नोट- कुछ मानवीय और तकनीकी भूलों के चलते हम दैनिक जागरण में 13 जुलाई को छपी नीलू रंजन की खबर पर टिप्पड़ी नहीं कर पाए थे। जिसके लिए जेयूसीएस क्षमा प्रार्थी है। लेकिन आजाद की फर्जी मुठभेड़ के बाद केंद्र सरकार जिस तरह माओवादियों के खिलाफ अपने मिथ्या अभियान में लगी है उसे देखते हुए हमें लगता है कि नीलू रंजन की इस प्लांटेड स्टोरी की सच्चाई पर पत्रकारीय और वैचारिक दृष्टि कोण से बहस होनी चाहिए।
किसी आमफहम हो चुके तथ्य पर सफेद झूठ बोलने और गुमराह करने का आरोप लगने के भय से सरकारें अपनी बात खुद न कह कर किस तरह ‘अपने’ पत्रकारों के मुह से अपनी बात रखवाती है, 13 जुलाई 2010 के दैनिक जागरण में छपी नीलू रंजन की खबर ‘नक्सलियों ने ही कराया आजाद का एंकाउंटर’ इसका ताजा उदाहरण है।
खबर में इस आमफहम हो चुके तथ्य कि आजाद की हत्या कर सरकार खास कर गृहमंत्रालय ने माओवादियों से बात-चीत के किसी भी उम्मीद को खत्म कर दिया है के विपरीत बताया गया है कि ‘आजाद का एंकाउंटर खुद बात-चीत के विरोधी नक्सलियों ने पुलिस को सूचना देकर करवाई है।’ नीलू जी ने इस दावे को सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े कुछ अधिकारियों के हवाले से कही है। नीलू आगे लिखते हैं ‘आजाद को दरअसल बात-चीत की सरकार की पेशकश स्वीकार करने की कीमत चुकानी पडी है। उसने न सिर्फ चिदम्बरम की बात-चीत की पेशकश को स्वीकार किया था, बल्कि केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त वार्ताकार स्वामी अग्निवेश से मुलाकात कर बात-चीत की शर्त का पत्र भी लिया था।
खबर की इन पंक्तियों से कुछ बातें स्पष्ट हैं। अव्वल तो यह कि आजाद की हत्या जिनके साथ फ्रीलांस पत्रकार हेमचंद पाण्डे को भी माओवादी बताकर मार डाला गया, पर उठने वाले सवालों का जवाब सरकार नहीं दे पा रही है और अब सवालों को दूसरी दिशा में मोडना चाहती है। लेकिन चूंकि इस प्रयास में उसे पकड में आ जाने वाले झूठे तर्क देने होंगे जिससे उसकी और किरकिरी होगी इसलिए वो ये सब नीलू और उन जैसे अन्य ‘राजधर्म’ निभाने वाले पत्रकारों से करवा रही है। जिसमें तथ्य और तर्क पिछले 10-15 सालों से सरकारों को ऐसे ही ‘मुश्किल’ सवालों से उबारने के लिए पैदा किए गए कथित रक्षा विशेशज्ञ मुहैया करा रहे हैं। नीलू इन्हीं लोगों के तर्कों के बुनियाद पर एक जाहिर हो चुकी सच्चाई को छुपाने के लिए सरकारी दिवार खडी करना चाहते हैं।
दूसरी बात जो खबर स्थापित करना चाहती है वो ये कि माओवादी अनुशासित और संगठित संगठन नहीं हैं बल्कि डकैतों के गिरोह की तरह हैं जो अपने किसी बडे नेता को सिर्फ इसलिए मार देते हैं कि वो सरकार से बात-चीत करना चाहता है। दूसरे अर्थों में खबर सरकार के इस पुराने धिसे-पिटे तर्क को स्थापित करना चाहती है कि सरकार तो बात-चीत के लिए तैयार है, माओवादी ही ऐसे किसी प्रयास को नहीं सफल होने देना चाहते। यहां तक कि सरकार द्वारा मध्यस्थता के लिए ‘नियुक्त’ स्वामी अग्निवेश और अपने ही एक बडे नेता के इस दिशा में प्रयास को भी नाकाम कर रहे हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि नीलू ने स्वामी अग्निवेश को जो कुछ अन्य लोगों के साथ माओवादियों और सरकार के बीच बात-चीत का रास्ता निकालने की लम्बे समय से स्वतंत्र प्रयास में थे को सरकार द्वारा ‘नियुक्त’ लिखा है। जबकि अग्निवेश ऐसे किसी ‘नियुक्ति’ से इनकार किया है। उनके अनुसार सरकार सिर्फ उनसे सम्पर्क में थी। जिस पर बाद में सरकार की तरफ से असहयोगी रवैया अपनाया जाने लगा और दिल्ली में उनके द्वारा इस प्रयास के बाबत प्रेस कांफ्रेंस की योजना को अंतिम समय में टलवा दिया गया। दि हिंदु, इण्डियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में छपे खबरों के मुताबिक अग्निवेश यह प्रेस कांफ्रेंस आजाद के कथित एंकाउंटर में मारे जाने से दो दिन पहले प्रस्तावित था। पत्रकार हेमचंद्र पाण्डे जिन्हें आजाद के साथ ही नकसली बताकर मारा गया का अपने कार्यालय के प्रांगण में आयोजित श्रद्धांजली कार्यक्रम में अग्निवेश ने सरकार पर खुलेआम आरोप लगाया कि आजाद की हत्या से सरकार ने अपनी फास्सिट मंशा जाहिर कर दी है कि वो किसी भी कीमत पर माओवादियों से वार्ता नहीं करना चाहती और इस प्रयास में लगे आजाद जैसे लोगों को वो किस तरह ठंडे दिमाग से मारती है।
जाहिर है, सरकार एक स्वतंत्र और इमानदार प्रयास करने वाले व्यक्ति को अपने द्वारा ‘नियुक्त’ बताकर माओवादियों से बात-चीत करने मंे अपनी तरफ से जानबूझ कर की गयी शरारत को ढकना चाहती है और इस इमानदार प्रयास को अपना श्रेय देना चाहती है। जिसके लिये नीलू ने आजाद और हेमचंद्र पाण्डे की हत्या के ठीक बाद अग्निवेश द्वार जारी बयान जिसमें उन्होंने इस घटना को माओवादियों और सरकार के बीच बात-चीत के किसी भी सम्भावना को खत्म करने वाला बताया था, को उसके वास्तविक संदर्भों से काट कर अपनी स्टोरी के अंत में ‘पेस्ट’ कर दिया है। वे लिखते हैं ‘कट्टर नक्सली नेताओं ने आजाद को रास्ते से हटाने का फैसला किया और आंध्र प्रदेश पुलिस को आजाद की सूचना दे दी और वह पलिस का शिकार बन गया। स्वामी अग्निवेश का कहना है कि आजाद की मौत के साथ ही नक्सलियों से बात-चीत की तमाम सम्भावनाएं भी खत्म हो गयी हैं’। यानि, जो बयान अग्निवेश ने सरकार को निशाना बनाते हुए दिया था उसे नीलू ने अपनी कलाकारी से सरकार के पक्ष में ‘पेन्ट’ कर दिया।
इस खबर में अपने नाम से दिए गए बयान पर जब अग्निवेश से पूछा गया तो उन्होंने इसे तोडा-मरोडा और प्लान्टेड बताया।
बहरहाल, नीलू की कलाकारी का एक और नमूना देखें। वे लिखते हैं ‘सूत्रों' की मानें तो आजाद बातचीत की पेशकश से स्वामी अग्निवेश का पत्र लेकर जा रहा था, ताकि पोलित ब्यूरो में इस पर अंतिम फैसला लिया जा सके। यह माना जा रहा था कि आजाद नक्सलियों के र्स्वोच्च नेता गणपति से बातचीत के लिए राजी कर लेगा’। गौरतलब है कि आजाद द्वारा शांतिवार्ता हेतु पत्र लेकर पोलिट ब्यूरो के बीच बहस के लिए जाने और वहां गणपति से इस मद्दे पर बात करने की योजना वाला बयान, आजाद के वारगंल के जंगलों में कथित एंकाउंटर में मारे जाने के पुलिसिया दावे के बाद वरवर राव और किशन जी की तरफ से आया था। जिसमें उन्होंने पुलिस पर आजाद के हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग करते हुए कहा था कि आजाद और हेमचंद्र को पुलिस ने नागपुर के पास पकडा था। जहां से उन्हें इस मुद्दे पर मीटिंग में जाना था। वरवर राव और किशन जी का यह बयान दैनिक जागरण समेत सभी अखबारों में छपा था। अब सवाल उठता है कि ये बयान हफ्ते भर बाद ही ‘सूत्रों' के हवाले से कैसे और क्यों छापी गयी।
- द्वारा जारी
अवनीश राय, शाह आलम, विजय प्रताप, ऋषि कुमार सिंह, देवाशीष प्रसून, अरूण उरांव, राजीव यादव, शाहनवाज़ आलम, चन्द्रिका, दिलीप, लक्ष्मण प्रसाद, उत्पल कान्त अनीस, अजय कुमार सिंह, राघवेंद्र प्रताप सिंह, शिवदास, अलका सिंह, अंशुमाला सिंह, श्वेता सिंह, नवीन कुमार, प्रबुद्ध गौतम, अर्चना महतो, विवेक मिश्रा, रवि राव, राकेश, तारिक शफीक, मसिहुद्दीन संजारी, दीपक राव, करूणा, आकाश, नाजिया अन्य साथी
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस), नई दिल्ली इकाई द्वारा जारी.
रविवार, 8 अगस्त 2010
शुक्रवार, 6 अगस्त 2010
TIME SOME TIME SAY OUT
TIME SOME TIME SAY OUT
dear respected which i would like to put in your mind that's every important but nobody follow it and i hope that am never going to wrong within my life around. it is a great amazing that makes us laugh against another view . two days ago mr kalmadi said '' nothing wrong done by me. i consider myself lucky because whenever i think to make any decision about any topic then first of all called my core member but right now my dearest one blamed on me ..........what you know very well there is no need of narration making as far as am making out..... ''. for your information kalmadi is not only a m.p from pune maharastra, he has also a authorized person by central government for RASTRAMANDAL kHEL. I have a idiom ,i was learned in class five or six am not exactly says .but sorry soulfully , i saw any where ''time some time say out'' mr kalmadi is a person who dedicated themselves for growing congress root from long periodical way in ,he had been no destiny no prediction but something is extra that congress loved him although why hutted by lead and saying scared always avoid the true zone.
While the delhi government and the commonwealth game 2010 organizing committee have been dismissing the central vigilance commissions reports of alleged irregularities in 16 cwg projects, the cvc is preparing to hand over the reports of central bureau of investigation for further investigation. However the exercise will be carried out after the game . highly placed sources in cvc said the commission will submit the details to the cbi for further investigation by the first week of November .cvc is also in the process of checking more has been compromised or been resorted to while completing the projects. cvc officials have found financial irregularities and other modern of corruption in at list 16 case pertaining to the cwg. the commission added that according to their findings,.........sorry swim deeply yourselves and your decision format what should need be about all ?
By prakash pandey a journalist
dear respected which i would like to put in your mind that's every important but nobody follow it and i hope that am never going to wrong within my life around. it is a great amazing that makes us laugh against another view . two days ago mr kalmadi said '' nothing wrong done by me. i consider myself lucky because whenever i think to make any decision about any topic then first of all called my core member but right now my dearest one blamed on me ..........what you know very well there is no need of narration making as far as am making out..... ''. for your information kalmadi is not only a m.p from pune maharastra, he has also a authorized person by central government for RASTRAMANDAL kHEL. I have a idiom ,i was learned in class five or six am not exactly says .but sorry soulfully , i saw any where ''time some time say out'' mr kalmadi is a person who dedicated themselves for growing congress root from long periodical way in ,he had been no destiny no prediction but something is extra that congress loved him although why hutted by lead and saying scared always avoid the true zone.
While the delhi government and the commonwealth game 2010 organizing committee have been dismissing the central vigilance commissions reports of alleged irregularities in 16 cwg projects, the cvc is preparing to hand over the reports of central bureau of investigation for further investigation. However the exercise will be carried out after the game . highly placed sources in cvc said the commission will submit the details to the cbi for further investigation by the first week of November .cvc is also in the process of checking more has been compromised or been resorted to while completing the projects. cvc officials have found financial irregularities and other modern of corruption in at list 16 case pertaining to the cwg. the commission added that according to their findings,.........sorry swim deeply yourselves and your decision format what should need be about all ?
By prakash pandey a journalist
सूर्य द्वारा संगम तट को छूने की एक कोशिश....संगम सनसेट इन इलाहबाद
यह तस्वीर नलिन नयन प्रकाश द्वारा कैमरे में कैद की गई है,जो एक उभरते हुए प्रोफसनल कैमरामैंन और स्टिल फोटोग्राफी के महारथी है इनकी और तस्वीरे जो इन्होने कैमरे में कैद की है उसे आप http://nalinimagetalk.blogspot.com/ पर देख सकते हैंऔर इसी तरह इनकी तस्वीरे cavs today पर आती रहेंगी ...
"शिव" को मिले "फ्री हैण्ड" के बाद सारे सूरमा धराशायी.....
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की भाजपा में वापसी को लेकर उठे तूफान और मध्य प्रदेश के दागी मंत्रियो के मसले पर गरमाई आग को शिवराज सिंह चौहान ने एक झटके में शांत कर दिया है॥ वे सारे मंत्री और नेता शिवराज के बयानों के बाद अपनी मांदो में दुबक गए है... इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर ये साफ़ हो गया है शिवराज की दिल्ली के दरबार में पकड़ कितनी मजबूत है....?
उमा भारती की भाजपा में वापसी के बदल शिवराज के बयानों के बाद छटगए है .... उमा की पार्टी में वापसी पर प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री की राय को महत्त्व दिएजाने के आलाकमान के ब्यान के बाद ये बात भी साफ़ हो गयी है कि बिना शिव की हरी झंडी मिले बिना उमा का अभी पार्टी में लौटना मुश्किल है... इधर मंत्रिमंडल से निष्कासित किये गए स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्राजो शिवराज सरकारको अस्थिर करने में जुटे थे उन्हें भी इस कार्य में असफलता हाथ लगी है....
कुछ दिन पहले अनूप मिश्रा की स्वास्थ्य मंत्री के पद से छुट्टी के बाद मध्य प्रदेश भाजपा मेंकोहराम मचा हुआ है... पार्टी के कई आला नेताओ से इस प्रकरण के बाद मेरी खुद बात भी हुई ... सबका कहना था कि अनूप मंत्रिमंडल से हटने के बाद शिवराज के खिलाफ अपना मोर्चा खोल सकते है.... जिनमे प्रदेश के मंत्रिमंडल के नम्बर २ माने जाने वाले एक कद्दावर नेता के साथ शिवराज की दागी "टीम" का लगभग पूरा कुनबा शामिल था लेकिन शिवराज ने शिवपुरी में एक सभा में भू माफियो को ललकार कर अपने सटीक तीर से उनके विरोधियो को चारो खाने चित्त कर दिया... शिवराज ने शिवपुरी में प्रदेश के भीतर भू माफिया उनको गद्दी से हटाने की साजिश रच रहे है ये बयान देकर अप्रत्यक्ष रूप से उमा से निकटता पाए एक कद्दावर नेता को निशाने पर ला गया है.... मुख्यमंत्री द्वारा ये बयान दागी मंत्रियो से ध्यान हटाने की मुहीम का एक हिस्सा था जिसमे शिवराज ने एक बार फिर ये दिखया दिया भाजपा में मोदी के बाद क्यों अब उनका गुणगान किया जाने लगा है.... इन बयानों के बाद उमा भारती की पार्टी में वापसी की सम्भावनाये तो फिलहाल समाप्त ही हो गयी है... उनकी वापसी की अटकले लम्बे समय से भाजपा में चल रही है॥
दरअसल , जसवंत की पार्टी में वापसी के बाद उमा की भाजपा में वापसी को बल मिलने लगा था... लेकिन शिव, प्रभात और सुषमा की "तिकड़ी" उमा की वापसी के पक्ष में कतई नही थी... लेकिन उमा की पिछले कुछ समय से आडवानी के साथ बड़ी निकटता ने पार्टी के एक बड़े तबके को उनके पक्ष में लामबंद करना शुरू कर दिया था जिनमे प्रदेश की राजनीती से जुड़े कैलाश विजयवर्गीय से लेकर सुमित्रा महाजन तो बाबूलाल गौर से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी तक शामिल थे... इसके बाद एक बैठक में उमा के मसले पर पार्टी के नेताओ में काफी नोक झोक भी हुई जिसमे बाबूलाल गौर ने इस्तीफे की पेशकश कर डाली... रिपोर्टिंग के दौरान मेरी आँखे भी इसकी गवाह बनी थी जिसके बाद चौहत्तर बंगले के आवास में कई नेताओ की आवाजाही शुरू हो गयी... डेमेज कंट्रोल के तहत शिवराज को आलाकमान ने तुरंत दिल्ली बुला लिया...और उमा के मसले पर उनकी राय जाननी चाही जहाँ पर शिवराज ने साफ़ लफ्जो में कह डाला अगर उमा की पार्टी में वापसी हो गयी तो वह मध्य प्रदेश का मोह कैसे छोड़ पाएंगी?
भूमाफिया शिवराज को हटाना चाहते है बयान दिए जाने के बाद शिवराज को हटाने की मुहीम में लगे नेताओ की दाल नही गल रही है....अब आलाकमान द्वारा शिवराज को "फ्री हैण्ड" दिए जाने के बाद भाजपा के मंत्रियो की प्रदेश में मुसीबत बद गयी है....क्युकि मुख्यमत्री ने सभी को अपने अधिकारचेत्रो में रहने की नसीहते दे डाली है....इन बयानों के बाद सूबे में उमा की वापसी की पैरवी करने वालो के स्वर धीमे हो गए है....ऐसे में अब पार्टी में उमा भारती की वापसी की दूर दूर तक कोई सम्भावनाये नही दिखाई देती...............
उमा भारती की भाजपा में वापसी के बदल शिवराज के बयानों के बाद छटगए है .... उमा की पार्टी में वापसी पर प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री की राय को महत्त्व दिएजाने के आलाकमान के ब्यान के बाद ये बात भी साफ़ हो गयी है कि बिना शिव की हरी झंडी मिले बिना उमा का अभी पार्टी में लौटना मुश्किल है... इधर मंत्रिमंडल से निष्कासित किये गए स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्राजो शिवराज सरकारको अस्थिर करने में जुटे थे उन्हें भी इस कार्य में असफलता हाथ लगी है....
कुछ दिन पहले अनूप मिश्रा की स्वास्थ्य मंत्री के पद से छुट्टी के बाद मध्य प्रदेश भाजपा मेंकोहराम मचा हुआ है... पार्टी के कई आला नेताओ से इस प्रकरण के बाद मेरी खुद बात भी हुई ... सबका कहना था कि अनूप मंत्रिमंडल से हटने के बाद शिवराज के खिलाफ अपना मोर्चा खोल सकते है.... जिनमे प्रदेश के मंत्रिमंडल के नम्बर २ माने जाने वाले एक कद्दावर नेता के साथ शिवराज की दागी "टीम" का लगभग पूरा कुनबा शामिल था लेकिन शिवराज ने शिवपुरी में एक सभा में भू माफियो को ललकार कर अपने सटीक तीर से उनके विरोधियो को चारो खाने चित्त कर दिया... शिवराज ने शिवपुरी में प्रदेश के भीतर भू माफिया उनको गद्दी से हटाने की साजिश रच रहे है ये बयान देकर अप्रत्यक्ष रूप से उमा से निकटता पाए एक कद्दावर नेता को निशाने पर ला गया है.... मुख्यमंत्री द्वारा ये बयान दागी मंत्रियो से ध्यान हटाने की मुहीम का एक हिस्सा था जिसमे शिवराज ने एक बार फिर ये दिखया दिया भाजपा में मोदी के बाद क्यों अब उनका गुणगान किया जाने लगा है.... इन बयानों के बाद उमा भारती की पार्टी में वापसी की सम्भावनाये तो फिलहाल समाप्त ही हो गयी है... उनकी वापसी की अटकले लम्बे समय से भाजपा में चल रही है॥
दरअसल , जसवंत की पार्टी में वापसी के बाद उमा की भाजपा में वापसी को बल मिलने लगा था... लेकिन शिव, प्रभात और सुषमा की "तिकड़ी" उमा की वापसी के पक्ष में कतई नही थी... लेकिन उमा की पिछले कुछ समय से आडवानी के साथ बड़ी निकटता ने पार्टी के एक बड़े तबके को उनके पक्ष में लामबंद करना शुरू कर दिया था जिनमे प्रदेश की राजनीती से जुड़े कैलाश विजयवर्गीय से लेकर सुमित्रा महाजन तो बाबूलाल गौर से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी तक शामिल थे... इसके बाद एक बैठक में उमा के मसले पर पार्टी के नेताओ में काफी नोक झोक भी हुई जिसमे बाबूलाल गौर ने इस्तीफे की पेशकश कर डाली... रिपोर्टिंग के दौरान मेरी आँखे भी इसकी गवाह बनी थी जिसके बाद चौहत्तर बंगले के आवास में कई नेताओ की आवाजाही शुरू हो गयी... डेमेज कंट्रोल के तहत शिवराज को आलाकमान ने तुरंत दिल्ली बुला लिया...और उमा के मसले पर उनकी राय जाननी चाही जहाँ पर शिवराज ने साफ़ लफ्जो में कह डाला अगर उमा की पार्टी में वापसी हो गयी तो वह मध्य प्रदेश का मोह कैसे छोड़ पाएंगी?
भूमाफिया शिवराज को हटाना चाहते है बयान दिए जाने के बाद शिवराज को हटाने की मुहीम में लगे नेताओ की दाल नही गल रही है....अब आलाकमान द्वारा शिवराज को "फ्री हैण्ड" दिए जाने के बाद भाजपा के मंत्रियो की प्रदेश में मुसीबत बद गयी है....क्युकि मुख्यमत्री ने सभी को अपने अधिकारचेत्रो में रहने की नसीहते दे डाली है....इन बयानों के बाद सूबे में उमा की वापसी की पैरवी करने वालो के स्वर धीमे हो गए है....ऐसे में अब पार्टी में उमा भारती की वापसी की दूर दूर तक कोई सम्भावनाये नही दिखाई देती...............
बुधवार, 4 अगस्त 2010
मेरा गोरखपुर शहर.........
![]() |
| योगी आदित्यनाथ मनोज तिवारी |
![]() |
| विश्व प्रसिद्द गोरखनाथ मंदिर |
![]() |
| गोरखपुर विश्वविद्यालय |
जहाँ बाबा राघव मेडिकल कॉलेज है
जहाँ दीनदयाल विश्वविद्यालय है
जहाँ गोरख बाबा का मंदिर है
जहाँ योगी सबके दिलों के अंदर है
जो कबीर प्रेम कि धरती है
जहाँ बुढ़िया माई रहती है
जहाँ जनता बाबा कि पुजारी है
जहाँ से हारा मनोज तिवारी है
जहाँ योगी बाबा का राज़ है
जिन पर सदा ही मुझको नाज़ है
जहाँ हिंदुत्व और विकास की लहर है
वहीँ मेरा गोरखपुर शहर है
चित्र क्रमश-
१- योगी आदित्यनाथ
2- manoj tiwari
3- गोरखनाथ मंदिर
4-गोरखपुर विश्वविद्यालय
5-गोरखपुर रेलवे स्टेशन
6-कबीरदास ( मगहर )
7-गीता प्रेस कि पुस्तक
प्रस्तुतकर्ता-
आदित्य कुमार मिश्रा
राम जानकी नगर गोरखपुर
a
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
जुगाड़ से बड़ी कोई प्रतिभा नही होती..........
जिन्दगी ने ढाहें है ढेरों सितम -
अनिल धीरू भाई अम्बानी के चौकीदार कि कसम..............................
जी हाँ ऊपर जो हेड लाइन आपने पढ़ा सैधांतिक रूप से वो गलत है लेकिन मीडिया में आकर मैंने देखा कि वो एक अटल सत्य है....माखनलाल विश्वविद्यालय में HI देख लिया था कि जुगाड़ क्या चीज़ है......खैर जुगाड़ के हम भी धनी आदमी है...लेकिन जुगाड़ से अपनी क्षमता से बहुत ज्यादा पाने कि कोसिस नही करनी क्योंकि जुगाड़ से एकाएक सफलता पाया जा सकता है लेकिन .सफलता पर टिका नही रहा जा सकता ......मगर भाई भूखो मरने से अच्छा है कि हर आदमी को थोडा बहुत जुगाड़ रखना ही चाहिए.... अब तक आपने अमिताभ साहब और उनके लाडले अभिषेक बच्चन कि तस्वीर भी देख ही ली होगी ......ये भी जुगाड़ का ही नमूना है...भले ही यहाँ बाप-बेटे का रिश्ता है....लेकिन अगर हमारे आपके माँ -बाप अमिताभ के कद के होते तो क्या हम भी आज रिज्यूम लेकर आज तक--इंडिया न्यूज- इंडिया टीवी -यू एन आई --आई बी एन 7 --और तमाम फलाना -ढिमका के चक्कर काटते क्या ...शायद नहीं......अभिषेक को फिल्मो में चांस भी मिला होगा तो अमिताभ कि वजह से ----तमाम फ्लाप फिल्मो के बावजूद लगातार फिल्मे मिलती रही तो अमिताभ कि वजह से ......यहाँ तक कि ऐश्वर्या जैसी हुस्न कि मल्लिका भी मिली तो उसमे भी अमिताभ का कद बहुत माइने रखता है...........
अब आपके सामने मुल्ला मुलायम सिंह और उनके साहब जादे अखिलेश यादव की तस्वीर भी मौजूद है......अगर मुलायम सिंह इतने ऊँचे कद के न होते ( पैसे और सोहरत की बात कर रहा हूँ सम्मान की नही) तो अखिलेश यादव के वश की बात तकी की एक साथ २-२ लोकसभा सीटें जित जातें...शायद कभी नही.......कुल मिलाकर.....बाप--बेटे का रिश्ता ही सही मगर अखिलेश आज जो कुछ भी हैं जुगाड़ पे ही हैं........अब बात हो जाये मीडिया फिल्ड की ........वैसे मुझे मालूम है की इस ब्लॉग को मदिया के सुरवीर लोग ही पढ़ते हैं........और मीडिया में जुगाड़ का महत्व तो जानते ही होंगे....लेकिन माफ़ कीजियेगा .....मै अपनी व्यथा को अकेले झेल नही पा रहा हूँ.....कुछ आप भी झेल जाइये मेरी दुआ लगेगी......तो बात ये है कि मै भी अपना रेज्यूम लेकर अन्सुमन भाई के साथ मार्च-अप्रैल २०१० में नोएडा में इंडिया न्यूज --आजाद न्यूज---महुआ चैनल--जैसे कई चंनेलो के चक्कर काट चूका हु... ....अपने प्रिय सांसद योगी आदित्यनाथ के पास तक भी इसी इरादे से गया था लेकिन उनसे कुछ कहा नही ....सोचा कि किस मुह से ये कहूँ कि मुझे नौकरी दिलादिजिये....मगर गया तो जुगाड़ के ही इरादे से था....सब बात छोडिये मै आई बी एन में इन्टर्न के समय पूरे एक महिना GEST CO-ORDINATION में बिता दिया कि रोज नेताओं के घर जाने को मिलेगा ...किसी दिन मौका निकाल कर अपनी सेटिंग करा लूँगा ..और मौका मिला भी था....एक बार नहीं कई बार....बीजेपी प्रवक्ता रवि शंकर प्रसाद --कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी---बीजेपी के चन्दन मित्रा ---एन सी पि के महासचिव डी पि त्रिपाठी , अभी गुजरात के पूर्व मंत्री अमित शाह का मुकदमा जो लड़ रहे हैं हैं ....के टी एस तुलसी ..देवरिया के पूर्व सांसद मोहन सिंह ....जैसे लोगो के घर गया...उनके कालर में माइक लगाया .....ये सब मै अपनी गुणगान नही कर रहा हूँ...बता रहा हु कि जुगाड़ लगाने के लिए कितना तलवा चाटने जैसा काम करना पड़ता है....हलाकि वो मेरा तात्कालिक काम थालेकिन सब कुछ के बाद कैसे कहा जाए कि साहब मुझे नौकरी दिलादो......मै तो किसी से नही कह पाया अपने दोस्तों से भले मजाक में या सही--सही कह दू मगर ऐसे लोगों से मै नही कह पाउँगा.........हाँ राजनीति मेरा प्रिय क्षेत्र है मै उसमे अभी या कभी भी थोडा बहुत समझौता कर सकता हूँ........भोपाल में मैंने एक गुरु ढूंढने का प्रयास किया ....क्योंकि चेला मै बहुत अच्छा हूँ....गुरु मिला नही....मेरा मकान मलिक पप्पू विलास थोडा गुरु टैप का लगा मगर वो भी पार्षद का चुनाव हर गया ...मेरा जुगाड़/गुरु ...वाला काम तमाम हो गया.....फिर माखनलाल में एक पावरफुल और जिम्मेदार गुरु से मेरी मुलाकात हो गई...घुमा फिरा कर मैंने जुगाड़ लगाया.....गुरु ने वैल्यू भी दिया मगर गुरु मुझे पहचान भी गया....बोला राजनीति में जाना चाहते हो तो जाओ अपनी एक अलग पहचान बनाओ....निचे से उपर जाने कि कोसिस करो....सीधे उपर मत जाओ क्योकि वहाँ से गिरोगे तो उठ नही पाओगे.......यहाँ शब्द मेरे हैं भाव गुरुदेव के ही हैं.......तो मै निचे से ऊपर कि रह पर चल पड़ा हूँ.......आगे मेरी मेहनत और आप लोगो कि दुआदोनों मिले तो आदित्य मिश्रा लोकसभा का सदस्य बनकर रहेगा...............लेकिन शुरू में मैंने जो बात खी कि जुगाड़ से बड़ी कोई योग्यता नही होती ,,,,,,बहुत ज्यादा गलत नही है.......अगर आप को कोई गुरु न मिला हो तो जुगाड़ से बड़ा कोई गुरु नही है........जुगाड़ से बड़ी कोई प्रतिभा शुरुआत दिलाने के लिए मिडिया में है ही नही........जुगाड़ से ही केव्स के २०१० बैच के जो दो चार बंदे कही टिक पाए हैं.....तो हो अगर कोई जुगाड़ तो मत चुको चौहान......

सोमवार, 2 अगस्त 2010
यायावर
आशुतोष शुक्ला के द्वारा ये कविता लिखी गयी है ....
दृश्य श्रव्य अध्यन केंद्र में प्रसारण पत्रकारिता के तृतीय समेस्टर के छात्र हैं .......
मेरे द्वारा लिखी हुई ये कविता किसी साहित्यिक योगदान के लिए न हीं है , अपितु केवल एक भावना प ैदा करती हैउस व्यक्ति में जो त माम तरह की बुराइयों में फंस कर अपने मूल लक्ष्य से भटक गया हो और एक आवाज़ चाहता होजो उसे नी ंद से जगा दे ...........
'ये कविता एक आवाज़ है'.............
'ये कविता एक आवाज़ है'.............
यायावर था मै कभी ,
ठहर गया हूँ अभी अभी
जैसे बाँध के सामने रुक जाती है कोई नदी ,
कुछ क्लेश था मन में बचा अभी
क्यों बंध सीमा में गया अभी
सत्यान्वेषण की राह में बाधाएं आती है कितनी
यह ज्ञात हुआ है मुझे अभी
मुझको दिखता है सत्यांश उस बंधन के कोने से कही
मुझमे दृढ़ता मुझमे भुजबल मुझ में नवयौवन का प्रवाह ,
मै भरा हुआ उत्साह से था उस बंधन ने जाना न अभी
यह बंधन कुटिल बेड़ियों का लालच की जिसमे गाँठ पड़ी
जब मैंने वहां प्रहार किया बंधन टूटे गांठे जा उडी
फिर चल पड़ा मै उधर
जिसको लक्ष्य बनाया था कभी
तोड़ के साड़ी सीमओं को निकल पड़ा हूँ अभी अभी
यायावर हूँ मै अभी .....................
यायावर हूँ मै अभी .............................. .
शनिवार, 31 जुलाई 2010
अज्ञातवास में जॉर्ज..........................

कोई सहारा ना रहा......................
हम किसी के ना रहे ...........
कोई हमारा ना रहा........................
शाम तन्हाई की है .........
आएगी मंजिल कैसे.........
जो मुझे राह दिखाए.......
वही तारा ना रहा ...............
क्या बताऊ मैं कहाँ............
यू ही चला जाता हू.......
जो मुझे फिर से बुला ले..........
वो इशारा ना रहा........."
झुमरू की याद जेहन में आ रही है ............. मजरूह सुल्तानपुरी और किशोर की गायकी इस गाने में चार चाँद लगा देती है........... पुराने गीतों के बारे में प्रायः कहा जाता है "ओल्ड इस गोल्ड ".......इसका सही से पता अब चल रहा है............ ७० के दशक की राजनीती के सबसे बड़े महानायक पर यह जुमला फिट बैठ रहा है........ कभी ट्रेड यूनियनों के आंदोलनों के अगवा रहे जार्ज की कहानी जीवन के अंतिम समय में ऐसी हो जायेगी , ऐसी कल्पना शायद किसी ने नही की होगी.......कभी समाजवाद का झंडा बुलंद करने वाला यह शेर आज बीमार पड़ा है ....वह खुद अपने साथियो को नही पहचान पा रहा ......यह बीमारी संपत्ति विवाद में एक बड़ा अवरोध बन गयी है..........."प्रशांत झा" मेरे सीनियर है.........अभी मध्य प्रदेश के नम्बर १ समाचार पत्र से जुड़े है........... बिहार के मुज्जफरपुर से वह ताल्लुक रखते है ......... जब भी उनसे मेरी मुलाकात होती है तो खुद के हाल चाल कम राजनीती के मैदान के हाल चाल ज्यादा लिया करता हूँ ....... एक बार हम दोनों की मुलाक़ात में मुजफ्फरपुर आ गया ... देश की राजनीती का असली बैरोमीटर यही मुजफ्फरपुर बीते कुछ वर्षो से हुआ करता था....... पिछले लोक सभा चुनावो में यह सिलसिला टूट गया...... यहाँ से जार्ज फर्नांडीज चुनाव लड़ा करते थे..... लेकिन १५ वी लोक सभा में उनका पत्ता कट गया.....नीतीश और शरद यादव ने उनको टिकट देने से साफ़ मन कर दिया........... इसके बाद यह संसदीय इलाका पूरे देश में चर्चा में आ गया था... नीतीश ने तो साफ़ कह दिया था अगर जार्ज यहाँ से चुनाव लड़ते है तो वह चुनाव लड़कर अपनी भद करवाएंगे......... पर जार्ज कहाँ मानते? उन्होंने निर्दलीय चुनाव में कूदने की ठान ली....... आखिरकार इस बार उनकी नही चल पायी और उनको पराजय का मुह देखना पड़ा........... इन परिणामो को लेकर मेरा मन शुरू से आशंकित था...... इस चुनाव के विषय में प्रशांत जी से अक्सर बात हुआ करती थी..... वह कहा करते थे जार्ज के चलते मुजफ्फरपुर में विकास कार्य तेजी से हुए है... लेकिन निर्दलीय मैदान में उतरने से उनकी राह आसान नही हो सकती ...उनका आकलन सही निकला ... जार्ज को हार का मुह देखना पड़ा.... हाँ ,यह अलग बात है इसके बाद भी शरद और नीतीश की जोड़ी ने उनको राज्य सभा के जरिये बेक दूर से इंट्री दिलवा दी .........आज वही जार्ज अस्वस्थ है...... अल्जायीमार्स से पीड़ित है........ उनकी संपत्ति को लेकर विवाद इस बार तेज हो गया है..... पर दुःख की बात यह है इस मामले को मीडिया नही उठा रहा है.... जार्ज को भी शायद इस बात का पता नही होगा , कभी भविष्य में उनकी संपत्ति पर कई लोग अपनी गिद्ध दृष्टी लगाए बैठे होंगे..... पर हो तो ऐसा ही रहा है.... जार्ज असहाय है... बीमारी भी ऐसी लगी है कि वह किसी को पहचान नही सकते ... ना बात कर पाते है...... शायद इसी का फायदा कुछ लोग उठाना चाहते है.......कहते है पैसा ऐसी चीज है जो विवादों को खड़ा करती है.......... जार्ज मामले में भी यही हो रहा है.... उनकी पहली पत्नी लैला के आने से कहानी में नया मोड़ आ गया है.... वह अपनेबेटे को साथ लेकर आई है जो जार्ज के स्वास्थ्य लाभ की कामना कर रही है... बताया जाता है जार्ज की पहली पत्नी लैला पिछले २५ सालो से उनके साथ नही रह रही है.... वह इसी साल नए वर्ष में उनके साथ बिगड़े स्वास्थ्य का हवाला देकर चली आई..... यहाँ पर यह बताते चले जार्ज और लैला के बीच किसी तरह का तलाक भी नही हुआ है...अभी तक जार्ज की निकटता जया जेटली के साथ थी....वह इस बीमारी में भी उनकी मदद को आगे आई और उनके इलाज की व्यवस्था करने में जुटी थी पर अचानक शान और लैला के आगमन ने उनका अमन ले लिया .... जैसे ही जार्ज को इलाज के लिए ले जाया गया वैसे ही बेटे और माँ की इंट्री मनमोहन देसाई के सेट पर हो गयी ..... लैला का आरोप है जार्ज मेरा है तो वही जया का कहना है इतने सालो से वह उनके साथ नही है लिहाजा जार्ज पर पहला हक़ उनका बनता है.... अब बड़ा सवाल यह है कि दोनों में कौन संपत्ति का असली हकदार है...?जार्ज के पेंच को समझने ले लिए हमको ५० के दशक की तरफ रुख करना होगा.... यही वह दौर था जब उन्होंने कर्नाटक की धरती को अपने जन्म से पवित्र कर दिया था॥3 जून 1930 को जान और एलिस फर्नांडीज के घर उनका जन्म मंगलौर में हुआ था.....५० के दशक में एक मजदूर नेता के तौर पर उन्होंने अपना परचम महाराष्ट्र की राजनीती में लहराया ... यही वह दौर था जब उनकी राजनीती परवान पर गयी ......कहा तो यहाँ तक जाता है हिंदी फिल्मो के "ट्रेजिडी किंग " दिलीप कुमार को उनसे बहुत प्रेरणा मिला करती थी अपनी फिल्मो की शूटिंग से पहले वह जार्ज कि सभाओ में जाकर अपने को तैयार करते थे... जार्ज को असली पहचान उस समय मिली जब १९६७ में उन्होंने मुंबई में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता एस के पाटिल को पराजित कर दिया ... लोक सभा में पाटिल जैसे बड़े नेता को हराकर उन्होंने उस समय लोक सभा में दस्तक दी ... इस जीत ने जार्ज को नायक बना दिया... बाद में अपने समाजवाद का झंडा बुलंद करते हुए १९७४ में वह रेलवे संघ के मुखिया बना दिए गए...उस समय उनकी ताकत को देखकर तत्कालीन सरकार के भी होश उड़ गए थे... जार्ज जब सामने हड़ताल के नेतृत्व के लिए आगे आते थे तो उनको सुनने के लिए मजदूर कामगारों की टोली से सड़के जाम हो जाया करती थी....आपातकाल के दौरान उन्होंने मुजफ्फरपुर की जेल से अपना नामांकन भरा और जेपीका समर्थन किया॥ तब जॉर्ज के पोस्टर मुजफ्फरपुर के हर घर में लगा करते थे ... लोग उनके लिए मन्नते माँगा करते थे और कहा करते थे जेल का ताला टूटेगा हमारा जॉर्ज छूटेगा... १९७७ में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उनको उद्योग मंत्री बनाया गया... उस समय उनके मंत्रालय में जया जेटली के पति अशोक जेटली हुआ करते थे ... उसी समय उनकी जया जेटली से पहचान हुई ...बाद में यह दोस्ती में बदल गयी और वे उनके साथ रहने लगी....हालाँकि लैला कबीर उनकी जिन्दगी में उस समय आ गयी थी जब वह मुम्बई में संघर्ष कर रहे थे...तभी उनकी मुलाकात तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री हुमायु कबीर की पुत्री लैला कबीर से हुई जो उस समय समाज सेवा से जुडी हुई थी... लैला के पास नर्सिंग का डिप्लोमा था और वह इसी में अपना करियर बनाना चाहती थी ...बताया जाता है तब जार्ज ने उनकी मदद की...उनके साथ यही निकटता प्रेम सम्बन्ध में बदल गयी और २१ जुलाई १९७१ को वे परिणय सूत्र में बढ़ गए...इसके बाद कुछ वर्षो तक दोनों के बीच सब कुछ ठीक चला...परन्तु जैसे ही जॉर्ज मोरार जी की सरकार में उद्योग मंत्री बनाये गए तो लैला जॉर्ज से दूर होती गई... जॉर्ज अपने निजी सचिव अशोक जेटली कि पत्नी जया जेटली के ज्यादा निकट चली गई... इस प्रेम को देखते हुए लैला ने अपने को जॉर्ज से दूर कर लिया और ३१ अक्तूबर १९८४ से दोनों अलग अलग रहने लगे..इसके बाद लैला दिल्ली के पंचशील पार्क में रहने लगी वही जॉर्ज कृष्ण मेनन मार्ग में...अब इस साल की शुरुवात से संपत्ति को लेकर विवाद गरमा गया है..इसे पाने के लिए जया और लैला जोर लगा रहे है..चुनावो के दौरान जॉर्ज द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक वह करोडो के स्वामी है जिनके पास मुम्बई , हुबली, दिल्ली में करोड़ो की संपत्ति है..यहीं नही मुम्बई के एक बैंक में उनके शेयरों की कीमत भी अब काफी हो चुकी है... ऐसे में संपत्ति को लेकर विवाद होना तो लाजमी ही है.. जॉर्ज के समर्थको का कहना है जया ने उनको जॉर्ज की संपत्ति से दूर कर दिया है...वही वे ये भी मानते है जया ने उनका भरपूर इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया ...सूत्र तो यहाँ तक बताते है कि जया के द्वारा जॉर्ज की संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा झटक लिया गया है..२००९ में खुद जॉर्ज ने अपनी पोवार ऑफ़ अटोर्नी में इस बात का जिक्र किया है...वही जया ने लैला पर जबरन घर में घुसकर जॉर्ज के दस्तावेजो में हेर फेर के आरोप लगा भी जड़ दिए है..यही नही जया का कहना है उन्हें जॉर्ज के गिरते स्वास्थ्य की बिलकुल भी चिंता नही है..वही लैला और उनके बेटे सुशांत कबीर का कहना है वे जॉर्ज के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है तभी वे हर पल उनके साथ है चाहे पतंजलि योगपीठ ले जाते समय कि बात हो या चाहे उनके गिरते स्वास्थ्य के समय की बात वे हर पल उनके साथ बने है॥जया के समर्थको का कहना है संपत्ति हड़पने के आरोप लैला के द्वारा लगाये जाने सही नही है..अगर उन्हें गिरते स्वास्थ्य की थोड़ी से भी चिंता होती तो उन्हें देखने इस साल नही आती जब जॉर्ज बीमार हुए ...लैला भी कम नही है वे भी संपत्ति पर नजर लगाये बैठी है..वैसे इस कहानी का एक पक्ष ये भी है की जया ने जॉर्ज का इस्तेमाल करना बखूबी सीखा है तभी उन्ही के कारन जॉर्ज की छवि कई बार धूमिल भी हुई है..जैसे रक्षा सौदों में दलाली से लेकर तहलका में उनके दामन पर दाग लगाने में जया की बड़ी भूमिका रही है..यही नही जॉर्ज को मुजफ्फर पुर से लड़ने की रणनीति भी खुद जया की थी..इस हार के बाद उनको राज्य सभा में भेजने की कोई जरुरत नही थी...वैसे भी जॉर्ज कहा करते थे समाजवादी कभी राज्य सबह के रास्ते "इंट्री" नही करते..इन सब बातो के बावजूद भी उनका राज्य सभा जाना कई सवालों को जन्म देता है....यही नही शरद नीतीश की जोड़ी का हाथ पकड़कर उनको राज्य सभा पहुचाना उनकी छवि पर ग्रहण लगाता है.. आखिर एका एक उनका मूड कैसे बदल गया ये फैसला कोई गले नही उतार पा रहा है..इसमें भी जया की भूमिका संदेहास्पद लगती है॥बहरहाल जो भी हो आज जॉर्ज सरीखा शेर खुद दो पाटन के बीच फसकर रह गया है...जंग जारी है संपत्ति को लेकर विवाद अभी भी गरम है..जॉर्ज तो एक बहाना है॥ देखना होगा इस नूराकुश्ती में कौन विजयी होता है...? लैला कबीर के लिए राहत की बात ये है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनको अपने साथ रखने की अनुमति दे दी है... वैसे इससे ज्यादा अहम् बात जॉर्ज का गिरता स्वास्थ्य है जिसकी चिंता किसी को नही है॥ लेकिन"पैसा " एक ऐसी चीज है जो झगड़ो का कारन बनती है ये कहानी जॉर्ज की नही , कहानी घर घर की है.............देखना होगा ये कहानी किस ओर जाती है?(हर्षवर्धन पाण्डे युवा पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है...समसामयिक विषयो पर लेखन लम्बे समय से करते आ रहे है... आप इनके विचारो को "बोलती कलम ब्लॉग"पर भी पढ़ सकते है)
रविवार, 18 जुलाई 2010
ऑस्ट्रेलिया में अभी भी जारी है नस्लवाद.........
गौर से देखिये इन तस्वीरो को.....एक चित्र हजार शब्द कहता है...इस फोटो को देखकर आप भी अनुमान लगा सकते है....दिमाग पर ज्यादा जोर नही डालना पड़ेगा.... क्युकि ये पहेली नही है.... ये तस्वीर है जयंत डागोर की , जो खुद ही आप बीती बता रही है... बायी तरफ लिखा है ऑस्ट्रेलिया में न्याय कहाँ है तो दाई ओर जयंत जिस बोर्ड को पकडे है उस पर लिखा है आखिर कब तक ऑस्ट्रेलियन सिस्टम से लड़ा जाए....?ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों को न्याय नही मिल रहा है.... वहां की सरकार के लाख दावो के बाद भी भारतीयों के साथ नस्लभेद जारी है... अगर सब कुछ सामान्य होता तो आज जयंत जैसे लोगो को अपनी आप बीती सुनाने के लिए भारतीय मीडिया का सहारा नही लेना पड़ता..... जयंत की पत्नी अन्ना मारिया भी ऑस्ट्रेलियन मीडिया से त्रस्त है.... खुद उनकी माने तो वहां नस्लभेद किया जाता है मीडिया को भी वैसी आज़ादी नही है जैसी भारतीय मीडिया में है .... वैसे भारतीय मीडिया को दाद देनी चाहिए.... खासतौर से खबरिया चैनलों को जो हर घटना के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते है.... फिर आज का समय ऐसा है कि हर व्यक्ति अपनी बात पहुचानेके लिए मीडिया का सहारा लेने लगता है.... जयंत भी यही कर रहे है.... भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया का डंका पूरे विश्व में बजने लगा है.... अप्रवासी भारतीय भी अब इसके नाम का नगाड़ा बजाने लगे है... जयंत और उनकी पत्नी अन्ना से मिलकर तो कम से कम ऐसा ही लगा... ऑस्ट्रेलियाई मीडिया जब उनकी एक सुनने को तैयार नही हुआ तो जयंत और उनकी
पत्नी अन्ना भोपाल पहुचे जहाँ मीडिया के सामने अपनी व्यथा को रखा ....
जयंत डागोर 1998 से ऑस्ट्रेलियन नागरिक है...1989 में अपने जुडवा भाई आनंद की साथ मिलकर उन्होंने ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए वीजा आवेदन दिया तो उनके भाई आनंद का वीजा एक्सेप्ट कर लिया गया लेकिन उन्हें वीजा नही मिल पाया..जबकि दोनों भाईयो ने नई दिल्ली के पूसा केटरिंग कोलेज से होटल मेनेजमेंट की डिग्री प्राप्त की थी.. 1990में जयंत के भाई ने आनंद को भाई के नाते स्पोंसर किया लेकिन उसके बाद भी ऑस्ट्रेलियन हाई कमीशन ने उसका वीजा एक्सेप्ट नही किया... इसके बाद लगातार चार बार यही सिलसिला चलता रहा... जयंत के आवेदन को एक्सेप्ट नही किया गया... आख़िरकार एक लम्बी लडाई लड़ने की बाद जयंत1996 में परमानेंट शैफ का वीजा लेकर ऑस्ट्रेलिया चले गए...
1998 में जयंत तो ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता मिल गई..1999में जयंत मेलबर्न के एक होटल में शैफ काम करने लगे... यहाँ पर एक सीनियर शैफ माईकल उन्हें भारतीय होने के नाते परेशान करने लगा.... जिसकी शिकायत उन्होंने एच आर मैनेजर से की जिसके बाद उसे जरुरत से ज्यादा काम करवाया जाने लगा...जिसके चलते जयंत को "कार्पल टनल " की बीमारी हो गई जिसके इलाज में जयंत को एक बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी...इसके बाद जयंत फिर जब काम पर लौटा तो डाक्टर की सलाह को अनदेखा करते हुए माईकल उससे फिर पहले से ज्यादा काम लेने लगा...जिससे जयंत के हाथो में दर्द होने लगा...और डॉक्टर ने जयंत को फिर से अनफिट घोषित कर दिया... इसी बीच माईकल ने एक दिन जयंत के ऊपर "फ्रोजन चिकन" का बड़ा बक्सा फैक दिया जिससे जयंत के गर्दन और सीने में गंभीर चोट आ गई..इस पूरी घटना की गवाह उनकी महिला सहकर्मी रेचल सीजर बनी... इस सबके बाद भी मेनेजर ने जयंत की एक नही सुनी.... कारण वह भारतीय थे...चौकाने वाली बात यह है जब यही व्यवहार माईकल ने एक ऑस्ट्रेलियन नागरिक के साथ किया तो माईकल को नौकरी से निकाल दिया गया॥ जयंत अपनी लडाई पिछले २१ सालो से लड़ रहे है लेकिन उनको कोई न्याय नही मिल पाया है... यहाँ तक कि ऑस्ट्रेलिया के मीडिया ने भी उनकी एक नही सुनी जिसके चलते उनको अपनी बात भारतीय मीडिया से कहनी पड़ रही है... आज जयंत इतने परेशान हो गए है कि उन्हें अब अमेनेस्टी , ह्युमन राईट जैसी संस्थाओ पर भी भरोसा नही रहा... जयंत कहते है कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ नस्लभेद जारी है..लेकिन भारतीय सरकार भी इस मामले में पूरी तरह से दोषी है क्युकि उसके मंत्रियो के पास भी उनकी समस्या को सुनने तक का समय नही है.... इसलिए वह अपनी बात भारतीय मीडिया के सामने लाना चाहते है ताकि ऑस्ट्रेलिया की सरकार का असली चेहरा सभी के सामने आ सके....
(हर्षवर्धन पाण्डे युवा पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है...समसामयिक विषयो पर लेखन लम्बे समय से करते आ रहे है... आप इनके विचारो को "बोलती कलम ब्लॉग"पर भी पढ़ सकते है)
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
बंगाल के राजनीती में मुहिमो का दौर
बंगाल में विधान सभा चुनाव नजदीक हैं,सत्ता धरी दल इनदिनों खुद के नीतिओ को पाक साफ करार करने में मशगुल हैं और बंगाल के आवाम को ये सन्देश देने में लगे हैं की हम कल भी काम करते थे और आज भी कर रहे हैं. लेकिन ममता दीदी ने केन्द्रीय प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए , हर दिन एक नया मुहीम छेड़ रही हैं .ममता का गंगा तट खुबसूरत बनाओ योजना इनदिनों बंगाल के लोगो को खूब रस आरही हैं.पुरे कोल्कता शहर में कुल ४८ गंगा तट हैं जिन्मेसे २ कोल्कता पोर्ट ट्रस्ट के देख रेख में हैं और शेस बचे तट नगर निगम के पास हैं,यैसे में ममता ने अपनी बुद्धिमता का इस्तमाल कर इस वर्ल्ड क्लास पर्यटन का केंद्र और आय का केंद्र बनाने की कही . इसी मुहीम को ले कर एक सभा हुआ जिसमें ममता ने कहा हैं की यदि वो आगामी चुनाव में जीतती हैं तो वो कोल्कता को लोंदन में तब्दील कर देगी .खैर कोल्कता लोम्दन बने या नहीं पर ये साफ हो गया हैं की टी .एम्। .सी .......धर दबोचो दुसमन को की योजना बना कर युवाओ को एक कर काम करना शुरू कर चुकी हैं......ये खबरे हैं बंगाल से आपके साथी प्रकाश के साथ देश केदुसरे भागो की खबरों के लिए हमारी टीम के साथ कैब्स टुडे पर बने रही ये नमस्कार इजाजत दीजिये............
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
'डांस में ही रची बसी है जिन्दगी: संदीप सोपारकर'
विश्व प्रसिद्ध कोरियोग्राफर और "डांस इंडिया डांस" के जज संदीप सोपारकर एक बहुत बड़ा नाम है...संदीप एक ट्रेंड जर्मन बालरूम डांस टीचर होने के साथ साथ ऐसे पहले भारतीय है जिन्होंने "बाल रूम डांस टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल "से सर्टिफिकेट प्राप्त किया है...संदीप को हर प्रकार के लातिन अमेरिकी और स्टैण्डर्ड बाल रूम डांस में विशेषज्ञता हासिल है..उन्होंने पूरे विश्व में "इम्पिरिअल सोसाइटी ऑफ़ टीचर्स ऑफ़ डांसिंग " में चौथा स्थान पाया है..संदीप के छात्रों में भारत सहित विश्व की नामी गिरामी हस्तिया शामिल है जिनमे ब्रिटनी स्पीयर्स ,मेडोना,गाय रिची, शकीरा, बियोंसे, आदि सभी ने वाल्ट्ज, चा_चा , टेंगो और पैसो जैसे डांस के लिए संदीप से डांस सीखा है..उनकी इस लिस्ट में कुवैत के शाही परिवार के सदस्य भी शामिल है जिन्हें उन्होंने क्लासिकल बाल रूम डांस सिखाया है॥हाल ही में अन्तराष्ट्रीय डांस स्पोर्ट्स संस्था ने पहली बार बाल रूम डांस को इस प्रतियोगिता में शामिल किया है...और इसमें भारत की एकमात्र फेकल्टी संदीप है... भारतीय फिल्म कलाकारों में काजोल, सोनम कपूर, अमीषा पटेल, फरहा खान, सोनाली बेंद्रे , तब्बू, पूजा बेदी जैसी कई अभिनेत्रियों के नाम शामिल है जिनको संदीप ने डांसिंग स्टेप सिखाये है..इसके अलावा संदीप के बाल रूम स्टूडियो की देश भर में कई ब्रांचे है जो मुंबई, पुणे, सूरत जैसे शहर शामिल है...कुछ समय पहले सालसा ट्रेनिंग की एक कार्यशाला में भाग लेने आये संदीप से हर्षवर्धन पाण्डे ने बात की ... प्रस्तुत है इसके मुख्य अंश:1 भोपाल आना इससे पहले भी हुआ है क्या? यहाँ से गहरे लगाव की कोई खास वजह ?
उत्तर - डांस क्लास के लिए भोपाल आना पहली बार हुआ है... लेकिन भोपाल मेरे लिए नया नही है...इस शहर से मेरा पुराना नाता रहा है...यहाँ पर मेरा ननिहाल रहा है ...मेरे पिता जी आर्मी में थे...ऐसे में भोपाल में उनकी पोस्टिंग होने के चलते काफी समय उनका यहाँ पर बीता... साथ ही मेरी नानी माँ का घर भी यही पर है..इसीलिए मैं खुद को भोपाली मानता हूँ।
२ भोपाल में डांस को लेकर बच्चो में कैसा क्रेज है?
उत्तर - हाँ के बच्चो में खासा क्रेज है ... यहाँ के बच्चो में डांस को लेकर मैं काफी टेलेंट देखता हूँ...यहाँ के बच्चे रियेलिटी शो में हिस्सा भी ले रहे है...वे क्लासिकल डांस को एक्सेप्ट भी कर रहे है...ये काफी बड़ी बात है ... क्युकि आम तौर पर बच्चे हिप होप या वेस्टर्न डांस करना पसंद करते है
३ संदीप क्या आपको बचपन से ही शौक था कि आप एक दिन डांसर ही बनेंगे?
उत्तर - मैंने डांस को शुरू से हौबी की तरह देखा ....कभी प्रोफेशन के तौर पर अपनाने की नही सोची। 12 साल की उम्र से डांस करना शुरू किया ... उस समय में आर्मी क्लब में डांस करता था... होटल मेनेजमेंट के कोर्स के बाद मैंने ऍम बी ऐ किया और जॉब भी की लेकिन दिल के किसी कोने में डांस ही बसा था... ऐसे में 1996 में जर्मनी में डांस की प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली..और फिर तो कोरियोग्राफी को ही बतौर प्रोफेशन अपना लिया।
४ रिएलिटी शो के बारे में तरह तरह की बातें कही जाती है.... कोई कहता है इसमें प्रतिभाओ के साथ न्याय नही होता तो कोई कहता है ये सब शो पूर्व नियोजित होते है ... आप कहाँ तक इत्तेफाक रखते है इससे ?
उत्तर- रिएलिटी शो पूरी तरह से रियल होते है....इसमें कोई भी चीज लड़ना जजेज का डांस करने लगना पहले से तय नही होता...लेकिन रिएलिटी शो करियर बनाने के लिए उपयुक्त नही है..ये तो सिर्फ एक प्लेटफोर्म है जहाँ पर आपको खुद को एक्सप्रेस करने का मौका मिलता है॥ करियर के द्वार इससे नही खुलते उसके लिए खूब मेहनत करनी पड़ती है
5 बच्चो को डांस सिखाने और स्टार्स को डांस सिखाने में क्या अंतर नजर आता है आपको?
उत्तर- मेडोना, शकीरा, जैसे बड़े बड़े नाम अगर हो तो उन्हें सिखाने में मजा आता है लेकिन मुझे बच्चो को सिखाने में बहुत मजा आता है..बच्चो को सिखाना आसान होता है...वे कही से भी खुद को मोड़ लेते है...जबकि 35 साल के स्टार के साथ ये आसानी से नही हो सकता।
६ अभी तक के आपके अनुभव में सबसे बुरे और सबसे अच्छे डांसर कौन लगे?
उत्तर- सभी के साथ अलग अलग अनुभव रहे ...अभी तक के मेरे सफ़र में मनोज वाजपेयी मुझे सबसे बुरे लगे... मेरे लिए उनको डांस सिखाना सबसे बुरा लगा... मेरे लिए उनको डांस सिखाना काफी कठिन था...वही मल्लिका शेरावत काफी बेहतरीन डांसर है लेकिन उनकी इमेज सिर्फ एक सेक्स पर्सनालिटी की बन गयी है...डांस मामले में उनसे बेहतर आज तक उन्हें कोई नही लगा..वे हर स्टेप को बहुत जल्दी फोलो करती है।
7" काईट्स " आसमान में उडी लेकिन कुछ दिनों बाद बॉक्स ऑफिस में औधे मुह गिर गयी...आपके साथ कैसे रहे इसके अनुभव?
उत्तर- काइट्स मूवी फ्लॉप रही... लेकिन इस मूवी में मेरे द्वारा कोरियोग्राफ किये गए ऋतिक रोशन के डांस को ख़ासा सराहा गया॥ ऋतिक को "सालसा" आता था...इसलिए बाल रूम डांस सिखाने में मुझे उसके साथ ज्यादा मेहनत नही करनी पड़ी॥ उन्हें सिर्फ एक बार स्टेप करके दिखाना पड़ता था..वही कंगना ने तो डांस में वो कर दिखाया जो मैंने पहले कभी सोचा भी नही था... वो बहुत अच्छा डांस करती है ...बल्कि मुझको तो लगता है उन्हें बोलीवुड में एक डांस पर्सनालिटी की तरह से दिखना चाहिए ....अब वे अपनी पागलपन वाली इमेज से बहार आया जाए तो बेहतर रहेगा।
8 आने वाले समय में आपकी कौन कौन सी मूवी आ रही है...?
उत्तर- मेरी जल्द ही "साथ खून माफ़" आने वाली है...जिसमे मैंने प्रियंका चोपड़ा को एक डांस के लिए कोरियोग्राफ किया है...इस फिल्म में प्रियंका के सात पति होते है ... जिनका वो एक एक करके क़त्ल कर देती है..शायद इसी के चलते फिल्म का नाम सात खून माफ़ रखा गया है।
९ अंतिम सवाल संदीप , कभी ऐसा लगा कोरियोग्राफी का काम करते करते थकान हो गयी अब मुझको एक्टिंग के फील्ड में उतर जाना चाहिए?
उत्तर- एक्टिंग फील्ड ... ना बाबा ना... मेरी लिए डांस कोरियोग्राफी ही बेहतर है ...अभी एक्टिंग के फील्ड में आने की दूर दूर तक कोई संभावना नही है....... मेरी जिन्दगी डांस में ही रची बसी है।
(हर्षवर्धन पाण्डे युवा पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है...समसामयिक विषयो पर लेखन लम्बे समय से करते आ रहे है... आप इनके विचारो को "बोलती कलम ब्लॉग"पर भी पढ़ सकते है)
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
वोट बनाम विकास......

बिहार में इस साल के अंत में विधान सभा चुनाव होने है ... लेकिन राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गयी है और चुनावी गहमागहमी का पारा भी चदाहुआ है॥ राजनीतिक पार्टिया वोट बैंक की रणनीति बनाने में जुट गयी है ... बिहार में वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा दलितों और मुसलमानों का है ... कांग्रेस और राजद सरीखी पार्टिया तो अपने को इनका मसीहा बताने से किसी तरह का गुरेज नही करती....और राजद तो सालो दर साल इन्ही के दम पर सत्ता का स्वाद चखते रही है॥भले ही उसके राज में दलितों की स्थिति में कोई सुधार नही हुआ हो...जदयू के नेता नीतीश कुमार की भी अपनी छवि दलित नेता के रूप में रही है॥और मुस्लिम वोते बैंक पर इनकी भी नजर रही है...तभी तो नरेन्द्र मोदी के एक विज्ञापन में में अपनी फोटो छपने से नीतीश कुमार खफा हो गए कि आननफानन में गुजरात सरकार द्वारा कोसी पीडितो को दी गयी मदद को वापस कर दिया... लेकिन सवाल इस बात का नही कि क्या गुजरात सरकार द्वारा दी गयी मदद कि राशी नरेन्द्र मोदी कि व्यक्तिगत थी या गुजरात की जनता की ॥ यदि नीतीश कुमार ने इस बात का विचार किया होता तो कोई और तस्वीर होती... लेकिन मामला वोट का है...लेकिन अगर बात मोदी की की जाए तो वे कहते है उन्हें वोट की राजनीती में कोई रूचि नही है वे तो सिर्फ और सिर्फ विकास की राजनीती करना चाहते है... और पटना के अधिवेशन में उन्होंने नीतीश कुमार को भी विकास की राजनीती करने की समझाईश दी ... लेकिन मोदी के लिए रास्ता इतना आसन नही है ... कांग्रेस और एनी पार्टिया गोधरा कांड को भुनाने में कोई कसर नही छोड़ रही...भले ही कांग्रेस के खुद के दामन पर चौरासी के दंगे और भोपाल गैस त्रासदी का कला सच हो...इन दिनों बिहार में चुनाव प्रचार को लेकर भी नरेन्द्र मोदी निशाने पर है... बीजेपी और जद यू में अभी उहा पोह कि स्थिति बनी हुई है कि नरेन्द्र मोदी बिहार के आगामी चुनावो में प्रचार करेंगे या नही॥राजनीती में इस तरह के सियासी दाव खूब चलते है... क्युकि हिन्दुस्तान में जातीय राजनीती का बोल बाला रहा है॥तभी तो दलितों पर राजनीती कर कोई सत्ता हथियाना चाहता है तो कोई रीजनल आधार पर प्रदेश को बाटने की कोशिसो को कर "हीरो" बनता है... और जनताभी ऐसे लोगो को झांसे में आकर चुन लेती है॥ जनता भ्रम में जीती है .... उसे हकीकत से रूबरू होने नही दिया जाता ... हिंदी चीनी भाई भाई का नारा यहाँ बुलंद किया जाता है और वह चीन देश पर हमला कर देता है... एंडरसन को देश से बहार इस तरह छोड़ा जाता है जैसे घर में आये अथिति छोड़ने का दस्तूर हमारे देश में है ... जनता भ्रम में है ॥ अपने हित में देश बेचने का सौदा भी अगर हो जाए तो कोई परहेज नही...आज देश में महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है....कृषि मंत्री शरद पवार कहते है मैं कोई ज्योतिषी नही हूँ... जय राम रमेश चीन में जाकर देश के खिलाफ बयान देकर चले आते है और प्रधान मंत्री इस पर अपनी जिम्मेदारी लेते है... लेकिन वे कैसी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे है ॥ आम आदमी की जानकारी से ये भी दूर है... आये दिन महंगाई बद रही है.... और सरकार कहती है महंगाई को कम करने की कोशिश की जा रहीहै....मुह का निवाला क्या अब तो उजियारे में रहना भी दूभर हो जाएगा क्युकि केरोसिन के दामो में भी वृद्धि का मन सरकार ने बना लिया है... शायद प्रधान मंत्री की यही जिम्मेदारी है और राहुल गाँधी दलित हितों की बातें करते नही थकते ॥जिस देश में प्रति व्यक्ति आय २० रुपये हो उसका क्या होगा सोचा जा सकता है॥राजनीती का ऊट किस करवट बैठेगा ये कह पाना मुश्किल है॥राजनीती का खेल केवल मोहरों से नही मुद्दों से भी खेला जाता है और इसमें कितने मोहरे इस्तेमाल में आयेंगे यह भी कह पाना मुश्किल है... राजनीती के इस खेल में सरकार माहिर है... वोट और विकास का एक चेहरा नरेन्द्र मोदी का है...जहां महाराष्ट्र में विदर्भ और बुंदेलखंड के किसान भू जल के खाली होते भंडार के कारन खेती में हो रहे घाटे से उबर न पाने की स्थिति में है और आत्महत्या कर रहे है ...वही देश के कई इलाको में पानी की बड़ी समस्या बनी हुई है..... इन सारी गंभीर चुनौतियों का सामना गुजरात कर रहा है इस मोर्चे पर अन्य राज्यों को उसने करार जवाब दिया है ॥ वह मोदी की सरकार ने जल संकट से निपटने के लिए सरकार और जन भागीदारी का अनूठा मॉडल पेश किया है...२००४ में गुजरात में २२५ तहसीलों में से ११२ में भू जल स्तर गंभीर स्थिति में था लेकिन आज की स्थिति में ११२ में से ६० तहसीलों में जल स्तर सामान्य स्थिति में पहुच गया है ... ये नरेन्द्र मोड़ की राजनीती का एक मॉडल है जिसका जवाब "विकास " है...जहाँ २००९ में देश की कृषि विकास दर ३ फीसदी थी वही गुजरात में ये ९।०६ प्रतिशत रही ....गुजरात में पिछले दस सालो में १५ फीसदी कृषि भूमि का इजाफा हुआ है॥ गुजरात में कृषि उत्पादन १८००० करोड़ रुपये से बढ़कर ४९००० करोड़ रुपये हो चूका है...वही देश के अन्य राज्यों में किसानो की स्थिति दयनीय बनी हुई है...जहाँ कपास का दुनिया भर में उत्पादन ७८७ किलो प्रति हेक्टेयर है वही गुजरात में ७९८ किलो प्रति हेक्टेयर है... नरेन्द्र मोदी ने गुजरात को विकास की एक नयी दिशा दी है यह कहने में किसी तरह का कोई परहेज नही होना चाहिए... तभी तो आज की तिथि में गुजरात के किसान मालामाल है ... उनके कपास की धूम चीन तक मची हुई है वही अन्य राज्यों में सरकारे कहती है कपास की खेती घाटे का सौदा बन चुकी है....बात विकास और राजनीती की चली है तो मुलायम सिंह यादव का जिक्र करना जरूरी हो जाता है....मुलायम समाजवाद को तरजीह देते है और बातें करते है फ़िल्मी कलाकारों और अपने परिवार वालो की... महिला आरक्षण विधेयक की बात उती तो मुलायम ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया...लेकिन फ़ैजाबाद में चुनाव लड़वाने के लिए अपनी डिम्पल यादव का बखूबी इस्तेमाल किया... इस मौके की राजनीती में उन्हें उस किसी चीज से गुरेज नही जो चुनाव जीतू हो... दरअसल तस्वीर पूरे देश की यही है... राजनेता केवल वोटरों को देखते है... आम आदमी से उनका कोई सरोकार नही है... जीतने के बाद उनका न तो विकास से नाता है और ना ही जनता से.... लेकिन अब बिहार में ये देखने की बात होगी जनता विकास चाहती है या वोट खरीदने वालो की फरोख्त में शामिल होती है... विकास देश की तस्वीर बदलेगा और वोटो की राजनीती देश को गर्त में धकेलेगी......
( रजनीश पांडे के सौजन्य से ये लेख मिला है.... रजनीश अपनी नॉन स्टॉप एंकरिंग के लिए केव्स में जाने जाते रहे है.....)
गुरुवार, 1 जुलाई 2010
निवेदन है ... कृपया गौर फरमाए.......
साथियो,
केव्स टुडे सभी का सामूहिक ब्लॉग है.... इसमें कहानी , संस्मरण जैसे चीजे नही लिखे तो बेहतर रहेगा... इसमें अगर इस तरह की चीजे लिखी जा रही है तो यह हमारी टीम के लिए सही नही है.... कई जूनियरो को इसमें लिखी और परोसी जा रही सामग्री पर आपत्ति है....
ब्लॉग अभिव्यक्ति का माध्यम है ... इसमें जनसरोकारो वाली पत्रकारिता की जाए तो अच्छा रहेगा.... देश , दुनिया और सामाजिक सरोकारों को तरजीह देने के मकसद से ये ब्लॉग खोला गया है.... यदि इसमें हम छोटी मोटी दैनिक जीवन की डायरी लिखेंगे तो जिस मकसद से ये ब्लॉग खोला गया है वह अपना मकसद पूरा नही कर पायेगा.....
आशा है आप सभी मेरी बातो से सहमत होंगे और आने वाले दिनों में सकारात्मक विचारो के साथ नयी पहल में सहयोग देंगे........ हर्ष
केव्स टुडे सभी का सामूहिक ब्लॉग है.... इसमें कहानी , संस्मरण जैसे चीजे नही लिखे तो बेहतर रहेगा... इसमें अगर इस तरह की चीजे लिखी जा रही है तो यह हमारी टीम के लिए सही नही है.... कई जूनियरो को इसमें लिखी और परोसी जा रही सामग्री पर आपत्ति है....
ब्लॉग अभिव्यक्ति का माध्यम है ... इसमें जनसरोकारो वाली पत्रकारिता की जाए तो अच्छा रहेगा.... देश , दुनिया और सामाजिक सरोकारों को तरजीह देने के मकसद से ये ब्लॉग खोला गया है.... यदि इसमें हम छोटी मोटी दैनिक जीवन की डायरी लिखेंगे तो जिस मकसद से ये ब्लॉग खोला गया है वह अपना मकसद पूरा नही कर पायेगा.....
आशा है आप सभी मेरी बातो से सहमत होंगे और आने वाले दिनों में सकारात्मक विचारो के साथ नयी पहल में सहयोग देंगे........ हर्ष
मंगलवार, 22 जून 2010
भ्रष्ट पत्रकारिता को सफलता का शोर्ट कट कहा जाता है----- कुठियाला
माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलपति बृजकिशोर कुठियाला जी से हाल ही में हर्षवर्धन पाण्डेय ने बातचीत की जिसमे आज की पत्रकारिता के बारे में खुलकर चर्चा हुई । इस बातचीत में उन्होनें पत्रकारिता से जुड़े कई राज खोले. वस्तुत: स्वभाव से एक शिक्षक और मानवशास्त्र के स्टुडेंट रहे कुठियाला जी ने उच्च शिक्षा IIMC और FTII जैसे संस्थानों से ली.मनुष्य और सम्प्रेषण पर लिखे कुछ लेखों ने उनकी दिशा बदल दी और वे पत्रकार बन गए.
11 साल रिसर्च और 26 साल शिक्षण के कार्य का लंबा अनुभव रखने वाले कुठियाला जी से आज के दौर की व्यवसायिक पत्रकारिता के मिथकों और सनसनीखेज खबरों की अंधी दौर के बारे में हर्षवर्धन पाण्डेय ने विस्तार से बात की। जिस में कई अहम जानकारियां से हम रु ब रु हुए॥
पेश है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
सबसे पहले तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति बनने पर आपको बधाई ...
जी बहुत बहुत शुक्रिया...
भारतीय पत्रकारिता के प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के नए रोल को क्या आप किसी चुनौती के रूप मे लेते हैं?
ये मेरे लिये कोई चुनौती नहीं है. किसी भी काम को चुनौती के रूप में लेना मेरा स्वभाव नहीं रहा है. ये तो बस मौके की बात है. अपनी डयूटी और रिटायरमेंट के बाद वैसे भी मैंने प्लान किया था वानप्रस्थ की ओर जाने का, लेकिन ये नई जिम्मेदारी मेरे लिये नई उर्जा के समान है और ये काफी उत्साह वर्धक है. हां ये बात तो है कि ये बड़ी जिम्मेदारी है और मेरी कोशिश रहेगी की इस विश्वविद्यालय से अच्छे पत्रकार समाज को दूं.
ऐसा सुनने में आ रहा है कि अच्युतानंद मिश्रा जी के बाद कुलपति के पद पर आपकी नियुक्ति को लेकर कुछ राजनीति भी हुई थी?
हंसते हुये - डिप्लोमेटिक उत्तर दूं क्या! -
आपको जो उचित लगे.
नहीं, बिल्कुल नहीं. हां लेकिन मै इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि दबाव जरूर बना. क्योंकि कुछ लोग चाहते थे कि मैं इस पद पर काम करूं. कम्पीटिशन तो था पर मेरा सेलेक्शन हुआ. मुझसे कहा गया कि पिछले 15 सालों में मीडिया संस्थानों के निर्माण के कार्यों को देखते हुए आपको ये जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसमें हमारे अनुभव भी काम आये.
मैं ये भी बताना चाहुंगा कि मेरा कद अच्युतानंद मिश्रा जी से काफी छोटा है. ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे उस विश्वविद्यालय के कुलपति की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, जिसे अच्युतानंद मिश्र जी ने अपने प्रयासो से एक नई पहचान दी है. उनके कार्यो को आगे बढाना मेरी प्रमुखता होगी.
माखनलाल के वीसी बनने के बाद आपकी और क्या प्राथमिकता होगी. गाहे बगाहे ये सुनने में भी आता है कि बाहर से कम ही लोग भोपाल आ पाते हैं. ये सब बेस्ट फैकल्टी को लेकर कहा जाता है?
नोयडा सेंटर की शिकायत रही है कि हमारे यहां बाहर से कम लोग आते है. वही भोपाल वाले भी कहते हैं. इसका निराकरण किया जायेगा. उन विशेषज्ञ को बुलाया जायेगा जो अपने क्षेत्र में माहिर हो. जैसे कि आप राजदीप सरदेसाई से ये उम्मीद नहीं कर सकते की वो आकर आपको अच्छा वायस ओवर सिखायेंगे. ये तो कोई अच्छा वायस ओवर आर्टिस्ट ही सिखा सकता है. मेरे संज्ञान में कुछ बातें भी आई है.
बंद हो चुके कुछ कोर्स जैसे बिजनेस जर्नलिज्म और स्पोर्ट्स जर्नलिज्म पर भी हमारी चर्चा हुई है. यहां आपको बता दूं कि हम कुछ विशेष चीजों पर काम कर रहे हैं. कॉमनवेल्थ गेम से पहले हम कुछ वर्कशॉप करायेंगे. ताकि उनको सही से तैयार किया जा सके.
आप एक प्रतिष्ठित पत्रकारिता विश्वविद्यालय के वीसी हैं. जहन में एक सवाल आता है कि आप की नजर में भ्रष्ट पत्रकारिता की क्या परिभाषा है?
आं.... देखिये सच कहा जाय तो भ्रष्ट पत्रकारिता में बहुत आकर्षण होता है . सभी को पता है कि ये गलत है. फिर भी लोग इसके हाथों में समाते चले जाते हैं. एक अच्छे और ईमानदार पत्रकार समय के साथ मीडिया एथिक्स और वैल्यू के साथ समझौता करता चला जाता है और धीरे धीरे इसके जाल में फंसता जाता है .फिर टीआरपी और रीडरशिप की चुहा बिल्ली की दौर के पीछे भागने लगता है.
आज ऐसी पत्रकारिता को सफलता का शॉर्ट कट भी माना जाता है. ऐसी पत्रकारिता से दूर रहने का हमें भरसक प्रयास करना चाहिए. जिससे कि हम एक अच्छे पत्रकार बन सके और समाज को एक नई दिशा में ले जा सके. ये वास्तविकता है कि हम बुरी चीजों के प्रति जल्दी आकर्षित होते हैं, लेकिन हमें अपनी मर्यादा का ख्याल रखते हुए अपनी हदें और मिशन खुद तय करना होता है.
आपकी नजर में सनसनीखेज खबर के दलदल से निकलने का क्या रास्ता है?
देखिये इस तरह की पत्रकारिता काफी हद तक भटक चुकी है. गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में पत्रकार अपनी जीविका चलाने के लिए आज इस रास्ते पर चल रहे हैं और इस तरह की खबरों को खरीदना और बेचना चाहते हैं. आप ये भी कह सकते हैं कि सुर्खियों में बने रहने का ये एक शॉर्ट कट भी है. ऐसे पत्रकार सोचते हैं कि ये सबसे आसान रास्ता है एक लोकप्रिय मीडियाकर्मी बनने का.
लेकिन जो खबर नहीं भी है उसे सनसनीखेज ढंग से परोसना और बिना वजह ऐसे खबरों को तवज्जो और तूल देना दर्शक और पाठक के साथ सरासर धोखा है. सब को पता है कि पूरे विश्व में बडे अखबारों का सर्कुलेशन भी धीरे धीरे कम हुआ है. लगातार खबरें देने के दवाब में मीडिया खबरें बनाने लगते हैं. ये बाजार का दबाव है. ये इस बात का सूचक है कि अखबार भी अपने पाठकों के बीच पैठ बनाने के लिये बुरे दौर से गुजर रहा है. ऐसे वक्त में आप सिर्फ आपने बिजनेस के बारे में सोच सकते है ना की पत्रकारिता एक मिशन है, इस बारे में. ये एक बहुत बडी विकृति है. आप वही करेंगे जिससे संस्थान को लाभ होगा. मेरे विचार से टीआरपी, एबीसी और रीडरशिप ये सब एक मिथ्या है.
हम ये भी कह सकते हैं कि अच्छे लोग या तो थक चुके हैं या रुखसत हो चुके हैं. मीडिया के भीतर सफल पत्रकार भी इन सब चीजों से त्रस्त है. इस दलदल से निकलने का एक मात्र रास्ता है इच्छा शक्ति और लोगों के बीच सही रूप से किसी भी खबर का प्रस्तुतिकरण.
ऐसे में पत्रकारिता के भविष्य को आप किस रूप में देखते हैं?
जहां तक पत्रकारिता के भविष्य का सवाल है तो भविष्य में पत्रकारिता द्वारा संवाद बढेगा और स्वरुप बिगड़ेगा. ये स्वरुप सारा ध्वस्त होगा. फिर से एक नया मीडिया उभरेगा और जो समाज के हित की बात करेगा. आज की पत्रकारिता वो भस्मासुर है जो खुद अपने सिर पे हाथ रखे है.
क्या आप ये सब क्राइम बीट की पहुंच बढने के कारण कह रहे हैं ?
नहीं मैं उस मीडिया की बात कर रहा हूं जो हर जगह कॉमर्शियल चीज आसानी से ढूंढ़ लेता है. आम आदमी को क्या लाभ होगा ये हेडलाइन नहीं बनती. आज आलम ये है कि हमारा मीडिया ममता बनर्जी और सचिन तेंदुलकर में भी कॉमर्शियल ढूंढ़ लेता है. जो काम रेल आम आदमी के लिए कर सकता हैं वो काम सचिन तेंदुलकर नहीं कर सकता. अभी कुछ समय पहले मैं एक सेमिनार में हिस्सा लेने ऑस्ट्रेलिया गया था वहां एक मुद्दा उठा जो डेथ ऑफ जर्नलिज्म का था. पत्रकारिता अप्राकृतिक हो गयी है .20 -25 लोग जो बड़ी जगहों पर बैठें हैं, वो ये डिसाइड कर रहे हैं कि हमें कौन सी सामग्री परोसनी है. आज कल पत्रकार वो है जिसका काम बस हो गया है सूचना इकट्ठा करो और भेज दो. खबर बन जाएगी.
बेन्जामिन ब्रेडली ने 25 साल तक वाशिंगटन पोस्ट जैसे अखबार का सम्पादन किया. कुछ साल पहले जब वो भारत आये तो शेखर गुप्ता एनडीटीवी पर उनका वाक द टॉक कर रहे थे. उन्होने एक बात कही कि अमेरिका में पत्रकारिता बुनियादी मुद्दो की ओर लौट रही है. ऐसे में ये जो सेकेंड लाइन जर्नलिज्म है क्या वो भी भारतीय पत्रकारिता की ओर लौट सकती है. इसके बारे में आप क्या कहेगें?
देखिये सेकेंड लाइन जर्नलिज्म सामाजिक मुद्दों से जुडा हुआ है, ये जमीन से जुडे लोगों के लिए काम करता है. आप कह सकते है कि ये पत्रकारिता के रियल वैल्यू और इथिक्स से जुडा हुआ है.
अगर आप आरएसएस की मासिक, पाक्षिक, साप्ताहिक पत्रिका की कुल प्रसार संख्या देखें, तो ये किसी प्रतिष्ठित अखबार के मुकाबले ज्यादा है. इसमें देश, समाज, मानवता से जुडे मुद्दे की बात होती है. हम क्या करना चाहते हैं? क्या अधिकार है? जिस दिन पत्रकारों को ये सब समझ में आ जाएगी, उस दिन से वो इस ओर मुखातिब हो जाएगें. आप देखेंगें, आने वाले दिनों में यही सेकेंड लाइन जर्नलिज्म फलेगा, फूलेगा और लोगों के बीच लोकप्रिय होगा.
कुठियाला साहब ये जो आजकल चौबीस घंटे के न्यूज़ चैनलों की बाढ़ आ गयी है या यूं कहा जाए कि आना बदस्तुर जारी है, इसके बारे में आपकी क्या राय है ?
(हंसते हुए) चौबीस घंटे न्यूज़ चैनल का कांसेप्ट ही असफल है. ईमानदारी से चौबिसो घंटे समाचार का प्रसारण और उसे प्रस्तुत करना नामुमकिन है. इस लिए तो न्यूज़ चैनल आजकल रियालिटी शोज का सहारा ले रहे है. आप देख सकते है कि कोई भी न्यूज़ चैनल इससे अछूता नहीं है. खबरों को सबसे पहले ब्रेक करने और लगातार खबरें देने के दबाव और आपाधापी में चैनल खबरें बनाने लगते है. ये जनता के साथ सरासर धोखा है.
आजकल मीडिया का ट्रेंड बन गया है खबर को बढा-चढा कर परोसने का. मीडिया की इस अतिवादिता की चाभी को आप किस तरह लेते हैं ?
(थोडा गंभीर होते हुए)- अपनी सेल वैल्यू को बढ़ाने के लिए न्यूज़ चैनल खबरों की सनसनीखेज पैकेजिंग करते हैं और ऐसा फ्लेवर डालते हैं मानो ये खबर सिर्फ और सिर्फ उनके पास है. इस चक्कर में चैनल वाले जो खबरें तथ्यहीन है उसे भी सनसनीखेज और भयानक रुप से दिखाते हैं. लेकिन ये बहुत ही गलत अप्रोच है. ऐसे मीडिया हाउस लम्बी रेस के घोड़े नहीं हैं. लेकिन मैं आश्वस्त हूं कि आने वाले समय में अच्छे, निष्पक्ष और जनता के हितो को तव्वजो देने वाली खबरे भी आएगी.
राधे श्याम शर्मा जी जो वरिष्ठ पत्रकार है, ने अभी एक बहुत अच्छी बात कही है कि एक दिन वही पत्रकार होगा जो कभी नहीं बिकेगा. जितनी जल्दी बिकोगे उतना कम दाम मिलेगा. इसे कोइ संस्था या शिक्षण संस्थान तय नहीं कर सकता. ऐसे में एक अच्छे पत्रकार को खुद अपनी पत्रकारिता मिशन को टारगेट करना चाहिए. जिसके लिए वो समाज के चौथे स्तंभ के रुप में जाना जाता हैं.
कुछ बात करते है विश्वविद्यालय की प्लेसमेंट सेल पर. विश्वविद्यालय की प्लेसमेंट सेल को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते है. स्टुडेंट का ये कहना होता है कि जब पूरा विश्वविद्यालय एक है. तो फिर एमजे (पत्रकारिता विभाग) के स्टुडेंट का प्लेसमेंट हमेशा गुपचुप तरीके से हो जाता है, जबकी कैव्स (सेंटर फॉर ऑडियो विजुअल स्टडीज) और दूसरे डिर्पाटमेंट के स्टुडेंट सिर्फ हाथ मलते रह जाते है. क्या कुठियाला जी के आने के बाद हम उम्मीद करें की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी?
हां, मुझे इसकी जानकारी मिली है जो ठीक होगा वहीं किया जाएगा. इसपर अभी बात करना ठीक नहीं है. प्लेसमेंट क्षमतावान छात्र-छात्राओं का होना चाहिए. उन्हे इसके लिए खुद लायक बनना चाहिए. मैं कार्यभार संभालने के बाद हर दिन विभाग में दस से ग्यारह बजे तक पर्सनालिटी डेवलपमेंट की क्लास शुरू करवायी है जिससे जल्द ही अच्छे और सकारात्मक परीणम सामने आयेंगे. मैं ग्यारह वर्षों से इन चीज़ों पर जोर देता रहा हूं. उम्मीद है चीज़ें बदलेगी. मेरा जोर प्लेसमेंट सेल नहीं बल्की ऐसी बेस्ट फैकल्टी की तरफ रहेगा जो पढाई के दौरान ही बच्चों की प्रतिभा को तराश ले और उन्हें इनटर्न पर ले जाए.
चलिए ये सवाल आपकी निजी जिंदगी से. पढने के अलावा कुठियाला साहब को और कौन से शौक हैं ?
मैं रात में उपन्यास पढता हुं. मेरा शौक रहता है कि मैं कुछ पढूं. लेटेस्ट फिल्म देखना भी पसंद करता हूं. संगीत से लगाव है. दिनचर्या तो व्यस्त रहती है. इसी में सीरिअल देखने का समय निकाल लेता हूं.
पत्रकारिता के स्टुडेंट के लिए कोइ संदेश ?
बडे सपने देखो. निपुणता बढाओ. कम्प्यूटर में प्रवीणता लाओ. दो भाषाओं पर अच्छी पकड़ बनाओं.पढने से ज्यादा सोचने और विश्लेषण के लिए समय दो. देखो सफलता आपके कदम चूमेगी.
(हर्षवर्धन पाण्डे युवा पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है...समसामयिक विषयो पर लेखन लम्बे समय से करते आ रहे है... आप इनके विचारो को "बोलती कलम ब्लॉग पर भी पढ़ सकते है)
माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलपति बृजकिशोर कुठियाला जी से हाल ही में हर्षवर्धन पाण्डेय ने बातचीत की जिसमे आज की पत्रकारिता के बारे में खुलकर चर्चा हुई । इस बातचीत में उन्होनें पत्रकारिता से जुड़े कई राज खोले. वस्तुत: स्वभाव से एक शिक्षक और मानवशास्त्र के स्टुडेंट रहे कुठियाला जी ने उच्च शिक्षा IIMC और FTII जैसे संस्थानों से ली.मनुष्य और सम्प्रेषण पर लिखे कुछ लेखों ने उनकी दिशा बदल दी और वे पत्रकार बन गए.
11 साल रिसर्च और 26 साल शिक्षण के कार्य का लंबा अनुभव रखने वाले कुठियाला जी से आज के दौर की व्यवसायिक पत्रकारिता के मिथकों और सनसनीखेज खबरों की अंधी दौर के बारे में हर्षवर्धन पाण्डेय ने विस्तार से बात की। जिस में कई अहम जानकारियां से हम रु ब रु हुए॥
पेश है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
सबसे पहले तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति बनने पर आपको बधाई ...
जी बहुत बहुत शुक्रिया...
भारतीय पत्रकारिता के प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के नए रोल को क्या आप किसी चुनौती के रूप मे लेते हैं?
ये मेरे लिये कोई चुनौती नहीं है. किसी भी काम को चुनौती के रूप में लेना मेरा स्वभाव नहीं रहा है. ये तो बस मौके की बात है. अपनी डयूटी और रिटायरमेंट के बाद वैसे भी मैंने प्लान किया था वानप्रस्थ की ओर जाने का, लेकिन ये नई जिम्मेदारी मेरे लिये नई उर्जा के समान है और ये काफी उत्साह वर्धक है. हां ये बात तो है कि ये बड़ी जिम्मेदारी है और मेरी कोशिश रहेगी की इस विश्वविद्यालय से अच्छे पत्रकार समाज को दूं.
ऐसा सुनने में आ रहा है कि अच्युतानंद मिश्रा जी के बाद कुलपति के पद पर आपकी नियुक्ति को लेकर कुछ राजनीति भी हुई थी?
हंसते हुये - डिप्लोमेटिक उत्तर दूं क्या! -
आपको जो उचित लगे.
नहीं, बिल्कुल नहीं. हां लेकिन मै इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि दबाव जरूर बना. क्योंकि कुछ लोग चाहते थे कि मैं इस पद पर काम करूं. कम्पीटिशन तो था पर मेरा सेलेक्शन हुआ. मुझसे कहा गया कि पिछले 15 सालों में मीडिया संस्थानों के निर्माण के कार्यों को देखते हुए आपको ये जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसमें हमारे अनुभव भी काम आये.
मैं ये भी बताना चाहुंगा कि मेरा कद अच्युतानंद मिश्रा जी से काफी छोटा है. ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे उस विश्वविद्यालय के कुलपति की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, जिसे अच्युतानंद मिश्र जी ने अपने प्रयासो से एक नई पहचान दी है. उनके कार्यो को आगे बढाना मेरी प्रमुखता होगी.
माखनलाल के वीसी बनने के बाद आपकी और क्या प्राथमिकता होगी. गाहे बगाहे ये सुनने में भी आता है कि बाहर से कम ही लोग भोपाल आ पाते हैं. ये सब बेस्ट फैकल्टी को लेकर कहा जाता है?
नोयडा सेंटर की शिकायत रही है कि हमारे यहां बाहर से कम लोग आते है. वही भोपाल वाले भी कहते हैं. इसका निराकरण किया जायेगा. उन विशेषज्ञ को बुलाया जायेगा जो अपने क्षेत्र में माहिर हो. जैसे कि आप राजदीप सरदेसाई से ये उम्मीद नहीं कर सकते की वो आकर आपको अच्छा वायस ओवर सिखायेंगे. ये तो कोई अच्छा वायस ओवर आर्टिस्ट ही सिखा सकता है. मेरे संज्ञान में कुछ बातें भी आई है.
बंद हो चुके कुछ कोर्स जैसे बिजनेस जर्नलिज्म और स्पोर्ट्स जर्नलिज्म पर भी हमारी चर्चा हुई है. यहां आपको बता दूं कि हम कुछ विशेष चीजों पर काम कर रहे हैं. कॉमनवेल्थ गेम से पहले हम कुछ वर्कशॉप करायेंगे. ताकि उनको सही से तैयार किया जा सके.
आप एक प्रतिष्ठित पत्रकारिता विश्वविद्यालय के वीसी हैं. जहन में एक सवाल आता है कि आप की नजर में भ्रष्ट पत्रकारिता की क्या परिभाषा है?
आं.... देखिये सच कहा जाय तो भ्रष्ट पत्रकारिता में बहुत आकर्षण होता है . सभी को पता है कि ये गलत है. फिर भी लोग इसके हाथों में समाते चले जाते हैं. एक अच्छे और ईमानदार पत्रकार समय के साथ मीडिया एथिक्स और वैल्यू के साथ समझौता करता चला जाता है और धीरे धीरे इसके जाल में फंसता जाता है .फिर टीआरपी और रीडरशिप की चुहा बिल्ली की दौर के पीछे भागने लगता है.
आज ऐसी पत्रकारिता को सफलता का शॉर्ट कट भी माना जाता है. ऐसी पत्रकारिता से दूर रहने का हमें भरसक प्रयास करना चाहिए. जिससे कि हम एक अच्छे पत्रकार बन सके और समाज को एक नई दिशा में ले जा सके. ये वास्तविकता है कि हम बुरी चीजों के प्रति जल्दी आकर्षित होते हैं, लेकिन हमें अपनी मर्यादा का ख्याल रखते हुए अपनी हदें और मिशन खुद तय करना होता है.
आपकी नजर में सनसनीखेज खबर के दलदल से निकलने का क्या रास्ता है?
देखिये इस तरह की पत्रकारिता काफी हद तक भटक चुकी है. गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में पत्रकार अपनी जीविका चलाने के लिए आज इस रास्ते पर चल रहे हैं और इस तरह की खबरों को खरीदना और बेचना चाहते हैं. आप ये भी कह सकते हैं कि सुर्खियों में बने रहने का ये एक शॉर्ट कट भी है. ऐसे पत्रकार सोचते हैं कि ये सबसे आसान रास्ता है एक लोकप्रिय मीडियाकर्मी बनने का.
लेकिन जो खबर नहीं भी है उसे सनसनीखेज ढंग से परोसना और बिना वजह ऐसे खबरों को तवज्जो और तूल देना दर्शक और पाठक के साथ सरासर धोखा है. सब को पता है कि पूरे विश्व में बडे अखबारों का सर्कुलेशन भी धीरे धीरे कम हुआ है. लगातार खबरें देने के दवाब में मीडिया खबरें बनाने लगते हैं. ये बाजार का दबाव है. ये इस बात का सूचक है कि अखबार भी अपने पाठकों के बीच पैठ बनाने के लिये बुरे दौर से गुजर रहा है. ऐसे वक्त में आप सिर्फ आपने बिजनेस के बारे में सोच सकते है ना की पत्रकारिता एक मिशन है, इस बारे में. ये एक बहुत बडी विकृति है. आप वही करेंगे जिससे संस्थान को लाभ होगा. मेरे विचार से टीआरपी, एबीसी और रीडरशिप ये सब एक मिथ्या है.
हम ये भी कह सकते हैं कि अच्छे लोग या तो थक चुके हैं या रुखसत हो चुके हैं. मीडिया के भीतर सफल पत्रकार भी इन सब चीजों से त्रस्त है. इस दलदल से निकलने का एक मात्र रास्ता है इच्छा शक्ति और लोगों के बीच सही रूप से किसी भी खबर का प्रस्तुतिकरण.
ऐसे में पत्रकारिता के भविष्य को आप किस रूप में देखते हैं?
जहां तक पत्रकारिता के भविष्य का सवाल है तो भविष्य में पत्रकारिता द्वारा संवाद बढेगा और स्वरुप बिगड़ेगा. ये स्वरुप सारा ध्वस्त होगा. फिर से एक नया मीडिया उभरेगा और जो समाज के हित की बात करेगा. आज की पत्रकारिता वो भस्मासुर है जो खुद अपने सिर पे हाथ रखे है.
क्या आप ये सब क्राइम बीट की पहुंच बढने के कारण कह रहे हैं ?
नहीं मैं उस मीडिया की बात कर रहा हूं जो हर जगह कॉमर्शियल चीज आसानी से ढूंढ़ लेता है. आम आदमी को क्या लाभ होगा ये हेडलाइन नहीं बनती. आज आलम ये है कि हमारा मीडिया ममता बनर्जी और सचिन तेंदुलकर में भी कॉमर्शियल ढूंढ़ लेता है. जो काम रेल आम आदमी के लिए कर सकता हैं वो काम सचिन तेंदुलकर नहीं कर सकता. अभी कुछ समय पहले मैं एक सेमिनार में हिस्सा लेने ऑस्ट्रेलिया गया था वहां एक मुद्दा उठा जो डेथ ऑफ जर्नलिज्म का था. पत्रकारिता अप्राकृतिक हो गयी है .20 -25 लोग जो बड़ी जगहों पर बैठें हैं, वो ये डिसाइड कर रहे हैं कि हमें कौन सी सामग्री परोसनी है. आज कल पत्रकार वो है जिसका काम बस हो गया है सूचना इकट्ठा करो और भेज दो. खबर बन जाएगी.
बेन्जामिन ब्रेडली ने 25 साल तक वाशिंगटन पोस्ट जैसे अखबार का सम्पादन किया. कुछ साल पहले जब वो भारत आये तो शेखर गुप्ता एनडीटीवी पर उनका वाक द टॉक कर रहे थे. उन्होने एक बात कही कि अमेरिका में पत्रकारिता बुनियादी मुद्दो की ओर लौट रही है. ऐसे में ये जो सेकेंड लाइन जर्नलिज्म है क्या वो भी भारतीय पत्रकारिता की ओर लौट सकती है. इसके बारे में आप क्या कहेगें?
देखिये सेकेंड लाइन जर्नलिज्म सामाजिक मुद्दों से जुडा हुआ है, ये जमीन से जुडे लोगों के लिए काम करता है. आप कह सकते है कि ये पत्रकारिता के रियल वैल्यू और इथिक्स से जुडा हुआ है.
अगर आप आरएसएस की मासिक, पाक्षिक, साप्ताहिक पत्रिका की कुल प्रसार संख्या देखें, तो ये किसी प्रतिष्ठित अखबार के मुकाबले ज्यादा है. इसमें देश, समाज, मानवता से जुडे मुद्दे की बात होती है. हम क्या करना चाहते हैं? क्या अधिकार है? जिस दिन पत्रकारों को ये सब समझ में आ जाएगी, उस दिन से वो इस ओर मुखातिब हो जाएगें. आप देखेंगें, आने वाले दिनों में यही सेकेंड लाइन जर्नलिज्म फलेगा, फूलेगा और लोगों के बीच लोकप्रिय होगा.
कुठियाला साहब ये जो आजकल चौबीस घंटे के न्यूज़ चैनलों की बाढ़ आ गयी है या यूं कहा जाए कि आना बदस्तुर जारी है, इसके बारे में आपकी क्या राय है ?
(हंसते हुए) चौबीस घंटे न्यूज़ चैनल का कांसेप्ट ही असफल है. ईमानदारी से चौबिसो घंटे समाचार का प्रसारण और उसे प्रस्तुत करना नामुमकिन है. इस लिए तो न्यूज़ चैनल आजकल रियालिटी शोज का सहारा ले रहे है. आप देख सकते है कि कोई भी न्यूज़ चैनल इससे अछूता नहीं है. खबरों को सबसे पहले ब्रेक करने और लगातार खबरें देने के दबाव और आपाधापी में चैनल खबरें बनाने लगते है. ये जनता के साथ सरासर धोखा है.
आजकल मीडिया का ट्रेंड बन गया है खबर को बढा-चढा कर परोसने का. मीडिया की इस अतिवादिता की चाभी को आप किस तरह लेते हैं ?
(थोडा गंभीर होते हुए)- अपनी सेल वैल्यू को बढ़ाने के लिए न्यूज़ चैनल खबरों की सनसनीखेज पैकेजिंग करते हैं और ऐसा फ्लेवर डालते हैं मानो ये खबर सिर्फ और सिर्फ उनके पास है. इस चक्कर में चैनल वाले जो खबरें तथ्यहीन है उसे भी सनसनीखेज और भयानक रुप से दिखाते हैं. लेकिन ये बहुत ही गलत अप्रोच है. ऐसे मीडिया हाउस लम्बी रेस के घोड़े नहीं हैं. लेकिन मैं आश्वस्त हूं कि आने वाले समय में अच्छे, निष्पक्ष और जनता के हितो को तव्वजो देने वाली खबरे भी आएगी.
राधे श्याम शर्मा जी जो वरिष्ठ पत्रकार है, ने अभी एक बहुत अच्छी बात कही है कि एक दिन वही पत्रकार होगा जो कभी नहीं बिकेगा. जितनी जल्दी बिकोगे उतना कम दाम मिलेगा. इसे कोइ संस्था या शिक्षण संस्थान तय नहीं कर सकता. ऐसे में एक अच्छे पत्रकार को खुद अपनी पत्रकारिता मिशन को टारगेट करना चाहिए. जिसके लिए वो समाज के चौथे स्तंभ के रुप में जाना जाता हैं.
कुछ बात करते है विश्वविद्यालय की प्लेसमेंट सेल पर. विश्वविद्यालय की प्लेसमेंट सेल को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते है. स्टुडेंट का ये कहना होता है कि जब पूरा विश्वविद्यालय एक है. तो फिर एमजे (पत्रकारिता विभाग) के स्टुडेंट का प्लेसमेंट हमेशा गुपचुप तरीके से हो जाता है, जबकी कैव्स (सेंटर फॉर ऑडियो विजुअल स्टडीज) और दूसरे डिर्पाटमेंट के स्टुडेंट सिर्फ हाथ मलते रह जाते है. क्या कुठियाला जी के आने के बाद हम उम्मीद करें की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी?
हां, मुझे इसकी जानकारी मिली है जो ठीक होगा वहीं किया जाएगा. इसपर अभी बात करना ठीक नहीं है. प्लेसमेंट क्षमतावान छात्र-छात्राओं का होना चाहिए. उन्हे इसके लिए खुद लायक बनना चाहिए. मैं कार्यभार संभालने के बाद हर दिन विभाग में दस से ग्यारह बजे तक पर्सनालिटी डेवलपमेंट की क्लास शुरू करवायी है जिससे जल्द ही अच्छे और सकारात्मक परीणम सामने आयेंगे. मैं ग्यारह वर्षों से इन चीज़ों पर जोर देता रहा हूं. उम्मीद है चीज़ें बदलेगी. मेरा जोर प्लेसमेंट सेल नहीं बल्की ऐसी बेस्ट फैकल्टी की तरफ रहेगा जो पढाई के दौरान ही बच्चों की प्रतिभा को तराश ले और उन्हें इनटर्न पर ले जाए.
चलिए ये सवाल आपकी निजी जिंदगी से. पढने के अलावा कुठियाला साहब को और कौन से शौक हैं ?
मैं रात में उपन्यास पढता हुं. मेरा शौक रहता है कि मैं कुछ पढूं. लेटेस्ट फिल्म देखना भी पसंद करता हूं. संगीत से लगाव है. दिनचर्या तो व्यस्त रहती है. इसी में सीरिअल देखने का समय निकाल लेता हूं.
पत्रकारिता के स्टुडेंट के लिए कोइ संदेश ?
बडे सपने देखो. निपुणता बढाओ. कम्प्यूटर में प्रवीणता लाओ. दो भाषाओं पर अच्छी पकड़ बनाओं.पढने से ज्यादा सोचने और विश्लेषण के लिए समय दो. देखो सफलता आपके कदम चूमेगी.
(हर्षवर्धन पाण्डे युवा पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है...समसामयिक विषयो पर लेखन लम्बे समय से करते आ रहे है... आप इनके विचारो को "बोलती कलम ब्लॉग पर भी पढ़ सकते है)
बुधवार, 16 जून 2010
वक्त आ गया विदाई का ...................
दोस्तों माखनलाल विश्वविद्यालय में हम लोगों का दो साल पूरा हो गया .....आज अक्षर पत्सारिया ने कहा कि मिश्रा जी आप लोग जाने वाले हो मुझे बहुत दुःख हो रहा है.....कलेजा मजबूत करके मैंने कह दिया इमोशनल नही प्रोफेसनल बनो....लेकिन मै खुद प्रोफेसनल नही बन पाया.....आगे क्या लिखूं कल क्राईम रिपोर्टिंग का इक्जाम .........बट आई विल मिस यू.........
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