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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

क्लिक----- क्लिक

आज सुबह जब घर से निकला तो कोई खबर नही मिल रही थी...... नजर दीवार पर लगे इस बोर्ड की महान विभूतियों पर गई .....यह सभी हमारा हाथ आम आदमी के साथ जैसे नारों का प्रतिनिधित्व करते नही थकते..... आज आम आदमी हाशिये पर है..... महंगाई ने उसका जीना मुहाल कर लिया है ..... यह स्केच भी इसी की बानगी दिखा रहा है ..........

नव दुर्गा के अवसर पर अपने मोहल्ले की गलियों में इसे सजा रखा है अभिषेक नाम के एक युवक ने... आज जब मेरी नजर इस बोर्ड पर गई तो सारा मोहल्ला कैमरे के सामने आने लगा ....टी वी में अपनी तस्वीरे देखने का मन किसे नही होता.... आज नजारा देखकर लगा मीडिया से लोग चमत्कार की उम्मीदे क्यों करते है ....


स्केच है यू पी ऐ और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी का जिनको चोर उच्चका गठबंधन का अध्यक्ष बताया गया है....... शायद यह महंगाई का डंक है........

यह मनमोहन नही कुम्भकरण सिंह है........इनके पास बर्बादी विभाग है...... गरीबो को नही जीने देने की कसम इन्होने खायी है.........

इससे नीचे की तस्वीर में यह है हमारे देश के दुलारे कृषि कम क्रिकेट मंत्री शरद पवार जिनको अनाज की कोई परवाह नही है.....वह कहते है न मैं कोई ज्योतिष तो नही हूँ जो कह सकू महंगाई कम हो जाएगी..................

छमा प्रार्थी हू ..... पिछले एक महीने से ब्लॉग पर कुछ नया नही लिख पाया...... आज से नई पोस्ट की शुरुआत कर रहा हू......आशा है आप निराश नही होंगे..... बीते एक महीने से बहुत व्यस्त लाइफ चल रही है....दिन हो या रात हो फुर्सत ही नही हो पा रही थी.... प्रोपर ६ घंटे नीद भी नही ले पा रहा था....ऊपर वाले से दुआ करूँगा ऐसी व्यस्त लाइफ वह किसी को भी न दे..... व्यस्त होने की वजह पर फिर कभी बात होगी.......
"अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा " बचपन में हिंदी के अध्यापक कालोनी जी ने राहुल सांकृत्यायन की लेखन शैली के बारे में पदाया था .... इसका असली महत्व अब समझ में आ रहा है जब पत्रकारिता के फील्ड में रहकर खबरों की खोज खबर कर रहा हूँ.....पत्रकारिता में एक फंडा है किसी भी व्यक्ति के पास नोज फॉर न्यूज़ होनी चाहिए ....लेकिन कट , कॉपी ,पेस्ट के जमाने में आज खबरे दम तोड़ रही है....
आजकल तो फील्ड में जाने से पत्रकार कतराने लगे है ... एयर कंडिशनर रूमों में बैठकर खबरे चुराने का चलन चल पड़ा है ...डोट कॉम की अधिकतर पत्रकार यही सब कर रहे है... आम आदमी उनके भी हाशिये पर है...पेज थ्री वाली खबरों से फुर्सत मिल सके तब तो आम आदमी की बात हो पायेगी....... ऐश्वर्या के प्रेग्नेंट होने को तरजीह देने से आम आदमी से जुडाव रखने वाली खबरे अटकी रह जाएँगी ॥

अभिषेक के पडोसी तो इस काम की सराहना कर ही रहे थे साथ ही उसके मोहल्ले में दुर्गा जागरण के अवसर पर महंगाई डायन का जागरण हो रहा है.... कीमते इतनी तेजी से बदती जा रही है कि लोगो का जीना मुश्किल होता जा रहा है .... एक देवी ने मुझे बताया अगर यही सब रहा तो लोगो का अगले चुनाव में कांग्रेस से भरोसा उठ जायेगा......
वैसे लोगो का भरोसा सरकार से उठने लगा है ॥ तभी एक महिला ने मुझसे बातचीत करते हुए कहा कि सरकारे कीमते कम करने की दिशा में कोई ठोस कदम नही उठा रही है.... अगर यह सब होता तो आज दैनिक उपभोग की चीजे इतनी महंगी नही होती......कालाबाजारी और वायदा का कारोबार ही इतना ज्यादा है कि सरकार जमाखोरों पर अंकुश नही लगा सकती......
शरद पवार जैसे मंत्री तो पूरे साल के ३६५ दिनों में से ३६ दिन अपने मंत्रालय को दे पाते है ... बचे दिन वह क्रिकेट की यात्राओं में लगा दिया करते है .....ऐसे में क्या होगा हमारे किसान का.... ? वह तो आत्महत्या करेगा ही.......बेचारी पीपली लाइव भी लोगो को आत्महत्या करने से नही रोक पा रही है .... मध्य प्रदेश में भी अब किसान आत्महत्या की मामले बढ़ते ही जा रहे है॥ कल ही एक गाव के मेहनती किसान से बात हो रही थी... उसने कहा साहब खेती बाड़ी में अब कुछ बचा नही है.... बस हम सब जैसे तैसे अपने दिन काट रहे है.....
कुछ समय पहले पीपली लाइव के "नत्था " से मिलना हुआ .... उसकी तकदीर फिल्म आने के बाद भी नही बदल पायी है.....आज भी उसके पास रहने को खुद का मकान नही है... उसने एक बहुत अच्छी बात कही जो मेरे दिल को छू गई..... उसने कहा मैं नही चाहता कोई नत्था देश में फिर से आत्महत्या करे........लेकिन क्या करे किसान का दर्द आज कोई समझ नही सकता ......उनकी जमीनों को कोडियो के भाव या तो बेचा जा रहा है या उन पर सेज बने जा रही है ... ऐसे में देश की कृषि विकास दर फीसदी फिसड्डी से आगे बद पानी मुश्किल दिखाई देती है ...

(लेखक युवा पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है .... आप बोलती कलम ब्लॉग पर जाकर इनके विचारो को पढ़ सकते है)

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

पूर्व छात्रो के जमा होने से खुशनुमा हुआ माखनलाल के परिसर का माहौल

एक तो एम ० फिल० की परीक्षा दूसरे ई ० टीवी ० का कैम्पस , आज दिनभर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रिकारिता विश्वविद्यालय में पुराने छात्रो का जमावड़ा रहा । पिछले कुछ दिनों तक विवादों में रहने के बाद आयी शून्यता को दूर करने के लिए इतना काफी था , खास तौर पर बड़ी संख्या में केव्स के छात्रों ने आकर माहौल को काफी खुशनुमा बना दिया छुट्टी का दिन होने के बाद भी विश्वविद्यालय में कोलाहल रहा ।
पिछले दिनों के माहौल ने परिसर की खुशी छीन ली थी , हार कोई ऊब रहा था कुछ लोगो ने तो घर जाने का मन बना लिया था , एक तो रूखा मौसम ऊपर से परिसर के रूखे माहौल से मन में एक अजीब तरह की अशांती थी लेकिन आज एक बार फिर लोग एकदूसरे के गले लगकर एक दूसरे का हल पूछते नजर आये, कैंटीन के बहार पूरा दिन छात्रो का जमावड़ा रहा और शाम कब हो गयी पता ही नहीं चला , आज फिर विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श हुआ जिसमे कुछ देर तो पिछली बाते केंद्र में रही लेकिन फिर अयोध्या मामले से लेकर बिहार चुनाव तक कई विषयो पर बहस हुयी , अयोध्या मामले के निर्णय को स्वागत योग्य बताते हुए लोगो ने निष्कर्ष निकला की अब मीडिया को इस विषय को छोड़ देना चाहिए , लोगो ने कहा की रोज रोज इस विषय पर बहस सामाजिक सोहार्द को विगड़ सकता है । कुछ लोगो ने तो यह भी कहा कि अब इस विषय पर कुछ भी न तो लिखा जाने चाहिए न ही दिखाया जाना चाहिए । विभिन्न विषयों पर सार्थक बहस के बीच बीच में लोग उन लोगो के बारे में भी जानकारी जुटते रहे जो नहीं आये थी या कही काम कर रहे थे । अयोध्या मामले पर लोगो ने आपना अनुभव बताते हुए कहा कि निर्णय के बाद वो कहा कहा गए और लोगो कि क्या प्रतिक्रिया रही ? कुलमिलाकर परिणाम यह निकला कि देश का आम आदमी इस निर्णय से खुश है वाह चाहे जिस समुदाय का हो।
आज कि इस सार्थक बहस ने हमारे खोये मनोबल को फिर वापस लाने का काम किया और एक बार फिर पढाई के ओर मन आकर्षित हुआ । लेकिन दुःख इस बात की है कि लोग अभी तक एक अच्छी नौकरी के लिए प्रयासरत ही है लेकिन खुसी कि बात यह है कि उनका मनोबल बढ़ा हुआ है और अपने पर पूरा भरोसा है ,आज नहीं तो कल लेकिन अच्छी शुरुवात करेंगे ।
हमारे लिए यही सब काफी था, और एक बार फिर पुराना माहोल बनाने में हमारे अग्रजो की जो भूमिका रही उसके लिए वो धन्यबाद के पात्र है । परिसर में दिग्गजों के जमावड़े ने माहौल तो खुशनुमा तो किया ही साथ ही छुट्टी के दिन भी राजू की काम से काम १०० चाय बिक गयी लगभग हार १५ मिनट के बाद कोई न कोई नया सीनियर आता था और आते ही सबसे पहले चाय का आदेश देता था ।
कहते है बीता हुआ दिन लौट कर नहीं आता लेकिन हमलोगों के लिए एक बार फिर बीता दिन लौट आया , हा कुछ अग्रज जो नहीं आये उनकी कमी जरूर खली लेकिन यह सुनकर संतोष हो गया की काम कर रहे है ।

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

D- day very smoothly and peacefully passed away
Its not fear, it is the respect that come from true soul
The day of verdict passed very smoothly and peacefully, rumour was whatever spreading that could not get the place. Past three from I can not have to understand what is going to be happen on D – day, but finally thanks to god nothing is happen else in between the society where I am and other live afar away home , Some people said that am very scared about decision may be or may be not. How I can speak ?
I am not talked anybody to this D- day ……why ? ? ….. only I was looked the atmosphere where was I staid. Many and more met me in tea stall whom into some Muslim and some Hindu. Just I was go sit and take tea and after finishing without looking here and there again come into the room and a few second spent with book then after again turned there where from I was got meal of everyday. ( for myself my head everywhere bend, its does not matter temple or mosque……). Whatever you can understand. But in my word, a respect I have for the both religion so…….today really I feel good because my India is not living with 1992 incident it believe in build power and every community has a good and finest mind so that, The day of verdict passed very smoothly and peacefully. Its not fear, it is the respect that come from true soul

Media prakash
Lokmat Maharastra
Aurangabad

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

केवल नौ दिन की मैया....???

केवल नौ दिन की मैया....???

अदबी और इल्मी माहौल का शहर कहा जाने वाला कोलकता अपने एक और चीज के लिए पूरे हिदुस्तान में शुमार हैं. खैर आप इसमें इतिहास को टटोलेंगे तो भी मुझे गुरेज नहीं होगा, क्योंकि आप अपने तरीके से इस शहर के बारे में जानते हो और मैं जरूर आप से कुछ ज्यादा जानता मालुमात रखा हूंगा क्योंकि भाई मेरी पैदाइस ही यहां कि है.लेकिन जिस विषय को मैं केंद्रित कर रहा हूं मेरा दावा है कि आप उससे सौ फीसदी रू-ब-रू होंगे. कोलकाता शहर का ब्रिटेन स्ट्रीट, कुछ कदम यहां से आगे ब‹ढेंगे तो उसी राह से होती हुई दाहिने मु‹डाव से एक और स‹डक दिखेगी, जिसे लोग बी के पाल के नाम से जानते हैं इसका दूसरा नाम नूतन बाजार भी यहां पीतल की बर्तनों एवं मूर्तियों का बाजार लगता है और इन दुकानों के चबुतरों पर ख‹डे होकरजरा बाये ओर नजरे दौ‹डाएंगे तो दिखेगी, केवल सकरी-सकरी कइयों गलियां और जब इन गलियों में प्रवेश करेंगे तो कोलकाता का लाजवाब पान आप का इंतजार कर रहा होगा. दो रुपए दीजिए पान चबाइए और फिर इसी राह से आगे ब‹ढजाइएं. यही असल काम की मंजिल और अदबी रूह जो आपके रूह तक उतरने को व्याकुल दिखेंगी, और मेरा विश्वास है कि आप भी बिना दिमागी कसरत किए आगे की प्रक्रिया में खुद ब खुद मसरूफ हो जाएंगे. खमा चाई..... लेकिन हुजूर कोई परहेज नहीं करता है. जो भी आते है, बडे इत्मेनान से कार्य का संपादन करते है. जैसे किसी अखबार का आखरी अंक जाने वाला हो.अब तक सारा दृश्य अपके दिमागी धरातल पर साफ उतर गया होगा. मगर आप जो भी समझे होंगे चीजे लगभग वहीं होगी पर सोच जरा सकारात्मक और सृजनात्मक हो तो उसमें भी हर रिश्ते नजर आएंगे. लेकिन सुअरबारे की नजर से नहीं इंसान की नजर से और वह भी इमान को पाक रखकर, भाई मेरा यकीन मानों दुर्गा का स्वरुप यहां भी दिखता और वह भी मां जैसी.यकिन मानिएगा कुछ चीजे ऐसे ही लोगबाग समझते हैं.दुर्गा पूजा बंगाल का एक ऐसा पर्व हैं जो पूरे बंगाल को इस समय मम-मय अर्थात माँ के लिए समर्पित कर देता हैं. चारो ओर बंगाली बा‹िडयों से लेकर भव्य पंडालों की तैयारियां महिनों से चलती हैं. माँ की मूर्तियां कुंभारटोली से लेकर नदियां और नदियां से लेकर हाव‹डा के गपतल्ला गली तक मूर्तियों का निर्माण कार्य चलता हैं. लेकिन पूजा मंडप के लेप हेतूं मिट्टी और शुद्ध जल या फिर मां की मूर्ति को आखरी रूप अर्थात चोख (आंख) बनाने के लिए भी शुद्ध मिटटी और शुद्ध जल की आवश्यकता प‹डती है. जो आखिरकार उस वैश्यालय से प्राप्त होता है जिसे हमारे तहजीबी लोग गलत कहते है, जी ह मैं सोनागाछी के वैश्याई चौखट की बात कर रहा हूं बंगाल की मान्यता रही है कि बिना इसके पूजा अधूरी रहेगी. केवल उन्हें चंद दिनों के लिए माँ स्वीकार करना समझ में नहीं आता मेरा मानना है कि वह सर्वथा से माँ रही है. उनके भीतर झांक कर देखीए, हर रिश्ते नजर आएंगे. चीजों को परोसने को लेकर आप जरूर अटपटा अनुभव किए होंगे......खैर (खमा चाई) (फितरते इंसान से वकिफ हूं मैं इसलिए सोचा ऐतमात के साथ समझा ले जाऊंगा. )गुनजाइश हो तो लिखिए.....आपका ही सभी का फैज है कि लिख रहा हूं....
प्रकाश पाण्डेय लोकमत समाचार महाराष्ट्र औरंगाबाद.....

रविवार, 26 सितंबर 2010

बुढापे ने लाचार किया मांगने को अधिकार....

बुढापे ने लाचार किया मांगने को अधिकार.... (प्रकाशपाण्डये)लोकमतसमाचार(औरंगाबाद महाराष्ट्र)कुछ दिन पहले मैंने इस विषय पर काम किया है सो अपने अनुभव को अपने अंदाज में बयां कर रहा हूं. जरा गौर फरमाइगा..........इस सिलसिले में मैं औरंगाबाद के कई वृद्धा आश्रमों में भी गया था..जिसका निचो‹ड लिख रहा हूं....पूरा संदर्भ शायद सम्भव नहीं हैं. इसके पहले भी अंग्रेजी में एक ऑर्टिकल लिख चुका हूं लेकिन दुख है कि आप दोस्तों संबंधित विषय पर कोई टिका टिप्पणी नहीं करते हैं.. जीवित रहने दो मारों मत...........कैव्स प्रणाम आपकोयहां से प‹ढे..... .................
आंखों की झुरियां, बालों का सफेदपन यह बयां करता है कि जवानी की छटा हुजूर ढल गई है, बु‹ढापे ने दस्तक देना शुरू कर दिया है. खुद को सम्भलों और चलों आराम करों जो बीज तुमने अभी तक लगाया था उसका असल भोग करने का सही वक्त आ गया हैं. तन जाओं दोहन शुरू करों. यह तो पम्परागत हमारा अधिकार कहता है लेकिन जिस बीज को आपने पानी दिया है वह सत प्रतिशत फूला चुका हैं परंतु दुख इस बात की है कि आप ने कुछ ज्यादा ही पानी पीला दिया. यही कारण है कि वह आज आप से अधिक दिमागदार हो चुका है और आपको ही अस्वीकार करना शुरू कर दिया है. आप इस समय लाचार हो गए है, सारी क्षमताएं स्थिर और सिमटने लगी हैं.स्वावलंबी तो आप कतई नहीं रह सकते है. इसका भली भाति एहसास आपको अब तक हो ही गया होगा. खैर ऐसे वक्त में औलाद ही मुंह मो‹ड लिया है तो आप क्या कर सकते है. आपके दिल पर क्या गुजर रही होगी समझ सकते हंै. आपने अपनी हर इच्छाओं की तिलांजलि देकर अपने जिगर के टुक‹डे को उसकी पसंदीदा वस्तुएं समय-दर-समय मुहैया कराया, आज जब आप पर ही संकट के बादल मंडराने लगे है तो बेटे जनाब ने मुंह मो‹डना शुरू कर दिया. वाह खुदा तुने कैसे वक्त में ऐसे बच्चों को जन्म दिया था. सारी मशांए मानों खोखली मात्र रह गई हैं. बेटा जनाब क्या आपके बु‹ढापे का सहारा बनेंगे. लेकिन इस मॉडन दौर के कुछ दिमागदार सपूतों ने खुद को प्रमाणित कर दिया है कि वो औलाद नहीं धरती के अनचाहे अवसाद है जिसे इस धरती पर आने का कोई हक ही नहीं था. खैर आ ही गए है तो विषाद जरूर फैलाएंगे और आप बचकर कहा जाएंगे.जिम्मेदारियों का उन्हें कोई एहसास नहीं होता क्योंकि स्कूल से लेकर कॉलेज जाने तक आपने बच्चा हैं कहकर उसे जिम्मेदारी सौंपी ही नहीं. दायित्व को इन नवाबजादों ने पंचतत्व में विलीन कर दिया हैं. आज सबकुछ खोकर आप लोग स्वयं अपने अधिकार के लिए गि‹डगि‹डा रहे हैं तो क्या होगा. चलिएं दोहरे अर्थों को छो‹डकर साफ-साफ बात करते है. हालही में दिल्ली हाई कोर्ट में ७३ साल के एक बुजुर्ग ने अपने बेटे के खिलाफ अर्जी दाखिल कर अपने प्रोटेक्शन की मांग की. खैर यह पहला मामला नहीं होगा,ऐसे बहुतायत मामले हैं, जिसमें बुजुर्ग कभी प्रोटेक्शन की मांग करता है तो कभी गुजारा-भत्ते की गुहार लगाता हंै. लेकिन धन्यवाद भारतीय संविधान और न्यायालय का जिसने इस पूरे मसले पर ध्यान केद्रित करते हुए औलाद की कानूनी जिम्मेदारी को तय कर, इस संदर्भ विशेष के लिए निर्मित कानून के अंतर्गत नियम कायदों को बनाया. न्यायालय ने बुजुर्गों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए कुछ नियम कायदे बनाए जो उनके बुरे दिनों में संकट मोचन का काम करती हंै.नियम कायदे :औलाद अपने माता पिता को किसी भी रूप से परेशान कर रहा हो, चाहे वो शारीरिक उत्पी‹डन हो या मानसिक ऐसे स्थिति में बुजुर्ग को अपने हक के मद्देनजर स्थानीय थाने में पहुंच अपने बेटे के खिलाफ केस फाइल कर कार्रवाई की मांग कर सकता हंै. भारतीय संविधान में व्यक्ति विशेष की स्वतंत्रता के मद्देनजर कुछ मौलिक अधिकार बनाए गए हैं. अनुच्छेद-२१ के कहता है कि सभी को जीवन जीने की स्वतंत्रता दी गई हैं. किसी कारण वस व्यक्ति को यह लगे कि उसके इस स्वतंत्रता पर कोई किसी प्रकार का बंदिश लगा रहा हैं तो संबंधित स्थानीय पुलिस थाने में पहुंच प्रोटक्शन की मांग कर सकता हैं. अगर ऐसे में पुलिस सहयोग नहीं करती हैं तो बुजुर्ग कोर्ट में मामले को दर्ज करा कर प्रोटक्शन की मांग रख सकता हैं तथा उक्त पुलिस अधिकारी जिसने केस फाइल नहीं किया था के खिलाफ भी मामला दर्ज कर कार्रवाई की मांग कर सकता हैं. इसके अलावा भी बुजुर्ग कानून की सहायता लेकर अपने बच्चों को कानूनी रूप से मजबूर कर गुजारा भत्ता की मांग कर सकता है. संतान नहीं होने की स्थिति में जो भी व्यक्ति उसके जायदाद का वारिस बनता हैं, वह व्यक्ति उनका ख्याल रखेंगा. साथ ही उसके स्वास्थ्य एवं भरण पोषण पर ध्यान देगा. कुछ केस ऐसे भी सामने आते है जिसमें बुजुर्ग प्रॉपर्टी स्वयं के पास अर्जित रखता है और वह इसे विल के जरिए किसी शख्स के नाम कर देता है, तो उस शख्स जिम्मेदारी होती है कि वह उसका देखभाल करें. द मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैंरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट २००७ के तहत ट्रिब्यूनल का गठन किया गया. इस ट्रिब्यूनल में एडीएम लेवल का अधिकारी बैंठता है. सेक्शन-१७ के मुताबिक इस मामले में किसी वकील की आवश्यकता नहीं होती है. इसके अंतर्गत दोनों पक्षों को अपनी बात स्वयं रखनी प‹डती हैं. सेक्शन-५ कहता है कि अगर किसी कारण वस बुजुर्ग कोर्ट आने की अवस्था में नहीं है तो वह इस काम के लिए किसी अन्य को नियुक्त कर सकता है.
‘‘बु‹ढापा वृद्धा बचपन का पूर्ण आगमन हुआ करता है. कहा जाता है कि इस अवस्था में प्रवेश करने बाद व्यक्ति की इच्छाए एक बार फिर से जागृत होती हंै, और उसके बर्ताव में एक नटखटी बच्चे का स्वरुप दिखने लगता हैं. ऐसे में वह सोचता हैं कि कोई उसका ख्याल रखे पालन पोषण करें.ङ्कङ्क प्रेमचंद (बु‹ढी काकी )...............

गुरुवार, 23 सितंबर 2010




Mother pain calling out inside the orphan

Time never says that what is going on tomorrow with us. But our basic problem is some one does not want to accept this true, because they realize” they will always get them young, never they are not going to face older age”. Dear at once accept and try to make out nature changes which time by time swirling such as a form of ecosystem. A many time ago, when I was read in class five, our teacher Mr Bhattacharjee was taught us a lesson , I am not more confirmed about the name of that chapter but as far as I think may be there name was “respect of parents”. there in between we got a central idea of whole about the respect how to deliver pleasure before our mother and father that he feels both of them built a solid wall not mould of molder. This meditation speech of respect I got through my teacher and that writer who wrote that lesson for understanding us the real defination of relationship between child and their parents. now what I am feel guilty myself do not know for ?. yesterday I was reached a orphan for reporting purpose there were found some old age suffered loveable mother and father who had been unwanted for her and his childs that’s due to they spent there time here and everyday pray to god & demand to them death nothing else. RUKHNANI DEVI KHEDKAR is a name of mother who love all one but this loveable mother could not get protection of their child between this stage, when really she deserves it for herself. Sorrow not sorrow great heart pain I feel yesterday ………………brother do not sees yourself as DOCTOR, ENGINEER, and other professionals only need is do respect her & his parents and prepare self as a good son…..(PRAKASH PANDEY)

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

हम ही है हिंदुस्तान

हिन्दू कटे या कटे मुसलमान ,सबसे पहले दोस्तों कटेगा हिंदुस्तानसंगम से बना है देश हर धर्म इसकी जान , कई धर्मो , भाषाओ ,संस्कृतियों से मिलकर बना है हिंदुस्तान ।हिंदुस्तान शरीर है धर्म इसकी भुजाये एक भी भुजा कटी तो अधुरा रहेगा हिंदुस्तानहै उदारहण पडोशी देशो की पहचान , कट कट कर जो बने है और लगते है बेजानकहते है इनका या उनका है हिंदुस्तान ,वो खुद ही नहीं जानते क्या चीज है हिंदुस्तानचंद स्वार्थियो के चक्कर में हम अगर पड़ जायेंगे, स्वार्थी स्वार्थ निकालेंगे और हम खड़े पछतायेंगेनेता कुर्सी की तलाश में अपने घोड़े दौड़ाएंगे, इन घोड़ो के पैरो से बस मानव रौंदे जायेंगेमानवता होगी शर्मशार और नेता खुशी मनाएंगे, विश्व पटल पर भारत की संकीर्ण छवि बनायेंगेवो घूमेंगे ए० सी 0 में और हम फुटपाथ पर रात बिताएंगे,कभी कभी कुछ जलशो में वो हम पर रहम दीखायेंगे ,पीछे मुड़ते ही हमारी गरीबी लाचारी का मजाक उड़ायेंगे हमसे ही बने है वो और वी ० वी ०आई० पी ० कहलायेंगे , अब हम उनके दरवाजे के अन्दर नहीं घुसने पाएंगे इसलिए दोस्तों कहता हू लो खुद को पहचान ,इससे पहले फिर एक बार जल उठे हिंदुस्तानबेनकाब करो इन अलगाववादी ताकतों को और बता दो ,न हम हिन्दू है न है हम मुसलमान , हम जान गए है की हम ही है हिंदुस्तान हम ही है हिंदुस्तान ............

हम ही है हिंदुस्तान

हिन्दू कटे या कटे मुसलमान ,सबसे पहले दोस्तों कटेगा हिंदुस्तान
संगम से बना है देश हर धर्म इसकी जान , कई धर्मो , भाषाओ ,संस्कृतियों से मिलकर बना है हिंदुस्तान ।
हिंदुस्तान शरीर है धर्म इसकी भुजाये एक भी भुजा कटी तो अधुरा रहेगा हिंदुस्तान
है उदारहण पडोशी देशो की पहचान , कट कट कर जो बने है और लगते है बेजान
कहते है इनका या उनका है हिंदुस्तान ,वो खुद ही नहीं जानते क्या चीज है हिंदुस्तान

चंद स्वार्थियो के चक्कर में हम अगर पड़ जायेंगे, स्वार्थी स्वार्थ निकालेंगे और हम खड़े पछतायेंगे
नेता कुर्सी की तलाश में अपने घोड़े दौड़ाएंगे, इन घोड़ो के पैरो से बस मानव रौंदे जायेंगे
मानवता होगी शर्मशार और नेता खुशी मनाएंगे, विश्व पटल पर भारत की संकीर्ण छवि बनायेंगे
वो घूमेंगे ए० सी 0 में और हम फुटपाथ पर रात बिताएंगे,
कभी कभी कुछ जलशो में वो हम पर रहम दीखायेंगे ,पीछे मुड़ते ही हमारी गरीबी लाचारी का मजाक उड़ायेंगे
हमसे ही बने है वो और वी ० वी ०आई० पी ० कहलायेंगे , अब हम उनके दरवाजे के अन्दर नहीं घुसने पाएंगे
इसलिए दोस्तों कहता हू लो खुद को पहचान ,इससे पहले फिर एक बार जल उठे हिंदुस्तान
बेनकाब करो इन अलगाववादी ताकतों को और बता दो ,
न हम हिन्दू है न है हम मुसलमान , हम जान गए है की हम ही है हिंदुस्तान
हम ही है हिंदुस्तान ............ जो

सोमवार, 13 सितंबर 2010

क क

विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे " पर्वत पुत्र "


भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त का नाम आज भी राष्ट्रीयराजनीती में बड़े गर्व के साथ लिया जाता है... पन्त जी के अतुलनीय योगदान के कारण वह पूरे राष्ट्र के लिए युगपुरुष के समान थे जिसने अपने ओजस्वी विचारो के द्वारा राष्ट्रीय राजनीती में हलचल ला दी थी.... उनके व्यक्तित्व में समाज सेवा, त्याग, दूरदर्शिता का बेजोड़ सम्मिश्रण था... समस्त भारत में वे उनकी १२३ वी जयंती पर बीते दिनों याद किये गए...पन्त जी का जन्म १० सितम्बर १८८७ को उत्तराखंड के अल्मोड़ा से तीस किलोमीटर दूर हवालबाग विकासखंड के खूट नामक गाव में हुआ था... प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा अपने जिले में पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा पाने के लिए ये इलाहाबाद चले गए...जनमुद्दो की वकालत करने की तीव्र जिज्ञासा ने इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एल एल बी की डिग्री लेने को विवश किया ... १९०५ में इस उपाधि के मिलने के बाद इन्होने अपना जीवन न्यायिक कार्यो में समर्पित कर दिया....पन्त जी के जीवन पर महात्मा गाँधी का विशेष प्रभाव पड़ा....गाँधी के कहने पर ये वकालत को छोड़कर राजनीती में चले आये.... उस समय समाज में दो तरह की विचार धाराएं थी... पहली विचारधारा में प्रगतिशील लोग हुआ करते थे, वही दूसरी विचार धारा में स्वदेश प्रेमी लोग थे... पन्त जी ने दोनों विचार धारा में समन्वय कायम कर उत्तराखंड के कुमाऊ में राष्ट्रीय चेतना फ़ैलाने में अपनी महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाई....उन्होंने गरीबो के विरोध में आवाज उठाते हुए कुली बेगार के खिलाफ विशाल आन्दोलन चलाया ... १९१६ में अपने प्रयासों से कुमाऊ परिषद की स्थापना की और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए.....१९१६ का वर्ष पन्त जी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ ... इस वर्ष पन्त जी अपने असाधारण कार्यो के कारण किसी के परिचय के मोहताज नही रहे...यही वह वर्ष था जब वे राष्ट्रीय राजनीती में धूमकेतु की तरह चमके... १९२० में गाँधी जी के सहयोग से असहयोग आन्दोलन में इन्होने अपना सक्रिय सहयोग दिया... १९२७ में सर्व सम्मति से कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए... १९ नवम्बर १९२८ को लखनऊ में जब साईमन कमीशन आया तो नेहरु की साथ इन्होने भी उनका विरोध किया.... देश की आजादी में पन्त के योगदान को कभी नही भुलाया जा सकता है.... जंगे आजादी की दौर में हिमालय पुत्र की द्वारा प्रत्येक आन्दोलन चाहे वह सत्याग्रह हो या असहयोग आन्दोलन ,अपना पूरा योगदान दिया ... आजादी की दौर में अपनी सक्रिय भूमिकाओं की चलते पन्त जी को कई बार जेल की यात्राये भी करनी पड़ी...१५ अगस्त १९४७ को वह आज़ाद भारत में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये गए ...इस पद पर वह १९५२ तक काम करते रहे... १९५२ में देश की संविधान बनाये जाने के बाद जब प्रथम आम चुनाव हुए तो उनका सञ्चालन पन्त जी की प्रयास से हुआ..इन चुनावो में कांग्रेस ने विजय पताका लहराई...१९५४ में जवाहर लाल नेहरु की आग्रह पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल में गृह मत्री का ताज पहना ... अपने कार्यकाल में पन्त जी ने विभिन्न कामो को पूरा करने का भरसक प्रयत्न किया....२६ जनवरी का दिन कुमाऊ के इतिहास में बड़ा महत्वपूर्ण रहा ...इस तिथि को भारत सरकार ने उन्हें "भारत रत्न" की उपाधि से विभूषित किया....७ मार्च १९६१ को पन्त जी की ह्रदय गति रुक जाने से मौत हो गई.... पन्त जी ने अपने प्रयासों से राष्ट्र हित के जितने काम किये उसके कारण भारतीय इतिहास में उनके योगदान को नही भुलाया जा सकता ...कुछ दिन पहले हमने उनकी १२३ वी जयंती मनाई .... पन्त जी को सच्ची श्रद्धांजलि तब मिले पाएगी जब हम उनके द्वारा कहे गए विचारो और सिद्धांतो पर चले .......
( लेखक युवा पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है..... आप बोलती कलम ब्लॉग पर जाकर समसामयिक विषयो पर इनके विचार पढ़ सकते है)

रविवार, 12 सितंबर 2010

भला हिजड़ों के राज में भी राम मंदिर का निर्माण हो सकता है क्या...........हाँ कोशिश करना पड़ेगा इसलिए सभी राम भक्तों से निवेदन है की हनुमान चालीसा पढ़े....जिससे हमारे सभी भाइयों को सदबुद्धि आये ......और राम जी का भव्य मंदिर अयोध्या में बने......जय श्री राम......



२२ जुलाई २००८ को भरी लोकसभा में अशोक अर्गल, फगन सिंह कुलस्ते और  महावीर भगौरा द्वारा  नोटों की गद्दी उछाली गयी थी ....बीजेपी वालों का कहना था की कांग्रेस और सपा वालों ने उनके सांसदों को मनमोहन सरकार के पक्ष में वोट डालने के लिए ये नोट भेजे थे...जबकि कांग्रेस और सपा ने आरोप लगाया की ये नोट खुद बीजेपी के सांसदों  ने ही लाये हैं ...और एक सीडी के बारे में भी चर्चा चली थी की स्ट्रिंग आपरेशन हुआ है और सबूत इसी सीडी में है....जिसे सांसदों के विशेषाधिकार के कारण जनता को नही दिखाया गया .....सब कुछ जनता के सामने हुआ...टीवी...पे लाइव दिखाई दिया ....मगर संसद में कुछ हिजड़े जरुर हैं वे चाहें कांग्रेस में हो चाहें किसी अन्य दल  में ...जिन्होंने....दोषियों  को बचा लिया.....ऐसे हिजड़ों के राज में राम मंदिर का निर्माण कैसे सम्भव है........इस लिए राम मंदिर का निर्माण हनुमान जी की कृपा से ही सम्भव है....इसलिए सभी राम भक्तों से निवेदन है की हनुमान चालीसा पढ़े....जिससे हमारे सभी  भाइयों को सदबुद्धि आये ......और राम जी का भव्य मंदिर अयोध्या में बने......जय श्री राम......

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

छुप छुप के पिया हम अंधेरो में मिलते रहे
सामने आये तो शर्मागाये
खैर जाओ तुम भी भूल जाओ
और चलो हम भी भूल जाते
पर याद रखना अबकी कुछ किये तो
मास खसोट लूँगा
जीते जी जावा हसरतो पर माघ भर देसी लाल पारी डालुगी।
ये ही है नजराए हिंदुस्तान का फलसफा .......राजनीती की निति बिस्तर से शुरू होती.....

सोमवार, 6 सितंबर 2010

चुप रहो , सब चुप रहो, कोई नही बोलेगा , इस देश में सबसे होशियार मेरी माँ है ----और सबसे योग्य मै..


जी हाँ कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर फिर से सोनिया गाँधी  विराजमान हो गयी हैं और देश का अगला प्रधानमंत्री भी अघोषित रूप से राहुल गाँधी ही माने जा रहे है....बाकि इस देश में कोई न तो युवा है न ही योग्य ......और तो और खुद तो परिवारवाद की मिशाल कायम कर  रहे हैं..और युवाओं को बेवकूफ बनाने के लिए .युवक कांग्रेस में संगठन  चुनाव कराकर युवाओं को आगे लाने की बात कर रहे हैं......आगे और लिखूंगा अभी  टाइम नही है..

रविवार, 5 सितंबर 2010

माखनलाल वि.वि. के कुलपति श्री बी.के कुठियाला जी की रीवा यात्रा (४ सितम्बर २०१०)


 



कैमरामैन---रामचंद्र दैनिक जागरण -रीवा

रामचन्द्र rewa me  एक एन जी ओ भी चला रहे हैं जिसमे पत्रकारों की भागीदारी सर्वाधिक है ...ये जनता के सहयोग से जनता की सेवा की मिशाल कायम कर रहे हैं...

वाह रे जी मान गए...

विवेक  मिश्र -गाँव-टोला ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं

वाह रे !शीला जी मान गए
दिल्ली वाले सब जान गए
अब क्या बहाना मारेंगी
कलमाड़ी का कहा और मानेंगी
अब तो दुनिया सारी जानेगी
मीडिया भी है खूब डट गया
मजदूर बेचारा खट गया
वेल्थ ही वेल्थ बट गया
बचा है सब कॉमन-कॉमन
अब कौन थामेगा तुम्हारा दामन
वाह रे !शीला जी मान गए
दिल्ली वाले सब जान गए
अब दिल्ली भी है सोचती
बेकार में ही क्यूँ मै उजड़ गयी
चारो और ठसाठस भर गयी
टम्प्रेरी व्यवस्था में बस जायेगी
वर्ल्ड क्लास मेट्रो भी शर्माएगी
यात्री उठेंगे या सामान उठेगा
गेम्स में यह सवाल बनेगा
और किस-किस को खिलाएँगी
आखिर मंहगाई कब घटाएंगी
अन्न-पानी को जब सब तरसेंगे
तब मणिशंकर जैसे तुम पर बरसेंगे
वाह रे !शीला जी मान गए
दिल्ली वाले सब जान गए
कलमाडी जी कुछ ध्यान धरो
राष्ट्र का पैसा यूँ न बर्बाद करो
उधर गिल जी की अलग राग सुनो
"अफसर नहीं खिलाडी चुनो"
आप तो गिल साहब केवल दाना चुनो
आप ने ही तो कहा है
"भगवान् खेल करवाएगा"
फिर ज़रा सोचिये राष्ट्र क्यूँ शर्मायेगा
मनमोहन जी आप क्यूँ शांत हैं ?
आपकी समितियों के तो खूनी दांत हैं
अब तक इस "मनमोहन कॉमनवेल्थ"में
खर्च हुआ है बेवजह का फाईनेन्स
देख सके तो देख ले
नहीं तो लगा ले लेंस
रकम आपको भी बड़ी दिखेगी
वित्त में आपकी समझ बढ़ेगी
हे! मनमोहन, शीला और कलमाडी जी
कुछ तो दया करो इस जनता पर
है सावन होगा कॉमन
जनता की हेल्थ पर भी ध्यान दो
सबको दिया हम लोगो को भी कुछ वेल्थ दान दो
फिर हम कहेंगे
वाह रे ! जी मान गए.....

सोमवार, 30 अगस्त 2010

पत्रकारिता के नाम पर कलंक

पत्रकारिता के नाम पर कलंक

जब से पत्रकारिता का मीडिया के साथ अनुबंध हुआ है या यूँ कहें कि जबसे पत्रकारिता नें अपना नाम बदलकर मीडिया रख लिया है, तब से इसके भाव कुछ ज़्यादा ही चढ गये हैं। भाव तो इस कदर चढ गये हैं कि इसको अपनी आँख के अलावा मछली की आँख तक देखने की फुरसत नहीं है। अगर वास्तव में इसके सही पहलुओं पर विचार किया जाय तो निष्कर्श यह निकलता है कि पत्रकारिता और मीडिया शब्द वास्तव में कर भी क्या सकते हैं। जैसा कि हम जानते ही हैं कि शब्द इन्सानों द्वारा गढि़त या यूँ कहें कि प्रतिस्ठित, चतुर, चालाक, तिकड़मीं आदि आदि प्रकार के लोगों के दिमाग में उपजे गढंत हैं । जैसे कि इन्सान को भगवान नें बनाया फिर हम नें यानी इन्सानों नें रिस्ते-नाते, ऊँच-नीच, जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय, आदि में बांट दिया। अभी बात चल रही थी पत्रकारिता की जहाँ पर सिद्ध हो गया कि कि यह इन्सान की उपज है, तो फिर क्यों ना इन्सान इसमें अपना बस चलानें की कोशिश करे। जब किसी चीज़ का कद और शक्ति बढती है तब उसकी तरफ पूरी क़ायनात का झुकाव लाजमी है। यानी जब मीडिया या पत्रकारिता भारतीय लोकतंत्र का चौथा खम्भा या पिलर बन ही गया है तो इसमें भी बदलाव आना ही चाहिये भले ही यह पिलर निर्जीव या चेतना हीन ही क्यों न हो। क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है। मीडिया का कद बढते ही इसमें रोटी ढूढने वालों की कतार भी बढने लगी। जब यह कतार बढी और इस क्षेत्र में काम करने वालों की मात्रा बढी तो मीडिया शब्द के साथ शोषण शब्द जुड़ गया। फिर शोषण कुछ इस कदर बढने लगा कि रोज़ खुल रहे मीडिया संस्थानों से निकले छात्रों को यानी भावी पत्रकारों को निजी समाचार चैनलों, समाचार पत्रों, प्रोडक्सन हाउस, और समचार से जुड़े सभी क्षेत्रों में बिना बेतन के फ्रेशर का ठप्पा लगाकर दो महीने चार महीने मुफ्त में काम कराने की प्रथा चल पडी। यह प्रथा और सभी क्षेत्रों में भी है ऐसा नही की यहीं बस है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं लगाया जा सकता कि इस दुनिया का अगर एक इन्सान अँधा है तो हम सारी दुनिया को ही अँधा कर दें। और इस प्रकार अपने घर का भी फूँक कर निजी संस्थानों को फायदा पहुँचाने का धंधा चल पड़ा। अब अगर कहें कि तो फिर लोग करते क्यूँ हैं, तो भाई कोई कितना भी पढ लिख कर, प्रशिक्षण लेकर तैयार हो जाय उसे पैसा न देना पड़े और उसकी सद्बुद्धि का सदुपयोग अपने चैनल को आगे बढाने में कैसे उपयोग किया जाय, इसका बखूबी इन्तजाम किया गया और वही फ्रेशर वाली शील सभी निजी संस्थानों नें बनवाकर रख ली और बच्चों पर दे मारी। यानी 4-6 महीने मुफ्त में काम करो तब जा कर बेतन लेने लायक हो पाओगे। नाटक की सीन यहीं खतम नही होती अगर किसी को नौकरी मिल भी गई तो बिना अप्वाइन्टमेन्ट लेटर के लेबर की तरह नियुक्त कर लिया जाता है। अब यहाँ शुरू होता है असली खेल। इसके बाद जो पुराने कर्मचारी और ऊँचे पोस्ट के लोग होत हैं वे अपने अधीनस्तों से पैसे से ज़्यादा और समय से ज़्यादा काम लेते हैं। इसकी इजाज़त मीडिया और पत्रकारिता नही देता, इसे तो सिर्फ बदनाम किया जाता है। यह काम तो इसके अंदर काम करने वाले कामचोर मीडिया मोहरों का है। यहा पर अधीनस्थ खुल कर और आवाज़ बुलंद कर के बोल भी नही सकते क्योंकि उनके पास तो कोई अथराइज्ड लेटर भी नही है , और दूसरा न बोलने का कारण उनके पीछे लगी हुई लम्बी कतार। इस नई पीढी (पत्रकारों) के मन में यह बात आना लाज़मी है कि जायें तो जायें कहाँ। इसलिये वरिष्ठ पत्रकार अपने अधीनस्थ को अपना भी काम सौप कर रफूचक्कर हो लेते हैं। अब अनुभवी पत्रकारों के तरफ से यह यह दलील आ जाती है कि इससे तो सीखने का मौका मिलता है शोषण कहाँ होता है, लेकिन सीनियर यह भूल जाते हैं कि जहाँ काम आवै सुई कहाँ करै तलबार। ऐसा नही कि यह पूरी बिरादरी ही एक तरह की है। यहाँ भी लोग ऐसे हैं जिनसे पत्रकारिता को गर्व होता है। लेकिन वो कुछ ऐसे जगहों में मिलते हैं, जिनको देख कर लोग हंसते हैं, कभी-कभी सफेद बाल के पीछे, टूटीफूटी मेज और कुर्सी के नीचे, चलिसमा (पाँवर का चश्मा) के पीछे, डण्डे के सहारे या किसी इन्सान के सहारे, लडखडाती जीभ और धोखा दे चुके दातों के सहारे, बेचारगी भरी पलकों के नीचे आदि आदि। यानी अनुमान लगाना आसान है कि कौन सी पीढी कहाँ है। इसके इतर भी लोग मिलते हैं लेकिन अब यह ब्यवसाय उनको अपने साथ टिकने और अपने पास फटकने का इजाज़त नही देता। यानी इस क्षेत्र में ताजा-ताजा जो पौधरोपड़ किया गया है उसमे फूल लगने, फल लगने, फल के मजबूत होने और पकने का बहुत ही नजदीक समय आ गया है। इसलिये पूरे बगीचे के पौधों को साथ में मिलकर निर्णय लेने और आपस में एक दूसरे से लिपट जाने का समय आ गया है जिससे कि कोई छति ना पहुचा सके बर्ना अगर किसी प्रकार से बाग को छति पहुचाने में कामयाबी मिली समझो समाज की प्राँण वायु आक्सीजन का उन्मूलन हो जायेगा, और जो मीडिया आज अपनी टी.आर.पी. बढाने के लिये झूठ की अफवाह फैलाती घूम रही है कि 2012 में प्रलय आ जायेगी। वह सिर्फ मीडिया के लिये आयेगी और किसी भी प्रकार की क्षति नही होगी इसका दावा है। एक बात और कि अगर मीडिया और पत्रकारिता की यह पौध भी अगर ना जागी तो समाज में विचार, सोच, आपसी समझ, आदि सभी उपजों में प्रलय ज़रूर आ जायेगी। और यह समाज बिना पानी की मछली की तरह हो जायेगा। यानी अब नई पीढी ठान ले और इस बात को भलीभाँति समझ ले कि अगर अधिकार मागने से न मिले तो छीनना भी धर्म है।
निराकार को आकर देता
मन को देता ठिठुरन
आब को आप से मिलाता
कर को मनचाहे मन से
करवाता ................
कहता सबको चल,
चढ़ पर्वत पर
गिरने का न डर तू पाल
पाला जो मन में ऐसा कुटिका
तो चल लेले सन्यास......
भाई बड़ा भाबंदर आपना पथ है
कलम की मिट गयी धार

सोमवार, 23 अगस्त 2010

Geelani threatens more protests if crackdowns are not stopped

Geelani threatens more protests if crackdowns are not stopped Syed Ali Shah Geelani, chairman Hurriyat Conference (G), today threatened to intensify the ongoing public protests if the crackdowns against the people were not put to an end immediately। In a statement, he strongly condemned the re-introduction of crackdown, identification parade, arrests of youth and humiliating behaviour with women by police and forces. Geelani also appealed the people to foil such tactics of the government. He asked the people to come out of their houses and not to allow the police and forces to conduct the crack down and other related actions. “I appeal the people to come out collectively out of their houses and protest and foil the attempts to arrest the youth,” Geelani said. He asked the men to remain on the forefront by forming a defence wall and by keeping the women behind so that forces personnel do not reach to them. “Those in the crackdown must beat tin and raise slogans. Those outside the crackdown must also raise slogans and move to the area under crackdown. Doing so has become inevitable to save the youth from arrests and protect the honour of women,” the Hurriyat (G) chairman said. He strongly assailed the snatching of dupatta of a woman by police men during a crackdown at Bemina. “Forces personnel have got frustrated. And some Kashmiri police officers are committing more atrocities on people than forces. For promotions they are at war against their own people. Such acts are highly condemnable,” Geelani said. The Hurriyat (G) chairman alleged that Indian rulers and their local agents have got frustrated due to strong pro-freedom sentiment in Kashmiri youth and now they have started a new but intense chapter of suppression,” he said. Geelani viewed that unjustified curfew and crackdown is part of the new suppressive policy of Indian and state governments. “The policy makers in New Delhi have not learnt anything from the past and are committing same mistakes again and again. Such mistakes have not yielded anything for them in the past nor would they do so in future also,” he said. The Hurriyat (G) chairman described as deceit the 50,000 jobs and involvement of MLAs into it and said providing jobs to Kashmiri youth in the state is not a favour. “Such a process is carried forward through service selection board and involving MLAs into it is part of deceitful politics,” he said. Geelani asked the people to remain vigilant against such tactics and said the government must also realise that people would not surrender their sacred movement for ordinary benefits and concessions. Meanwhile, Prof Jaswant Singh Mann, president All India Shiromani Akali Dal, heading a delegation of Sikhs, met Geelani at his Hyderpora residence. The Hurriyat (G) chairman assured them that Sikhs are an inseparable part of Kashmiri society. “We have centuries old tradition of communal brotherhood and this tradition would be protected at any cost and any situation,” he said. Geelani stated that threatening letters to Sikhs is the handiwork of Indian agencies and an attempt to divert the attention from the ongoing massacre in Kashmir.

today expressed deep concern over the an onymous threats letters to members of the Sikh community asking them to leave the Kashmir valley.In a handout issued here from Srinagar , the ANC president, Begum Khalida Shah, aunt of Chief minister Omar Abdullah and sister of New and Renowable Energy Minister Farooq Abdullah, had expressed her deep anguish and sorrow over the conspiracy being hatched to harm the traditional communal harmony in the state.She has expressed her dismay at the Sikh Community being threatened through posters. "In a similar ploy our Pandit brethren were made to leave the valley,'' she said, adding,'' Now similar plots were being hatched to scare our Sikh brethren and force them to leave the valley. Begum Shah has expressed her solidarity with the Sikh community and assured that ANC would not allow any such conspiracy to succeed.The ANC President has appealed to all the people not to allow any such nefarious designs to succeed and uphold the rich tradition of the Hindu-Muslim and Sikh unity at all costs and defeat all communal forces bent upon undermining the rich traditions of Kashmiriyat.

रविवार, 22 अगस्त 2010

कैव्स जय हो...हमसे बढकर कौन है....




दोस्तों देश की स्थिति नाजुक है,,,कश्मीर जल रहा है..हमको बहुत खल रहा है...गाँधी ख़ानदान का पिछलग्गू सरदार चुप है ...सोनिया और राहुल गाँधी के इशारे का इंतजार कर रहा है...राहुल और सोनिया सोच रहे है की थोडा और इंतजार करा लिया जाए...हिंदुस्तान के शायद कुछ मुसलमान खुस हो जाएँ और वोट बैंक पक्का हो जाए.....लेकिन सोनिया और राहुल को शायद नही मालूम की सच्चा हिन्दुस्तानी मुसलमान कभी भी कश्मीर में क्या पूरे हिंदुस्तान में कभी भेद भाव नही चाहेगा.....और गद्दारों की बात क्या की जाये ...वे  चाहें हिन्दू हो या मुसलमान उन्हें तो वतन का खाना है पाकिस्तान का गाना है......वैसे देश के गद्दारों.......सावधान ,,चाहें तुम सत्ता में हो या...आम जनता के रूप में.....कसम है भारत माता की भगत सिंह और आजाद की क़ुरबानी बर्बाद नहीं जाने देंगे....तुम्हे गोली मार दी जाएगी ...अगर संसद में हो तो संसद  में  घुसकर गोली  मारी  जाएगी.गद्दारों  को जो बचाएगा वो भी गद्दार कहलायेगा...वो भी मारा जायेगा ...ये मत सोचना की सांसद हो गए हो तो तुम्हे जनता का सेवक होने का तमगा मिल गया है......गद्दारों  के लिए हिंदुस्तान में कोई जगह नही है.....इन्कलाब जिंदाबाद......का नारा लगाने वाले शहीद क्या  इसी दिन के लिए अपनी जान  कुर्बान कर गये थे ......कहानी आगे भी है...लेकिन ज्यादा टाइम अभी नही है......सिर्फ राहुल गाँधी जी से आग्रह करूँगा कि आप कश्मीर समेत पुरे हिंदुस्तान में हिन्दू मुस्लिम में भेद भाव मिटाने  की  कोसिस करो...आप समर्थ हो....बाकि सब तो आपके दया दृष्टी पर सांसद,एमेले मंत्री--प्रधानमंत्री...बने हुए है..........................................एक बात और कहना चाहूँगा हिंदुस्तान के पहले पत्रकारिता  विश्वविद्यालय माखनलाल विश्वविद्यालय से  आजकल काफी दुखद समाचार आ रहा है.....तो ये भी बता दूँ....कि सब  दिन होत  न एक समान...कभी एमसीयु से एक साथ दर्जनों लोग जी न्यूज़ ज्वाइन किये थे ...कुछ लोग आगे भी करेंगे....लोकतान्त्रिक देश में सदा ही विकल्प खुले ...आज एच ओ डी..और कुलपति कोई और है....काल कोई और होगा हो सकता है कैव्स वालों हमारे आपके बीच  का ही कोई हो.....सो डरना मना है हमे जो नही मिला वो हम दूसरों को देंगे.....हम तो वो हिन्दुतानी हैं कि डिएम--सीएम--.और पीएम बनेंगे ...अच्छा करेंगे तो ठीक हैं वरना ........आगे आप लोग समझदार आदमी हो .....भविष्य की बातें.....अभी से क्या बताउं  . अपने वर्तमान केव्स एच ओ डी और कुलपति जी प्रणाम करते हुए ....अपनी बात को समाप्त करता हू...... कैव्स जय हो ...
वक्त की परछाइयों को ढूढियेगा मत
वरना आप भी बनजायेंगे साया मानलीजिये
बस इन्तहाँ की होड़ में भागियेगा मत
वरना हर कदम पर फिसल जायेंगे मानलीजिये
हर कदम पर मंज़िल से आँखमिचौली करिये मत
वरना रास्ते मुह मोड़ लेंगे मानलीजिये
कोई सफर में अपना पराया नही होता
सिर्फ सुनिये नही अब मानलीजिये
हौसलों की डोर टूटे जुड़ भी जाती है
मोहब्बत में खलल आये अगर फिर रोकलीजिये
साया आप भी हैं, हम भी हैं, दुनिया भी है लेकिन
मिसाल अब हमे बनना है ठानलीजिये

कुछ पाने के लिये कुछ खोना भी पड़ता है

कुछ पाने के लिये कुछ खोना भी पड़ता है

कुछ पाने के लिये कुछ खोना भी पड़ता है। यह कहावत बचपन से सुनता आया हूँ। सिर्फ सुनता ही नही था बल्कि अपनी डींग हांकने के लिये बाकायदा सबके सामने परोसा भी करता था जिससे कि समाज में अपना भी एक बर्चस्व बन सके। लेकिन इसका सही अर्थ आज मै अपनी ज़िंदगी के 25 वर्ष गुजारने के बाद समझ पाया, जब मै अपनी ज़िंदगी में पहलीबार बहन से राखी बधवाने अपने घर नही जा पा रहा हूँ क्योंकि आज मै इस शहर में रोटी की तलास में भटक रहा हूँ। इस बात का सबसे बड़ा ज्ञान तब हुआ जव मैं रक्षाबंधन के दिन सबके हाँथ में राखियाँ देखा। बहन का फो़न आया उसने रूँधे हुये स्वर में कहा धर नहीं आ सके तो मेंरी तरफ से राखी खरीद कर बाँध लेना। लेकिन यह बात उसे और मुझे भी भली भाँति पता है कि राखी का मतलब सिर्फ धागा नही बल्कि प्यार, सुरक्षा, समर्पण, त्याग, न टूटने वाला बंधन, ज़िंदगी भर की दुआयें जैसे अछुण्य धागों से बनी डोर का नाम राखी है और जब इसी राखी को बहन ने अपने भाई की कलाई में जिस दिन बाँध दिया वही रक्षाबंधन का त्योहार बन गया। अब मै बाजा़र से खरीद कर कैसे कोई भी धागा अपने हाँथ में बांध लूँ क्योकि कोई भी धागा चाहे कितना भी ज़्यादा मजबूत और कितना भी ज़्यादा महगा क्यों न हो लेकिन वह बहन की राखी से ज़्यादा मूल्यवान और उससे ज़्यादा मजबूत तो हो ही नहीं सकता। इस रक्षाबंधन ने सिर्फ यही नही बल्कि मुझे यह भी सिखाया कि जो शब्द मैं आजतक सबको सुनाता आ रहा था वह सिर्फ एक कोरा ज्ञान था इसके सिवा और कुछ भी नहीं। तब एक बात और भी समझ में आई की जब कोई अच्छे शब्द किसी महा पुरुष के मुह से बाहर तब आते हैं जब वे कठिन परिस्थितियों से गुजर चुके होते हैं। इस बंधन को एक औपचारिकता मात्र मानकर हांथ में राखी बाधवालेने मात्र से इसकी महत्ता सिद्ध नही होती। इसकी महत्ता वो और अच्छे से बता सकते हैं जिनको खुदा ने बहन जैसी अमूल्य चीज़ नही दी। उनका दिल इस रक्षाबंधन के दिन बडे अच्छे से गवाही दे सकता है कि बहन न होने का मतलब क्या होता है। इसके साथ एक बाकया जोड़ना बहुत ज़रूरी है जो इस विषय से इतर होते हुये भी इसका अभिन्न अंग है। जहां एक ओर लोग अपनी बहन ना होने पर तड़पते हैं वहीं कुछ लोग किसी की बहन को अपनी संतान और अपनी लड़की मानकर सिर्फ लड़के की चाहत में भ्रूण हत्या करने से बाज नहीं आते और किसी दूसरे को बहन के बिना ज़िंदगी भर तड़पने के लिये छोड़ देते हैं। आखिर इन लोगों को बोध कब होगा जिससे कि किसी की बहन की हत्या रोकी जा सके। और किसी को हो या न हो पर एक बात तो तय है कि जो आज एक बहन के लिये तड़प रहे हैं उनको तो ज़रूर होगी और आने वाली पीढ़ी किसी भी सूरत में दूसरे की बहन छीननें की कोशिश नहीं करेगी भले ही वह उसी की संतान क्यों न हो। आज यह बात मेंरे मन में टीस दे रही है कि जिसके हाँथ में सिर्फ एक रक्षाबंधन के दिन राखी नहीं बंधी उसका यह हाल है तो जिसके ज़िंदगी के सारे रक्षाबंधन इसी तरह बिना बहन से राखी बंधवाये गुजरते होंगे उनकी ज़िंदगी में किस प्रकार की उथल-पुथल होती होगी सोचकर ही दिल सिहर उठता है। अब चूँकि आज रक्षाबंधन का त्योहार है और बहन ने कहा भी है इसलिये मै खरीद कर खुद राखी बाँध रहा हूँ क्योंकि बहनें इसके लिये मुझे दुआयें भेजी हैं और इस राखी में उन्ही दुआओं की डोर मिलाकर बाँध रहा हूँ और इस पर्व पर सभी को राखी की मुबारक बाद भी देता हूँ। और समाज से यह बिनती भी करता हूँ कि रक्षाबंधन का त्योहार सभी पूरी रौनक और उत्साह से मना सकें इसके लिये समर्पित हो जायें।
रक्षाबंधन की सबको शुभकामनायें

रोहित सिंह चौहान
बघवारी, सीधी,(म.प्र.)

शनिवार, 21 अगस्त 2010

आखिर कहाँ है राजनीति की संवेदना

आखिर कहाँ है राजनीति की संवेदना

गैस त्रासदी को लेकर चल रही राजनीति और राजनीतिक दलों का आपसी जंग लड़नें का इसे सुसज्जित अखाड़ा बना लेने की प्रवृति जो इतने सालों से चली आ रही है उसे देखते हुये जनता के मन में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर कहाँ गई राजनीति की संवेदना ? जब आम आदमी और पीड़ितों की आवाज़ बुलंद होती है तो सारे राजनीतिक दल तो काँप ही जाते हैं साथ ही साथ तात्कालिक दोषियों की भी धड़कनें तेज़ हो जाती हैं और हड़बड़ाहट में कुछ की कुछ बयानवाजी कर बैठते हैं। वे सायद जानते हुये भी भुलानें की कोशिश कर रहे हैं कि यह जो दोषियों को बचाने की पटकथा, पटकथा लेखक से लिखवाई जा रही है वह हकी़क़त की ज़िन्दगी में काम नही आने वाली क्योंकि रील और रियल लाइफ में बहुत अंतर होता है। अब वह ज़माना गया जब जनता सिर्फ सिनेमा की स्क्रीन पर दिखने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को सबकुछ समझती थी। अब उसे भलीभाँति ख़बर हो चुकी है कि दिखने वाले मोहरे के अलावा और इसे सफल बनाने के पीछे उस कहानी की आइडिया दिमाग़ में आना शूटिंग की बजट और लोकेशन निर्धारित करना, कैमरा मैन, सहायक, भीड़ जुटाना, फि़ल्म जनता तक आसानी से पहुँच सके उसकी मार्केटिंग करवाना आदि-आदि। इन सबके बीच अभिनेता का चाँकलेटी चेहरा और कैमरे के सामने अपने आप को कहानी के हिसाब से प्रस्तुत कर सकने की क्षमता के कारण चेहरे में इस्नो-पाउडर लगा कर अभिनय करादिया जाता है। ऐसा नही की अगर फ़िल्म ग़लत बन रही है तो इसके लियें अभिनेता दोषी नही है क्योंकि अभिनय से पहले कहानी पढने और उसे भली भाँति समझनें का अधिकार अभिनेता के पास मौजूद है, तब भी ग़लती करे तो अभिनेता दोषी ज़रूर है। लेकिन इससे भी ज़्यादा गुनहगार तो वह है जिसके मन में इस प्रकार की सोच ने जन्म लिया और तो और हद तो तब हो गई जब उसने इस कहानी पर बाकायदा खेल रचाना शुरू कर दिया। उसने यह भी नही सोचा कि इसका असर उस पर क्या पड़ेगा जो इसका आखिरी लक्ष्य है। ठीक इसी प्रकार की आँख मिचौली भारतीय राजनीति में भोपाल गैस त्रासदी को लेकर चल रही है। कुछ तो इस प्रकार से चल रहा है कि पीड़ित जनता और उसके अंगभंग हुये शरीर को ऐसे उपयोग किया जा रहा जैसे फ़िल्म की किसी सीन को आकर्षक बनानें के तिये अभिनय कराया जाता है। जहाँ एक हिस्सा सुध ही नही लेना चाहता इसे सबकी नजरों से ओझल रखना चाहता है वही दूसरी और दूसरा हिस्सा इन्ही तस्वीरों की खासी बड़ी होर्ड़िंग बनवाकर बीच चौराहों में लगवादेता है और कोने में अपना निसान लगाना नही भूलता। जिससे जनता यह कह सके कि कम से कम किसी ने सुध तो ली। अगली वोटिंग तक यही सिलसिला चलता रहता है। लेकिन वोटिंग खत्म होने के बाद वहीं पर बेरोक टोक कोई दूसरी होर्ड़िंग लगजाती है और यहाँ पर यह कहावत चरितार्थ होती नजर आती है कि रात गई बात गई। लेकिन भोपाल की जनता उस रात और उस बात दोनों को कैसे जाने दे सकती है। अगर इसकी कोशिश भी करते हैं तो उनकी जमीर इसकी इजाज़त नही देती। जिस प्रकार एक ड़ाँक्टर अपने मरीज से यह जता देता है कि कोई मर्ज़ ज़्यादा बिकरार रूप ले इसके पहले परहेज करना और दबा लेना शुरू कर दे। बरना अगर संभव हुआ तो आँपरेशन से पीड़ा देकर मर्ज़ ठीक किया जायेगा। लेकिन मर्ज़ अगर ऐसा निकला जिसका आँपरेशन संभव न हो तो दबा के सहारे कुछ दिन ही जिन्दा रहा जा सकता है। इस राजनीतिक सेहत की जानकारी जनता के पास बखूबी विद्यमान है और वह अपने हितों की रक्षा के लिये इनका उपयोग करना भी जानती है।


रोहित सिंह चौहान
बघवारी,सीधी,(म.प्र.)

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

सभी ने टॉप किया....2

सभी ने टॉप किया शीर्षक लेख में कुनाल गिरी इलेक्ट्रोनिक मीडिया के छात्र जो की अंतिम वर्ष के छात्र थे उनका रिजल्ट घोषित हो गया है जिससे उन्होंने अनुरोध किया की अपडेट किया जाए सो अपडेट रिजल्ट के हिसाब से उनकी  कहानी  उन्ही  की  जुबानी - सभी  को  बताते  हुए  मुझे  हर्ष  हो  रहा  है  की  mera  टोटल  मार्क्स  1790/2300 है .. जिस -से   यह  बात  saaf  हो  जाती  है  ki  इस  bar  भी  मेने  hi  टॉप   किया   .. vivek ji kirpiya apna blog ko update kare...


kunal giri

बुधवार, 18 अगस्त 2010

टूटता दिख रहा कुठियाला का तिलिस्म

यह लेख माखनलाल पत्रकारिता विश्विद्यालय भोपाल में प्रसारण पत्रकारिता के छात्र "भूपेन्द्र पाण्डे " द्वारा लिखा गया है-


माखनलाल में रहना है तो हमसे मिलकर चलना है , कुठियाला मुर्दाबाद , कुठियाला के कार्यकाल की जाँच हो , कर्मचारी एकता जिंदाबाद , जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जायेगा हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है । ये नारे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में आज शिक्षक कर्मचारी और अधिकारी जोर जोर से चिल्लाकर लगा रहे थे और इन्ही नरो को तख्ती प़र लिख कुलपती के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे । विश्वविद्यालय के कुलपति बी० के० कुठियाला की नियुक्ति और पद सँभालने के कुछ दिन बाद से ही उन पर अनके आरोप लगाये जारहे थे कुछ लोग तो तो इनकी नियुक्ति पर भी सवालिया निशान लगाते हुए कहते है की इसके पीछे बहुत बड़ी राजनीति है और इसमें इनका संघी होना बहुत काम आया है इनने भी यहाँ पहुचते ही सबसे पहले विश्वविद्यालय के लैटर पैड का रंग बदल कर भगवा रंग दे दिया तभी से लोग कयास लगा रहे थे की अब पत्रकारिता विश्वविद्यालय का भगवाकरण होने वाला है ।
तब से आज तक कुलपति जी के सारी नीतियों को चुप चाप मानता चला आ रहा प्रशासन और कर्मचारियों के सब्र का बांध आज टूट ही गया हड़ताल और प्रदर्शन का कारण पता करने पर कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अर्जुन लाल गोहरे ने बताया की विश्वविद्यालय तेलंगा के कार्यालय में १०० से अधिक कर्मचारी टास्क पर नियुक्त है इन को न तो परमानेंट किया जा रहा न इनके वेतन में कोई वृद्धी की जा रही है , खाली पड़े पदों के भर्ती का आदेश होने के बाद भी इसे भरा नहीं जा रहा है इन्होने मांग की है की पिछले लगभग १० वर्षो से संस्था को ३ से ४ हज़ार रुपयों में अपनी सेवा दे रहे कर्मचारियों को एक सरल प्रक्रिया के तहत नियमित किया जाये कुलपति पर आरोप लगते हुए इन्होने कहा कि ये बिना किसी को कोई जानकारी दिए गुपचुप तरीके से शासन को पत्र लिखकर रजिस्ट्रार और परिक्षानियांत्रक के पद पर आपने आदमियों को बैठना चाहते है जबकि वर्तमान में इन पदों को देख रहे डा० श्रीकांत सिंह और राजेश पाठक बढ़िया काम कर रहे है । कर्मचारियों की मांग है डा० श्रीकांत सिंह रजिस्ट्रार के पद की योग्यता रखते है और इन्हें ही इस पद पर रखा जाये क्योकि ये लम्बे समय से हमारे बीच में है और हमारी समस्यायों को भलीभांति समझ सकते है । वर्तमान में आप प्रसारण पत्रकरिता विभाग के एच० ओ० डी० के पद पर रहते हुए भी अपनी जिम्मेदारी को बहुत अच्छे ढंग से निभा रहे है । इनका कहना है श्री कुठियाला के आने के बाद यहाँ भ्रस्टाचार फैल गया है यू० टी० डी० सेंटर के संचालको की ओर से शिकायत आ रही है की कुलपति द्वार बनाई तीन सदस्यीय टीम घूस लेकर सेंटर को मान्यता दे रही है । कर्मचारियों ने कहा की अभी कुछ दिन पहले विश्वविद्यालय के काम से जा रहे 3 कर्मचारी की रात में दुर्घटना से दर्दनाक मौत हो गयी लेकिन उनके परिवार को कोई विशेष आर्थिक सहायता नही दी गयी , इन्हें जल्द सहयता दिया जाये और इनके परिवार से एक एक सदस्य की अनुकम्पा पर नियुक्ति की जाये । सब ने एक सुर में कुलपति के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए कहा की यदि जल्दी हमारी मांगे पूरी नहीं हुयी तो हम गांधवादी ढंग से हड़ताल करेंगे और लम्बी लडाई लड़ेंगे । यह था आज के तजा घटनाक्रम का हल कुछ दिन पीछे चले तो पता चलता है की कुलपति जी आते ही केवल सत्ता आपने हाथ में लेना चाहते थे इसके लिए आप अपने मन से कानून पर कानून बनाते रहे और लोग आँख बंद कर मानते रहे चाहे वाह शुराक्षकर्मियो की संख्या घटना हो या कुछ ओर परिवर्तन की बयार कुछ ऐसे चली की विश्वविद्यालय के पानी के सहारे जीने वाले लडको को १० बजे के बाद विश्वबिद्यालय में घुसना मना कर दिया गया यहाँ पढने वाले लड़के अपने घर से ज्यादा समय यहाँ बिताते थे यहाँ पर विभिन्न विषयों पर रात में घंटो बहस होती रहती थी पर अब नहीं । अभी हद नहीं हुयी इस छोटे से विश्वविद्यालय में १४ नए कोर्स शुरू किये गए जबकी पहले से चल रहे कोर्सो के लडको का भविष्य अभी तक अँधेरे में है इनके प्लेसमेंट की कोई ब्यवस्था नहीं है इस वर्ष निकले बड़ी संख्या में छात्र बेरोजगार घूम रहे है । कुलपति के सामने छात्रो ने गुहार लगाई थी पर कोई सुनवाई नहीं हुयी इन छात्रो में कई ऐसे है जिन्होंने अपना कोर्स लोन लेकर किया है।
आपने विश्वविद्यालय में प्रवेश की परम्परागत प्रेवश परीक्षा को समाप्त कर मेरिट सिस्टम लागू किया जिसका परिणाम यह रहा की ४ लिस्ट निकलने के बाद भी कई विभागों की सीटे खाली पढी है। जो नए कोर्स शुरू किये गए उनमे कुछ में तो कोई आवेदन ही नहीं आया ओर कुछ में २य ३ छात्रो का प्रवेश हुआ इसके आलावा पढ़ाने के लिए शिक्षक नदारद है । कुल मिलकर यहाँ छात्रो के भविष्य के साथ गन्दा मजाक करने की कोशिश की जा रही है पर अब तक सब चुप थे अब जब बात आपने पर आयी तो लोगो ने चिल्लाना शुरू किया खैर आवाज बुलंद है ओर लगता है कि आब कुलपति का तिलिस्म टूट रहा है वैसे अभी तक यह विश्वविद्यालय राम भरोसे चल रहा है कदम कदम पर भ्रस्टाचार है देखना यह होगा कि कुछ बदल पता है या सबके मुह ,बंद कर दिए जायेंगे ।

रविवार, 15 अगस्त 2010

सभी ने टॉप किया.....

बहुत बेसब्री से अपने प्रोफशनल डिग्री का इंतज़ार कर रहे युवा पत्रकारों को परीक्षाफल घोषित हुआ इस बार कैव्स के चौथे सेमेस्टर के छात्रों में जन्हा इलेक्ट्रोनिक मीडिया कोर्से  में रंगोली शुक्ला ने बाजी मारी इनको २३०० में 1763 अंक प्राप्त हुए जो  की कैव्स डिपार्टमेंट के चौथे सेमेस्टर का सबसे हाई स्कोर रहा लेकिन इन्ही के प्रतिद्वंदी कुनाल गिरी का रिजल्ट इस बार किन्ही कारणों से रुक गया है,फिलहाल दूसरे नंबर पर नलिन नयन प्रकाश (इलेक्ट्रोनिक मीडिया ) ने 2300 में 1693 अंक प्राप्त कर दूसरा स्थान प्राप्त किया है,वन्ही तीसरे स्थान पर तुनीर ने 1687 अंक  कुल प्राप्त किए हैं.इसके अलावा इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सभी ने टॉप किया मतलब सब ने फर्स्ट डीविजन प्राप्त किया है,शोकाकुल बात यह है की इन्ही के बीच हरफनमौला आशुप्रज्ञा मिश्र फेल हो गए...
ये तो बात थी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की अब चौथे सेमेस्टर के प्रसारण पत्रकारिता पर भी नज़र डाल ले - इस बार चौथे सेमेस्टर में प्रसारण पत्रकारिता में सुनील कुमार वर्मा ने 1724 अंक  ग्रहण  कर बाजी मारी वंही दुसरे नंबर पर उमा सिंह यादव ने 1688 अंक प्राप्त किया,तीसरे स्थान पर झरना बनर्जी ने 1650 अंक प्राप्त कर झंडा बुलंद किया..वन्ही पुराने छात्र फिर एक बार चूरन साबित हुए ..........और साथ में यंहा भी सभी ने टॉप किया अर्थात फर्स्ट डीविजन की झड़ी लगी रही..
और इन सबके अलावा जिन्हें परीक्षाफल को  लेकर डर था उनकी भी नय्या  पार हो गयी आप सभी लोग इशारा समझ गए होंगे....
इन सबके बाद हमारे अनुजो द्वीतीय सेमेस्टर में कैव्स डिपार्टमेंट में मुदिता त्रिपाठी (इलेक्ट्रोनिक मीडिया )ने 600 में 482 अंक पाकर टॉप किया ही साथ ही विश्विद्यालय भी टॉप किया है.. वंही दुसरे स्थान पर 445 अंक पाकर अनूप मिश्र ने अपना स्थान तय किया...तीसरे स्थान पर आशीष मंगल सोनी ने ४४३ अंक प्राप्त किया...बाकी इलेक्ट्रोनिक मीडिया के चार  छात्रों को निराशा हाथ लगी.
प्रसारण पत्रकारिता में द्वीतीय सेमेस्टर के छात्रों में इस बार लड़कियों ने बाजी मारी ..पहले स्थान पर सुरुचि  अग्रवाल ने 456 अंक प्राप्त किये,दुसरे स्थान पर निधि मोदी ने 451 अंक प्राप्त किये तीसरे स्थान पर दीपा सिंह ने 446 अंक खींचे...इसके आलावा दो छात्रों ने परीक्षा नहीं दी जिससे उनका परिणाम नकारात्मक रहा .......
निर्देश -इस लिंक को क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा वंहा आपको  
media exams का विकल्प मिलेगा उसे क्लिक करे ,क्लिक करने के बाद अपना कोर्से सुनिश्चित करे ,तत्पश्चात सेण्टर कोड के विकल्प में 999 डाले आपका परीक्षाफल मिल जाएगा ....

15 अगस्त , रहे मस्त

कैव्स परिवार की ओर से ६४वी स्वतंत्रता वर्षगाँठ पर सभी को ढेर सारी शुभकामनाएँ-
जहा गलत देखेंगे हम, आवाज़ हमारी ज़रूर उठेगी
कसम खाते हैं ये एकता कैव्स में भी  दिखेगी
कैव्स टुडे है मंच हमारा
भारत देश है हमको प्यारा
लोकतंत्र की हम रक्षा करेंगे
अपनी कलम से हम शिक्षा करेंगे
हिंसा  को अहिंसा से हम करेंगे परास्त
हम न जाने -माने कोई जात- पात
कैव्स टुडे का ये सपना है
हर किसी को साथ रखना है
सामान सबको मिले अधिकार
कैव्स टुडे का यही कार- भार

शनिवार, 14 अगस्त 2010

चोला माटी के नत्था राम ...ये मेरे साथी सोनू उपाध्य का लेख हैं ....जो लोकमत में मेरे साथ कार्यरत है
भट सूअर की धुक-धुकी के धुएं का रैला उठा और जो घूमा कि खाट पर लेटी दोहरी हुई अम्मा ने खखियार के बलगम ओटले पर दे मारी... फिर चिल्लाई.. पिपली... पिपली ... पिपली... का भवो ऐसो जेसो लाइव रामलीला के लाने मेलो भर गयो. का भवो जो नत्था...कहां गयो री कुल्टा..चिल्लात जात है अम्मा बीडी पर बीडी फूंकती है.. नासमिटी, कुल्टा निकली राजनीति कि नत्था के जत्था के जत्था गांव का गांव छोड दियो. जो पिपली में लाइव फिल्म का का रंग भवो कि कैमरे की आंख घूमी भर है कि बाबू के फटे रजिस्टर में नत्था के मरने की तारीख दर्जी की थी और सांय-सांय आवाज गूंजत है.. देस मेरा रंग रेज रे बाबू.. देस मेरा रंग रेज रे बाबू..

पिपली लाइव में भवो जे कि आखिरी में कुदाली के साथ गांव से भाग गयो नत्था और बीबी रह गई तपती दोपहरी में जनगी भर बर्तन की राख के साथ मोरी में भेने के लाने.. जे का बोले पिपली की पूरा देस भयो जे.. पिपली के खुदखुसी के मेले के रेले में बंधे झूलों के नट-नटीया में जहां-तहां बिखर जात है.. तनिक गोर करों हों तो टीवी मीडिया की गाडियों की धूलेरी में बचे-खुचे चाय के गिलास दुअन्नी में बेचे-बेचे फिरो हों गन सारे नत्थों के बेटे.. बाप की मौत के लाने मुआवजा भवो है.. अधमरा भवो किसान कि खिखियाकर परसाई जी परसाई जी तो कभी हरिशंकर-हरिशंकर चिल्लात-चिल्लात रूलाई फूट पडती है. तमाशा भवो रे तमाशा.. मौत भई तमाशा.. मुआवजे के लाने तमाशा..

कछु कहत न जात जो काम अच्छो कि फिल्मी अंखियों से टिपर-टिपर देस के करनधार की ठठरी पर जे राजनीति की पिपली बाइट देत है.. दूर से कैमरो घूमत है कि पानी निकालत-निकालत पानी निकल भयो किसान को कि नत्था से मुंह ही न फेरों हों तनिक भी कि मती मारी गई कि नासमिटा हरामखोर, नत्था की टट्टी की टीआरपी में लाइव लाइव भई है पिपली..दरोगा कने का बोलत रहो कि सबके सब दो ही मिनिट में टोला बनाए के मिनिटों में मैला आंचल कर दियो.. किसान की जदगी का..

का भवो अब जे कि योजना-फोजना मिली भगत का रैला है..मंहगाई डायन मार जात है..ओ पर नत्था का का.. कि फिरकी-फिकरी घन चक्कर भयो मौत के लाने मुआवजा तो दूर की बात दीमक-दीमक-चर..चर चाटत है का भवो रे नत्था कछु एक या दो नहीं हो कुल्टा नासमिटी पूरे देस में कुर्सी घर-घर पैदा करो हों.. का भवो हों..रोंए कि हंसे कि होरी मरो थो गोदान में कि होरी-मोहतो मरो है गड्ढे में तनिक भी खैर नाहीं है..का हों रोवें कि हंसे.. हो देस मेरा रंग..रेज रे बाबू..हो देस मेरा रंग..रेज रे बाबू..

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

भूमण्डलीकरण की कृषि...

यह लेख माखनलाल पत्रकारिता विश्विद्यालय भोपाल में प्रसारण पत्रकारिता के छात्र "आशुतोष  शुक्ला" द्वारा लिखा गया है-

भारत एक कृषि प्रधान देश है। केवल इतना कहने भर से ही भारत कृषि में हालत सुधरने वाली नहीं है। भारतीय कृषि की हालत दिन पर दिन भयावह होती जा रही है। कुछ लोगो का मानना है की इस दुर्दशा के लिए भारतीय किसान खुद जिम्मेदार है। ऐसे हे लोगो के मुखार्विन्दों से अक्सर यह सुनने को मिलता है की भारतीय किसानो को भूमण्डलीकरण के इस दौर में यदि टिके रहना है तो उन्हें प्रतिस्पर्धी होना होगा , पैदावार मे उसमे वृद्धी ही इस पर्तिस्पर्धा में बने रहने का एक मात्र रास्ता है। आज कल के सम्मेलनों में आप वैज्ञानिको से या अर्थशास्त्रियों से यह अक्सर सुनते पाएंगे की किस तरह उत्पादकता ही कृषि समुदाय के अस्तित्व को कायम रखने में निर्णायक साबित होती है। जो किसान अपनी उत्पादकता नहीं बढ़ा सकते वह न सिर्फ हाशिये पर चले जायेंगे बल्कि भीरे धीरे उनका अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा या वे कृषि जगत से ही बाहर हो जायेंगे। कम उत्पादकता के लिए भारतीय किसानो के ऊपर अक्षम होने का लेबल चिपका दिया जाता है , और यह लेबल कृषि व्यापर उद्योग को सरकारी मदद दिलाने वाली नीतियों में बदलाव को जायज़ ठहराने के लिए काफी है। हालाँकि यह बहस भ्रामक है की भारतीय किसान अक्षम है। सच तो है की भारतीय किसान विश्व के सबसे सक्षम किसानों में से एक है। वास्तव में, भारतीय किसान किस तरह अपनी उत्पादकता को बढ़ा सकता है जबकि उसके पास महज़ दो और तीन एकड़ भूमि हो , तब वह साल दर साल उपज बढ़ाएगा या अपने परिवार का भरण - पोषण करेगा। क्या यह चुकाने वाला तथ्य नहीं है की औसत भारतीय किसान १।४ हेक्टयर कृषि योग्य भूमि पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर रहता है वहीं अमेरिका में एक किसान के पास केवल अपनी गाय का पेट भरने के लिए लग्भाक १० हेक्टेयर की जमीन प्राप्त है। किसी उन्नत किसान से यदि आप १।४ हेक्टेयर भूमि पर खेती करने को कहेंगे तो वह आपके ऊपर हंसेगा। वास्तविकता में विकसित देशों में किसान जमीन के छोटे- छोटे टुकड़ों पर खेती करने की बात सोच भी नहीं सकता।
सरकार का यदि यही रवैया रहा तो देश के न जाने कितने और जिले विदर्भ और बुंदेलखंड बन जायेंगे। इसे एक विरोधाभास ही कहा जायेगा की जिस सरकार ने कभी जमींदारी उन्मूलन जैसा कदम उठाया था आज वही सरकार गाँव में फिर से महाजनी व्यवस्था को लागु करने की बात सूच रही है। विदर्भ या बुंदेलखंड या देश के किसी भी कोने में हो रही किसानो की आत्महत्याओं ने ही ग्रामीद इलाकों में क़र्ज़ मिलने के सवाल को प्रमुखता से उभरा है। इसी के फलस्वरूप रिजर्व बैंक ने जोहल कार्य समीति का गठन किया था जिसमे बैंक मुश्किल में जी रहे किसानो की परेशानियों का अध्ययन किया जाना तय है। ज़रा सोचिये कमेटियां बनाकर किसानो का भला किस प्रकार किया जा सकता है ?
रहत पैकेज देकर कितनो दिनों तक किसानो पर एहसान किया जायेगा ? श्री लाल शुक्ल द्वारा लिखे राग दरबारी की एक लाइन है की "सूखा और अकाल सरकारी अफसरों के भाग्य से आता है ।" अधिकारीयों के पास पैकेज के प्रस्ताव बनाने का काम राहत पहुँचाने से बड़ा काम हो गया है।
कुछ बरस पहले तक बुंदेलखंड के बारे में एक शब्द भी ना बोलने वाले आज वह दिन रात रैलियाँ कर रहे है । पैकेज दिलाने की होड़ मची हुई है। लेकिन उसके बाद भी यहाँ की मूल समस्या की जड़ में जाने की ज़रुरत किसी को महसूस नहीं हो रही है । सच तो ये है की हमें खासकर किसानो को राज नेताओं से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए । क्यूंकि अपने रानीतिक स्वार्थ के मेल में सभी पार्टियां एक है । सरकार किसानो की सब्सिडी के बारे में सोचना भी नहीं चाहती है। विकसित देशों के किसान दक्ष इसलिए है क्यूंकि वहा पर उन्हें साल दर साल भारी सब्सिडी मिल जाती है। कपास उत्पादन को ही ले लीजिये अमेरिका में करीब बीस हजार कपास उत्पादक किसान है , जिनके द्वारा हर साल लगभग चार अरब डालर मूल्य का कपास पैदा किया जाता है। ये किसान कपास का उत्पादन बंद ना करे इस लिए अमेरिकी सरकार अपने राजकोष से लगभग साढ़े चार अरब डालर से अधिक सब्सिडी बांटती है। जिसके फलस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कपास का मूल्य ४५% तक गिर जाता है , नतीजतन विदर्भ के किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती है । भारत के लिए तात्कालिक कदम यही होना चाहिए की आने वाले विश्व व्यापार संगठन के सम्मलेन में विकास संबंधी समझौते के अंतिम रूप लेने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए की ओ ई सी डी के देश अपने यहाँ दी जाने वाली सब्सिडी को पूरी तरह ख़तम करें ।
यदि हमारे राजनेता इतना भी करने में कामयाब नही हो पाते है तो इसे किसानों का और देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा , और हमारे पास केवल राजनैतिक आरोप - प्रत्यारोप के अलावा और कुछ भी नहीं बचेगा । फिर हमारे पास केवल यही कहने को बचेगा -

" सख्त मिटटी को नरम बनाते -बनाते ,
जिन हाथों में आज पड़ गई है गाँठ
हवा में हिल रहे है उनके हाथ
गेहूं की बालियों की तरह । "

छात्रसंघ चुनाव पर लगी रोक |

लेखक युवा पत्रकार हैं,वर्तमान समय में  दैनिक हिदी समाचार पत्र "लोकमत" औरंगाबाद में कार्यरत हैं,इनके विचार www.aakrosh4media.blogspot.com पर  पढ़े  जा सकते  हैं-
छात्रसंघ चुनाव पर लगी रोक


हाईकोर्ट ने छात्रसंघ चुनाव एवं उसकी प्रक्रिया शुरू करने पर रोक लगा cदी और सुनवाई 17 अगस्त तक टालते हुए राज्य सरकार एवं प्रमुख उच्च शिक्षा सचिव से जवाब देने को कहा है। न्यायाधीश महेशचन्द्र शर्मा ने राज। विवि के चार छात्रों की याचिकाओं पर गुरूवार को यह अंतरिम आदेश दिया। याचिकाओं में छात्रसंघ चुनाव में उम्मीदवारों की पात्रता से सम्बन्घित चार अलग-अलग मुद्दे उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने छात्रसंघ चुनाव के मामले में हाईकोर्ट की जोधपुर स्थित प्रधानपीठ के दो अगस्त के उस आदेश का हवाला दिया। जिसमें स्नातकोत्तर में निर्घारित आयु पार छात्र को चुनाव लडने की अनुमति दी है। लेकिन विश्वविद्यालय ने कहा कि प्रधान पीठ का उक्त आदेश केरल विश्वविद्यालय के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने विभिन्न पक्षों को सुनने के बाद सुनवाई 17 अगस्त तक टालते हुए छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया एवं चुनावों पर रोक लगा दी। असर विवि तक ही दोनो पक्षों के अघिवक्ताओं के अनुसार मामला राजस्थान विश्वविद्यालय से सम्बन्घित होने से रोक भी इसी विश्वविद्यालय तक सडबल बैंच में जाना चाहिएविश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप ही किए जा रहे हैं। मैंने इस संदर्भ में कुलपति को सलाह दी है कि हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के खिलाफ हमें तुरंत ही डबल बैंच में जाना चाहिए। प्रो.रमेश दाधीच, मुख्य चुनाव अघिकारी, राजस्थान विवि छात्रासंघ चुनाव

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

हरिशंकर परसाई का महत्वपूर्ण योगदान

हिंदी साहित्य में व्यंग्य को केंद्र में लाने और व्यापकता प्रदान करने में हरिशंकर परसाई का महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी पुण्यतिथि 11 अगस्त पर श्रद्धांजलि स्वरूप उनके दो व्यंग्य- मुण्डन और प्रेमियों की वापसी

सुब्रत राय सहारा की मार्मिक अपील पर उन्हे एक खुला खत...jucs india (हरेराम मिश्र)

प्रिय सुब्रत राय साहब, सप्रेम नमस्कार।
आपके द्वारा समाचार पत्रों मे कामन वेल्थ गेम 2010 के लिए आम जनता के नाम की गयी मार्मिक अपील हमने पढी है। आपकी यह मार्मिक अपील उस समय समाचार पत्रों मे प्रकाशित हुई है जब चारों ओर से कामन वेल्थ गेम आयोजन समिति पर भ्र्रष्टाचार और बेइमानी के सीधे आरोप लगे है। आपको और हमको यह नही भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार के आरेाप प्रथम दष्ृटया ही ऐसे है कि जिसे कोई नजरंदाज नही कर सकता। कृपया ध्यान दें कामन वेल्थ गेम के नाम पर आमआदमी के पैसे की बंदरबांट पिछले 2006 से ही आरंभ हो गयी थी। यह बात अलग है कि उस समय कई सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात नजरंदाज करते हुए कलमाडी एण्ड कंपनी ने लगातार मनमानी की। आपने अपनी मार्मिक अपील में लिखा है िक इस खेल का आयोजन इस देश के लिए गर्व की बात है ं। आप यह बताएं कि इस खेल आयोजन से भारत की कौन सी समस्या हल होती देख रहे है ं। जिस समय आम जनता भारी मंहगाई मे पिस रही हो और जिस 76 प्रतिशत जनता के लिए दोनो जून रोटी का भरोसा तक ना हो, वह देस पर और उसके इस आयोजन पर कैसे गर्व कर सकती है ।
अपनी मार्मिक अपील मे आपने यह लिखा है कि हजारों आयोजक और 23000 स्वयं सेवी चौतरफा आलोचना से गहरी निराशा मे जा रहे है। आप यह बताएं कि आम आदमी का पैसा मनमानी खर्च करके वेा हिसाब देने की जिम्मेदारियों से क्यो बच रहे है । अगर आयोजन समिति इतनी ही पाक साफ है तो वह यह सिद्ध कयों नही करती कि कही किसी किस्म का कोई घपला नही हुआ है। इसमे निराशा मे जाने जैसा क्या है । अगर वो पाक साफ है तो आम जनता को खर्च का पूरा हिसाब तत्काल दें दे ।ं
आपकी अपील मे लिखा है कि अगर किसी तरह की अनियमितता हुई हो तो इस खेल के आयोजन के बाद हर कार्यवाही अवश्य हो । क्या आपको अभी भी अनियमितता होने के बारे मे संदेह है । जबकि जांच एजेंसियां इस आयोजन मे प्रथम दृष्टया ही भारी अनियमितता मान चुकी है । दरअसल कई सामान्य बाते ही आयोजन समिति को गंभीर सवालों के कटघरे मे खडा कर देती है । जिस समय कलमाडी चौतरफा से घिर गये है और जिस तरह से आप की मार्मिक अपील कलमाडी की काली करतूतों के साथ खडी है, उसे हम बखूबी समझ सकते है ।
दर असल आपकी इस मार्मिक अपील मे भी आपकी मुनाफे की गंध छुपी है आप भी इस खेल के खेल मे भागीदार होकर प्रसारण अधिकार लेकर मलाई खाना चाह रहे है। और यह काम केवल हां हुजूरी से ही हो सकता है। क्योंकि अभी तक सारे टेंडर केवल उसके परिचितों को ही मिले थे । आपको लगता है िक इस तरह उसके साथ खडे होने से आप भी कुछ लाभ कमा सकते है ।
जहां तक खेल होने के बाद कार्यवाही की बात है, ठीक नही है तब तक मामला ही ठंडा हो जाएगा। कार्यवाही तत्काल हो । उन्हे आयोजन समिति से बाहर कर के तत्काल उन पर एफआइआर दर्ज हो । जहां तक मीडिया की अति का सवाल है यह एक अलग और गंभीर विचार का विषय है । और मीडिया ने इस खेल को उजागर कर कुछ भी गलत नही किया है
।उसने तो वही कहा है जो उसने देखा है । और इसमे बदनामी जैसा क्या है ।
मै आपको एक सलाह दूंगा अगर आप भी किसी किस्म का टेडर चाहते है तो आप भी कलमाडी साहब को घूस दीजिए ब्यक्तिगत रिस्ते कायम कीजिए, लेकिन देश को बरगलाने की घटिया कोशिश न कीजिए क्योंकि गुलामी के इस प्रतीक का आयोजन देस को विश्वास मे लेकर नही किया जा रहा है ।



आपका

हरेराम मिश्र

identity

Second, unlike earlier, there is an intellectual push to the current demand for Gorkhaland. One of the impetus for a separate state of Gorkhas would be securing of their identity as Indians. Indian Gorkhas have long been misidentified as being citizens of Nepal and they feel that a state of their own will root them to India. The Gorkhaland of their imagination, therefore, does not only secure the economic development of the Darjeeling area but also the political identity of the over one crore Indian Gorkhas across the country.
• So are the Indian Gorkhas migrants from Nepal or where have they come from?
Indian Gorkhas have been residents of India for centuries. Under the Treaty of Sugauli in 1815, Nepal ceded an area of 18,000 sq km to the British. This territory constitutes what are today parts of Himachal Pradesh, Uttarakhand, Sikkim and Darjeeling district. A treaty with Bhutan in 1860 brought the current Dooars areas in Bengal and Assam into British possession. The Gorkha population resident in these territories became part of British India then. The Gorkhas participated in the Freedom Movement with Gandhiji and also joined the Azad Hind Fauj in big numbers. The tune of India’s national anthem Jana Gana Mana was taken from an original composition by Captain Ram Singh Thakur, a Gorkha in the INA. Two Gorkhas, Damber Singh Gurung and Ari Bahadur Gurung were members of the Constituent Assembly. Ari Bahadur Gurung was a member of the drafting committee. He is a signatory to the first Constitution of India.
Joel Rai

बुधवार, 11 अगस्त 2010

Give peace a chance: An all-party meeting of J&K political parties convened by the Prime Minister Dr. Manmohan Singh on the request of chief minister Omar Abdullah here ended inconclusively, with an assurance from the Central government that all suggestions would be examined and put on board while taking any decision to break the unrest in Kashmir Valley. It was also learnt that Dr. Singh will separately consult the main opposition Peoples Democratic Party (PDP). Union Minister and National Conference president Dr. Farooq Abdullah pleaded for restoration of autonomy, but he left the door open for an alternative proposal acceptable to all groups. Almost all the parties baring Bharatiya Janata Party (BJP) called for immediate resumption of peace process by initiating a dialogue internally with separatists and externally with Pakistan to assuage frustration amongst youth. Chief Minister Omar Abdulah, who left to his father to articulate his party’s stand had a tiff with Pathers’ Party chief Prof. Bhim Sigh, when the latter raised the issue of ‘miss-governance’ and virtual non-existent communication between the people and government. Omar intervened and said he has been reaching out to people, referring to his recent visit to Soura hospital. Bhim Singh and the BSP representative Tulsi Ram Langeh demanded removal of Abdullah government and imposition of Governor’s rule. Communsit Party of India –Maxist leader Mohamamd Yusuf Tarigami and PCC chief Prof. Saifuddin Soz called for sending an all-party parliamentary delegation to Kashmir to assess ground situation. In his concluding remarks, Prime Minister told the leaders that his government was sensitive to problems and crises in Kashmir. He said the presence of his senior cabinet colleagues in the meeting indicates the seriousness and the exercise was also aimed to apprise them the gravity of situation. Almost entire Cabinet Committee on Security (CCS) was present at the four-hour long meeting, held at the official Race Course residence of Prime Minister.Earlier, in his inaugural remarks, Dr Manmohan Singh also hinted at amendments in the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) that is seen as draconian by the Kashmiris and also talked of the dialogue with Pakistan resulting in "a permanent and just settlement of all outstanding issues that protects the honour and self-respect of all sections of the people of the State," but admitted that the complex problem that has defied resolution for 63 years cannot be solved easily or quickly. Sensing desperation of the Kashmiri youths who grew up in 20 years of militancy with no employment opportunities, Prime Minister Manmohan Singh also held out a carrot of jobs in both public and private sectors to stop them from pelting stones on the security forces as the only way to register their anguish."I can feel the pain and understand the anger and frustration that is bringing young people out on to the streets of Kashmir. Many of them have seen nothing but violence and conflict in their lives and have been scarred by suffering, he said.The youths will, however, have to wait for at least three months for any job opportunities as that is the deadline set by the PM for a 6-member expert group headed by former Reserve Bank of India governor and his economic adviser Dr C Rangarajan to formulate a job plan that increases employability in the state. Members of the group are Infosys founder N R Narayana Murthy, Tarun Das, the Chief Mentor of the Confederation of Indian Industry (CII), Syed Shakil Qalander, president of Federation Chamber of Industries Kashmir, economist P Nanda Kumar and an official of the J&K government.Announcing the constitution of the group at a meeting of the leaders of all political parties in the state at his residence, the Prime Minister appealed to the youth "to go back to their schools and colleges and allow classes to resume" and asked parents: "What future is there for Kashmir if your children are not educated?""I am convinced that the only way forward in Jammu and Kashmir is along the path of dialogue and reconciliation. The events in Kashmir over the past few weeks have caused me great pain. I share the grief, the sorrow and the sense of loss of every mother, every father, every family and every child in Kashmir," he said.Dr Manmohan Singh also hinted amendments in the Armed Forces Special Powers Act that is seen as draconian by the Kashmiris and human right activists, saying the J&K police who have to eventually take on the burden of normal law do not require special powers to discharge their duties.Those attending the meeting also saw a hint of withdrawal of the central security forces and Army from the civilian area in his remark that the Centre will accelerate the process of strengthening and expanding the J&K Police so that they can function independently and effectively within the "shortest possible time." He said the state is only now emerging from the shadow of more than two decades of a deadly insurgency, which brought only death and devastation and two lost decades in the history of Jammu & Kashmir’s development. "Our Government, more than any other government in the past, has invested heavily in the peace process in Kashmir. The brave rejection of militancy by the people opened the door for us to pursue an unprecedented and intensive internal and external dialogue on the issues that have bedeviled Jammu and Kashmir for six decades," he underlined. Urging the people to give peace a chance to rebuild the state and its institutions, promote economic activity that creates job opportunities, Dr Manmohan Singh frankly admitted that the key to the problem is a political solution that addresses the alienation and emotional needs of the people. "This can only be achieved through a sustained internal and external dialogue. We are ready for this. We are willing to discuss all issues within the bounds of our democratic processes and framework. But this process can gather momentum and yield results only if there is a prolonged peace," he said.He also extended the Centre's full support to Chief Minister Omar Abdullah making efforts to renew contacts with the people and asked the assembled leaders of various political parties in the state also to reach out the people and reinvigorate peaceful political activities on the ground that are lacking today. "The youth wings of your parties should be activated. In a democracy, leaders have to listen to the voice of the people and gain their trust and confidence," he said."Every possible effort should be made to reach out to the youth in Jammu and Kashmir. We must respond in a sincere and substantive manner to their genuine aspirations for freedom from fear and for freedom to build for themselves a life of dignity, security and well- being," he said while promising the youth that their genuine empowerment will be accorded the highest priority in his government's J&K policy.The Prime Minister also stressed that the local body elections should be held early to increase peoples’ participation in democratic governance and to ensure political empowerment at the grassroot level.

अमर हरिशंकर परसाई जी की पुण्यतिथि पर ......

इस महान व्यंग्य पुरोधा का जन्म १९२४ में जमानी (इटारसी) के पास हुआ,अपने समय से आगे कालजयी सार्थक रचना का प्रयास बहुत ही कम उम्र से ,नौकरी को एक साइड फेंक लिखने को ही पेशा बना लिया,जीवनचर्या जो चलानी थी,जबलपुर से "वसुधा" नाम की साहित्यिक पत्रिका को घाटे के बावजूद निकालते रहे,सिस्टम ने पत्रिका तो नहीं चलने दी लेकिन आप की कलम निरंतर पैनी होकर समाज के सुलझे- अनसुलझे मुद्दों,पूर्वाग्रहों.ढर्रो.कुरीतियों,आडम्बर,आदि पर बराबर चलती रही,सबसे खास नई दुनिया  में "सुनो भाई साधो" में कई स्तम्भ लिखते रहे जो काफी लोकप्रियता को प्राप्त हुआ,साहित्य की परिभाषा के अनुकूल सबका हित चाहते हुए इनकी लेखनी ने जो कुछ दिया है वः दिनों दिन और भी सार्थक होता दिख रहा है,लेकिन परसाई जी शायद ऐसा नहीं चाहते थे,इनका देहवसान तो ज़रूर १० अगस्त  १९९५ में हो गया लेकिन आज भी और आगे भी ये हममे आपमें जिंदा रहेंगे,अमर रहेंगे ,आप चाहते थे बदलाव हो तो अब हम नई पीढ़ी को उनकी कलम को संभालना होगा,और तब तक लिखते रहना पड़ेगा जब सर्व समाज के अनुकूल बदलाव नहीं होता,एक बार फिर हम सभी केव्स टुडे के छात्र आपको शत शत नमन करते हैं.....
प्रमुख रचना - कहानी संग्रह-हँसते हैं रोते हैं,  जैसे उनके दिन फिरे,
 उपन्यास--रानी नागफनी की कहानी,तट की खोज .
निबंध- तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे,वैष्णव की फिसलन पगडंडियों का ज़माना,सदाचार की ताबीज विकलांग श्रद्धा के दौर,बैमानी की परत आदि
इसके अलावा कई निबंध भी आप के द्वारा लिखा गया है...केव्स टुडे के युवा पत्रकारों ज़रूर पढो....  

नक्सलियों तुम दिल्ली आओ --- निर्दोष लोगों को मत मारो........

नक्सलियों तुम दिल्ली क्यों नही आते-----
---तुम जंगलों में घूमते फिरते हो और बेचारे  निर्दोष ग्रामीणों और सी आर पी ऍफ़ और पुलिस के जवानों को मारते रहते हो....
देखो लोकतंत्र में हथियारों के लिए कोई जगह नहीं है....सम्विधान  में इसे सिर्फ पुलिस और सेना जैसी संस्थाओं के जवानों के द्वारा  प्रयोग करने के लिए परमिशन  दिया गया है......इसलिए तुम लोग  मुख्य धारा में आकर संघर्ष करो...चुनाव लड़ो...लोकसभा में जाओ---राज्य सभा में जाओ---अच्छी-अच्छी नीतिया बनाओ-----इस तरह कायरों कि तरह गोली बारी करके बिलों में मत छुपो----वरना किसी न किसी दिन हिंदुस्तान  में कोई  सरदार पटेल प्रधान मंत्री कि कुर्सी पर बैठेगा और तुम्हे बिल में से निकाल कर धुंए में उड़ा देगा-------------
                                -----------एक बात और पूछना चाहता हूँ कि नक्सलीओं क्या तुमने खून खराबा करने कि कसम खा ली है क्या--- अगर हाँ,  तो कसम तोड़ दो ये गलत है-----अगर कसम नही तोड़ोगे तो फिर निर्दोष जनता को और पुलिस के जवानों को मत मारो ---------मारना है तो----दिल्ली आओ----ये नेताओं के भेष में कुछ राक्षस लोक सभा और राज्य सभा  में घुस गये हैं.... कुछ तो विभिन्न राज्यों कि विधान सभाओं में  भी विराजमान हैं-----दिन रात भ्रस्ताचार   करते रहते हैं---- करोडो रूपये निगल चुके हैं और करोडो रूपये ये अब सीबीआई या अन्य जाँच में बर्बाद करेंगे......अभी कुछ महीने पहले मधु कोड़ा कि कहानी तो तुमने देखि थी------जाने कितने कोड़ा अभी लोक सभा और  राज्यसभा में---विधानसभा में मौजूद है....सिर्फ परिवार वाद --  धनबल--जनबल--और बाहुबल के दम पर ----मारो ----मारो--
---मारना है तो इन दरिंदो को मारो----जो जनता का  पैसा डकार रहे हैं और कहते हैं कि हम जन सेवा कर रहे हैं.......मारना तो मै भी इन दरिंदो को चाहता था...क्योंकि मुझे भी पहले कलम से ज्यादा गोली में विश्वाश था....लेकिन अब मै बड़ा हो गया हूँ मुझे लगता है कि कलम में भी ताकत होती है बशर्ते कलम बिकाऊ न हो.........मै तुमसे फिरसे कहता हु कुछ न मिले तो कलम थाम लो...पढो....और अगर अब भी बात नहीं समझ में आ रही है तो ......मारो---दिल्ली में आकर मारो----और भगत सिंह----और चंद्रशेखर आज़ाद कि तरह मरो------राजगुरु---और बिस्मिल्लाह खान कि तरह मरो-----जो भी करो ऐसा करो कि जनता कि भलाई में हो.....कोई तुम्हारी लाश पे न  थूके-----तुम्हारी लाश पर लोगों को नाज़ हो----मै बार बार कहता हू दिल्ली आओ--------------------------------------शहीदों का वो गीत याद करो----कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों
                           अब   तुम्हारे  हवाले  वतन  साथियों-----



कायर मत बनो और हो सके तो कानून अपने हाथ में मत लो...............

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

‘Present phase will prove to be a turning point’Geelani: No differences amongseparatists on Kashmir

‘Present phase will prove to be a turning point’Geelani: No differences amongseparatists on Kashmir out any different among separatists on Kashmir cause, Syed Ali Shah Geelani, chairman Hurriyat Conference today said the ongoing phase will prove to be a turning point in Kashmir movement.he stated that his optimism is based on the unity of the people and the way they are unitedly implementing the ongoing programme.Geelani strongly condemned the continuous arrest of Mirwaiz Umar Farooq, Mohammad Yasin Malik, Mohammad Ashraf Sehrai, Mian Abdul Qayoom, Gen Moosa and all other detainees and demanded their immediate release.The Hurriyat chairman stated that even if he softened his stand all people would stop their support to him also. “I am very hopeful about the Kashmir issue reaching its logical conclusion and that Kashmiris achieving their goal. But the need of the hour is that we remain consistent and do not lose patience,” he said.Asked about him becoming a central figure right now, Geelani said he did not undergone change of stand on Kashmir in the past nor would he do so in future. “I want to make it very clear that even if Geelani changes his stand he too will lose the public support. We are representing the aspirations and blood of people and we should ensure that we stick to our stand,” he said.About unity, Geelani observed that the people are united and following a cause. This is the real proof of unity. He asked why there are several parties in India and why are not they being asked to unite. This is because when there is any issue pertaining to their country’s security their voice automatically becomes one. Likewise today Kashmiri separatists are one and united. “There is no difference among us about the Kashmir cause and this is the symbol of unity. As I said the present movement can prove a turning point in Kashmir cause,” the Hurriyat chairman said.He said the people should strictly follow the protest programme and youth need not violate it besides they should not pay attention to rumours. “Nobody is in touch with me through Track-II and such types of reports are all rumours and those should not be taken notice of,” Geelani said.About Syed Sallah-u-Din, chairman United Jehad Council (UJC), the Hurriyat chairman said he has offered lot of sacrifices for the movement which should not be forgotten. “Whenever a statement comes from him it is surely in the interest of the movement and not against it. I have no contact with Sallah-u-Din sahib since long and I come to know about the perspective after reading his statements,” he said.Geelani said Kashmiris are not afraid of arrests and this type of thinking is not going to help India. He asked the government of India to read the writing on the wall.The Hurriyat chairman asked the people to remain vigilant against the elements with vested interests, who are trying to defame the movement. He in this connection referred to the role of some National Conference workers and Ikhwanis. He urged youth to be courageous, patient and disciplined.About talks with centre that it is his known stand that such talks are futile. “Even Mirwaiz Umar Farooq’s Hurriyat held several rounds of talks but nothing has yielded,” he said.

'नाग मुकुट' कैदियों द्वारा तैयार बाबा वैद्यनाथ धाम में

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक झारखण्ड के देवघर के बाबा वैद्यनाथ धाम में स्थित शिवलिंग पर सजने वाला 'नाग मुकुट' यहां की जेल में तैयार होता है।
कामना लिंग के नाम से विश्वप्रसिद्घ बाबा नागेश्वर के सिर पर श्रृंगार पूजा के समय प्रतिदिन फूलों और बेलपत्र से तैयार किया हुआ 'नाग मुकुट' पहनाया जाता है। यह नाग मुकुट देवघर की जेल में कैदियों द्वारा तैयार किया जाता है। इस पुरानी परंपरा का निर्वहन आज भी किया जा रहा है।
बाबा वैद्यनाथ धाम के पुरोहित पंडित सूर्यकांत परिहस्त ने बताया कि यह पुरानी परंपरा है। कहा जाता है कि वर्षो पहले एक अंग्रेज जेलर था जिसके पुत्र की अचानक तबियत बहुत खराब हो गई। उसकी स्थिति बिगड़ते देख लोगों ने जेलर को बाबा के मंदिर में 'नाग मुकुट' चढ़ाने की सलाह दी। जेलर ने लोगों के कहे अनुसार ऐसा ही किया और उनका पुत्र ठीक हो गया। तभी से यहां यह परंपरा बन गई।
इसके लिए जेल में भी पूरी शुद्घता और स्वच्छता से व्यवस्था की जाती है। जेल के अंदर इस मुकुट को तैयार करने के एक विशेष कक्ष है जिसे लोग 'बाबा कक्ष' कहते हैं। यहां पर एक शिवालय भी है। जेलर चंद्रेश्वर प्रसाद सुमन बताते हैं कि यहां मुकुट बनाने के लिए कैदियों की दिलचस्पी देखते बनती है। इस कारण मुकुट बनाने के लिए कैदियों को समूहों में बांट दिया जाता है।
प्रतिदिन कैदियों को बाहर से फूल और बेलपत्र उपलब्ध करा दिया जाता है। कैदी उपवास रखकर बाबा कक्ष में नाग मुकुट का निर्माण करते हैं और वहां स्थित शिवालय में रख पूजा-अर्चना की जाती है। शाम को यह मुकुट जेल से बाहर निकाला जाता है और फिर जेल के बाहर बने शिवालय में मुकुट की पूजा होती है। इसके बाद कोई जेलकर्मी इस नाग मुकुट को कंधे पर उठाकर बम भोले, बम भोले बोलता हुआ इसे बाबा के मंदिर तक पहुंचाता है।
उधर, कैदी भी इस कार्य को कर खुश होते हैं। कैदियों का कहना है कि बाबा की इसी बहाने वह सेवा करते हैं जिससे उन्हें काफी सुकून मिलता है। पंडित परिहस्त बताते हैं कि शिवरात्रि को छोड़कर वर्ष के सभी दिन श्रृंगार पूजा के समय नाग मुकुट सजाया जाता है। शिवरात्रि के दिन भोले बाबा का विवाह होता है इस कारण यह मुकुट बाबा बासुकी नाथ मंदिर भेज दिया जाता है।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

कवारो की फोज़ तयार (कुंवारे और कुंवारी) 'मोस्ट एलिजिबल बैचलर्स'

जरा जानिए की संसद के 'मोस्ट एलिजिबल बैचलर्स' का हाल चल क्या हैं ....
ऐसा नहीं है कि सिर्फ क्रिकेट और फिल्मी दुनिया में ही 'मोस्ट एलिजिबल बैचलर्स' (कुंवारे और कुंवारी) हैं। देश की संसद में भी ऐसे युवाओं-युवतियों की कमी नहीं हैं। वर्तमान लोकसभा में लगभग आधे दर्जन से अधिक सांसद ऐसे हैं जिनके सिर पर या तो अभी तक सेहरा नहीं बंधा है या जिनके हाथ अभी तक पीले नहीं हुए हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सचिव वरुण गांधी से लेकर केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री अगाथा संगमा भी इनमें शुमार हैं।
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने हाल ही में शादी रचाकर अपने चाहने वाली हजारों युवतियों का दिल तोड़ा। गाहे बगाहे बॉलीवुड के सर्वाधिक चर्चित कुंवारे सलमान खान की शादी की चर्चा भी सुर्खियां बटोरती रहती हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर यूं तो तलाकशुदा हैं लेकिन जल्द ही वह अपनी महिला मित्र सुनंदा पुष्कर से विवाह रचाने वाले हैं। उनकी शादी की चर्चा सुर्खियों में है।
हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और वहां की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की बेटी चेल्सी की शादी भी खूब चर्चा में रही। कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट के सदस्य व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने शादी की है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे गनी खान चौधरी के खानदान से ताल्लुक रखने वाली मौसम नूर ने सांसद बनने के चंद महीनों के भीतर ही अपने बचपन के दोस्त मिर्जा काएश बेग से निकाह कर लिया था।
इन शादियों व शादी की चर्चाओं के बीच यह चर्चा भी इन दिनों है कि राहुल और वरुण जैसे संसद के चर्चित कुवारों के घर कब शाहनाई बजेगी या कुवांरियों के हाथ कब पीले होंगे। राहुल गांधी देश के युवा नेताओं की फौज में मोस्ट एलिजिबल बैचलर हैं, इसमें कोई शक नहीं। उनके बारे में लंबे समय से यह चर्चा आम है कि वह अपनी एक स्पेनिश गर्लफ्रेंड से शादी करना चाहते हैं। बहरहाल, देश को उनकी शादी का इंतजार है।
हाल ही में वरुण के बारे में ऐसी खबरें आई कि वह जल्द ही विवाह करने वाले हैं और उनकी मां मेनका गांधी ने उनके लिए एक लड़की भी ढूंढ ली है। राहुल और वरुण के अलावा सुवेंदु अधिकारी, प्रदीप मांझी, मीनाक्षी नटराजन, अगाथा संगमा, हमदुल्लाह सईद और योगी आदित्यनाथ ऐसे युवा सांसद हैं जिनके सिर पर अभी तक सेहरा नहीं बंधा या जिनके हाथ अभी तक पीले नहीं हुए हैं।
आम युवाओं की तरह ये सांसद भी अपनी शादी के बारे में बात करने से हिचकिचाते हैं। लक्षद्वीप से कांग्रेस के सांसद हमदुल्लाह सईद ने बातचीत में कहा कि अभी तक शादी के बारे में कुछ सोचा नहीं है, जब भी होगी तो आप लोगों को जरूर निमंत्रण दूंगा। सईद वर्तमान लोकसभा के सबसे युवा सदस्य हैं। वह महज 28 साल के हैं।
पश्चिम बंगाल के तामलुक से तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुवेंदु अधिकारी से जब उनकी शादी की योजना के बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि मेरी तो शादी हो गई है। मैंने जनता से शादी कर ली है। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने भी अभी तक शादी नहीं की है। उन्होंने तो शादी न करने की घोषणा ही कर दी है।
शादी की योजना के बारे में इसी प्रकार अन्य कुवांरे/कुंवारी सांसदों से भी बात की गई लेकिन अधिकांश ने इसे बेहद निजी मामला बताते हुए कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

not a london brize just a yamuna brize....


नलिन नयन प्रकाश द्वारा -
टिप्स-  बेहतरीन नज़र और सही समय के इंतज़ार से हम भी भारत को रंग - बिरंगा देख सकते है...
यह तस्वीर भी नलिन नयन प्रकाश द्वारा कैमरे में बंद  की गई है,तस्वीर देखिये और लगा लीजिये इनकी फोटोग्राफी का अन्दाज़ा....
इनकी और तस्वीरे जो इन्होने कैमरे में कैद की है उसे आप http://nalinimagetalk.blogspot.com/ पर  देख  सकते हैं....