी की बातें माननी पड़ेगी क्युकि वही प्रधान संपादक जो है.... नही तो फटकार सुनने को मिलेगी......क्या पता नौकरी से भी हाथ धोना पद सकता है वैसे भी २००८_२०१० बीच के हमरे केव्स के साथी नौकरी की तलाश में ठोकरे खा रहे है .... लेकिन हमारे (सी ऍम डी ) अलग तरह के है.... जितनी आज़ादी उन्होंने मुझे दे राखी है और शायद ही कोई देता होगा... लिखने से लेकर महत्वपूर्ण फैसले लेने को मैं स्वतन्त्र हूँ.... हमारी टीम के एक साथी रजनीश पाण्डेय का स्वास्थ्य इन दिनों ख़राब चल रहा है.... उनकी कमी खल रही है... आशा है वह जल्द ठीक होकर पत्रिका में अपना योगदान देंगे......
आपको बता दू पत्रिका का प्रचार काफी हो चूका है... ऍम सी यू में हमें हर कोई पहचानने लगा है ..... प्रमोशन बिलकुल "पीपली लाइव " वाले अंदाज में हुआ है पत्रिका के लिए ज्यादा प्रचार करने की जरुरत नही हुई ...... विवेक, आदित्य आपके हाथो में जल्द ही पत्रिका होगी.... भिजवाने की व्यवस्था की जा रही है.......एक खुशखबरी है विवेक भाई आपको विहान का बिहार ब्यूरो चीफ बनाया जा रहा है.... परमार जी के संपर्क में रहिये और वहां से कुछ खबरे हम तक पहुचाये ..........आदित्य जी आप भी खबरे भेजना शुरू कर दीजिये......
घुमक्कड़ी करते हुए कुछ तस्वीरे उतारी है .....नजर फेरियेगा ऐसी उम्मीद है ......डोट कॉम के भी कई प्रकार मार्केट में आ चुके है... सांप , बिच्छु के बाद अब बारी केकड़े की है ....स्वर्णिम मध्य प्रदेश में अब कई तरह के ग्रुप बन्ने लगे है ..... शिव राज मामा अपना प्रदेश की भावना जगा रहे है ....... ग्रुप तस्वीर पर मामा का प्रभाव लगता दिख रहा है...."शनि देव " का तो क्या कहना .... ग्लोबल हो गए है..... जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है... या तो " साईं " या "शनि " देव.... संजय टेलर का भी क्या कहना ॥ अपना प्रचार कर रहे है और पोस्टर चिपकाना मना कर रखा है .....प्रेस की इससे बड़ी आज़ादी और क्या हो सकती है ..... आज़ाद प्रेस नाम से पेपर ............
"भाइयो! मैंने आप पर बहुत ज़ुल्म किया है. इसलिए अपने पापों का......"
एक बस्ती थी, जहाँ चूहों का दर्जनों परिवार हसी-खुशी अपनी जिंदगी बसर कर रहा था. दुनिया के भय-आतंक और ईर्ष्या-द्वेष से दूर वो स्वतंत्र हो कर विचरण करते थे। लेकिन उनकी खुशियों को एक दिन किसी की नजर लग गई। चूहे यह देख कर काफी भयभीत हो गए कि एक बिल्ली उसके गांव में घुस आई है। पहले तो चूहों ने सोचा कि शायद ये बिल्ली इस गाँव से होकर गुजर रही है. उधर बिल्ली ने जैसे ही गाँव में कदम रखा, उसे आभास हो गया कि यह चूहों की बस्ती है. उसने इस गाँव में डेरा डाल दिया. फिर तो चूहों का बुरा वक़्त शुरू हो गया. बिल्ली घात लगा कर चूहों का शिकार करने लगी. चूहों का अपने घरों से निकलना भी मुश्किल हो गया. खाने कि तलाश में अब वो बिल से बहार भी नहीं आ सकते थे. स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी. चूहों को जल्द से जल्द इस समस्या का समाधान निकालना था. अन्यथा भूख से मरने कि नौबत आ सकती थी. इसी के तहत चूहों के मुखिया ने एक आपात बैठक बुलाई. बैठक में इस बात पर विचार-विमर्श हो रहा था कि बिल्ली से कैसे निपटा जाए? तभी एक चूहे ने कहा- "क्यूं न हम सभी मिल कर बिल्ली पर हमला कर दें." लेकिन से आसान नहीं था. बिल्ली काफी चालाक थी और फुर्तीली भी. साथ ही इसमें जान का जोखिम भी था. तभी पिछली पंक्ति से एक युवा चूहे ने कहा- "बगल के गाँव में मेरा एक कुत्ता दोस्त रहता है.वो हमारी मदद कर सकता है. अगर उसे यहाँ बुला लिया जाए तो वो बिल्ली को खदेड़ देगा." यह राय सभी को पसंद आई. चूहे के मुखिया ने आदेश दिया कि कल ही वो उस कुत्ते से जाकर इस संदर्भ में बात करे.
अगली सुबह वो चूहा बिल्ली कि नज़रों से बचते बचाते बगल के गाँव के लिए प्रस्थान किया. उस चूहे ने कुत्ते के सामने अपना प्रस्ताव रखा. कुत्ते ने साफ़ इनकार कर दिया, ये कह कर कि २४ दिसम्बर से उनके फर्स्ट सेमेस्टर कि परीक्षा है और वो अभी भौकने कि प्रक्टिस कर रहा है. चूहे के काफी निवेदन करने के बाद आखिरकार कुत्ता तैयार हो गया.
जैसे ही वो कुत्ता चूहों के गाँव में आया, बिल्ली अपने घर में दुबक गयी. कुत्ते ने बिल्ली के घर के सामने डेरा दाल दिया. अब बाज़ी पलट चुकी थी. बिल्ली का घर से निकलना मुश्किल हो गया और चूहों के पुराने दिन वापस लौट गए. कुत्ते के लिए नाश्ते और खाने का इंतज़ाम चूहे ही करते थे. कुत्ता दिन-रात बिल्ली के घर के बाहर बैठा रहता था. ऐसे में बिल्ली के लिए मुसीबत बढ़ गयी. कुछ दिन तक तो बिल्ली कुत्ते के जाने का इंतज़ार करती रही, लेकिन अब भूख से उनकी हालत पतली होने लगी थी. वो अपने घर से बाहर भी नहीं निकल सकती थी, क्यूंकि बाहर कुत्ता २४ घंटे मुस्तैद रहता था.
तभी बिल्ली के शातिर दिमाग में एक योजना आई. एक कुतिया से उनका अच्छा-ख़ासा परिचय था. बिल्ली ने सोचा कि वो उस कुतिया से बात करेगी और कहेगी कि वह इस कुत्ते को अपने प्यार में फंसा कर यहाँ से दूर ले जाये. बिल्ली ने तत्काल उस कुतिया से संपर्क किया. कुतिया एक झटके में तैयार हो गयी. अगले दिन वो कुतिया उस गाँव में आई और कुत्ते पर डोरे डालने लगी.कुत्ते को पता था कि बिल्ली काफी शातिर दिमाग है. इसलिए कुतिया के प्यार भरे इशारों में उसे साजिश कि बू आ रही थी. उस कुतिया ने अपने स्तर से काफी प्रयास किया, पर कुत्ते के ईमान को डगमगाने में नाकाम रही. बिल्ली कि ये योजना पूरी तरह नाकाम हो गयी. भूख प्यास के मारे उसका और भी बुरा हाल हो गया था. अगर जल्द ही वह कोई वैकल्पिक उपाय नहीं करती तो भूख से वैसे भी मारी जाती. आखिरकार बिल्ली ने तुरुप का इक्का निकाला और कुत्ते से निपटने का पूरा बंदोबस्त कर लिया.
अगली सुबह से वह स्वयं कुत्ते पर प्यार के डोरे डालने लगी. पहले तो कुत्ते ने अपने ऊपर संयम रखा, लेकिन बिल्ली को दूसरी बिरादरी कि लड़की होने का फायदा मिला. एक रात बिल्ली ने खिड़की को खुला छोड़ दिया और निवस्त्र हो गयी. कुत्ते का धैर्य ज़वाब दे गया. उसका ईमान डगमगाने लगा. उस रात दोनों एक-दूसरे के आगोश में आ गये. बिल्ली के पास ये सुनहरा मौका था कुत्ते से छुटकारा पाने का. मौका पाते ही बिल्ली ने चूहे के गले पर वार किया और अगले ही क्षण कुत्ता ढेर हो गया.
चूहे के बुरे दिन फिर से वापस आ गए. बिल्ली का तांडव फिर से अपने चरम पर पहुँच गया. चूहों के पास अब कोई विकल्प भी नहीं था, सिवाय बिल्ली के ज़ुल्म को सहने के और खौफ के साए में जीने के अलावा. चूहों को मार कर खाने का बिल्ली का सिलसिला अनवरत चलता रहा, और फिर एक दिन........
एक दिन चूहे ये देख कर हैरान हो गए कि बिल्ली उसका गाँव छोड़ कर जा रही है. वास्तव में महीनों चूहे का मांस खाने से बिल्ली उब गयी थी. इसलिए बिल्ली यहाँ से दूर जा रही थी. लेकिन बिल्ली ने जाते जाते भी कोई मौका नहीं छोड़ा. वह चूहों को संबोधित करते हुए बोली- "भाइयो! मैंने आप पर बहुत ज़ुल्म किया है. इसलिए अपने पापों का प्रश्चित करने तीर्थ यात्रा पर जा रही हूँ. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना."
प्यारे साथियो! कहानियों के पठन-पाठन की भारतीय परम्परा बेहद पुरानी है. हर कहानी में कुछ न कुछ संदेश छुपा होता है. खासकर जब कोई संदेशपरक कहानी हो तो उसका अर्थ और भी गूढ़ हो जाता है. तो इस कहानी से आपको क्या सन्देश मिला, हमें ज़रूर बताईयेगा, अपने बहुमूल्य टिप्पणियों के जरिये.
शनिवार, 4 दिसंबर 2010
व्यस्तता...
दोस्तों नमस्कार, बहुत समय के बाद आपसे मिल रहा हूँ. क्यूंकि मै भी किसी बड़े आदमी की तरह व्यस्त था. बड़ा आदमी हमेशा व्यस्त रहता है, इसीलिये वाह सफल है. कारण साफ़ है व्यस्तता रहने के कारण या यूँ कहे की व्यस्तता की काली चादर ओढ़ कर मै यानी एक व्यस्त आदमी आप से हमेशा यही कहता हूँ की... कुछ देर में फ़ोन करता हूँ. नहीं तो बाद में बात होगी. लोग जब मुझसे कहते हैं की कुछ लिखो यार तब मै कहता हूँ इतना काम है की यार फुर्सत ही नहीं मिलती. और मन ही मन मै बड़ा आदमी यह सोचता हूँ की मैंने अपना समय फालतू काम और फालतू समाज से बचा लिया. ये फुर्सत न मिलना कितना बड़ा और सटीक बहाना है. खासकर मेरे लिए.. बड़ी-बड़ी बाते हांकना. मेरे लिए बहुत आसान है, क्या हुआ कुछ देर जुबान ही तो खोलना और बंद करना है. व्यस्तता आप और सबके लिए बहुत सही है ख्याल रहे की ये व्यस्तता आपके और हमारे लिए कंही सामाजिक असफलता का कारण न बन जाए.
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं...
शकील "जमशेदपुरी"
![]() |
अपने वजूद को दर्द से सजाए रखते हैं
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं
ये मेरे रात भर रोने की गवाही है
पत्तियों पर शबनम का जो पहरा है
इतनी सी बात कब समझेंगे वो
जख्म दिल का तेरे प्यार से गहरा है
फिर भी तेरी तस्वीर दिल में समाए रखते हैं
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं
रात भर मैंने जो आसमां की निगहबानी की
चांद और तेरे हुस्न की आजमाइश में
और तुम जो जागती रही रात भर
खलल पड़ता रहा सितारों की नुमाइश में
अब तेरी तस्वीर को पलकों में छुपाए रखते हैं
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं
हम समझते थे वो समझती है खामोशी की जुबां
अब उनके समझ की इंतेहा हो गई
चुप रहने को बेहतर समझते रहे "शकील"
तेरी यही खामोशी एक दास्तां हो गई
जागते अरमां को अब सुलाए रखते हैं
दिल जलाते हैं और शम्मा बुझाए रखते हैं
परेशान है लोग वोडाफोन की चोरी से....
वोडाफ़ोन एक नेटवर्क कम्पनी जो लोगो को सस्ते दामो पर सेवाए प्रदान करने का विज्ञापन करती है और हच कम्पनी को खरीद कर भारत आयी है आज लोगो की जेबों पर भरी पड़ रही है, कही यह एक साजिश तो नहीं कुछ हो पर इसका काम करने का अंदाज ईस्ट इंडिया कम्पनी की याद दिलाती है इस कम्पनी ने हमरे देश के गाँव गाँव तक पहुच बना लेने के बाद अब देश की गरीब औए अशिक्षित जनता की जेब पर डाका डालने का काम शुरु कर दिया ।
हमारे देश की बड़ी आबादी जो गाँवो में रहती है वो या तो अशिक्षित या यूँ कह ले की अल्प शिक्षित है खास तौर से तकनीकी संबंधी जानकारी रखने वालो की संख्या तो न के बराबर है वह जनता बेबाकी से इस संचार क्रांती युग में मोबाईल फ़ोन का प्रयोग करती है ऐसे में वोडाफ़ोन कम्पनी ग्राहक की मांग के बिना ही उनके फ़ोन पर विभिन्न तरह की सेवाए शुरू कर देते है और उसके एवज में मासिक किराया उनके बैलेंस से कट लेते है लोग दुखी तो बहुत होते है मेरा पैसा कट लिया गया पर वो इसके बारे में शिकायत कहा करे इसका ज्ञान उनको नहीं और वो संतोष कर के बैठ जाते है की चलो इतना ही कटा फिर कटेगा तब किसी से बात करेंगे और इस बहाने कंपनी को लाखो का फायदा चोरी से हो जाता है, यह क्रम लगातार महीने दर महीने चलता रहता है और लोग परेशां होकर भटकते रहते है , उनके पास एक उपाय है की वो नंबर बदल दे लेकिन समस्या यह है की उनके घर के लोग परदेश कमाने गए होते है और नया नंबर लेने में तमाम तरह की कानूनी औपचारिकताये पूरी करनी पड़ती है जो एक नाजायज खर्च भी है।
इस समस्या के बारे में मै सुनता तो बहुत दिन से था पर भरोसा तब हुआ जब दीपावली की छुट्टी पर मै घर गया मेरे गावों के वोडाफोन उपभोक्ताओ में से ८०% लोग इस समस्या से पीड़ित थे जिनमे से कईयों के लिए मैंने कस्टमर केयर पर फ़ोन करके उनकी सेवाए बंद करवाई और भी प्रबल भरोसा तब हुआ जब बिना मेरी अनुमति लिए यह सुबिधा मेरे फ़ोन पर चालू कर दी गयी, जब मैंने इस बीमारी के बारे में जनसंपर्क स्थापित किया तो लोग इस कंपनी को गालिया देकर कह रहे थे की यह कम्पनी चोर है और बिमारो की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी मेरे घर के सभी लोगो ने अपना सिमकार्ड बदल दिया था कारण पूछा तोबस वही वोडाफ़ोन चोर है ।
समस्या इतनी ही होती तो भी काम चल सकता था पर आगे की कहानी कुछ यूँ है की जब मेरा पैसा कटा गया तो मैंने भी निर्धारित प्रक्रिया की तरह कस्टमर केयर में बात की वहा से पहला जबाब यह आया की की सर अगर आपका पैसा काट लिया गया है तो निश्चित ही आपने इस सेवा के लिए मांग की होगी अर्थात मै झूठा कई तरह से संतुस्ट करने के बाद मुझे कई अंको का एक शिकायत नंबर दिया गया और साथ ही यह बतया गया की आप निश्चिन्त रहे अगर आप का पैसा गलत कटा गया होगा तो ७२ घंटो के अन्दर आप को वापस कर दिया जायेगा । धीरे धीरे ७२ घंटे बीते पैसा वापस नहीं आया मैंने फिर बात की जवाब - सर अगर आपका पैसा वापस नहीं हुआ है तो इसका मतलब आपका पैसा सही कटा गया है और आपने इस सेवा की मांग अवश्य की होगी । इसके बाद सब ख़तम पैसा भी गया झूठे भी बने और अब कुछ नहीं करसकते है सिर्फ एक रास्ता की सिम बदल दू । अब से पहले मैंने अपने आपको इतना कमजोर कभी नहीं समझा था मै लाचर था मेरे पास सब कुछ है सबूत है गवाह है खुद को सही प्रमाणित करने के लिए पर मै कुछ नहीं कर सकता ज्यादा से ज्यादा अपनी भड़ास निकालने के लिए फिर से उस गरीब को गली दे सकता हू जो इस विदेशी चोर कंपनी की गुलामी कर रहा है लेकिन मै जनता हू वह तो मजबूर है ...
पर वह रे हमारी भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनी एयरटेल एक फोन पर पैसा वापस बस इतना बताना पड़ा की बिना मेरी अनुमति के फला नंबर पर यह सुबिधा लगा दी गयी है जिसके एवज में पैसा काट कर मुझे दुविधा में दल दिया गया है मै छठा हू की इस सुबिधा को मेरे फोन से हटा दिया जाये और मेरा पैसा वापस कर दिया जाये -जबाब ओके सर कुछ देर में आपके फोन पर एक सन्देश आएगा और आपका पैसा वापस कर दिया जायेगा और ५ मिनट के अन्दर पैसा वापस ....
इन विदेशियों से निपटने की कोई कारगर योजना सरकार बना नहीं रही या बनाना नहीं चाहती यह तो मै नहीं जनता पर यह जरूर जनता हू की यह सब बड़े पैसे वाले लोग है और कुछ भी खरीद सकते है लोगो की जमीर को भी और तो किया था ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने दूसरी बात थ्री जी स्पेक्ट्रम यह भी बताता है की अब कोई भी बिक सकता है बस कीमत मुफीद हो .......
मै तो बस इतना ही कहूँगा की लोग वोडाफोन की चोरी से परेशान है । बाकी जाने सरकार और जनता........
हमारे देश की बड़ी आबादी जो गाँवो में रहती है वो या तो अशिक्षित या यूँ कह ले की अल्प शिक्षित है खास तौर से तकनीकी संबंधी जानकारी रखने वालो की संख्या तो न के बराबर है वह जनता बेबाकी से इस संचार क्रांती युग में मोबाईल फ़ोन का प्रयोग करती है ऐसे में वोडाफ़ोन कम्पनी ग्राहक की मांग के बिना ही उनके फ़ोन पर विभिन्न तरह की सेवाए शुरू कर देते है और उसके एवज में मासिक किराया उनके बैलेंस से कट लेते है लोग दुखी तो बहुत होते है मेरा पैसा कट लिया गया पर वो इसके बारे में शिकायत कहा करे इसका ज्ञान उनको नहीं और वो संतोष कर के बैठ जाते है की चलो इतना ही कटा फिर कटेगा तब किसी से बात करेंगे और इस बहाने कंपनी को लाखो का फायदा चोरी से हो जाता है, यह क्रम लगातार महीने दर महीने चलता रहता है और लोग परेशां होकर भटकते रहते है , उनके पास एक उपाय है की वो नंबर बदल दे लेकिन समस्या यह है की उनके घर के लोग परदेश कमाने गए होते है और नया नंबर लेने में तमाम तरह की कानूनी औपचारिकताये पूरी करनी पड़ती है जो एक नाजायज खर्च भी है।
इस समस्या के बारे में मै सुनता तो बहुत दिन से था पर भरोसा तब हुआ जब दीपावली की छुट्टी पर मै घर गया मेरे गावों के वोडाफोन उपभोक्ताओ में से ८०% लोग इस समस्या से पीड़ित थे जिनमे से कईयों के लिए मैंने कस्टमर केयर पर फ़ोन करके उनकी सेवाए बंद करवाई और भी प्रबल भरोसा तब हुआ जब बिना मेरी अनुमति लिए यह सुबिधा मेरे फ़ोन पर चालू कर दी गयी, जब मैंने इस बीमारी के बारे में जनसंपर्क स्थापित किया तो लोग इस कंपनी को गालिया देकर कह रहे थे की यह कम्पनी चोर है और बिमारो की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी मेरे घर के सभी लोगो ने अपना सिमकार्ड बदल दिया था कारण पूछा तोबस वही वोडाफ़ोन चोर है ।
समस्या इतनी ही होती तो भी काम चल सकता था पर आगे की कहानी कुछ यूँ है की जब मेरा पैसा कटा गया तो मैंने भी निर्धारित प्रक्रिया की तरह कस्टमर केयर में बात की वहा से पहला जबाब यह आया की की सर अगर आपका पैसा काट लिया गया है तो निश्चित ही आपने इस सेवा के लिए मांग की होगी अर्थात मै झूठा कई तरह से संतुस्ट करने के बाद मुझे कई अंको का एक शिकायत नंबर दिया गया और साथ ही यह बतया गया की आप निश्चिन्त रहे अगर आप का पैसा गलत कटा गया होगा तो ७२ घंटो के अन्दर आप को वापस कर दिया जायेगा । धीरे धीरे ७२ घंटे बीते पैसा वापस नहीं आया मैंने फिर बात की जवाब - सर अगर आपका पैसा वापस नहीं हुआ है तो इसका मतलब आपका पैसा सही कटा गया है और आपने इस सेवा की मांग अवश्य की होगी । इसके बाद सब ख़तम पैसा भी गया झूठे भी बने और अब कुछ नहीं करसकते है सिर्फ एक रास्ता की सिम बदल दू । अब से पहले मैंने अपने आपको इतना कमजोर कभी नहीं समझा था मै लाचर था मेरे पास सब कुछ है सबूत है गवाह है खुद को सही प्रमाणित करने के लिए पर मै कुछ नहीं कर सकता ज्यादा से ज्यादा अपनी भड़ास निकालने के लिए फिर से उस गरीब को गली दे सकता हू जो इस विदेशी चोर कंपनी की गुलामी कर रहा है लेकिन मै जनता हू वह तो मजबूर है ...
पर वह रे हमारी भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनी एयरटेल एक फोन पर पैसा वापस बस इतना बताना पड़ा की बिना मेरी अनुमति के फला नंबर पर यह सुबिधा लगा दी गयी है जिसके एवज में पैसा काट कर मुझे दुविधा में दल दिया गया है मै छठा हू की इस सुबिधा को मेरे फोन से हटा दिया जाये और मेरा पैसा वापस कर दिया जाये -जबाब ओके सर कुछ देर में आपके फोन पर एक सन्देश आएगा और आपका पैसा वापस कर दिया जायेगा और ५ मिनट के अन्दर पैसा वापस ....
इन विदेशियों से निपटने की कोई कारगर योजना सरकार बना नहीं रही या बनाना नहीं चाहती यह तो मै नहीं जनता पर यह जरूर जनता हू की यह सब बड़े पैसे वाले लोग है और कुछ भी खरीद सकते है लोगो की जमीर को भी और तो किया था ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने दूसरी बात थ्री जी स्पेक्ट्रम यह भी बताता है की अब कोई भी बिक सकता है बस कीमत मुफीद हो .......
मै तो बस इतना ही कहूँगा की लोग वोडाफोन की चोरी से परेशान है । बाकी जाने सरकार और जनता........
शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010
....जब से यह करम हुआ.
शकील "जमशेदपुरी"
शकील "जमशेदपुरी"
तस्वीर गूगल के सौजन्य से! |
छत पे तुम जो आ गई तो लोगों पे सितम हुआ
अमावस की रात में भी चांद का भ्रम हुआ
जिंदगी लगी थिरकने दूर रंजो-गम हुआ
मुझपे तेरे प्यार का जब से यह करम हुआ
याद तेरी आ गई और मुझसे यूं लिपट गई
गीत लिखने के लिए हाथ में कलम हुआ
लोग पूछते है मुझसे राज मेरे गीत का
क्या कहूं मैं उनसे कि बेवफा सनम हुआ
मिट सकेगी क्या कभी हीर-रांझे की दास्तां
"शकील" तेरे प्यार का किस्सा क्यों खत्म हुआ?
शनिवार, 27 नवंबर 2010
हर्ष , रजनीश और प्रवीण परमार ......आप लोगो को विहान पत्रिका निकालने के लिए बहुत - बहुत शुभकामना.......
आज जहाँ एक ओर मीडिया में नौकरी की अनिश्चितता दिखाई दे रही है....कोई तरीका नही समझ आ रहा है की आखिर अच्छी नौकरी पाई कैसे जाए....नौकरी पक्की कैसे हो.....हमारे अंदर सब कुछ है....डिग्री ही नही ज्ञान भी .....और जितना अनुभव होना चाहिए उतना अनुभव भी....बावजूद इसके ....कहीं न कहीं कुछ कमी है....भले ही वो सिस्टम की हो या हमारी.....लेकिन कमी है.....अधिकतर लोग दिल्ली से भोपाल....महाराष्ट्र से दिल्ली....मै खुद रीवा से दिल्ली और भोपाल का चक्कर लगाता रहता हूँ.....क्यों, सिर्फ और सिर्फ अपने मन मुताबिक नौकरी के लिए.......
इस बीच माखनलाल विश्वविद्यालय के कैव्स के तीन योद्धा हर्ष-प्रवीन और रजनीश विहान नाम की पत्रिका निकाल रहे हैं..और भी तमाम लोगो का सहयोग है इसमें सभीके बारे में मै ज्यादा नही बता पाउँगा.....लेकिन कैव्स का स्टुडेंट रहने के कारण मेरे लिए यह ....बहुत ही खुसी और गर्व की बात है......मै हर्ष जी के लिए चार पंक्तियाँ कहूँगा.....................गुमनामो की पहचान हो तुम
संघर्ष के दूजा- नाम हो तुम
ऐ हर्ष तुम्हारा क्या कहना
विहान हो तुम-विहान हो तुम ........
जी हाँ अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही इस पत्रिका का नाम विहान रखा है हर्ष भाई ने......एक बात और कह दू की हर्ष जी की तारीफ के साथ-साथ मै .......विहान के प्रबंध सम्पादक रजनीश जी और प्रधान सम्पादक प्रवीण परमार जी को भी बहुत बधाई और धन्यवाद देता हू....इस पत्रिका का सभी को इंतजार है........कोशिश अच्छी है......मात्र दो पंक्तियों के साथ.........
........बाधाओं से डरकर नौका पार नही होती
कोशिश करने वालो की कभी हार नही होती.......
विहान विहान विहान विहान और बार-बार विहान पत्रिका की सफलता के लिए सुभकामना देता हू......चूँकि विहान की टीम मेरे दोस्तों की है इसलिए ....कुछ ज्यादा या गलत लिख दिया हू तो सभी दोस्तों और पाठको से माफ़ी चाहूँगा.....
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
विहान
निष्पक्ष ............
निर्भीक.................
जनपक्षीय सरोकारों की दिशा में .............
एक पहल...................
" विहान "
निष्पक्ष एवम रचनात्मक सोच की पक्षधर पत्रिका .............
कीजिये कुछ इन्तजार..............
जल्द ही आपके हाथो में होगी
" विहान "
निर्भीक.................
जनपक्षीय सरोकारों की दिशा में .............
एक पहल...................
" विहान "
निष्पक्ष एवम रचनात्मक सोच की पक्षधर पत्रिका .............
कीजिये कुछ इन्तजार..............
जल्द ही आपके हाथो में होगी
" विहान "
बुधवार, 24 नवंबर 2010
फ्रस्टेट लालू क्या किया , खैनी दिया बनाय.........
बिहार में नितीश को भारी बहुमत मिला और एन डी ए की सरकार फिर बन गई .....इसमें आस्चर्य जैसी कोई बात नही है.....लेकिन मीडिया को रोज कोई न कोई मसाला चाहिए....मिल गया मसाला.....नीतिस की जीत...एन डी ए की जीत.... विकास की जीत...बात लालू की भी होनी चाहिए.....मै करता हू..........दरअसल लालू कभी नेता थे ही नही......वे तो नेता कम नही बल्कि जोकर हैं..... ऐसी बात नही है की लालू की जरुरत इस देश की जनता को नही है.....है जरुर है...... लालू की बहुत जरूरत है.....गरीब जनता को लालू की बहुत जरूरत है .....लेकिन मुख्यमंत्री और रेलमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए नही बल्कि लाफ्टर शो में जाकर लोगो को हंसाने के लिए...... वैसे भी आज के भाग दौड़ की इस दुनिया में बहुत टेंशन है.....लालू कुछ टेंशन कम करदें यही उनकी तरफ से इस देश की जनता के लिए सच्ची सेवा होगी........रही बात नितीश के जीत की तो एक तो उन्होंने बिहार में कुछ काम किया था.....दूसरी बात मैदान में कोई था भी नही......राहुल गाँधी हर समय युवाओं को बेवकूफ बनाकर वोट बैंक बनाने में कामयाब नही हो सकते.......आगे भारत माता की जय.....
मंगलवार, 16 नवंबर 2010
हुनर हमको भी आता है.....
शकील "जमशेदपुरी"
![]() |
| फोटो गूगल के सौजन्य से! |
फूल में खुशबू है तुझसे, महकता है तेरे खातिर
चिंगारी शोलों में भी है, भड़कता है तेरे खातिर
बेशर्मी चांद की देखो ये तकता है तुझे अब तो
बेशर्मी इस दिल की देखो, धड़कता है तेरे खातिर
चिंगारी शोलों में भी है, भड़कता है तेरे खातिर
बेशर्मी चांद की देखो ये तकता है तुझे अब तो
बेशर्मी इस दिल की देखो, धड़कता है तेरे खातिर
अंधेरा फिर घना छाया जुल्फ तूने जो लहराई
तेरा चेहरा जो देखे तो चांद लेता है अंगड़ाई
बहुत सुनते थे चर्चा फूल, कलियां और शबनम की
तेरा चेहरा जो देखे तो चांद लेता है अंगड़ाई
बहुत सुनते थे चर्चा फूल, कलियां और शबनम की
तुझे देखा तो जाना है कि सब तेरी है परछाई
पल्लू में चेहरा छुपाना भी तेरा यूं मुस्कूराना भी
गजब ढाता है यह मुझपर तेरा पलकें छुकाना भी
मुझे हर एक पन्ने में तेरा चेहरा झलकता है
पढूं कोई कहानी या पढूं कोई फसाना भी
गजब ढाता है यह मुझपर तेरा पलकें छुकाना भी
मुझे हर एक पन्ने में तेरा चेहरा झलकता है
पढूं कोई कहानी या पढूं कोई फसाना भी
प्यार शाजिस है गर तेरी तो इश्क है मेरा पेशा
दिखावा दिल मिलाने का भला यह खेल है कैसा!
दिखावा दिल मिलाने का भला यह खेल है कैसा!
निगाहों में बसाकर फिर निगाहों से गिरा देना
हुनर हमको भी आता है मगर करते नहीं वैसा
हुनर हमको भी आता है मगर करते नहीं वैसा
संघ आतंकवादी क्यों नहीं हो सकता!
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| फोटो गूगल के सौजन्य से. |
आखिर क्या वजह है कि संघ की ओर से ऎसे बेसिर पैर वाले बयान आ रहे हैं। आखिर क्यों उन्हें धरना प्रदर्शन पर बाध्य होना पड़ा। इसका उत्तर एक शब्द में दिया जा सकता है- "बौखलाहट"।
संघ की यह बौखलाहट स्वभाविक भी है। पहले तो गृह मंत्री ने "भगवा" आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया। फिर राहुल गांधी ने संघ की तुलना सिमी से की दी। और अब राजस्थान ATS द्वारा किए जा रहे जांच में नए-नए खुलासे सामने आ रहे हैं। अजमेर, हैदराबाद, मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के तार संघ से जुड़ रहे हैं। अभी हाल ही में संघ के पदाधिकारी इंद्रेश का नाम अजमेर धमाकों से जुड़ा। ऎसे में संघ की बौखलाहट स्वभाविक है। "सच्चे देशभक्त" की छवि दांव पर लगती दिख रही है। हलांकि संघ आतंकी गतिविधियों में अपनी संलिप्तता को कांग्रेस की साजिश करार दे रहा है।
अब मेरी संघ से कोइ जाती दुश्मनी तो है नहीं। मैं मान लेता हूं कि संघ जो कह रहा है वो शत-प्रतिशत सही है। यानी कांग्रेस संघ को बदनाम करने के लिए जांच एजेंसि का दुरुपयोग कर रही है। मुझे यह मानने में भी कोइ आपत्ति नहीं कि संघ परिवार सबसे बड़े देशभक्त और भारतीय सभ्यता एंव संस्कृति के रक्षक हैं। और एक देशभक्त कभी आतंकी गतिविधियों में लिप्त नहीं हो सकता! उन्माद से उनका दूर-दूर तक कोइ सम्बंध नहीं हो सकता! इस तथ्य के मूल्यांकन के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने होंगें।
1920 में पूरा देश गांधी जी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। इस दौरान हिंदू-मुस्लिम संगठित हो गए थे। अंग्रेजी हूकूमत को यह एहसास होने लगा था कि यदि भारत पर अधिक समय तक शासन करना है तो हिंदू-मुस्लम एकता को विघटित करना होगा। इसी दौरान RSS का गठन हुआ। कहा तो यहां तक जाता है कि RSS का गठन अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम के बीच फूट डालने के उद्देश्य से कराया था। यह बहुत हद तक सच भी लगता है जब हम पाते हैं कि 1920 से 1947 तक कोई भी RSS का नेता जेल नहीं गया। 1920 के बाद के राजनीतिक परिदृश्य पर गौर करने पर हम पाते हैं कि अंग्रेजों ने हर तरह से हिंदू-मुस्लिम के बीच मतभेद कायम करने की योजना बनाई। मुस्लिम लीग को दोबारा गांधी से अलग करना इसी योजना का प्रतिफल था। आरएसएस का गठन भी करवाया गया और उन्हें यह जिम्मेदारी भी सौंपी गई कि देश के हिंदू को गांधी से दूर ले जाएं। भीष्म साहनी की पुस्तक "तमस" से पता चलता है कि किस तरह 1947 में बंटवारे से पहले आरएसएस वालों ने एक गरीब आदमी को पैसे देकर मस्जिद में सूर फुंकवाए। साम्प्रदायिकता फैलाने वाले इसी तरह से अपना काम करते हैं। यह बात और है कि बदलते वक्त के साथ उन्होंने नए-नए तरीके ईजाद कर लिए हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के साढ़े पांच महीने के अंदर महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। यह हत्या एक विचारधारा द्वारा की गई थी। वर्तमान में संघ उसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है।
ऐसे एतिहासिक परिपेक्ष्य में यह कहना कितना उचित है कि संघ वाले उन्माद नहीं फैला सकते? वह धमाके नहीं कर सकते? और वह एक सच्चे देशभक्त हैं? जाहिर है संघ की हिमायत की उम्मीद उसी से की जा सकती है जो खुद संघ परिवार से हैं-----एक हिंदूस्तानी से कदापि नहीं। दशहरे के दिन संघ वाले "शस्त्र" पूजा करते हैं जो इस बात का प्रमाण है कि अपनी नीतियों को पूरा करने के लिए हिंसा का सहारा लिया जा सकता है। संघ की नीतियों से हम सभी वाकिफ है। उनकी नीति हिंदूत्व पर आकर समाप्त होती है।
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
राहुल गाँधी जी आप चुप क्यों हैं......
.......आपने कहा था कि आर एस एस और सिम्मी एक जैसे संगठन यानि कि राष्ट्र विरोधी हैं....अब संघ के पूर्व प्रमुख ने कहा कि सोनिया गाँधी ने इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी कि हत्या का साजिस रचा था.....१२ नवम्बर 2010 के भास्कर अख़बार में ये भी लिखा है की सुदरसन जी ने सोनिया गाँधी को अवैध सन्तान कहा था...किसने गलत कहा किसने सही......ये साबित करने का काम मेरा नही है....लेकिन आप से गुजारिस है कि अगर आर एस एस राष्ट्र विरोधी संगठन है तो इस पर प्रतिबंध लगवाइए .....केंद्र में आपकी सरकार है......और अगर ऐसा कराने का साहस नही है तो बे सर पैर कि बात करके अपनी राजनीती चमकाने की आइन्दा कोशिस मत करिए......वर्ना कोई और सुदरसन आपको कुदर्शन करा देगा और आप दूरदर्शन पर देखते रह जाएँगे.....
बुधवार, 10 नवंबर 2010
हिंदुस्तान के अगुआ यानि कि सरदार मनमोहन सिंह जी आप जनता कि भावनाओं का कद्र क्यों नही करते...आपको सिर्फ सोनिया और राहुल जी के इशारे का इंतजार रहता है क्यों....
70 हजार करोड़ रुपया किसानो का कर्ज माफ़ करके केंद्र सरकार आज तक दहाड़ती है......जबकि स्पेक्ट्रम वितरण में केवल 1658 करोड़ रुपया केंद्र को मिला...1, लाख 76 हजार 7 सौ करोड़ रुपया घोटाले में कोई जवाब देने वाला नही है.....क्यों.....गठबंधन कि सरकार क्या इसी तरह चलेगी.....ए राजा को हटाया क्यों नही जा रहा है.....फैसला मनमोहन सिंह को करना चाहिए ....लेकिन करूणानिधि पर फैसला छोड़ा जा रहा है.......जबकि जयललिता ने कहा है कि राजा को हटाओ मै बिना शर्त समर्थन देने को तैयार हू.....साहस दिखाने का वक्त है.....मनमोहन सिंह जी ये देश का अबतक का सबसे बड़ा घोटाला है.....क्या आप हिंदुस्तान के सबसे बड़े अर्थशास्त्री के राज में सबसे बड़ा घोटाला कराने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं..........कुर्सी का मोह छोड़ दीजिये ...खुलकर फैसला लीजिये.......हिंदुस्तान कि विशाल आम जनता का लाभ लेने अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा तक आ पहुंचे....लेकिन हिंदुस्तान के अगुआ यानि कि सरदार मनमोहन सिंह जी आप जनता कि भावनाओं का कद्र क्यों नही करते...आपको सिर्फ सोनिया और राहुल जी के इशारे का इंतजार रहता है क्यों.........ए राजा को हटाओ--देश बचाओ, पाई--पाई वसूलकर एक बार फिरसे किसानो के हित में कुछ कमाल कर दिखाइए.....
रविवार, 7 नवंबर 2010
शनिवार, 6 नवंबर 2010
माफ़ कीजियेगा पत्रकार किसीको नही चाहिए...
वर चाहिए---वधु चाहिए .....डाक्टर चाहिए
इंजीनियर चाहिए
प्राइमरी स्कूल का सरकारी मास्टर भी चलेगा
सेना का जवान तो दौड़ेगा
पुलिस या रेलवे में तो क्लर्क क्या चपरासी भी चल सकता है.................................................लेकिन लेडिज एंड जेंटल मैन, माफ़ कीजियेगा पत्रकार किसीको नही चाहिए..........................
क्यूँ नही चाहिए ......इसका कारण ये है की पत्रकारों की स्थिति अब वो नही रही जो पहले कभी हुआ करती थी........गली-गली जर्नलिज्म के फैक्ट्री खुलते जा रहे हैं...और मीडिया के लिए सस्ते दर पे मजदूर आसानी से मिल जा रहे हैं........खैर कुछ लोग जो इत्तेफाक से सेटल हो चुके हैं......वो इंकार कर देंगे.....वो कहेंगा.....म्य्लोर्ड ये सब बकवास है लेकिन आपको यकीं दिलाने के लिए कि मेरी बात सही है ये कहानी काफी है........................................एक समाचार पत्र के सम्पादक महोदय हैं.....उनके दो लड़के हैं....एक है पत्रकार....बोले तो नई दुनिया में रिपोर्टर है....जबकि दूसरा जो कि उनका छोटा बेटा है ......प्राइमरी स्कूल में मास्टर है.....बोले तो उसने बीए के बाद बीएड किया था......अब सम्पादक जी परेसान हैं कि उनके छोटे बेटे के लिए लड़की वाले आ रहे हैं ...कोई दस लाख तो कोई पन्द्रह लाख देने को तैयार है.....सम्पादक जी बहुत दुखी हैं क्योंकि पहले वो अपने बड़े बेटे कि शादी करना चाह रहे हैं ......उनकी समस्या ये नही है कि बड़े लडके के लिए कोई नही आ रहा है.....बल्कि मुख्य समस्या ये है कि 2 .5 -3 लाख से ज्यादा कोई दे नही रहा है .....जबकि लड़का जागरण मीडिया इंस्टिट्यूट नॉएडा से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट है ..........आगे आप समझ सकते हैं.....कि पत्रकारों को आम लोग इज्जत तो देते हैं....लेकिन समझते हैं कि झोला लेकर घूमेगा......खैर कहानी यहीं ख़त्म करता हू....और ये कहानी बुझदिलों को डरा सकती है ......हम जैसे लोग तो सोच समझ कर आये हैं....खासकर माखनलाल यूनवर्सिटी के लोग तो बिंदास होकर पत्रकारिता कर रहे हैं....और आगे भी करेंगे........आपको ऐसा लग रहा होगा कि बात को कहाँ से सुरु किया था और कहाँ ख़त्म कर रहा हूँ........लेकिन ..........फिर से ये बताना चाहूँगा कि मेरे परिचय के वो सम्पादक जी गाँव क्षेत्र से बिलोंग करते हैं......और गाँव में इन सरकारी मास्टर आदि को बहुत इज्जत मिलती है.....जबकि .......पत्रकार को जुझारू प्राणी समझा जाता है जो कि वो है.......आगे मै अपनी बात को ख़त्म नही कर पा रहा हू.....सब कुछ के बाद माफ़ कीजियेगा ......मै पत्रकारिता में आकर फिलहाल खुस हू.....उम्मीद है कि आप अगर पत्रकार हैं या पत्रकारिता कि पढाई कर रहे हैं तो आप भी इस पेशे से हमेशा खुस रहेंगे............खुदा हाफिज.....
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