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शनिवार, 11 मई 2013

मरने के बाद भी मुझे नहीं बख्शा

मैं क्या हूं ये जानने से पहले बताना चाहूंगा कि यहीं भारत के पंजाब के एक छोटे से गांव भिखीविंड में मेरा जन्म हुआ था। मेरी पहचान के तौर पर, पाकिस्तान मुझे आतंकी के रूप में जानता है और पूरी दुनिया इस पहचान के साथ-साथ भारत का जासूस मानती है। लेकिन मैं एक किसान था। हां ऐसा कथित तौर पर यह भी सुनने में आया कि मैं एक शराब तस्कर भी था। वर्ष 1990, उस दौरान लाहौर और फैसलाबाद में दो सिलसिलेवार धमाके हुए। चौदह लोगों के मरने की पुष्टि हुई। चुंकि बम हादसा बड़ा था तो धमाके के जिम्मेदारों को भी खोजने की पड़ताल भी जोरों पर थी। करीब तीन महीने बाद 30 अगस्त 1990 को मुझे कौसर सीमा पर गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद मुझसे गहन पूछताछ होना लाजमा था। कारण, एक तो दहशत के खौफजदा माहौल में मैं पकड़ा गया ऊपर से भारतीय नागरिक भी ठहरा। मेरे पाकिस्तान में मौजूदगी की वजह पूछी गई। रास्ता भटक गया था मैंने बताया लेकिन मेरी बात पर उन्हें भरोसा कहां होता। मैं कब कैसे किन परिस्थितियों में पाकिस्तान पहुंचा इस पर दिमाग खपाना अब किस काम का क्योंकि अब यह सचाई तो मेरी मौत के साथ ही मिट्टी में मिल गई। कागजों पर अब मैं हमेशा एक आतंकी और भारतीय जासूस के तौर पर ही जाना जाऊंगा...लेकिन भारत को छोड़कर।
मुझे दुख नहीं कि पाकिस्तान ने मुझे सजा-ए-मौत दी। कोई भी देश होता तो 14 मासूम लोगों की हत्या के जुर्म में यही सजा सुनाता जो मुझे सुनाई गई। भारत में भी तो यही सजा सुनाई गई... अफजल और कसाब को। बस दुख है तो इस बात का कि मेरे सरीखे पाकिस्तन की जेलों में बंद भारतीय कैदियों के साथ बर्बर व्यवहार की घटनाएं जब-कब जगजाहिर होती रहती थीं फिर न तो भारत कुछ कर पाया और न ही मानवाधिकार की वह वैश्विक संस्था ही कुछ नहीं कर पाई जो गाहे-बगाहे किसी न किसी देश को अपनी रिपोर्ट सौंप नसीहत देती रहती है।
बंटवारे के बाद से चली आ रही दो देशों के बीच रंजिश के बीच एक आम नागरिक फंस गया, राष्ट्रों की कूटनीति के तहत एक आम नागरिक जासूस बना दिया गया... मुझे मेरे साथ ऐसा होने का अफसोस नहीं है। मुझे इस बात का भी दुख नहीं है कि  पाक जेल की चार दीवारी में मेरे शरीर के हर एक अंग को चोटें पहुंचाई गईं। चीख और दर्द के साथ मैंने अपने जीवने के आखिरी 22 साल बिताए। मुझे दुख नहीं है। मुझे दुख है कि मेरे नाम पर देश के पक्ष-विपक्ष ने जमकर राजनीति खेली। और पाकिस्तान के साथ किए जा रहे हर मजाक को हर बार बस सामान्य की तरह हमारा देश झेलता रहा। दुख है कि एक आस लिए मैंने भारत सरकार को कई बार अपने दर्द का बयान किया, जान का खतरा है ऐसा कई बार बताया। ऐसा मैं अकेला कैदी नहीं था हमारे वतन के कई और भी इसी पीड़ा से जूझ रहे थे फिर भी सरकार उदासीन बनी रही।
बस खुशी है तो इस बात कि मेरी बहन ने मेरे लिए अपना परिवार छोड़ा। मेरे बच्चों को गोद लिया। अकेले उसने मुझे वतन वापस लाने की मुहिम शुरू की। लेकिन दुख है कि देश के ही बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों ने उसके इस भातृ प्रेम को भी स्वार्थ बता डाला। अपनी लेखनी चलाकर लोगों ने लिख डाला कि मेरी रिहाई के मुद्दे को मेरी बहन भुनाकर अपना नाम कर रही है।... लेखक कुछ भी नहीं लिखते लेकिन क्या है कि अब लोकतंत्र का हवाला देकर कुछ भी लिखने वाले अब लेखक बन गए हैं।
...एक बाप के साए में उसके बच्चे बड़े होते हैं लेकिन मेरी दोनों बच्चियां मेरी तस्वीर देख के बड़ी हुईं। और मैंने अपने 22 साल सिर्फ उनकी प्यारी सी मुस्कान और किल्लारियों के सहारे काट दिए। मुझे मेरी बहन के हौसले से एक बारी लगने लगा था कि दम तोड़ने से पहले अपनी बच्चियों को सीने से लगा सकूंगा लेकिन मेरे सपनों से कहीं ज्यादा हकीकत मुझे दर्द दे रही थी। उनकी मार से अक्सर जान हलक तक आकर अटक जाती थी। लेकिन कम्बख्त मौत भी मेरे साथ खिलावड़ कर रही थी।
मैं पाकिस्तान की नजर में एक गुनहगार था। वहां भी मेरे मौत को लेकर राजनीति की गई। ऐसा सुनने में आया था कि पीपीपी की स्थिति डावांडोल चल रही थी। उनके पास सत्ता में वापस आने का एक ही मुद्दा बचा था। जनता की भावनाओं को वोट में बदलने का। सो...मेरी हत्या का ताना बाना बुन डाला गया।
हम भारतीयों की आत्मा इतनी भी दूषित नहीं कि यूं ही किसी को काट लें। मेरी पाक की उस जेल में सभी से दुआ-सलामा होती थी। मैं इस मामले में तो पाक था, मुझे लगा कि पाक में भी सभी मेरी तरह पाक हैं लेकिन कब जेल में मेरे ऊपर हमला हुआ कब मैं मौत के आगोश में सो गया कुछ पता ही नहीं चला।
गजब की बात है मेरे जीते जी किसी ने न तो मेरी सुध ली न ही मेरी परिवार की। और मेरे मरते ही राहुल और बादल मुझे कंधा देने पहुंच गए। केंद्र से 25 और प्रदेश से 1 करोड़ की राशि और मेरी बेटियों को सरकारी नौकरी। गजब की फुर्ती और दरिया दिली दिखाई दोनों ने। लेकिन मुझे कोई हक नहीं कि मैं ऐसा कुछ मदद के लिए बढ़े हाथों के लिए कुछ बोल सकूं। बड़ी बात ये है कि मेरे मरने के बाद सही लेकिन किसी ने तो मेरी चिंता दूर की। इसलिए मुझे भी लगता है कि कांग्रेस की प्रदेश और केंद्र की लोकसभा चुनाव की चिंता पंजाब राज्य से कुछ हद तक से तो कम हो ही जाएगी।
वैसे मजे की बात यह है कि अपने यहां मुर्दे पर भी जुबानी जंग सुनने वाली होती है। अपनी ही बात करूं तो ज्यादा बेहतर होगा। मेरे परिवार ने मुझे शहीद का दर्जा दिए जाने की मांग सरकार से की थी साथ ही राजकीय सम्मान के साथ मुझे अंतिम विदाई देने की मांग की थी। मुझे भारत में आए एक दिन भी नहीं बीता था कि लोकतंत्र का मजा ले रहे एक लेखक ने मुझे शहीद कहे जाने और मुझे राजकीय सम्मान के साथ जलाए जाने पर प्रश्न खड़ा कर इस अनुचित बता डाला।
वैसे मेरे लिए अब इन सब बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। बस ये बताने की कोशिश कर रहा था कि इस स्वार्थ भरी दुनिया में वेदनाओं और रिश्तों की कोई कीमत नहीं। हर कोई आज बस उन्हें अपने स्वार्थ के लिए भुनाने में लगा हुआ है और जो सच में इनका सम्मान करते हैं उन्हें भी मोहरा बना इस्तेमाल कर लिया जाता है।  लो एक और नया वाकया सामने आया अभी हाल ही में मुझे भारतीय खूफिया एजेंसी रॉ के पूर्व अधिकारी ने सार्वजनिक घोषित कर दिया कि मैं रॉ का एजेंट था। देखता हूं अब मेरी मौत पर आगे क्या गुल खिलाया जाएगा। वैसे मैं सरबजीत हूं...सरबजीत सिंह...

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

चौहान के लिए मुसीबत बन सकते हैं उमा-झा

दबाव, विवशता और समझौतों के बीच आखिरकार राजनाथ सिंह ने भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी टीम की घोषणा कर ही दी। टीम से कई को अपेक्षाएं थीं। सहज है, जोड़-तोड़ की गणित में कुछ की व्यवस्था हो गई तो मुंह तकते रहे गए। लम्बे समय से पार्टी में चल रहे शीत युद्ध के चलते इस टीम में जहां गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने खास लोगों को टीम का सदस्य बनवाकर अपना सिक्का बरकरार रखा। देखने वाली बात यह है कि टीम में पार्टी के उन वरिष्ठ नेताओं को जगह नहीं दी गई जिन्होंने जब-तब पार्टी के फैसलों के विरोध में मुंह खोले थे, लेकिन कुछ ऐसे लोगों को नजरअंदाजकर दिया गया जिनकी टीम राजनाथ में शामिल होने की प्रबल संभावनाएं थीं, इनमें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शामिल हैं। टीम गठन के बाद उनके चेहरे पर शिकन दिखने लगी। जाहिर है यह शिकन पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और प्रभात झा के कारण है, जिन्हें राजनाथ ने उपाध्यक्ष बनाया है।
राजनीति में यही विशेषता है कि  कब कौन किस पर भारी पड़ जाए कहा नहीं जा सकता। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने जब हुबली तिरंगा कांड को लेकर इस्तीफा दिया और बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी तब उन्हें अभास भी नहीं हुआ होगा कि बाबूलाल गौर उनकी वापसी पर कुर्सी से नहीं उठेंगे। इसके बाद जब शिवराज सिंह चौहान ने आनन-फानन में मध्यप्रदेश सरकार की बागडोर संभाली तब भी उमा भारती को यह अहसास नहीं होगा कि उनके मार्ग दर्शन में काम करके नेता बने शिवराज सिंह चौहान उनके प्रदेश वापसी की राह में रोड़े अटकाएंगे। और तो और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा को तो अंतिम क्षणों तक यह विश्वास नहीं था कि उनकी अध्यक्ष की कुर्सी छीनी जा चुकी है और मुख्यमंत्री की यह पता ही नहीं है। जाहिर है अब वक्त बदल गया है। संघ और भाजपा के केंद्रीय पदाधिकारियों की प्रशंसा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले खड़े दिख रहे शिवराज सिंह चौहान राजनाथ  की एक ही चाल से पीछे धकेल दिए गए और उमा भारती व प्रभात झा को भले ही संगठन में उनके मनमुताबिक पद न मिला हो, लेकिन उपाध्यक्ष रहते हुए वे शिवराज की राह में कई रोड़े डाल सकते हैं। चंद महीनों बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा विधानसभा चुनावों में जाने वाली है। जाहिर है प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के दावेदार शिवराज ही होंगे, लेकिन संगठन के अंदरूनी हलकों में यह चर्चा है कि प्रभात झा और उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान की राह में रोड़े अटका सकते हैं। संभव है कि प्रदेश में शिवराज का कद देखते हुए वे कामयाब न हों, लेकिन यदि इन नेताओं ने आपत्ति दर्ज कराई तो भाजपा की किरकिरी होना तय है।
राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो ठीक ऐसी ही शक्ति नितिन गडकरी के पास होगी। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम को कमजोरी करने या नाम पर मुहर लगाने के लिए। नितिन गडकरी को नरेंद्र मोदी ने कई मोकों पर झुकने के लिए मजबूर किया है। जिस कार्यकारिणी की बैठक में गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाए जाने के लिए पार्टी के संविधान में परिवर्तन होना था मोदी ने ऐन वक्त पर उसमें आने से इंकार कर दिया था। और शर्त रखी थी कि संजय जोशी को पार्टी से निकाल दिया जाए। मन मारकर गडकरी को मोदी की बात माननी पड़ी थी और संजय जोशी को पार्टी से बाहर निकालना पड़ा। इसके बाद जब गडकारी पर पूर्ति में गड़बड़ी के आरोप लगे तब मोदी ने गडकरी को गुजरात में प्रचार करने आने से रोक दिया था। एक तरह से यह पार्टी अध्यक्ष अपमान था, लेकिन मजबूरी में गडकरी को इस अपमान का कड़बा घूट पीना पड़ा। अब गडकरी संसदीय बोर्ड में हैं। यह ठीक है कि फिलहाल पार्टी में नरेंद्र मोदी की तूती बोल रही है, लेकिन संघ उन्हें आज भी संदेह की नजरों से देख रहा है। मोदी की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए संघ गडकरी का बखूबी इस्तेमाल कर सकता है। गडकरी भी अपने अपमानों का बदला लेने से परहेज नहीं करेंगे। हो सकता है कि भविष्य में मोदी के करीबी अमित शाह ही मोदी के गले की हड्डी बन जाएं। शाह पर शोहराबुद्दीन के फर्जी मुठभेड़ के अलावा कई संगीन आरोप हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जिन्हें गुजरात से तड़ीपार किया था। यदि चुनाव के समय तक शाह के खिलाफ कोई कानूनी पेंच फंसता है तो उसकी आंच मोदी पर जरूर आएगी। इसके अलावा भी टीम राजनाथ में ऐसे अनेक चेहरे हैं जो एक दूसरे पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए लड़ते हुए दिखाई दे सकते हैं। इनमें लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हैं। चूंकि पार्टी में प्रधानमंत्री पद का  उम्मीदवार कौन होगा इसे लेकर अभी तक अंतरद्वंद की स्थिति है। अभी तक किसी भी नेता को इस दौड़ से बाहर नहीं माना जा रहा है, लिहाजा वक्त के साथ टकराव बढऩे के आसार है। मुलायम सिंह ने पिछले दिनों जिस तरह से लालकृष्ण आडवाणी की तारीफ की और जदयू ने जिस तरह मोदी का विरोध किया इससे आडवाणी का पलड़ा भारी हो सकता है। कार्यकर्ताओं की भीड़ भले ही मोदी-मोदी के नारे लगाए, लेकिन गठबंधन की राजनीति में नंबर पूरे करने के लिए क्षेत्रीय दलों की सहायता जरूरी होती है और उनकी इच्छाओं को नजरअंदाज नहीं कि या जा सकता।

शनिवार, 30 मार्च 2013

...ये हैं शिवराज सिंह की ख़ुशी के मायने !


बड़े बुजुर्ग कह गए हैं की द्विअर्थी वाणी और चरित्र वाले मित्र से एक दुश्मन अच्छा है। पिछले 9 साल के शासनकाल में भाजपा की का कथनी और करनी में अंतर बताने वाले जितने तथ्य सामने आए हैं, वे संभवत: यही इशारा करते हैं। महिलाओं, किसानों और गरीबों  को लेकर खासी आत्मीयता दिखाने वाले प्रदेश  की भाजपा सरकार की  हकीकत  इसके कदम उलट है। यह आरोप यदि विपक्ष  के नेता लगाते तो शायद इसे राजनीति से प्रेरित  करार दिया जाता, लेकिन इस वास्तविकता से पर्दा उठाने वालों में सरकार के मंत्री और भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस शामिल है। पिछले दिनों आरएसएस के एक पदाधिकारी साफ कहा की संघ सरकार से खुश नहीं है। इससे पहले भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता ने तो मुख्यमंत्री को घोषणावीर की ही उपाधि दे डाली थी। हालांकि उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा।
सर्कार के पिछले 9 साल के कार्यकाल पर नजर डालें तो वादे जितने सकारात्मक हुए हैं, परिणाम उतने ही नकारात्मक सामने आए हैं। इसका खुलासा खुद सरकार ने विधानसभा में किया है। सरकार महिलाओं  की खासी हितैषी बनती है, लाड़ली लक्ष्मी, कन्यादान और बेटी बचाओ आंदोलन जैसे कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपए खर्च किये जाते हैं, लेकिन यही सरकार बच्चियों के अपहरण और बलात्कार रोकने में नाकाम साबित हुई है। गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने खुद विधानसभा में स्वीकार किया कि सरकार पांच हजार बच्चियों का पता नहीं लगा सकी।  इनमें से कुछ मानव तश्करी के मामले हैं। बलात्कार के मामलों में मध्यप्रदेश वर्षों से नबंर वन का ताज पहने हुए है। हाल ही में दतिया में विदेशी महिला से हुए गैंगरेप का जब विरोध किया गया तो सरकर ने इसे स्वार्थ  की राजनीति  करार दिया। हालांकि भाजपा जब विरोध में थी, तब विरोध स्वरूप रेप पीड़ित महिला को सार्वजनिक सभा में लाने पर भी नहीं हिचकी थी।
खैर! भाजपा की कथनी  और करनी का अंतर यहीं खत्म नहीं होता। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जबसे मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली है, उनका एक ही ध्येय रहा है किसानी को लाभ का धंधा बनाना। लेकिन इसकी वास्तविकता भी वादे के एकदम उलट है। कर्ज में डूबे किसानों के लिए सरकार जगह-जगह मदद की घोषणा करती है लेकिन जब वक्त आता है तो मदद उद्योगपतियों की, की जाती है। प्रदेश में किसानों पर सबसे ज्यादा बिजली चोरी के केस हैं। यह आरोप नहीं है बल्कि सरकार की स्वीकारोक्ति है। ऊर्जा मंत्री ऊर्जा मंत्री राजेन्द्र शुक्ल विधानसभा में बताया था किए जनवरी 2009 से जनवरी 2011 तक उपभोक्ताओं पर  कुल 2 लाख 13605 बिजली चोरी के प्रकरण बनाए गए हैं। बिजली चोरी के कुल प्रकरण में 17429 गिरफ्तारी वारंट जारी किये गए। इस समयावधि में  किसानों के खिलाफ बिजली चोरी के सर्वाधिक 1 लाख 2994 प्रकरण दर्ज किये गए, जबकि घरेलू उपभोक्ताओं के खिलाफ 61976, व्यावसायिक 9796 और उद्योगों के खिलाफ 38839 प्रकरण दर्ज हुए। यानी किसानों  को चुन-चुनकर पकड़ा गया और उद्योगपतियों को नजरअंदाज ·किया गया।
इसके अलावा आम आदमी के लिए आशियाने की चिंता कर रही सरकार वास्तव में आम आदमी को जमीन से दूर करती जा रही है और उद्योगपतियों, बिल्डरों को खासा लाभ दे रही है। पिछले कुछ वर्षों में भोपाल में जमीन के सरकारी दाम लगातार बढ़ाए जा रहे हैं। यह नियमानुसार होते तब भी गलीमत थी, कलेक्टर गाईड लाइन में कई गुना तक दाम बढ़ा दिए जाते हैं। संदेह है कि उद्योगपतियों और बिल्डरों को लाभ पहुंचाने  की यह सुनियोजित चाल है। सत्ताधारी दल के विधायक धु्रवनारायण सिंह शहर में भू-माफियाओं की बढ़ती गतिविधियों का मामला उठा चुके हैं। दरअसल शहर में निजी बिल्डर तेजी से निर्माण कार्य में लगे हुए हैं। शहर के आसपास की जमीन बड़े पैमाने में खरीदी जा रही है। बिल्डर जो जमीन खरीदता है, सरकर की  मेहरबानी से अगले साल उस जमीन के दाम दो-तीन गुना हो जाते हैं। इसका सीधा लाभ बिल्डर को मिलता है और आम आदमी को कई गुना ज्यादा कीमत अपने आशियाने के लिए चुकानी पड़ती है। एक और बड़ा संदेह है, जिस पर आम आदमी का अभी तक ध्यान ही नहीं गया है। पिछले दिनों कैबिनेट की बैठक में एक फैसला किया गया था कि उद्योगपति आवंटित सरकारी जमीन को गिरवी रखकर कर्ज ले सकते हैं। यह बेहद खतरनाक फैसला है। अव्वल तो उद्योगपति जमीन गिरवी रखकर कर्ज ले लेगा, और बढ़ी हुई जमीन की कीमत पर उसे और अधिक कर्ज मिल जाएगा, लेकिन आवंटित जमीन को गिरवी लेकर कर्ज लेने से तो प्रदेश की वह पूरी भूमि ही बंधक हो जाएगी जो उद्योगपतियों को दी गई है। यदि उद्योगपति अपना व्यवसाय विकसित नहीं करता है और कर्ज नहीं चुका पाता है तो सरकार के पास प्रदेश में उस उद्योगपति का ऐसा क्या है जिससे वह उद्योगपति से कर्ज वसूल सके? वैसे भी यह जिम्मेदारी फिर बैंकों के कन्धों पर आ जाएगी। खुद को विकास पुरुष और प्रदेश को औद्योगिक क्षेत्र प्रचारित करने की गरज से सरकार जो फैसले ले रही है वह अंतत: प्रदेश के लिए दुखदायी ही साबित होंगे।

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

कोर्ट के आदेश से मध्यप्रदेश में चुनावी पेंच हुए ढीले


कहते हैं कि राजनीति में किसी भी चीज को तुच्छ नहीं समझा जाता। एक छोटा सा कारण राजनैतिक पार्टी को सत्ता भी दिला सकता है और सत्ता से बेदखल भी कर सकता है। कुछ ऐसी ही परिस्थितियां मध्यप्रदेश सरकार के सामने बन रही हैं।
हाल ही हाईकोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाया है। फैसले के तहत 40 एकड़ जमीन में बसे लोगों के अवैध आशियानों को हटाया जाएगा। 23 साल बाद आए इस फैसले से 3 हजार परिवारों में रह रही करीब 24 हजार की आबादी संकट में आ गई है। वैसे नोटिस में यह भी कहा गया है कि जो परिवार बोर्ड को किराएदारी देते हैं उन्हें बेघर नहीं किया जाएगा लेकिन बोर्ड के कागजात बताते हैं कि आरिफ नगर में रह रहे कुछ चुनिंदा लोगों की ही बोर्ड से किराएदारी है बाकी सब अवैध रूप से रह रहे हैं।
दरअसल मामला आरिफ नगर का है। गैस त्रासदी के बाद सन् 1988 में मुसलिम समुदाय के लोगों के लिए यह बस्ती बसाई गई थी। उस समय कांग्रेस के नेता आरिफ अकील ने उन पीडि़तों को बसाने के लिए 40 एकड़ की जमीन दी थी। जिसके बाद से उस बस्ती का नाम नेता आरिफ के नाम पर पड़ गया। आरिफ पिछले चार बार के कांग्रेस से विधायक और मंत्री भी रह चुके हैं।
मामले ने उस समय तूल पकड़ा जब वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि उक्त जमीन उसकी है। जिसके बाद बोर्ड ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट द्वारा हाल ही में 1995 की धारा 54 के तहत अतिक्रमण हटाने का नोटिस इसी मामले पर निर्णय स्वरूप दिया था।
वर्तमान में बोर्ड का अध्यक्ष गुफरान-ए-आजम है। ये भी कांग्रेस के ही नेता हैं, लेकिन भाजपा सरकार ने इन्हें सर्वसम्मति से बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया। हालांकि अध्यक्ष पद धारण करने के बाद से ही यह अटकलें लगाई जाने लगीं थीं कि शायद गुफरान पार्टी बदल लेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वैसे तो आरिफ और गुफरान एक ही पार्टी के नेता हैं लेकिन दोनों विरोधी गुटों में शामिल हैं। कोर्ट के इस नोटिस ने दोनों के बीच आग में घी डालने जैसा काम किया है। आरिफ का हजारों का मुस्लिम वोट बैंक खतरे में आ गया है। हमेशा से आरिफ की जीत का सबब बनते आए ये मुस्लिम परिवार आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी नियति के आधार पर इनका भविष्य निर्धारित करेंगे। अगर इन लोगों को आरिफ नगर से हटा दिया जाता है तो आरिफ के लिए अगले साल सत्ता का सुख भोगना मुश्किल हो सकता है। बहरहाल आरिफ वर्तमान में मुम्बई में अपना इलाज करा रहे हैं।
उधर गुफरान के सामने ये समस्या आ खड़ी हुई है कि अगर वे इन लोगों को हटा देते हैं तो जो बचा कुचा मुस्लिम वोट इन्हें मिलता था वो भी आरिफ के नाम हो जाएगा और अगर नहीं हटाते हैं तो वो 3 हजार परिवार आरिफ के हैं ही। इतना ही नहीं इस मामले में प्रदेश शासित सरकार जो कि पिछले पांच सालों से इस मामले से बचने की कोशिश कर रही है। अंत में न चाहते हुए भी उसे टांग अड़ानी पड़ेगी। इस समय भाजपा सरकार विस चुनाव आने के चलते अपने हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है। ऐसे में कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार प्रशासन के साथ मिलकर अवैध अतिक्रमण हटाने में बोर्ड की मदद करे। सरकार उहापोह की स्थिति में है। अगर वह अतिक्रमण हटाने में साथ नहीं देती है तो कोर्ट के आदेश की अवमानना होगी और यदि साथ देती है तो वह 20 हजार लोगों से दुश्मनी मोल लेती है। अब देखना यह है कि कोर्ट के नोटिस से बने इस चक्रव्यूह की राजनीति में ये राजनेता कैसे उभरते हैं?

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

खारे पानी के पीछे कूटनीति करता चीन



अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषकों ने व्दितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसा कई बार ऐलान किया कि अगर तीसरे विश्व युद्ध की सम्भावनाएं जन्म लेती हैं तो उसके पीछे एक मात्र कारण होगा, पानी। एशिया महाव्दीप में फैली अशान्ति के पीछे कुछ यही कारण सामने आ रहे हैं। वैसे तो पशिचम के देश साम्राज्य के विस्तार की नीति तो कब का भूल चुके हैं लेकिन दिन ब दिन अपने ताकत का विस्तार करने वाला एशिया का एकमात्र शक्तिशाली देश चीन अपनी जमीन विस्तार की नीति को हर दम पर सफल करने में जुटा हुआ है। यही नहीं अब तो इसकी विस्तार नीति में जमीन के साथ-साथ पानी भी शामिल हो गया है। हालांकि हमेशा की तरह उसकी हर विस्तारवाद की नीति विवादों-चर्चाओं में बनी रहती है।

पिछले वर्ष से चीन व्दारा एक नये मुद्दे को तूल दिया गया जब भारत ने दक्षिण चीन सागर में कच्चा तेल निकालने का कार्यक्रम शुरू किया। वैसे अगर देखा जाए तो ये विवाद पुराना है लेकिन इस क्षेत्र में काम शुरु होने से चीन को अपना वर्चस्व खोता दिखा जिसके बाद से ही उसने नाना प्रकार से इस क्षेत्र को अपने प्रभाव में लाने के लिए प्रयास शुरु कर दिए।

चीन व्दारा भारत के काम पर प्रतिबन्ध लगाने की चेतावनी व तल्ख अन्दाज में धमकी देने के बाद से दोनों देशों के बीच माहौल कुछ गरम तो जरुर हुआ था लेकिन भारत की विदेशनीति ने उस माहौल को ज्यादा देर गरम नहीं रहने दिया। चीन का दक्षिण चीन सागर में अपना एकाधिकार जताना विवादों को न्योता देना जैसा ही है। इसी मसले पर जापान, फिलीपीन्स, विएतनाम, मलेशिया से उसने दक्षिण चीन सागर पर अपना एकाधिकार कर के चलते दुश्मनी मोल ले ली। एक तरफ जहां जापान ने विवादित सेनकाकू टापू को खरीदने की घोषणा कर दी है। वहीं चीन भी इस टापू पर अपने अधिकार की बात दोहरा रहा है। जापान अगर टापू को लेकर अपनी मंशा नहीं खतम करता है तो चीन घोषणा कर चुका है कि जापान को भविष्य में इसके बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। जापान अमेरिका की बीच रक्षा संधि है जिसके चलते अमेरिका का चीन की ऐसी प्रतिक्रया पर सामने आना निश्चित हो गया। यही कारण है कि विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन चीन गयी थीं लेकिन राष्ट्रपति जिनपिंग ने मिलने से मना कर दिया था। हालांकि उसके बाद से चीन ने अपने रिश्तों को सुधारने के लिए व्यापार का सहारा लिया लेकिन चीन को यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका को कूटनीतिज्ञों का बादशाह कहा जाता है।

हाल ही में चीन के रक्षामंत्री जनरल लियांग गुआंगली आतकंवादल को रेकने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास का प्रस्ताव लेकर भारत दौरे पर आए थे। मालूम हो कि प्रणब मुर्खजी रक्षामंत्री के रुप में 6 साल पहले चीन की यात्रा पर गए थे और सैन्य शिष्टाचार के तहत चीन के रक्षामंत्री को भारत यात्रा पर आना था लेकिन बार-बार भारत व्दारा याद दिलाने के बावजूद भी चीन भारत नहीं आया। ऐसे में अचानक चीन के रक्षामंत्री का भारत दौरा पर आना कई प्रश्न खड़े करता है।

मुलाकात के दौरान चीनी रक्षामंत्री ने क्यों किसी भी उस मुद्दे पर चर्चा नहीं की जो भारत के साथ विवादित हैं। पाक कब्जे वाले कश्मीर पर चीनी सेना की तैनाती या भारतीय सीमा पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ, चीन के चहेते अरूणाचल प्रदेश का विवाद आदि कई अन्य ऐसे मुद्दे जिन पर चर्चाएं होना स्वाभाविक था पर चीन ने इन सभी मुद्दों को भुलाकर बैठक के दौरान संयुक्त सैन्य अभ्यास का प्रस्ताव रख दिया लेकिन भारत नियमित वीजा वाली घटना को कैसे भूला सकता है। याद हो कि इससे पहले भारत की पहल पर चीन के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किया जाना तय हुआ था लेकिन भारत ने संयुक्त सैन्य अभ्यास को उस वक्त रोक दिया जब चीन ने भारत के उत्तरी सैन्य कमांडर को यह कहकर नियमित वीजा देने से इन्कार कर दिया था कि वह कश्मीर में तैनात है।

हालांकि भारत हमेशा से उदार रहा है इसलिए इस तरह की घटनाएं भारत को सम्बंधों को बिगाड़ने के लिए प्रेरित नहीं कर सकती लेकिन यकायक चीन के रवइय्ये में ऐसी लचक आना पच नहीं रहा है। भारत की वैश्विक स्तर पर पैठ और अन्य देशों का विश्वास भारत के प्रति खासा बढ़ा है। एशियाई क्षेत्र में भी उसकी मजबूती बढ़ी है। वैश्विक पटल पर भारत की सक्रीय प्रतिभागिता के चलते चीन का भारत आने का लक्ष्य कहीं वैश्विक स्तर पर चल रहे उसके विवादों के प्रति भारत का रवइय्या जाना, एशियाई इलाकों में हो रही राजनैतिक हलचल के प्रति भारत की तैयारी या इससे इतर को और गम्भीर कारण तो नहीं है। 

सोमवार, 17 सितंबर 2012

संसद में उत्पन्न गतिरोध के पीछे लचर कौन? नेतृत्व या जनता


मानसून सत्र में संसद की गतिविधियों में सकारात्मक हलचल की अपेक्षाएं जनता को कुछ ज्यादा ही थी लेकिन यूपीए-2 की कोलगेट कांड की आग ने इस सत्र को खाक कर दिया बाकी जो रही सही कसर थी उसे पदोन्नति में भी आरक्षण चाहने वालों ने पूरी कर दी।

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की अगर रिपोर्ट मानें तो 15वीं लोकसभा में 13 दिन हंगामा हुआ और 6 दिन हुआ विधायी काम। इस सत्र में 15 बिल पेश किए जाने थे, महज 4 ही पेश किए जा सके। 399 तारांकित प्रश्नों की सूची तैयारी की गयी थी जिसमें 11 ही प्रश्नों के जवाब मिल पाए। 4 सप्ताह चलने वाले मानसून सत्र में 3 सप्ताह तो हंगामों की भेंट चढ़ गए साथ ही चढ़ गए इस मानसून सत्र की व्यवस्थओं में लगे 117 करोड़ रूपये। इतिहास को देखा जाए तो वर्ष 1952 के पहले आम चुनाव के बाद से 15 वें संसद के अब तक चले सत्रों में सबसे कम काम इस मानसून सत्र में हुआ। अब जब बीते पन्नों को खोल ही दिया गया है तो इनता जानना है कि संसदीय प्रणाली की डगर चलने वाले भारत देश की संसद का हाल आजादी के तुरन्त बाद कैसा था? जब देश को नये नेतृत्व ने सम्भाला था। जब देश बेरोजगारी, भुखमरी और कंगाली के चंगुल में फंसा हुआ था।

1950 के दशक में लोकसभा की औसत बैठक हर साल 127 दिन चली थी वहीं अब यह संख्या घटकर 70-75 दिन रह गई है। 2008 में तो लोकसभा और राज्यसभा की बैठक 46 दिन से अधिक नहीं चल पाई। यही हाल संसद में पारित विधेयकों का होता जा रहा है। 1952 में जहां संसद के दोनों सदनों में 82 विधेयक पारित किए गए थे वहीं हाल के सालों में इनकी संख्या घटाकर 40-45 रह गई है। महत्वपूर्ण विषयों पर होने वाली बहस में सांसदों का कोरम तक नहीं जुट पाता है।
असल में तरक्की का सिगूफा फैलाने वाले संसद की कार्यप्रणाली के ग्राफ को दिन ब दिन नीचे ही गिराते जा रहे हैं। संसद की ऐसी दुर्दशा के पीछे दोषी कौन है\ उत्तर साफ है कमजोर नेतृत्व। ये देश की उस सर्वोच्च संस्था का हाल है जिसे 83 लाख रूपये की लागत से तैयार किया गया था।

18 जनवरी 1927 को भारत के तत्कालीन वायसरॉय लार्ड इरविन ने संसद भवन का उद्घाटन कियाजिसकी पहली बैठक 13 मई 1952 को आरम्भ हुई। हाल ही में 3 मई 2012 को संसद ने अपनs 60 वर्ष पूरे कर एक गौरव गाथा लिखी है। इस विशिष्ट अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने दोनों सदनों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि जीवन्त और स्वस्थ लोकतन्त्र के रूप में स्थापित होना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

मतलब साफ है कि हम वर्षों बाद भी उस लोकतांत्रिक देश में सांस नहीं ले रहे हैं जिसकी कल्पना हमने की थी अपितु पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी द्वारा कही गयी बात साफ बयां करती है कि वर्तमान में जिस लोकतंत्र में हम रह रहे हैं वह शुद्ध नहीं है और शुद्धता के पैमाने तक पहुंचाने के लिए हमें काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।

अन्ना के लोकपाल को संसद पर हमला बताकर एक तरफ तो राजनीतिज्ञ स्वयं को संसद के प्रति खुद को वफादार साबित करने की कोशिश करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ संसद सत्रों के नियमों को ताक पर रखकर उसकी गरिमा को हर बार किसी न किसी तरीके से तार करते रहते हैं। इनके इस व्यवहार से तो कुछ यही आभास होता है कि या तो ये राजनेता राजनीति का पाठ भूल गये हैं या फिर ये जनता को मूर्ख समझते हैं। बहरहाल अगर इस तरह के नेतागण पिछले 60 सालों से इसी तरह की राजनीति करके आज भी देश की सत्ता पर काबिज हैं तो यह वास्तव में पहुंच कर लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं जबकि नेतृत्व को चुनने का अधिकार सिर्फ हमें यानी जनता को मिला हुआ है।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

वेस्टइंडीज छुपा रुस्तम!

गेल, नरेन, ब्रावो और पोलार्ड बदलेंगे समीकरण

मोहम्मद शकील, भोपाल
18 सितंबर से जब 12 टीमें टी-20 विश्व कप के खिताब के लिए मैदान पर जोरआजमाइश करेंगी तो दुनिया की नजर भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड जैसी हाई प्रोफाइल टीमों पर रहेगी। भले ही वेस्टइंडीज को काई ज्यादा भाव न दे रहा हो, पर टीम संयोजन को देखते हुए उसे खिताब का दावेदार कहना गलत नहीं होगा। टीम का संयोजन टी-20 के लिए पूरी तरह से अनुकूल है। बात चाहे तेज बल्लेबाजी की हो या गेंदबाजी की, वेस्टइंडीज की टीम पूरी तरह से संपूर्ण नजर आती है। आईपीएल के हालिया संस्करण में सुनील नरेन और क्रिस गेल ने जिस स्तर का प्र्दशन किया है, उससे टीम काफी मजबूत हुई है। विशेषकर श्रीलंका के टर्निग विकेट पर नरेन की भूमिका निर्णायक रहने वाली है।
टीम में क्रिस गेल और कीरोन पोलार्ड जैसे विस्फोटक बल्लेबाज हैं। नरेन के बारे में सैमी कहते हैं कि हमारे पास टी-20 क्रिकेट का अभी सर्वश्रेष्ठ स्पिनर है और वह हमारे लिए वास्तव में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। बेशक नरेन को श्रीलंका की पिचों से मदद मिलेगी। क्रिस के आने से बल्लेबाजी अनुभवी हो गई है तथा पोलार्ड, ड्वेन ब्रावो, ड्वेन स्मिथ और आंद्रे रसेल जैसे खिलाड़ी मैच का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं।

गौरवशाली रहा है वेस्टइंडीज का इतिहास

वेस्टइंडीज क्रिकेट का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। क्लाइव लॉयड की कप्तानी में कभी वेस्टइंडीज मारक क्षमता वाली टीम हुआ करती थी। उन्होंने 1970 से 1980 तक क्रिकेट पर एकछत्र राज किया है। लेकिन इसके बाद उसकी टीम को संघर्ष करना पड़ा और तेजी से पतन हुआ। सैमी की अगुवाई वाली टीम को टी-20 विश्व कप में खिताब पर कब्जा जमा सकती है। वेस्टइंडीज ने 2004 में चैंपियंस ट्राफी जीतने के बाद कोई बड़ा टूर्नामेंट नहीं जीता है।

बुधवार, 12 सितंबर 2012

..जो बल्लेबाजों को नचाते हैं ऊंगलियों पर



इस बार एशियाई महाद्वीप में हो रहे टी-20 विश्व कप में स्पिनरों की भूमिका अहम रहने वाली है। एशियाई पिचें शुरू से ही स्पिनरों के लिए स्वर्ग रही है। ऐसे में इस विश्व कप में बल्लेबाज लट्टू की तरह नाचते हुए दिखेंगे। भारत की ओर से इस भूमिका का निर्वाहन आर. अश्विन करेंगे। न्यूजीलैंड के विरुद्ध टेस्ट सीरीज  में उन्होंने 18 विकेट लिए थे। उम्मीद तो यही है कि श्रीलंका के पिचों पर भी वह बल्लेबाजों को अपनी फिरकी के जाल में फसाएंगे। जब गेंद पाकिस्तान के सईद अजमल के हाथों में होती है तो विकेट गिरने का अंदेशा होने लगता है। टी-20 में इन्हें विकेट मशीन कहा जा सकता है। 41 मैचों में 58 विकेट कम नहीं होते। शाहिद अफ्रीदी के बारे में भी यही कहा जा सकता है। जितना बल्ले से करते हैं उससे कहीं ज्यादा गेंद से करते हैं। टर्न के साथ रफ्तार इस बार भी बल्लेबाजों के लिए कड़ी चुनौती होगी। इस कड़ी में एक और नाम आता है, वेस्टइंडीज के सुनील नरेन का। आईपीएल के जरिए अपनी गेंदबाजी से इन्होंने जितनी सुर्खियां बंटोरी, उतनी पिछले एक दशक में किसी विदेशी गेंदबाजों को नहीं मिली है। ये वह खिलाड़ी हैं जिनके कंधों पर अपनी टीम को चैंपियन बनाने का जिम्मा है।   

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

IPL ने हमें क्या दिया! एक ऑलराउंडर तक नहीं..


शकील जमशेदपुरी
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भारतीय टीम जब 18 सितंबर से टी-20 विश्व के अभियान की शुरूआत करेगी तो टीम को सबसे ज्यादा कमी एक ऑलराउंडर की खलेगी। क्रिकेट के इस छोटे संस्करण में ऑलराउंडर की भूमिका अहम हो जाती है। विश्व कप में हिस्सा ले रही ज्यादातर टीमों के पास बेहतरीन ऑलराउंडर है। पर भारत के पास ऑलराउंडर के नाम पर सिर्फ इरफान पठान है। पठान भी गेंदबाज ज्यादा और बल्लेबाज कम हैं। यह भारत की विफलता रही है कि कपिल देव के बाद सही मायने में कोई ऑलराउंडर भारत नहीं ढूंढ पाया।
2007 में जब हम खिताब जीते थे तब भी स्थिति यही थी। पांच साल बाद आज भी कुछ नहीं बदला। भारतीय बोर्ड ने आईपीएल को यह कह कर प्रोत्साहित कया कि इससे घरेलू प्रतिभाएं निकलेंगी। आश्चर्य है, आईपीएल के पांच संस्करण भी हमें एक अदद ऑलराउंडर नहीं दे पाया। ध्यान रहे पठान आईपीएल की देन नहीं हैं।  2007 विश्व कप के भारतीय टीम की तुलना अगर इस विश्व कप के टीम से की जाए तो इस बार 6 नए चेहरे है। इन 6 में से 4 खिलाड़ी ही ऐसे है जो 2007 के बाद प्रकाश में आए। सुरेश रैना, आर अश्विन, अशोक डिंडा और विराट कोहली। यानी पिछले 5 साल में हमें टी-20 के लिए उपयोगी सिर्फ 4 खिलाड़ी ही मिले है। उसमें भी कोई ऑलराउंडर नहीं। उम्मीद है, विश्व कप में ऑलराउंडर की कमी को रैना, सहवाग और रोहित शर्मा पूरी करेंगे।

रविवार, 26 अगस्त 2012

हवा के खिलाफ लड़ना-बढना रहेगा जारी

'' मर्द हैं न अब्बा जहाँ लाजवाब हो वहां हाथ चलाने लगे " पाकिस्तान के सोएब मसूद की फिल्म 'बोल' में ये लाइन एक बेटी अपने पिता से कहती हैं और वो भी तब जब बाप अपनी बेटी  के तर्कों से हार कर उसका मुंह बंद करने के लिए एक थप्पर जर देता है. भले हीं ये फिल्म पाकिस्तानी सरज़मी पर  बनी हो  लेकिन ऐसी सच्चाइयों  से भारत भी अछूता नही है. महिलायों  की बुलंद  आवाज़ और अंदाज़ को दबाने के  लिए भारत में भी पुरुषों ने  तरह तरह के हथकंडे अपनाये है. कुछ दिन पहले उ.प  के बागपत में महिलायों पर फरमान जारी किया गया जिसमे  महिलायों के फ़ोन पर बात करने से लेकर अकेले घुमने पर पाबन्दी की बात की  खाप  पंचायतों  ने, तब  किसी भी पार्टी या सर्कार को को कोई आपति नही हुई . किसी ने कहा की जीन्स पहनोगी  तो तेजाब फ़ेंक  देंगे, किसी ने कहा हिजाब पहन कर बाहर निकलो . किसी ने मन पसंद के लड़के से शादी करने पे रोक लगायी , तो  कोई  लड़कों के साथ दोस्ती पर  पर पाबन्दी की बात करता दिखा .  सरेआम संविधान में लिखित अधिकारों का उलंघन होता रहा लेकिन किसी ने विरोध में आवाज़ उठाने की जहमत नही उठाई. यहाँ तक की देश के युवा मुख्यमंत्री भी मूकदर्शक बने रहे. जब पत्रकारों ने सवालों की बौछार की तो उन्होंने कहा की 'कोई निर्णय चाहें सर्कार ले या सामाजिक संस्था वो लोगों की भली के लिए होना चाहिए'. ऐसा ताल मटोल का बयाँ सर्कार देगी तो ऐसी संस्थाओं के हौंसले तो और बुलंद हीं होंगे. महिलायों को काबू करने की महत्वाकांक्षाओं की हद तो तब हो गई जब इंदौर में एक  महिला की योनी पर ताला उसके पति ने लगाया  वो भी इसलिय क्योंकी पति को शक था की कहीं मेरी गैर मौजूदगी में किसी से सम्बन्ध  तो नही बना लेगी. यहाँ तक की २० वर्ष के बेटे को लेकर भी उसके मन में शक था.
        औरत के हर रूप पर मर्दों ने सवाल उठाया पर ज़वाब किसी के पास नही है. २००३ में झारखण्ड की सोनाक्षी मुखर्जी के साथ जो हुआ वो तो याद ही होगा  आपको. किस तरह सरेआम उसके चेहरे पर तेजाब फ़ेंक  दिया गया वो भी इसलिए क्योंकि गली मुहल्लों के उनलड़कों को उसने डांट दिया था जो उसकी ख़ूबसूरती के दीवाने थे. पुरुष चाहें
गली का गुंडा  हो लेकिन महिलाओं की डांट को अपनी इज्जत  का सवाल बना लेतें हैं और कितनो की आबरू के  साथ खेलने से बाज नही आता है.
      हाल में गोवाहाटी की एक लड़की के साथ लड़कों ने मिलकर सामूहिक छेड़छाड़ की और उसके कपडे तक फाड़ दिए . बाद में लड़की को दोषी ठहराया गया की वो ९ बजे रात  को क्यों घूम रही थी. यही नही उसपर ये भी आरोप लगया गया की उसने छोटे कपडे पहन रखे थे. लड़किओं को क्या पहनना है, कैसे चलना है, किससे बात करना है, क्या ये  भी पुरुष  तय करेगा? बलात्कार जब व्यस्क लड़किओं  के साथ होता है तो ये आरोप जर
 देता है ये समाज , लेकिन जब बात मासूम लड़किओं की आती है तो  समाज के ये प्रहरी चुप क्यों हो जाते हैं? ३ साल की यामिनी का क्या दोष था जो उसके हीं पडोसी ने उसे अपनी हवस का शिकार  बनाया. कई बार जन्म देने वाला पिता ही अपनी संतान पर गलत नज़र रखे तो इसपर क्यों नही कुछ कहतें ये सुलेमान. क्या कहीं  भी लड़की  की सुरक्षा की गारंटी है...इसका ज़वाब है नही.
   ज़रा सोचिये की जितनी भी गलियां हैं उसके निशाने पर कहीं न कहें औरतें ही हैं. इससे ये तो साफ़ हो जाता है की महिलाओं को अपमानित करने की प्रथा सदियों से चली आ रही है. हर बार लड़किओं को माँ बाप, आस पडोस वाले ये समझाते हुए दिख जाते है की ये करो, ये मत करो, ये सही नही  है तुम्हारे लिए, ये सही है. यानि हर सीख लड़कियों के लिए. क्यों नही ये लोग अपने बेटों को सही और गलत का फर्क समझते है. सामने वालें के साथ ठीक से पेश आने की बात क्यों नही सिखाते ये अपने सपूतों को.. अगर इतना भी  प्रयाश हो जाये तो काफी हद तक समस्या का हल हो सकता है. अगर पुरुषों ने इन बातों समझा ही होता तो २००१ में ४२,९६८ मामले दर्ज न होते. जिसमे से २४,२०६ मामले बलात्कार के हैं. इसमें चौकानेवाली बात है ये है की अधिकतर नाबालिक लड़कियां ही शिकार हुई है.
     महिला पढ़ी लिखी हो, बच्ची हो, बूढी हो सभी शिकार हो रही है पुरुषों के  हवश का.. हाल ही  में गीतिका एयर होस्टेस को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. वो भी एक पॉवर फुल नेता गोपाल कांडा के यातना  से तंग आ कर. आज गीतिका नही रही लेकिन क्या वो जिंदा होती  और न्यायालाव की शरण में जाती तो क्या उसे न्याय मिलता ?
    अब वक़्त आ गया है की ये विचार किया जाय की ये  पाबंदियां केवल औरतों के लिए ही क्यों है.  तो इसके लिए सर्कार की नीतियाँ भी कसूरवार हैं देश को आज़ाद हुए 60 साल से ऊपर  हो चुकें  है और आज भी महिलायों को संसद में ३३ फीसदी आरक्षण नही मिला. बलात्कारी बलात्कार करके आराम से समाज में घूमता रहता है .और कोई करवाई नही होती हैं. अगर होती भी है तो चंद  दिनों की जेल होती है और कुछ जुर्माना होता है जिसे वो चुका कर जेल से बाहर आ जाता है, और महिला आजीवन समाज की नज़रों
में दोषी बन जाती है. वो मुंह छुपाये अपराधी बने घूमती रहती है.
    लेकिन ये बात भी  माननी
पड़ेगी  की ऐसी सामाजिक व्यथा होने के बावजूद महिलाओं ने खुद को साबित किया है. ओल्य्म्पिक में भारतीय तिरंगे का मान बढ़ाने के लिए भारतीय बेटियों ने कोई कसर नही छोड़ी. मेरी कॉम और सायना   नेहरवाल के पदक इस बात का धोतक है. आज हर भारतीय इन्हें सम्मान की   नज़रों से देखता है. लेकिन इन खिलाडियों के लिए भी ये रास्ता इतना आसान  न था.   मेरी कॉम जो पांच बार विश्व चैम्पियन रही हैं. उनके दो बच्चें 
 है . घर से ले कर संघ तक के कर्मचारियों ने कहा की बच्चे पालने की सलाह दी और ताना भी मारा  मुक्केबाजी तुम्हारे बस  की बात नही. लेकिन कॉम ने किसी की नही सुनी  और वो आगे चलती चली गई और आज परिणाम सबके सामने है. सानिया मिर्ज़ा का सिक्का इस बार ओल्य्म्पिक में न चला हो लेकिन सानिया  ने भी देश के  टेनिस में नया अध्याय जोड़ा है. हालाँकि सानिया  मिर्ज़ा के स्कर्ट पर मुस्लिम समुदायों ने फ़तवा जारी
 किया था. लेकिन सानिया इन फालतू बातों के बजाय अपना खेल खलती रही. खेल के मैदान ही नही आब तो हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपने को साबित किया है. राजनीती में भी महिलायों ने अपना अलग मुकाम 
हासिल किया है. तीन दशकों तक चले  बंगाल में  वाम के सूर्य को अस्त
 करना का काम  ममता बनर्जी ने ही किया. मायावती ने भी यूपी में पूर्ण बहुमत की सर्कार बनाई  और ५ सालों तक राज किया. पुरुष ये कैसे भूल जाता है की उसको धरती पर लेनवाली एक महिला ही है और उसकी सभी ज़रूरते आधी आबादी के बिना अधूरी है. सीमोँ न द बउआर ने कहा था  की " औरत बनती नही बनायीं जाती है "  ज़रूरत है उन्हें सही अवसर दिए जाये, और निर्णय लेने की छूट भी. तब जा के महिला को आपनी शक्तियों और कमजोरियों का अहसास होगा.

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

अपराध-अपराधियों को शह देती अखिलेश सरकार


समाज में जो उजागर होता है उसे ही जनता सच मान लेती है और जो जैसे तैसे छिप गया वह खुद ब खुद इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाता है। अब इसे अखिलेश सरकार का दुर्भाग्य कहिए या वाकई इन्हीं के कार्यकर्ताओं का गुण्डाराज जिनकी बदौलत अपराध का ग्राफ दिन ब दिन चढ़ता ही जा रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने कार्यकाल का सैंकड़ा पूरा कर लिया है। इतने ही दिन में प्रदेश की स्थिति यह है कि हत्या जैसे संगीन अपराधों की 1150 से ज्यादा घटनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं। पिछले वर्ष से डेढ़ गुना ज्यादा अपराध मात्र 100 दिनों में ही हो चुका है। मायावती सरकार में अपराध काफी बढ़ा था लेकिन जिस रफ्तार से अपराध ने अखिलेश सरकार में अपने पैर पसारे हैं, स्थिति सोचनीय बनती ही जा रही है। हालांकि अब तक की उत्तर प्रदेश की दशा यह साबित कर चुकी है कि पालने में खेलने वाले शिशु को सत्ता सौंपना मूर्खता का परिचय देने के समान ही है। खिलौने की भांति वह समाज के साथ खिलवाड़ करता है और उन लोगों की तरफ ज्यादा आकर्षक होता है जो तमंचे-पिस्तौल से कारनामे दिखाया करते हैं। ठीक यही काम अनुभवहीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के कुख्यात बदमाशों के साथ गलबहियां करते फिर रहे हैं।
खैर अखिलेश सरकार ने अभी तक यह जानने की ज़हमत नहीं उठायी कि क्यों समाज में अपराध असामान्य से आम होता जा रहा है? ऐसा माना जाता है कि जब सरकार और अपराध एक मुंह खाना खाने लगें तो अपराध का आम होना कोई अजूबा नहीं रह जाता। सुशासन का चोला ओढ़ कर 13वीं विधान सभा चुनाव में सिर्फ अपराध और अपराधी को समाज में शह न देने की तर्ज पर अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल की बात को अनसुना कर बहुबली लल्लू सिंह को टिकट नहीं दिया था। जनता को रिझाने के लिए, यह विश्वास दिलाने के लिए कि सपा की गुण्डई सिर्फ गुण्डों के लिए होगी न कि जनता के लिए यह आवरण अखिलेश ने ओढ़ा था। दिखावे का चोला आखिर कब तक चढ़ा रहता। कभी न कभी तो उतरना ही था, सो उतर गया।
इस बात को बहुत से अवसरों पर उन्होंने साबित भी कर दिखाया। राष्ट्रपति पद के लिए यूपीए के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के घर भोजन करने गए तो यह देखकर दंग रह गए कि बहुबली विधायक मुख्तार अंसारी जिन पर करीब 15 व विजय मिश्रा जिन पर लगभग 25 अपराधिक मामले चल रहे हैं, मुख्यमंत्री के निवास स्थान पर शेखी बखार रहे हैं जबकि कारावास की सजा काट रहे इन दोनों ही अपराधियों को जेल से बाहर सिर्फ विधानसभा में भाग लेने तक की ही इजाजत है। यही नहीं कई वर्षों से जेल की हवा काट रहे राजा भइय्या को जेलमंत्री बना डाला। इन्हीं कई नामों में एक नाम और है अमरमणी त्रिपाठी। मधुमिता हत्याकांड का एकमात्र सूत्रधार। 58 वर्षीय यह शख्स मधुमिता शुक्ला की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहा है। मधुमिता (22 वर्ष) एक नवोदित कवयित्री थी जिसकी मई 2003 को लखनऊ स्थित उसके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मधुमिता के पेट में अमरमणि त्रिपाठी का बच्चा पल रहा था। अमरमणि त्रिपाठी के कहने के बावजूद जब मधुमिता ने बच्चे को गिराने से इनकार कर दिया तो उसकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। उस वक्त त्रिपाठी बसपा सरकार में मंत्री थे। हत्याकांड पर बवाल मचने के बाद मायावती ने त्रिपाठी को पार्टी से रुखसत कर दिया था साथ ही इस मामले को सीबीआई के सुपुर्द भी कर दिया था। जांच में त्रिपाठी को दोषी पाया गया और उसे उम्रकैद की सजा सुना दी गयी लेकिन जब से अखिलेश यादव ने राज्य के नए मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता संभाली है तब से त्रिपाठी की पांचों उंगलियां घी में हैं। सपा के सत्ता में आने के बाद त्रिपाठी की सजा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गयी है। ये अब समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता हैं। पिछले तीन महीने से हर दोपहर त्रिपाठी जेल से बाहर विचरण करने जा रहे हैं। पुलिस महकमा उन्हें इलाज के बहाने बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर ले जाता है। मेडिकल कॉलेज में त्रिपाठी को एक प्राइवेट लक्जरी रूम मिला हुआ है जहां वे अपने गुर्गों के साथ चटिया लगाते हैं। हर दिन लगने वाले इस दरबार में त्रिपाठी लोगों की शिकायतें दूर करते हैं, प्रॉपर्टी व जमीन के विवादों को सुलझाते हैं। शाम को दरबार खत्म होते ही उन्हें बाइज्जत वापस जेल पहुंचा दिया जाता है ताकि उम्र कैद के इस दिखावटी सिलसिले पर कोई उंगली न उठा सके।
ये किसी फिल्म की पटकथा नहीं बल्कि एक वास्तविकता है जिसमें अपराधियों को न केवल उस प्रदेश का प्रशासन बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री भी सिर चढ़ाए बैठे हैं। इस सच्चाई का हमेशा से यही इतिहास रहा है। कुख्यात बदमाशों को पार्टी में दामाद की तरह पूजा जाता है। सरकार अपने वोट बैंक व धन उगाही के लिए अपने दल में बड़े बड़े अपराधिक छवि वाले मठाधीशों को अपनी छाती पर चढ़ाए ले रही है लेकिन प्रश्न ये उठता है कि इन अराजक तत्वों द्वारा समाज में अपराध के चढ़ते पारे को आखिर कौन रोकेगा? अखिलेश सरकार का अगर यही रवैया बना रहा तो जल्द ही उन्हें मुख की खानी पड़ सकती है वैसे भी पार्टी के अन्दर बैठे बहुत से वरिष्ठ उन्हें खाने को बेताब हैं।

बुधवार, 8 अगस्त 2012

जाने कहाँ गए वो दिन...

साप्ताहिक छुट्टी होने की ख़ुशी में जब बारिश में शहर घुमने की चाहत हुई तो अल्हड़पन, आवारगी की अदा के साथ निकल पड़े...बारिश ने जब ज्यादा सताया...तो फिर पहुच गए एक ऐसी जगह...जो कभी साहित्यकारों, शायरों और विचारकों का अड्डा हुआ करता था...बोले तो कॉफ़ी हाउस...अब यहाँ मुझे कोई साहित्यकार नहीं दीखता,कोई विचारक नहीं दीखता...दीखते है तो सिर्फ आशकी के चंगुल में फंसे कुछ नवजवान साथी...यहाँ बैठकर जब सोचा तो लग...
ा कि या तो शहर में कोई विचारक नहीं बचा...या फिर ये अड्डा उनके लायक नहीं बचा...वजह कोई भी...फर्क व्यापर में भी नहीं पड़ा...फर्क पड़ा तो यहाँ के बातचीत के विषयों पर...ये वही जगह थी...जिसके बारे में मेरे एक मित्र ने सुबह ही जिक्र किया था...उसने बताया था कि नोएडा के सेक्टर 16 में इसी कॉफ़ी हाउस के होने के क्या मायने है...शायद बेरोजगारी झेलने वाला इंसान को रोजगार मिल जाये...खैर विचारों के झंझावातों से झूझता हुआ...देखा तो कॉफ़ी ठंडी हो चुकी थी....तो पीछे बैठे एक जोड़े की बातों को सुनकर...मुझे वहां से निकलना ही ठीक लगा...और फिर कॉफ़ी की गर्मी से गरमाया एक इंसान....विचारों से ठन्डे पड़े लोगों के बिच से मौसम का मजा लेने फिर निकल पड़ा...

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

जौहर प्रथा का साक्षी महोबा का कजली मेला

कीरत सागर पर लोगों का हुजूम...और लोक गीतों में आल्हा ऊदल का यशोगान...हर बुंदेली के रग रग में जोश और जुनून भर देता है...राखी के पर्व हर बहन अपने भाई को राखी बांधकर उसे दुआएं देती है...तो भाई भी उससे ताउम्र रक्षा का वादा करता है...मगर ऐतिहासिक कजली महोत्सव और रक्षाबंधन बुंदेलों के लिये केवल त्यौहार नहीं है,ये एक कहानी है जौहर प्रथा की...ये त्यौहार एक निशानी है वीरता की गाथा की...ये साक्षी है उस युद्ध का...जिससे कीरत सागर का पानी लहू में तब्दील हो गया... चंदेल और चौहान सेनाओं के खून से लाल कीरत सागर की धरती आज भी बुंदेलों में जोश व जज्बे का संचार करती है... कजली महोत्सव हजार साल पहले लड़ी गई अस्तित्व व अस्मिता की लड़ाई की याद ताजा कराता है...

1100 साल पहले चंदेल शासक परमालिदेव के शासन काल में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने आल्हा ऊदल की मौजूदगी में यहां आक्रमण कर महोबा को चारों ओर से घेर लिया था। चौहान सेना ने शहर के पचपहरा, करहरा व सूपा गांव में डेरा डाल राजा परमालिदेव से उनकी बेटी चंद्रावल का डोला व पारस पथरी नजराने की रूप में मांगी थी। यह वह दौर था जब आल्हा ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया गया था और वह अपने मित्र मलखान के पास कन्नौज में रह रहे थे। रक्षाबंधन के दिन जब राजकुमारी चंद्रावल अपनी सहेलियों के साथ भुजरियां विसर्जित करने जा रही थी तभी पृथ्वीराज की सेना ने उन्हें घेर लिया। आल्हा ऊदल के न रहने से महारानी मल्हना तलवार ले स्वयं युद्ध में कूद पड़ी थी। दोनों सेनाओं के बीच हुए भीषण युद्ध में राजकुमार अभई मारा गया और पृथ्वीराज सेना राजकुमारी चंद्रावल को अपने साथ ले जाने लगी। अपने राज्य के अस्तित्व व अस्मिता के संकट की खबर सुन साधु वेश में आये वीर आल्हा ऊदल ने अपने मित्र मलखान के साथ उनका डटकर मुकाबला किया। चंदेल और चौहान सेनाओं की बीच हुये युद्ध में कीरतसागर की धरती खून से लाल हो गई। युद्ध में दोनों सेनाओं के हजारों योद्धा मारे गये। राजकुमारी चंद्रावल व उनकी सहेलियां अपने भाईयों को राखी बांधने की जगह राज्य की सुरक्षा के लिये युद्ध भूमि में अपना जौहर दिखा रही थी। इसी वजह से भुजरिया विसर्जन भी नहीं हो सका। तभी से यहां एक दिन बाद भुजरिया विसर्जित करने व रक्षाबंधन मनाने की परंपरा है। महोबा की अस्मिता से जुड़े इस युद्ध में विजय पाने के कारण ही कजली महोत्सव विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सावन माह में कजली मेला के समय गांव देहातों में लगने वाली चौपालों में आल्हा गायन सुन यहां के वीर बुंदेलों में आज भी 1100 साल पहले हुई लड़ाई का जोश व जुनून ताजा हो जाता है।

गुरुवार, 7 जून 2012

कल रात जिसने 'आज तक' नहीं देखा...समझो कुछ नहीं देखा.....

जी हां मैं 7 जून के  रात 10 बजे की बात कर रहा हूं, जब आज तक पर पी चिदंबरम के कथित तौर पर धांधली कर चुनाव जितने के मामले में चर्चा हो रही थी। चर्चा में चिदंबरम के धुर विरोधी सुब्रमण्यम स्वामी, बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन और वरिष्ठ पत्रकार (महिला) नीरज भाग ले रही थीं, एकंर थे सुमित अवस्थी..... मजा तो तब आया जब शाहनवाज अपने ही अंदाज में कांग्रेस खासकर चिदंबरम पर हमला बोल रहे थे, इस  बीच सुमित ने उन्हें टोक दिया फिर तो चर्चा में चार चांद ही लग गया...शाहनवाज बोल पड़े सुमित जी मै समझ सकता हूं कि कांग्रेस की तरफ से आज कोई नहीं आया है और आपको स्पीकर की भूमिका में आकर संतुलन बैठाना पड़ रहा है...इस पर सुमित अवस्थी ने कहा शाहनवाज जी कृपा करके आप मुझे मेरा काम न  सिखायें...फिर चर्चा आगे बढ़ी...सुब्रमण्यम स्वामी ने तथ्यों के साथ चिदंबरम पर जबरदस्त हमला बोला...इत्तेफाक से नीरजा जी की आवाज सुमित तक आ नहीं रही थी...थोड़ी देर के लिए आई,,,,टेक्निकल इरर आ गया...शाहनवाज और स्वामी ने विरोधियों के खिलाफ खूब चौका-छक्का मारा...शाहनवाज हुसैन की भाषा में कहें तो सुमित ने संतुलन बिठाने के लिए कांग्रेस के सलमान खुर्शीद और राशीद अल्वी की बाईट सुनवाई....सबसे ज्यादा मजा अंत में आया जब शाहनवाज जी के स्पीकर बने एंकर सुमित अवस्थी ने कहा कि मैं अपने दर्शकों को बताना चाहूंगा कि लाख कोशिशों के बाद भी कांग्रेस की तरफ से कोई नेता इस मंच पर आना उचित नहीं समझा।


शनिवार, 26 मई 2012

ऊपर चलेंगें जब तो सारा हिसाब होगा...

क्या शिथिलताओं के दौर में होगा
होगा तभी जब हौसलों से हौसलों का मेल होगा...

पोखरों-तालाबों में वे अपने छितर गए
सौंप दें सागर इन्हें, तो न जाने क्या होगा...

मिट गया वो इतिहास की किताब से
पत्थरों की भांति जो बुत बना बैठा होगा...

बेटियों ने जिन आँखों में बचपन बिताया होगा
जिन हांथों ने उसके तन को कपड़ा पहनाया होगा
धूमिल होती उस बच्ची की इज्जत
वो मजलूम  बाप भला कैसे देख पाया होगा...

इस कलयुग के काल में लूट रहे हैं सब
तू मौन खड़ा हैं यूँ, शायद तुझमें बचा अभी इन्सान होगा...

हर पल की हरकत तम्हारी देख रहा हैं कोई
ऊपर चलेंगें जब तो सारा हिसाब होगा...

रविवार, 13 मई 2012

झूठी कहानी, झूठा फसाना और झूठी दिलशा.........लगता है कलयुग ही है


झूठी कहानी, झूठा फसाना और झूठी दिलशा.........लगता है कलयुग ही है 
क्या अब पूरी तरह से कलयुग आ गया, शायद इस लेख को पड़ने के बाद आप भी कहेगे की हाँ. रोज की तरह हम अपने रूम से ऑफिस के लिए निकले अबसे पहले तो हमारा सामना भीड़- भाड से हुआ. ये तो रोज मर्रा की कहानी थी इसमे नया कुछ नहीं था. रस्ते मै चलते हुए हमारी नजर उस पर पड़ी जिसने मुझे यह सब करने को मजबूर कर दिया. मेरे बगल से एक तिपहिया वाहन गुजरा जिसे आप टेक्सी कह सकते है. उस पर एक नेता को जन्म दिन की बढ़िया सी बधाई दी गयी थी. और बड़े- बड़े अच्छरों मै लिखा था जीवेत शरद: शतम...
यह कोई नया नहीं था इस शब्द से तो हम यदा कदा जूझते रहते है. भला आप ही सोचें क्या आज के समय कोई शरद: शतं अर्थात १०० साल जी सकता है. जब हमारे देश की औसत जीवन ६५-७० हो . ये तो कभी हो ही नहीं सकता है. भला हम जापान या विकसित देशों मैं तो रहते नहीं है, जहाँ एक बार तो सोचा भी जा सकता है. भारत जैसे देश मैं तो कह ही नहीं सकता! .मै १०० साल तक जीने को चुनौती नहीं दे रहा. भला मै कौन हो सकता हूँ . मै उन सज्जन को भी कुछ गलत नहीं मन रहा हूँ जिन्होंने इतने बड़े- बड़े शब्दों में बधाइयाँ दी हों. ये तो सभी लोगों का इक तरीका है, बधाइयाँ देने का. सो सज्जन साब भी कैसे पीछे रह सकते थे. लेकिन सोचो न भैया कोई ७० से ८० जी सकता है. हो सकता है ९० तक पहुच जाये लेकिन मेरे हिसाब से वह १०० नहीं जी सकता. क्योकि भारत देश की जलवायु आज के मानव को वंहा तक नहीं पंहुचा सकती. हाँ वो जमाना या समय चला गया जब लोग १०० या ११० तक आसानी से जी लिया करते थे. अब भारत के खान पान मैं काफी बदलाव आया है. अब बाजार मैं शुद्ध बस्तुएं ढूढें से शायद ही मिल पायें. साथ ही भाग्दोड़ बरी जिन्दी और जीने का तरीका . देर रात  तक सोना और १०-११ बजे तक विस्तर को छोड़ना ये सब भी तो जीवन को प्रभित करते  है. फिर आप ही बताएं की जीवेत शरद: शतम कभी हो सकता है.?

गुरुवार, 10 मई 2012

मखना लाल के कर्मचारियों को मिली चार माह की दिलाशा

मखना लाल के कर्मचारियों को मिली चार माह की दिलाशा 
कई दिनों से आंदोलित मखना लाल चतुर्वेदी वि. में परमानेंट करने को लेकर पहले हड़ताल और बाद में भूख हड़ताल तक आये कर्मचरियों को आखिर में चार माह की दिलाशा दी गयी है. और हड़ताल ख़त्म करा दी गयी  और निर्णय लिया गया की उनके परमानेंट के लिए एक कमिटी बनायीं जाएगी. फिर तय किया जायेगा की परमानेंट किया जाये की नहीं. देखना यह होगा की. कई सालों से कार्यरत कर्मचारियों को उनको लाभ दिया जायेगा की नहीं. 

शनिवार, 3 मार्च 2012

प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार होती तो .....सोचिये ज़रा!

तमाम टीवी चैनलों पर चलने वाले इस विज्ञापन को देने वाले विज्ञापनदाता पार्टी के तारनहारों....पिछले 22 सालों से उत्तर प्रदेश में आपकी सरकार तो आई नहीं....और आपने धर्म के आधार पर आरक्षण की जो राजनिती शुरू की है...उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले 22 साल भी आप यूपी में आने वाले नहीं हो....धर्म-जाति की राजनीति ही तो है जिसने बहन जी को आने का मौका दिया....बहन जी ने सोशल इंजिनियरिंग का नाम देकर दलित-ब्राम्हण-मुस्लिम गठबंधन किया और एक मुश्त वोटों की फसल काट ली....जातिवाद तो यूपी में है ही....धर्म में भी बांट दो....खैर जनसंख्या इतनी है कि आरक्षण घटाकर या बढ़ाकर जाति-धर्म के आधार पर बांटने से भी गरीबी खत्म नहीं होगी...खत्म होगी तो राजनीति में परिवारवाद को खत्म कर गरीबों को राजनीति में हिस्सा देने से....जिससे कि वे गरीबों के हक में कानून बना सकें....बाकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार है....2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला...कॉमनवेल्थ घोटाला...के सिवाय कर क्या रही है सोचिये ज़रा!





शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

माँ के पेट से चक्रव्यू भेदने की कला सीखने वाले भारतीय युवाओं में इतना अँधेरा क्योँ?

खबर भोपाल की है.................
बुधवार को बीएचएमएस थर्ड ईयर की छात्रा ने अपने कमरे में फांसी लगा ली. वजह था प्यार में धोखा. इससे पहले भी मेडिकल की एक छात्र ने ख़ुदकुशी कर ली थी. वहां भी मामला प्रेम प्रसंग का ही था. ऐसी ख़बरें कितनी दुखद होती है. सिर्फ मनचाहा प्यार न मिलने पर जिंदगी को अलविदा कह देना, युवाओं की सोच पर बड़े सवाल खड़े करता है. आखिर युवाओं में इतनी हताशा, इतनी निराशा क्योँ?
कुछ ही दिन पहले की बात है. मेरे कॉलेज में दो दोस्त आपस में झगड़ रहे थे. एक का कहना था कि तुमने बीती रात मेरा फ़ोन सिर्फ इस लिए नहीं उठाया, क्यूंकि तुम उस वक़्त किसी लड़की से बात कर रहे थे. तुम लड़कियों को बिला वजह इतना महत्व देते हो. मैं तो लड़कियों को घुटने पर रखता हूँ. तभी दूसरा दोस्त अपने जूतों कि तरफ इशारा करते हुए बोला- मैं लड़कियों को यहाँ रखता हूँ...............................
यह विचार किसी एक लड़के के व्यतिगत हो सकते हैं, पर इसमें कोई शक नहीं कि लडको कि ऐसी मानसिकता लड़कों के एक बड़े समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं. ज़ाहिर है अगर लड़के लड़कियों के बारे में ऐसी सोच रख सकते हैं, तो उसे मरने के लिए भी छोड़ सकते हैं. मेरा भी व्यकिगत तौर पर भी यही मानना है कि लड़के अच्छे प्यार करने वाले होते हैं, जबकि लड़कियां अच्छी चयन करने वाली होती है. अंग्रेजी में कहा भी जाता है- "Boy is a good lover and girl is a good chooser". बहुत कम ऐसे अवसर आते हैं, जब लडकियां किसी से सच्चा प्यार करती है. पर जब वो सच्चा प्यार करती है, तो पूरे मन से करती है. यहाँ तक कि नर्क तक भी उस लड़के का पीछा करती है. मुझे कहने में कोई झिझक नहीं कि उनके  प्यार की पराकाष्ठा ही उन्हें आत्महत्या पर आमादा कर देती है.
मैं लड़कों को कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहूँगा. पर वे इन बारीकियों को समझें  कि सच्चा प्यार करने वाली लड़कियां किसी भी कीमत पर हार नहीं मानतीं. तब उनके पास दो ही रास्ते होते हैं. या तो आपने प्यार को पाना या फिर खुद को मिटा देना.
लड़कियों को भी यह समझने होगा कि ख़ुदकुशी कोई समाधान नहीं है. मरने के बाद अगर किसी को प्यार का एहसास हो भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है. बेहतर तो यही होगा कि लड़कियां जीते जी अपनी भावनाओं को समझा पायें. वैसे भी समय से पहले और तकदीर से ज्यादा किसी को क्या मिलता है. नियति भी कोई चीज़ होती है......
सदा तो धूप के हाथों में भी परचम नहीं होता
ख़ुशी के घर में भी बोलो क्या कोई गम नहीं होता?
फ़क़त एक आदमी के वास्ते जग छोड़ने वाले
फ़क़त उस आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता


उम्मीद है अब ऐसी ख़बरें हमारे कान के पर्दे से नहीं टकराएंगी.